Wednesday, 13 November 2013



दीवारों का जंगल जिसका आबादी है नाम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,

दीवारों के इस जंगल में भटक रहे इंसान,
अपने-अपने उलझे दामन झटक रहे इंसान,

अपनी विपदा छोड़ के आए कौन किसी के काम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,

सीने खाली आँखें सूनी, चेहरों पर हैरानी,
जितने घने हँगामें इसमें, उतनी घनी उदासी,

रातें क़ातिल सुबहें मुज़रिम,मुल्ज़िम है हर शाम,
बाहर से चुप-चुप लगता है, अंदर है कोहराम,

हाल न पूछें दर्द न बाँटे, इस जंगल के लोग,
अपना-अपना सुख है सबका,अपना-अपना सोग,

कोई नहीं जो हाथ बढ़ाकर गिरतों को ले थाम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,

बेबस को दोषी ठहराए,इस जंगल का न्याय,
सच की लाश पे कोई न रोए,झूठ को शीश नवाए,

पत्थर की इन दीवारों में पत्थर हो गए राम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,

- साहिर

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