Friday, 8 November 2013


काम क्रोध और लोभ का मारा जगत न आया रास,
जब-जब राम ने जनम लिया,तब-तब पाया वनवास,

कलयुग तक चलती आई है सतयुग की यह रीत,
सबकुछ हार चुकें जब अपना तब हो राम की जीत,

जुग बदल पर बदल न पाया अब तक ये इतिहास,
जब-जब राम ने जनम लिया,तब-तब पाया वनवास,

छोड़ के अपने महल-दो-महले जंगल जंगल फिरना,
औरों की सुख-चैन की खातिर दुख संकट में घिरना,

यही है राम के लेख की रेखा आ गया अब विश्वास,
जब-जब राम ने जनम लिया,तब-तब पाया वनवास,

राम हर एक युग में आए पर कौन उन्हें पहचाना,
राम की पूजा की जग ने पर राम का अर्थ न जाना,

तकते-तकते बूढ़े हो गए धरती और आकाश,
जब-जब राम ने जनम लिया तब-तब पाया वनवास,

No comments: