एक राज़ बताया हमें , आँखों की पीर ने,
कितनों को पीर कर दिया दुनिया की पीर ने,
चिड़ियों को चुगते देख रहा था कि अचानक,
हँसकर कटोरा फेंक दिया , एक फकीर ने,
मजबूरियों की आड़ में गिरता चला गया,
रोका तो था बहुत मुझे, मेरे ज़मीर ने,
उस बादशाह का कोई मोहरा नहीं पिटा,
दी मात उसको उसके ही अपने वज़ीर ने,
दामन के दाग़ देख के मैं सोचता रहा,
कैसे रखी सँभाल के चादर कबीर ने,
(पवन दीक्षित)
कितनों को पीर कर दिया दुनिया की पीर ने,
चिड़ियों को चुगते देख रहा था कि अचानक,
हँसकर कटोरा फेंक दिया , एक फकीर ने,
मजबूरियों की आड़ में गिरता चला गया,
रोका तो था बहुत मुझे, मेरे ज़मीर ने,
उस बादशाह का कोई मोहरा नहीं पिटा,
दी मात उसको उसके ही अपने वज़ीर ने,
दामन के दाग़ देख के मैं सोचता रहा,
कैसे रखी सँभाल के चादर कबीर ने,
(पवन दीक्षित)
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