Friday, 8 July 2016

र श्मियां बिखेरूँगा दीप्त भाल की तेरे,
ज ख्मों का मरहम मैं लाऊँगा खोजकर,
नी रस इन भावों की बंजर इस धरती पर,
कां हाँ की वंशी से पत्थर को तोड़ कर,
त न्हाई के दुखों को सहते, बेबस इन,
प्रा णहीन जिस्मों में फूकूँगा शक्ति नई,
न मक हराम सारे बनेंगे नमक हलाल,
दे खेगी दुनियाँ, रूप वो अनूप दूँगा,
श पथ लाऊँगा समूल सागर निचोड़ कर,
प ल-पल जो तड़पाते, विष के उपचार हेतु,
र ह-रह जो ग्रसते हैं, चन्द्र मेरा राहु केतु,
दे व दानवों के, संघर्ष की कहानी को,
ना म हैं नए मगर, कथा वही पुरानी को,
जा ग्रत हो चेतन हो,शक्ति का प्रवाह कर,
न वल ज्योति आशा ले,काँटों में राह कर,
ता श के महल जैसे गिरेंगे वे आततायी,
है ये सच बच न सकेंगे भी वे चाह कर,
ये जन-जन के मन की वीणा की स्वर लहरी,
स हयोगों की शक्ति, आपसी समझ गहरी,
च मक है जलन दिल की,तड़प प्यास जीवन की,
मां का आशीष संग पाथेय ऐसा हो,
नि कल पड़ेंगे पथ में फिर वो चाह जैसा हो,
ये ही दुआ मांगे, कल न आज जैसा हो,

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