Friday, 8 November 2013

किस तरह भयावह दिखता है,सन्नाटा ये कोलाहल का,
परदे के पीछे परदा है ,बोझल सा स्वारथ का,छल का,

हर नज़र भटकटी फिरती है,हर लहर किनारा माँग रही,
विभ्रम में गुमी जवानी भी, अब एक सहारा माँग रही.

अब बात सुनो आँखें खोलो,ये वक्त तुम्हें कुछ कहता है,
सीने में शान्त उदधि के ही बड़वानल सोया रहता है,

दिन नहीं अभी बीते ज्यादह, देखा था जो प्यारा सपना,
जिसकी खातिर वे कष्ट सहे,कुर्बान किया सब कुछ अपना,

पर आह हुआ छल वृक्ष आम्र पर, ये बबूल के काँटे हैं,
कुछ नहीं किया,सुख नहीं दिया पुण्यात्मा को दुख बाँटे हैं.

है वह विचार धूमिल लगता,तस्वीर का रंग भी फीका है,
दे रक्त इसे सींचो, बाक़ी जो कर्ज बड़ा धरती का है,

अब कदम बढ़ा आगे आओ,ये लगी दृष्टि मंज़िल पर है,
जल रहा आज जो धू-धू कर वह नहीं ग़ैर अपना घर है,

चुका बहुत अब नहीं मात्र सरकार बदलना बाकी है,
शोषण अन्याय गरीबी का आधार बदलना साथी है,

हुलसाता अंतर,जो विचार वह प्रान गहन उस रव का है,
ये पान प्रेम आसव का है, ये गान महा विप्लव का है,

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