Friday, 8 July 2016

एक खरगोश और एक कछुआ,
ये दोनों थे मित्र बड़े,
मिलजुलकर रहते आपस में,
कभी नहीं वे थे झगड़े,
एक बार लग गई शर्त,
दोनों में दौड़ हुई,
दौड़़ पड़ा खरगोश,
सोचकर मेरी जीत हुई,
लेकिन आधे पथ में उसने सोचा,
थोड़ा सा सो लूँ,
कछुआ धीमे आता होगा,
तब तक एक नीँद ले लूँ,
धीमे-धीमे चलता कछुआ,
उसके आगे निकल गया,
सोया था खरगोश,
इसी से कछुआ बाजी जीत गया,
जबतक वक्त काम का तबतक,
नहीं करेंगे हम आराम,
जब हो वक्त खेल का खेलें,
इससे होगा ऊँचा नाम

No comments: