Friday, 1 November 2013


मको आए नहीं जीने के करीने यारो,
जानकर हमने डुबोए हैं सफीने यारो,

मयकशी अपने मुकद्दर में लिखी है तन्हा,
लोग उठ जाए तो हम जाएँगे पीने यारो,

ज़ु्ल्म पर ज़ुल्म सहे लब पे न लाए शिकवा,
ज़ब्त की दाद न दी हमको किसी ने यारो,

डूब जाऊँ कि लगूँ पार ये अपनी किस्मत,,
फिर पुकारा है हमें बहती नदी ने यारो,

आईने साफ करो अपने दिलों के पहले,
जाओ कैलाश कि फिर जाओ मदीने यारो,

हमको आए नहीं जीने के करीने यारो,
जानकर हमने डुबोए हैं सफीने यारो,

(रामेन्द्र त्रिपाठी)

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