भूल की मैंने तुम्हारी बात को जो प्यार समझा,
मृदु हँसी को ही तुम्हारी प्रीत का उपहार समझा,
ले तुम्हारी छवि ह्दय मंदिर सजाता ही रहा मैं,
भूल कर सब कुछ तुम्हारे गीत गाता ही रहा मैं,
रे निठुर तुमको ह्रदय ने प्रेम का अवतार समझा,
भूल की मैंने तुम्हारी बात को जो प्यार समझा,
मृदु हँसी को ही तुम्हारी प्रीत का उपहार समझा,
ले तुम्हारी छवि ह्दय मंदिर सजाता ही रहा मैं,
भूल कर सब कुछ तुम्हारे गीत गाता ही रहा मैं,
रे निठुर तुमको ह्रदय ने प्रेम का अवतार समझा,
भूल की मैंने तुम्हारी बात को जो प्यार समझा,
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