Tuesday, 26 November 2013

अ़बस इस जान को हमने, हजारों रोग पाले हैं,
न जाने किस तरह से हम ये नाज़ुक दिल सँभाले हैं,

ये दुनियाँ है वो जिसके वास्ते,सौ जाँ भी दूँ कम है,
मैं हूँ जो फूल तो समझो,ये मेरा प्यारा गुलशन है,

भटकता फिर रहा हूँ शान्त कर लूँ मै जलन दिल की,
मगर पाई ख़बर अब तक न मैंने कोई मंज़िल की,

तुम अपने हाथ दोनों को उठा,उससे दुआ माँगो,
मेरी नाकामियों को राह मिल जाए पता माँगो,

मगर मालूम है मुझको कोई कुछ कर नहीं सकता,
मैं जबतक पा न लूँ उसको यक़ीनन मर नहीं सकता,

बदन जाए बदल लेकिन मुझे क्या मौत आएगी,
अगर आ भी गई पछताएगी,फिर लौट जाएगी,

भटकता फिरता है सूरज,जलन दिल में लिए अबतक,
न जाने क्या लिखा किस्मत में है मंज़िल मिले कबतक,

तड़पता है समन्दर भी, कोई तो दर्द है दिल का,
न जाने क्यों पता उसको,नहीं मिलता है मंज़िल का,

हवा भी सर पटकती है,न पाया उसने साजन को,
चली जाती है यूँ बेताब सी, बस उसके दर्शन को,

मेरी भी प्यास है पानी भरी एक ऐसी बदली की,
जो धरती के लिए खुद को मिटा दे ऐसी पगली सी,

मेरी हर पल ये कोशिश है कभी उसको नहीं भूलूँ,
जो दम निकले तो प्रीतम के लपक कर होंठ मैं चूमूँ,

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