Thursday, 15 September 2016

ऐसे टला ट्रेन हादसा

उसकी उम्र चैदह साल थी और वह सातवीं कक्षा में पढ़ता था। नाम था वेंकटेश्वर राव । नारागनी वेंकटेश्वर राव, सीधा सादा भोला भाला, गोल-मटोल मुँह चेहरे से मासूमियत टपकती हुई।
उस दिन रविवार था छुट्टीवाला दिन, इसलिए खाना खा-पीकर उसने एक बैटनुमा लकड़ी उठाई और घर से निकल लिया। बाहर उसके पड़ोस का दोस्त मिल गया। फिर क्या था दोनों चल दिए खेल के मैदान की ओर। वे आपस में बातचीत करते हुए चले जा रहे थे। घर के पास के छोटे रास्ते को पार करते हुए अब वे दोनों रेलवे ट्रैक के किनारे - किनारे चलने लगे। दरअसल रेलवे लाइन के उस पार खेल का मैदान था।
 सारे इलाके के बच्चे वहीं के खुले मैदान में खेलते थे। बड़े बच्चे क्रिकेट खेलते, छोटे बच्चे उसे देखते या खुद किसी छोटी मोटी टीम का हिस्सा बन जाते और किसी कोने में खेलने लगते। छुट्टी के दिन तो सुबह से ही वहाँ बच्चों का जमावड़ा लग जाता।
बस खाने के समय या उससे कुछ पहले बच्चे वहाँ से फुरसत पाकर घर आ जाते। किसी के घर से स्वीकृति मिल जाती तो कोई चुपके से बहाने बनाकर आ जाता। जिन्हें देर हो जाती तब तक उनकी जगह दर्शकों में से किसी से भर जाती। आपके पास खेल का सामान हो या न हो तो भी आप वहाँ जा सकते हैं। आपको खेलने का अवसर मिलने की पूरी संभावनाएं होती हैं।
वेंकटेश्वर और उसके दोस्त तो अक्सर छुट्टी के दिन वहाँ जाते थे। उसके स्कूल ब्रहमपुर के अनेक लड़के वहाँ खेलने आते थे।उनके साथ वेंकटेश्वर को भी खेलने में अच्छा लगता था। इसी सिलसिले में अपनी व मित्रों की बातें करते हुए वे चले जा रहे थे।
तभी रेलवे ट्रेक के किनारे एक प्लास्टिक की खाली बोतल पर वेंकटेश्वर की नजर पड़ी। हाथ में पकड़ी लकड़ी से अनायास ही उसने उसमें चोट मार दी। बोतल लड़खड़ाती हुई आगे पत्थरों के पास गिरी। आगे बढ़कर उसने उसको फिर हिट किया तो हवा में उछलती बोतल रास्ते के बीचोंबीच गिरी। वेंकटेश्वर ने उसमें फिर लकड़ी की चोट मारी तो बोतल उड़ती हुई रेलवे ट्रेक के बिलकुल बीच में जा गिरी। वह उसे उठाने के लिए फिर आगे बढ़ा। अब उसे इस खेल में मजा आने लगा था।
पहले उसने अपने दोस्त को ही बोतल उठाकर लाने के लिए इशारा किया। लेकिन उसके दोस्त ने मुँह पिचकाते हुए उससे कहा - ‘ छोड़ यार ! चलते हैं जल्दी, देर हो रही है।’
‘अभी चलते हैं’- कहता हुआ वेंकटेश्वर बोतल उठाने के लिए ट्रैक के बीच पहुँचा।
अचानक उसकी नजर पटरी के बीच पड़े खाली स्थान पर गई। पटरी के बीच कम से कम छह इंच का टुकड़ा था ही नहीं । उसने जल्दी से अपने मित्र को पास बुलाकर दिखाया और कहा - देख, इससे तो दुर्घटना हो सकती है। हमें इसकी खबर केबिन मैंन को करनी चाहिए।’
उसका दोस्त झुँझला गया और बोला - ‘ट्रैक टूटा है तो टूटा रहे, हमें क्या? चलो खेलने चलते हैं।’
‘नहीं’ हमें इसकी सूचना देनी चाहिए।’ मैं तो जाऊँगां’। - वेंकटेश्वर बोला।
‘तो तू जा, मैं तो चला खेल के मैदान में, खबर करके वहीं आ जाना।’ - उसका दोस्त यह कहकर आगे बढ़ गया।
वेंकटेश्वर उस भयावह पल की कल्पना करके काँप गया, जब उस ट्रैक पर कोई गाड़ी आ जाएगी और दुर्घटना हो जाएगी। अगर उसने समय रहते यह सूचना न पहुँचाई तो उस संभावित भयंकर दुर्घटना का जिम्मेवार वह स्वयं को समझेगा।यह सोचकर वह तेजी से केबिन की ओर दौड़ पड़ा।
केबिन उससे एक सौ पचास गज की दूरी पर था। वह दौड़ता हुआ केबिन के निकट जा पहुँचा। उसे उस समय वहाँ कोई दिखाई नहीं दिया। उसने आवाज भी लगाई,मगर कोई उत्तर न पाकर वह वहाँ से आगे की ओर दौड़ गया।केबिन मैन शायद वहाँ नहीं था या संभवता उस तक बच्चे की आवाज नहीं पहुँच पाई। जो भी हो।
अब वेंकटेश्वर आगे ही आगे दौड़ता चला जा रहा था। उसका लक्ष्य पेड़ना रेलवे स्टेशन था जो वहाँ से सामने दिखाई दे रहा था। उसके पैरों में मानो पंख लग गए। जब वह हाँफता हुआ प्लेटफार्म पर चढ़ा तो उसकी नजर सीधी स्टेशन मास्टर के कमरे की ओर थी।
उसे तेजी से इस तरह भागते देख कई लोग उसकी ओर देखने लगे क्योंकि उस समय कोई ट्रेन प्लेटफार्म पर नहीं थी। मगर उसने उन सब की परवाह नहीं की। जब वह धड़धड़ाते हुए स्टेशन मास्टर के कमरे में घुसा तो कुर्सी पर बैठे स्टेशन मास्टर चैंक गए और प्रश्नसूचक निगाहों से उसकी ओर देखने लगे।
वेंकटेश्वर के मुँह से टूटे - फूटे शब्दों में निकला - ‘वह... वहाँ...टूटा है।’
स्टेशन मास्टर ने पूछा - ‘अरे’ जरा साँस तो ले लो। क्या कहाँ टूटा है ?’
इतनी देर में अपनी साँसों को व्यवस्थित करते हुए वेंकटेश्वर स्टेशनमास्टर से फिर बोला -‘ट्रैक... ट्रैक टूटा है आगे, आने वाली गाड़ी को रोक दो।’
स्टेशनमास्टर ने चैंकते हुए पूछा - ‘कहाँ, किस जगह की बात कर रहे हो?’
‘यहीं केबिन से थोड़ा आगे,पटरी के बीच खाली जगह है।’ - वेंकटेश्वर के स्वर में दृढ़ता थी।
स्टेशन मास्टर ने एक नजर अपनी घड़ी पर डाली फिर वेंकटेश्वर की ओर देखा उन्हें लगा, हो न हो ये लड़का सच बोल रहा हो। अभी गुड़िवाड़ा पैसिंजर के आने में समय है। तब तक ट्रैक की जाँच करवा लेते हैं।
स्टेशन मास्टर को सोच में पड़े देख वेंकटेश्वर ने एक बार फिर कहा - ‘सर, आने वाली ट्रेन को रोक दो।’उसे लगा बच्चा समझकर स्टेशन मास्टर उसकी बात पर कहीं ध्यान न दें।
स्टेशनमास्टर तेजी से एक्शन में आ गए उन्होंने तुरंत ट्रैक की जांच करने वाले कर्मचारियों को बुलाया। फिर वेंकटेश्वर की ओर इशारा करते हुए कहा - ‘इस लड़के के साथ जाओ और देखो, ट्रैक कहाँ खराब है। केबिन के आगे ट्रैक में कहीं कोई गड़बड़ है। जल्दी देखकर मुझे सूचना दो। गुड़िवाड़ा पैसिंजर आने वाली है। मैं यहाँ तुम्हारी खबर का इंतजार कर रहा हूँ।
 वेंकटेश्वर उनके साथ तुरंत चल पड़ा। उसे खुशी थी कि स्टेशन मास्टर ने उसकी सूचना पर एकदम भरोसा नहीं किया तो उसे गलत भी नहीं माना। उन्होंने तथ्यों की जाँच के लिए इन कर्मचारियों को उसके साथ भेज दिया। अब वह उन कर्मचारियों को बता रहा था कि कैसे वह केबिन मैन को बताने गया था मगर उनके न मिलने पर वह दौडता हुआ पेड़ना स्टेशन मास्टर के कमरे में पहुँचा।
बातों - बातों में वे केबिन से आगे उस स्थान तक आ पहुँचे। टूटे टैªेक को देखते ही रेलकर्मियों ने स्टेशन मास्टर को सूचित किया कि वास्तव में वेंकटेश्वर की खबर बिलकुल सही थी। टैªेक में खराबी थी। आने वाली गाड़ी को रोक दिया जाए। स्टेशन मास्टर ने गुड़िवाड़ा से पेड़ना आ पहुँची, पैसेंजर ट्रेन को लाल सिग्नल दिखाकर रोका दिया।
 स्टेशन के पास तक आ पहुªँची ट्रेन के रुक जाने से यात्री उतर - उतर कर आने लगे। कारण जानने पर उन्हें पता लगा कि नन्हें साहसी बालक की सूझबूझ के कारण एक टेªन हादसा होने से बच गया। सभी वेंकटेश्वर की प्रशंसा करने लगे। लगभग एक घंटे बाद ट्रैक सही होने पर ट्रेन आगे बढी।
अगले दिन ‘वार्ता’ समाचार एजेंसी ‘आंध्र ज्योति’ ‘आंध्र भूमि’ ‘विशाल आंध्रा’ आदि अनेक समाचार पत्रों में वेंकटेश्वर की साहस और सूझबूझ की सराहना करते हुए घटना का विवरण प्रकाशित किया। पेड़ना की म्यूनिसिपल चेयरपर्सन पद्मजा कुमारी व उसके वार्ड कौंसलर वी. वेणुगोपाल राव ने वेंकटेश्वर के साहस को सलाम करते हुए उसे सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया।
गणतंत्र दिवस के अवसर पर पुलिस परेड ग्राउण्ड में सारे जिले के गणमान्य लोगों के बीच वेंकटेश्वर की सूझबूझ धैर्य और हिम्मत की तारीफ करते हुए जिलाधिकारी के. प्रभाकर रेड्डी ने प्रशंसा पत्र प्रदान किया। इस अवसर पर उन्होंने वर्ष 2000 में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार प्राप्त तेरह बर्षीय बालक त्रिनाथ को भी याद किया, जिसने इसी प्रकार टूटे ट्रैक की सूचना सही समय पर देकर एक बड़ी दुर्घटना होने से बचाई थी।
विद्यालय के प्रधानाचार्य व जिलाधिकारी द्वारा वेंकटेश्वर का नाम भी राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार के लिए राष्ट्रीय बाल कल्याण परिषद नईदिल्ली भेजा गया। नारागनी वेंकटेश्वर राव को 2005 में यह पुरस्कार देश के प्रधानमंत्री जी ने अपने हाथों से प्रदान किया।
नन्हे दोस्तो -
मुðी में हम किस्मत रखें, मंजिल पर हों अपने पाँव,
घर से दूर रहें या घर में,रहें शहर में या हो गाँव,
चाहे तूफाँ बिजली कौंधे, हो कैसी भी आगे बाधा,
मर्जी होगी अपनी पूरी,कर लें मन में अगर इरादा।




         

दूसरी आकाशगंगा से

शाम होते ही सलीम नंदिनी और स्टेला बरगद के पेड़ के नीचे पहुँच गए। उन्हें राजू का इंतजार था। जो आज उन्हें अपना सपना सुनाने वाला था।
राजू ने आते ही कहा - ‘दोस्तोे, इस बार मेरी आँख लगी तो मैंने खुद को वीरान टापू पर पाया। चारांे ओर उभरी हुई पहाड़ियाँ.. सामने से आता सागर की लहरों का हल्का-हल्का शोर... अभी मैं सोच रहा था यह कौन सी जगह है, मैं यहाँ से बाहर कैसे जाऊँगा?
तभी सामने सागर की रेत से ऊँचे - ऊँचे बुलबुले उठने लगे। देखा कीचड़ से एक आकृति निकलकर बाहर आ रही है।
‘वह एक टेबिल लैंप की तरह थी। उसका चेहरा कीचड़ में पूरी तरह सना हुआ था। एकाएक उसके रोम -रोम से पानी के फुहारे से छूटने लगे जिसमें उसका पूरा शरीर धुल गया। वह एक विचित्र प्राणी था जैसा मैंने पहले नहीं देखा था।’
अचानक उसकी आवाज सुनाई दी - ‘कैसे हो राजू’?’
‘मैंने उससे डरते - डरते पूछा, ‘आप कौन हैं ?’ ‘आपको मेरा नाम कैसे पता?’
उसने जबाब दिया -‘राजू मुझे अपना दोस्त समझो।’
मैंने कहा -‘ऐसी अजीबोगरीब शक्ल का प्राणी मैंने पहले नहीं देखा।’
उसने मुस्कराते हुए कहा -‘राजू तुम्हारी पृथ्वी पर ऐसे अनेक जीव मौजूद हैं, जिन्हें किसी भी मनुष्य ने नहीं देखा। मैं तो ठहरा दूसरी आकाशगंगा का प्राणी...
‘दूूसरी आकाशगंगा’... मैने पलकें झपकाईं।
उसने कहा - ‘राजू तुम्हें पता है हमारा ब्रह्मांड कितना बड़ा है इसका कोई ओर - छोर नहीं। इसका कोई अंत न पाकर इसका नाम ही अनंत रख दिया गया है।
उसने आगे कहा -‘तुम्हारी पृथ्वी जिस तारे के चक्कर लगाती है, वह सूर्य तो बहुत छोटा तारा है तुम्हारी आकाशगंगा का।
ऐसी लाखों करोड़ों में से एक आकाशगंगा से मैं आया हूँ।
ओह ! मगर तुमने इतनी दूरी को कैसे पार किया - मैंने प्रश्न किया।
वह बोला- ‘राजू, हमारा विज्ञान तुम्हारी धरती से कहीं आगे है। इसलिए यह कोई समस्या नहीं।
‘कैसे ? -मैंने पूछा।
उसने कहा - ‘ऐसे समझो, धरती का जल, बर्फ पानी और भाप यानी ठोस द्रव व गैस के रूप में तापमान के हिसाब से बदल जाता है। तुम्हें पता है हमारा शरीर किन पाँच तत्वों से मिलकर बना है ?’
‘पानी ,मिट्ठी, अग्नि, वायु और आकाश’- मैंने जल्दी से जबाब दिया।
उसने बताया - ‘बिलकुल ठीक, हमारे ग्रह पर भी ऐसा ही है। हमने विज्ञान की मदद से ऐसी तकनीक विकसित की कि हम खुद को इन पाँच में से किसी भी तत्व में बदल सकते हैं।‘
‘ऐसा क्या ? - मैं हैरान रह गया।
 वह आगे बोला -‘अभी मैं खुद को हवा में बदल कर तुम्हारे आसपास मौजूद रहूँगा या सागर की इन लहरों में मिल कर बहने लगूँगा और तुम्हें पता भी नहीं चलेगा।’
यह कहते कहते वह एकदम से गायब हो गया। जरा सी देर में वह फिर दिखाई देने लगा। मैं हैरान था।
मैंने पूछा लेकिन तुम जीने के लिए प्राणशक्ति कहाँ से लेते हो ?
उसने मुस्कराते हुए जबाब दिया -यह बहुत अच्छा प्रश्न पूछा तुमने... हम अपनी प्राणशक्ति उन पाँच तत्वों में से किसी एक तत्व से ले सकते हैं।
‘जैसे’ ? - मैंने हैरान होते हुए पूछा।
उसने बताया -‘तुम हवा से साँस लेते हो, जबकि मैं हवा, पानी, मिट्टी, अग्नि और आकाश यानि शून्य निर्वात से भी जीवनी शक्ति ग्रहण कर सकता हूँ।’
‘ओह, मुझे याद आया। मैंने एक फिल्म में दूसरे ग्रह के प्राणी को धूप यानि अग्नि से जीवनी शक्ति पाते देखा था।’ - मैंने कहा।
उसने मुझे आगे बताया -‘ये जो बाल देख रहे हो न मेरे ...
‘मैंने उसके बालों की ओर ध्यान से देखा तो मुझे वे बाल कुछ-कुछ उस बाली जैसे दिखे जिसे हम लोग एक दूसरे की पीठ पर फेंककर चिपका देते हैं। ऐसे पतले-पतले सैकड़ों बाल उसके सिर पर थे।’
हाँ - मैंने कहा।
वह बोला-‘दरअसल यह बाल नहीं हैं।’
‘हंय...तो फिर’? - मैंने आश्चर्य से पूछा।
‘ये प्राणशक्ति से भरे सिलैंडर हैं। जिनमें एक-एक में सैकडों साल का ईंधन भरा हुआ है।’ - उसने बताया।
‘सैकड़ों साल... आपकी उम्र क्या है’ ? मैंने हैरान होकर पूछा।
उसने ठंड़ी सांस भरते हुए कहा -‘चलो मैं शुरू से ही तुम्हें बताता हूँ। राजू, हजारों साल पहले हमारा ग्रह भी तुम्हारी पृथ्वी की तरह विविध वनस्पतियों, जीव जंतुओं से भरपूर था।’
 उसने बताया -‘हमारे यहाँ अनेक दुधारू पशु थे। वैज्ञानिकों ने देखा ये चारा खाते है फिर उसके पेट में कुछ ऐसी रासायनिक क्रियाएं होतीं हैं जिनसे वह चारा दूध में बदल जाता है। उन्होंने सोचा क्यों न हम एक ऐसी मशीन बनाएं जिसमें उनके पेट जैसा वातावरण हो। वे उसमें चारा डालें और दूध बना लें। उन्होंने बना ली।
फिर सोचा आखिर चारे पर भी निर्भर क्यों रहा जाए। चारा भी तो हवा में मौजूद तत्वों से पोषकता ग्रहण करता है। क्यों न हम हवा से सीधे ऐसे पोषक तत्वों को ले लें, जो हवा से चारे ,चारे से गाय और गाय के दूध के जरिए हमें मिलते हैं।’
मेरा मुँह खुला रह गया।
यही नहीं उन्होंने मछलियों से मिलने वाले प्रोटीन को भी सीधे लेना शुरू दिया। जो वे समुद्री वनस्पतियों को खाकर पातीं थीं। वनस्पतियाँ सागर के पानी से और सागर का पानी वातावरण से...
 मगर इससे प्रकृति का चक्र धीरे - धीरे बिगड़ता चला गया। और लंबे समय में ये जीव जंतु वनस्पतियाँ कम होते गए, और ...
और क्या हुआ ? मैंने पूछा।
...और एक दिन यह जीवन चक्र खत्म हो गया। अब हमारा ग्रह सूना है। हमारी उम्र हजारों साल है। कभी पुराना समय याद आता है तो मैं तुम्हारी इस धरती पर आ जाता हूँ।
यानी अब से पहले भी आते रहे हो यहाँ ? - मैंने आश्चर्य से पूछा।
हाँ, अक्सर ... कई बार आता रहता हूँ। - उसने कहा
मैंने पूछा -  अच्छा, वो यू एफ ओ यानी उड़नतश्तरियों के जरिए...
नहीं, नहीं, मैंने कहा न अभी तुमसे जब तक हम न चाहें कोई हमारे बारे में नहीं जान सकता। - उसने बताया।
मगर मैंने तो जान लिया है तुम्हारे बारे में ...- मैंने जब ऐसा बोला तो वह मुस्कराया।
‘राजू,मत भूलो तुम यह सब सपने में देख रहे हो। -उसने कहा।
‘तो, तुम कहना क्या चाहते हो ?’ मैंने जब यह प्रश्न किया तो वह हँसने लगा।
बोला - ‘सपने की इस बात पर भला कौन विश्वास करेगा। शायद तुम्हें यह भी नहीं पता कि तुम्हें मैंने ही सपने में बुलाया है।’
-आप मेरी भाषा में कैसे बोलते हो ?
‘ये बुलबुले देख रहे हो। इनसे होकर किसी भी भाषा की तरंगें मेरे पास आएंगी, मेंरी भाषा में बदल जाएंगी।
हाँ, कमल, मैं भी उसकी इस बात पर जोर से चैंक पड़ा जिससे मेरी आँख खुल गई।
‘ओह’ - सभी बोल पडे।
‘अब तुम्हें अपने सपने में वह कब बुलाएगा ?’ - अचानक नंदिनी ने राजू से पूछा।
‘क्यों ? ’ - कमल ने नंदिनी से पूछा और सब उसकी ओर देखने लगे।
- ‘मुझे तो उपहार में उसके वे बुलबुले चाहिए जिनसे अपने देश की सैकड़ांे बोलियों और भाषाओं में बिखरे बाल साहित्य को हिंदी में सुन सकूँ।-स्टेला ने कहा।
अपने देश ही क्यों दुनिया के सारे देशों के बाल साहित्य को क्यों नहीं ? -    राजू बोला।
‘बाल साहित्य ही क्यों, जितनी अलिखित विरासत है वह सारी की सारी संग्रहीत होनी चाहिए।’- स्टेला ने जल्दी से कहा।
सलीम ने कहा - ‘दोस्तो,जब हमें आइडिया मिल ही गया है तो क्यों न हम खुद इस तरह का यंत्र बनाने का प्रयास करें।
सलीम ने कहा - ‘दोस्तो, वैसे हमारे ब्रहमाण्ड में ऐसे ग्रह जरूर हो सकते हैं जिनमें विज्ञान हमसे आगे हो।
‘कुछ भी कहो, ये सपना था बहुत मजेदार’ - नंदिनी ने कहा तो सबने सहमति में सिर हिलाया
इस तरह वे सभी राजू के सपने में दूसरे ग्रह से आए मेहमान के बारे में बातें करते हुए घर की ओर चल दिए।


         
   कनउजी लोकोक्तियों में नारी

लोकोक्ति वह झरोखा है जिसके माध्यम से हम तत्कालीन समाज के आंतरिक स्वरूप को समझ सकते हैं। जहां हमारे ग्रंथों में यत्र नार्यस्तु पूजंते रमते तत्र देवता  लिखा गया वहीं हिंदी साहित्य में प्रसादजी की ‘नारी तुम केवल श्रद्धा हो  से लेकर मैथिलीशरण गुप्तजी की ‘आंचल में है दूध और आंखों में पानी’ व निरालाजी की ‘वह तोड़ती पत्थर, देखा मैंने उसे, इलाहाबाद के पथ पर ... तक हमें नारी के विविध रूपों के दर्शन होते हैं। मगर इन सब से अलग कनउजी लोक साहित्य की लोकोक्तियों में नारी जीवन के विविध पहलुओं का जितना विशद मनोवैज्ञानिक व्यवहारिक रूप दिखाई देता है वह अपने आप में अनूठा है।
पुत्री, बहन, पत्नी मां व अन्य सामाजिक संबंधों में नारी को लेकर अनेक लोकोक्तियां प्रचलित हैं जिनके परिपेक्ष्य में नारी की सामाजिक स्थिति को बखूबी देखा जा सकता है। हमारे ग्रामीण समाज में लड़कियां जबतक पिता के घर में रहतीं हैं उनका बिना बनाव श्रंृगार के साधारण रूप में रहना उचित माना गया है। तभी तो कहा जाता है कि- ‘बाप की बेटी ,गूदर लपेटी,
परंतु जब यही लड़की ब्याह कर ससुराल आ जाती बहू बन जाती है तो उसका बनाव श्रंृगार उचित और लोक सम्मत होता है और कहा जाता है - लीपे पोते देहरिया और पहने ओढ़े मेहरिया,
गोकि लोकोक्तियों के शाब्दिक अर्थ ही नहीं होते उनके व्यापक अर्थ होते हैं। इनका प्रयोग जीवन के विविध क्षेत्रों में मिसाल के तौर पर किया जाता हैं। महिलाओं की वाचालता यानि अधिक बोलने की आदत की खासी आलोचना होती रही है। इस दृष्टि से कनउजी लोकोक्तियों में कई उदाहरण मिलते हैं।
जैसे-‘चटोर फोरै अपनो घरा, बतोर फोरै चार घरा,
 यानि कि चटोर स्त्री तो अपने घर को ही फोड़ती यानि अपने घर का ही नुकसान करती है जबकि वाचाल स्त्री चार घरों को फोड़ती है और जब तोड़ने फोड़ने की बात होगी तो जाहिर सी बात है कि ऐसी प्रवृत्ति की आलोचना भी होगी। कुछ महिलाएं जो अपने ऐसे स्वभाव के कारण विशेष तौर पर जानी जाती रहीं हैं और जिन पर कहने सुनने का कोई असर नहीं होता उन पर तीखे व्यंग्य लोकोक्तियों के माध्यम से किए गए।
एक उदाहरण देखें -‘दुतो दुतो कहां चलीं, खसम पूत कुसवाउन चलीं,
 अर्थात इधर की बातें उधर करने की आदत वाली स्त्री घर से निकल कर चल दी है। अब ये अपनी आदत के मुताबिक चुगली करेंगी और लोग इसके पति और पुत्र को कोसेंगे।
विवाह के बाद घर में परिवार की स्थितियों में बड़ा परिवर्तन आता है। जीवन के नए क्षेत्र में प्रवेश करने वाला नवयुवक द्वंद्व में फंस जाता है। उसके एक ओर जन्म देने वाली मां होती है जिसने पाल पोस कर इतना बड़ा किया होता है और दूसरी ओर होता है जवान उम्र का सहज आकर्षण। इस द्वंद्व में तलवार की धार पर चलता युवक व नववधू जरा भी संतुलन बरकरार रखने में चूके कि सुनने को मिलता है -
‘जब से आई कनलगू, तब से छूटी थनलगू,
सामाजिक मनोविज्ञान की दृष्टि से कनउजी लोकोक्तियों में नारी संबंधी सामाजिक रिश्तों पर भी प्रकाश पड़ा है। बेटे का बेटा और बेटी का बेटा दोनों के साथ किए गए व्यवहार में कहीं न कहीं सोच का अंतर साफ झलकता है। अगर ऐसा न होता तो भला लोक में यह उक्ति प्रचलन में क्यों आती -
‘पूत को पूत करेजे को टूक, धिय को पूत को पूत कठौती को टूक,
यानि बेटेे का बेटा तो कलेजे का टुकड़ा और लड़की का बेटा लकड़ी का टुकड़ा, इसके पीछे अन्य कारण तो होंगे ही साथ ही वंश परंपरा का नाम चलना, मोक्ष, पितृ तर्पण जैसी धार्मिक मान्यताओं का जुड़ाव तो लगभग साफ ही दिखाई देता है।
यह लोकोक्ति-
‘गिनन मैं न गूंथन मैं, मैं दूल्हा की मौसी,
 रिश्तों की सामाजिक मान्यता को, उसके पारिवारिक जीवन में महत्व को जहां प्रदर्शित करती है वहीं बहन के घर में भाई कुत्ता और ससुर के घर में जमाई...
कहकर कटु शब्दों में ऐसे रिश्ते को निंदित किया है। लोक मत के अनुसार ये लोग वहां ज्यादा दिन तक रहे तो सम्मान नहीं पाते।
यद्यपि आज समय बदल चुका है कनउजी समाज की नारी अपनी पारंपरिक छवि को तोड़कर उससे बाहर आने की भरपूर कोशिश कर रही है। हमारे भारतीय समाज में भला है बुरा है जैसा भी है मेरा पति मेरा देवता है वाली स्थिति रही है। ऐसे में आम परिवारों में पत्नी को खाने को दो वक्त की रोटी और पति का साथ मिलता रहे वह भी उसके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि से कम न था। लोक में प्रचलित यह उक्ति अपनी कहानी आप कह रही है- ‘अन्न की खक्क पिया की गारी ,जे ना मिटियौ नाथ हमारी’
इसका अर्थ है हे ईश्वर, मेरे घर में कभी खाद्यान्न की और मेरे पति की गालियों की कमी न रहने देना। यह लोकोक्ति पुरुष प्रधान समाज के अहम को तो संतुष्ट करनेवाली है मगर समाज में नारी की किस दयनीय स्थिति को प्रकट कर रही है, यह स्पष्ट है। वास्तविक स्थिति तो यह है कि हमारे समाज ने नारी को देवी कहकर दासी का दर्जा दिया है और उससे बिना अधिकार वाली रानी के जैसा व्यवहार किया है। नारी की परवशता उसकी शिक्षा और आथर््िाक स्वतंत्रता से दूर हो सकती है।
महिलाओं की वाचालता उनकी श्रृंगारप्रियता पर अनेक लोकोक्तियां कनउजी समाज में प्रचलन में रहीं हैं। कुछ उदाहरण  देखें - ‘ऐसे पै तौ ऐसी, काजर दए पै कैसी’
पीतर की नथनी पै इतनो गुमान, जो कहु सोने की होती तौ चलती उतान,
डेढ़ बाल कनपटी पै जूड़ा
दरअसल ये सीधे-सीधे बनाव श्रंृगार की उक्तियां न होकर सामाजिक तानेबाने में रची बसी अनेक स्थितियों का प्रतिबिम्बन हैं।
ऐसा नहीं कि महिलाएं ही आलोचना के शिकार हुए हैं वाचाल पुरुष भी लोक की वक्रदृष्टि से बच नहीं सके हैं। पुरुषों की ऐसी अनेक प्रवृत्तियों पर अंकुश के रूप में नीति का यह दोहा प्रचलन में है-
ढ़ीले हाथ कुल्हाड़ी मारै,
हंस के मांगै दम्मा,
पर तिरिया सै करै मसखरी,
तीनौैैैैैैैैै काम निकम्मा,    
यानि कि ढ़ीले-ढाले हाथों में कुल्हाड़ी पकड़कर लकडी़ चीरना, अपने दिए गए पैसों को हँसकर मांगना, दूसरे की स्त्री से मसखरी करना, ये तीनों काम निकम्मों के हैं।
सामाजिक कुप्रथाओं और रूढ़ियों पर भी लोकोक्तियों के माध्यम से प्रहार किए गए हैं। जैसे बेमेल विवाह को लेकर यह उक्ति देखिए-
जब बीबी भईं खाट कौ,
तब मियां चले घाट कौ,
बहुविवाह पर भी आक्षेप करती हुई यह उक्ति भी दर्शनीय है -
कांटो बुरो करील को,
औ बदरी को घाम,
सौत बुरी है चून की,
औ साझे को काम,
कनउजी लोक में उक्ति के रूप में ऐसे कहते हैं कि ‘सौत तौ चूनौ की नाहीं भली’ और ‘साझे की हंड़िया चैराहे पै फूटत’
समाज में विधवा नारी की स्थिति भी शोचनीय रही है। ऐसे में आर्थिक और धार्मिक रूप से परतंत्र बेसहारा नारी पर दया और सहानुभूति तो परिवार और समाज की होती है लेकिन उसका अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं होता। जैसा कि यह लोकोक्ति स्वयं बयान कर रही है। कहते हैं -रांड कौ मांड़ै को आसरो,
मांड़ चावल के धोए हुए पानी को कहते हैं। प्राचीन परंपराओं रूढ़ियों की संवाहक बूढ़ी अनुभवी स्त्रियों की अपेक्षा नई रोशनी की बहुओं के बीच पाढ़ियों के अंतर्विरोध हमेशा से ही मुखर रहे हैं। जैसे कि इस लोकोक्ति में कहा गया है - ‘नौ सौ खेल बसंतो खेलैं,तिन्हैं सिखावैं चंदो,
मां और पत्नी के दो नारी रूपों के संबंधों को रेखांकित करती यह लोकोक्ति उनके मनोवैज्ञानिक स्वरूप को उदघाटित कर रही है। जरा देखें -‘अम्मा टटोवै पेट,मेहरिया टटोवै फेंट
बाहर से थका हारा व्यक्ति जब घर लौटता हैं तो मां उसके खाली पेट को देखती है सोचती है कि वह भूखा होगा जबकि पत्नी उसकी जेब देखती है कि कितना कमा कर लाया है। सास और बहू के पारस्परिक अंर्तद्वंद्व को देखकर ही शायद यह उक्ति प्रचलन में आई होगी-‘सास मरी बहू को ठौर’
महिलाओं की वाचालता को लेकर बहुत कुछ कहा जाता है अक्सर ऐसे में मनमुटाव व पारिवारिक संघर्ष भी देखने को मिलते रहे हैं। सामाजिक जीवन में यह दृश्य आम हैं। तभी तो कहा जाता है-‘भुस मैं आगी बार जमालो दूर भई’
महिलाओं की वाचालता या छिद्रान्वेषी आदत धीरे-धीरे उनका स्वभाव बन गई। इसके पीछे के कारणों पर गौर करें तो हम पाएंगे कि समाज के इस आधे हिस्से को हमने सिर्फ चूल्हे चैके तक ही महदूद कर दिया। उसकी जीवन उर्जा को निकलने का उचित मार्ग भी नहीं दिया। वह उर्जा इसी प्रकार विकृत होकर क्षरित हुई। पुरुष समाज ने गाली भी उसी को दी जबकि वह ही इसका जिम्मेदार था। ऐसी प्रवृत्ति पर ही तो यह लोकोक्ति कही गई है- कानी अपनो टिटरो नाहीं देखत,दुसरे की फुली निहात्त,
यानि अपना बड़ा दोष भी न देखना बल्कि दूसरे का छोटा दोष भी बहुत बडा करके बताना।
कनउजी लोकोक्तियों में नारी संबंधी उक्तियों को देखने से पता चलता है कि इनमें नारी के मां रूप को सर्वाधिक सम्मान से देखा गया है। सारी आलोचनाओं के बावजूद नारी की क्षमताओं का दायरा इतना विस्तृत है कि इसके महत्व को नकारा नहीं जा सकता। जरा देखे यह लोकोक्ति तो जैसे अपनी कहानी आप कह रही है-
अम्मा पिसनहारी हुय के लरिका पाल लेत, बाप लखपती हुय के नाहीं पाल पाउत,
‘आस को बाप निराश की अम्मा’ नारी के विशाल मन और सम्माननीय क्षमताओं की ओर ही इंगित है।
संक्षेप में हम देखते हें कि कनउजी लोकोक्तियों में नारी जीवन के विविध पहलुओं उसकी सामाजिक स्थिति के बारे में बहुत जानकारी मिलती है। अभी तक उसके विचारों भावनाओं को विश्व समाज में वह स्थान नहीं मिला जिसकी वह अधिकारिणीं है। धीरे-धीरे सामाजिक जागरूकता के आते स्थिति में परिवर्तन भी आते जा रहे हैं। विख्यात ‘द सेकेंड सेक्स’ पुस्तक के अध्ययन से पता चलता है कि विश्व के सभी समाजों में कमोवेश यही स्थितियां हैं। देखिए निम्न लोकोक्ति समाज के इसी पुरुषवादी रवैए को तो दर्शाती है-
जोरू जोर की,नही तो और की,
आज तो बदले समय में पैर की जूती वाली उस छवि से निकलती हुई नारी आज हिमालय के शिखरों पर, सुदूर अंतरिक्ष में झंड़े फहरा रही है। विश्व के सभी समाजों में शैक्षिक आर्थिक व सामाजिक जागरूकता के आते उनकी स्थितियों में परिवर्तन आता जा रहा है।          
इस प्रकार हम देखते हैं कि कनउजी लोकोक्तियों में नारी के कई रूप उजागर हुए हैं। विभिन्न कुप्रथाओं रूढ़ियों व कुप्रवृत्तियों पर चोट की गई है। हल्के रूप में ये व्यंग्योक्तियां कनउजी समाज की तात्कालिक तस्वीर प्रस्तुत करने में सहायक हैं।


         

Friday, 8 July 2016

आसमान में छाए बादल,
जल भर भर कर लाए बादल,
लगता अब ये नहीं रुकेंगे,
कितना ऊपर और झुकेंगे,
ताल तलैया सब प्यासे थे,
आना ही था चौमासे थे,
धूल भरे थे पेड,नहाएं,
बच्चे घर से बाहर आएं,
ठंडी हवा बदन को भाती,
तन और मन दोनों सिहराती,
तबियत खुश कर जाए बादल,
आसमान में छाए बादल,
रोज झेलते घोर प्रदूषण,
सड़कों के ये प्यारे फूल,
जहर पी रहे हँसते-हँसते,
सारे जग से न्यारे फूल,
खिले-खिले चेहरे लेकर ये,
स्वागत करते हम सबका,
भले इन्हें हम नहीं सराहें,
फिर भी गिला नहीं दिखता,
हाथ हिला अभिवादन करते,
कैसे मस्त रहे हैं झूल,
जहर पी रहे हँसते-हँसते,
सारे जग से न्यारे फूल,
झूम रहे हैं, झूल रहे हैं,
जब - जब तेज हवा चलती,
खुश हो-होकर हाथ हिलाते,
कोई गाड़ी तेज निकलती,
खुश रहना हर हाल में हमको,
काँटे मिलें मिलें या फूल,
जहर पी रहे हँँसते-हँसते,
सारे जग से न्यारे फूल,
रंग कहाँ से लाती इतने,
सुंदर पंखों वाली,
सब दिन रहो फुदकती,
फिरती इस डाली उस डाली,
कभी हमें ले चलो घुमाने,
अपने गाँव शहर में,
कहाँ बैठ गाने गाती,
गर्मी की दो पहर में,
बारिश में भीगती, न मिलती,
दूर -दूर तक छाँव,
सर्दी में बिन स्वेटर कैसे रहती,
भला बताओ,
समय बिताती हो तुम कैसे,
जब होती हो खाली,
रंग कहाँ से लाती इतने,
सुंदर पंखों वाली,
र श्मियां बिखेरूँगा दीप्त भाल की तेरे,
ज ख्मों का मरहम मैं लाऊँगा खोजकर,
नी रस इन भावों की बंजर इस धरती पर,
कां हाँ की वंशी से पत्थर को तोड़ कर,
त न्हाई के दुखों को सहते, बेबस इन,
प्रा णहीन जिस्मों में फूकूँगा शक्ति नई,
न मक हराम सारे बनेंगे नमक हलाल,
दे खेगी दुनियाँ, रूप वो अनूप दूँगा,
श पथ लाऊँगा समूल सागर निचोड़ कर,
प ल-पल जो तड़पाते, विष के उपचार हेतु,
र ह-रह जो ग्रसते हैं, चन्द्र मेरा राहु केतु,
दे व दानवों के, संघर्ष की कहानी को,
ना म हैं नए मगर, कथा वही पुरानी को,
जा ग्रत हो चेतन हो,शक्ति का प्रवाह कर,
न वल ज्योति आशा ले,काँटों में राह कर,
ता श के महल जैसे गिरेंगे वे आततायी,
है ये सच बच न सकेंगे भी वे चाह कर,
ये जन-जन के मन की वीणा की स्वर लहरी,
स हयोगों की शक्ति, आपसी समझ गहरी,
च मक है जलन दिल की,तड़प प्यास जीवन की,
मां का आशीष संग पाथेय ऐसा हो,
नि कल पड़ेंगे पथ में फिर वो चाह जैसा हो,
ये ही दुआ मांगे, कल न आज जैसा हो,