काम क्रोध और लोभ का मारा जगत न आया रास,
जब-जब राम ने जनम लिया,तब-तब पाया वनवास,
कलयुग तक चलती आई है सतयुग की यह रीत,
सबकुछ हार चुकें जब अपना तब हो राम की जीत,
जुग बदल पर बदल न पाया अब तक ये इतिहास,
जब-जब राम ने जनम लिया,तब-तब पाया वनवास,
छोड़ के अपने महल-दो-महले जंगल जंगल फिरना,
औरों की सुख-चैन की खातिर दुख संकट में घिरना,
यही है राम के लेख की रेखा आ गया अब विश्वास,
जब-जब राम ने जनम लिया,तब-तब पाया वनवास,
राम हर एक युग में आए पर कौन उन्हें पहचाना,
राम की पूजा की जग ने पर राम का अर्थ न जाना,
तकते-तकते बूढ़े हो गए धरती और आकाश,
जब-जब राम ने जनम लिया तब-तब पाया वनवास,
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