Friday, 8 July 2016


  खन्ती मन्ती कौड़ी पाई,
कौड़ी मैंने गंग बहाई,
गंगा मोहे बारू दीन्हीं,
बारू मैंने भुज्जी को दीन्हीं,
भुज्जी मोहे चबेना दीन्हों,
चबेना मैंने घसियारे को दीन्हों,
घसियारे ने मोहे घास दीन्हीं,
घास मैंने गईया को दीन्हीं,
गईया मोहे दुद्धू दीन्हों,
दूध की हमनै खीर पकाई,
खीर हती सब घर नै खाई,
बची खुची आरे धरी पिटारे धरी,
जाजमऊ को बिल्लर आओ,
गूदा गूदा खाय गओ ,
बकली बकली डार गओ,
नई भीत उठी पुरानी गिरी धम्म   

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