मुड़-मुड़ के देखता रहा मैं राहगुजर को,
शायद कोई पयाम मिले मेरी नज़र को,
हसरत ही रही दिल को ऐ साथिया मेरे,
वक्ते-विदा भी तूने नहीं देखा इधर को,
मैं लूटा गया हूँ या खुद लुटा नहीं पता,
गुमसुम उदास दिख रहा दिल दुबका उधर को,
खुद्दारियों का खून करूँ पाऊँ ऐसी जीत,
दिल सीख नहीं पाया कभी ऐसे हुनर को,
शायद कोई पयाम मिले मेरी नज़र को,
हसरत ही रही दिल को ऐ साथिया मेरे,
वक्ते-विदा भी तूने नहीं देखा इधर को,
मैं लूटा गया हूँ या खुद लुटा नहीं पता,
गुमसुम उदास दिख रहा दिल दुबका उधर को,
खुद्दारियों का खून करूँ पाऊँ ऐसी जीत,
दिल सीख नहीं पाया कभी ऐसे हुनर को,
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