Wednesday, 13 November 2013


कश्ती का खामोश सफर है,शाम भी है तन्हाई भी,
दूर किनारे पर बजती है,लहरों की शहनाई भी,

आज मुझे कुछ कहना है...

लेकिन ये शर्मीली निग़ाहें,मुझको इजाज़त दें तो कहूँ,
खुद मेरी बेताब उमंगें,थोड़ी फुरसत दें तो कहूँ,

आज मुझे कुछ कहना है...

जो कुछ तुमको कहना है,वो मेरे दिल की बात न हो,
जो है मेरे ख्वाबों की मंज़िल,उस मंज़िल की बात न हो,

कह भी दो जो कहना है...

कहते हुए डर लगता है,कहकर बात न खो बैठूँ,
यह जो ज़रा सा साथ मिला है,यह भी साथ न खो बैठूँ,

आज मुझे कुछ कहना है...

कब से तुम्हारे रस्ते में,मैं फूल बिछाए बैठी हूँ,
कह भी दो जो कहना है मैं आस लगाए बैठी हूँ,

कह भी दो जो कहना है...

दिल ने दिल की बात समझ ली,अब मुँह से क्या कहना है,
आज नहीं तो कल कह लेंगे, अब तो साथ ही रहना है,

कह भी दो जो कहना है,

छोड़ो,अब क्या कहना है,

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