Friday, 8 July 2016

                                                       बादलों के देश में सात दिन

मेघों का आलय यानि बादलों का घर, मेघालय का यही तो अर्थ हुआ न। इस बार मैंने गर्मी की छुट्टियां में बादलों के घर ही जाने का निश्चय किया। जाने के एक दो दिन पहले ही राजधानी दिल्ली और उसके आसपास के आसमान में बादलों ने डेरा जमा लिया। घर के ऊपर चारो ओर से उमड़-घुमड़ कर आए बादलों को देखकर ऐसा लगा मानो मेरे आने की खुशी में वे ऐसे बावरे हो गए कि मुझे मेरे घर से ही लिवाने आ गए हों।
मुझे हवा के पंखों पर चढ़कर जाना था। शाम पांच बजे की इंडिगो की फ्लाइट थी। दिल्ली से गौहाटी तक का सोलह सौ किलोमीटर का सफर लगभग दो घंटे में तय किया जाना था। सुबह से ही मन में एक उत्साह था अनदेखे अनजाने देश में जाने का... सो सामान लेकर साढ़े ग्यारह बजे ही आटो से प्रतापविहार गाजियाबाद से आनंद विहार दिल्ली के लिए निकल गया। वैसे तो आनन्द विहार से मेट्रो में बैठ कर नईदिल्ली और नईदिल्ली से एयरपोर्ट मैट्रो में बैठकर बड़ी आसानी से एयरपोर्ट जाया जा सकता था। मगर अभी हमारे पास लगभग पांच घंटे थे और हमें यह भी पता था कि आनन्दविहार से एयरपोर्ट के लिए दिल्ली ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन यानि डी.टी.सी. की बसें जातीं हैं। सो हमने जाने के लिए इसी माध्यम को चुना। सोचा-‘जब घूमने के लिए निकले हैं तो एयरपोर्ट भी थोड़ा घूमते-घामते ही पहुंचें।’
आनंदविहार से साढ़े ग्यारह बजे बस मिली। किराया मात्र पच्चीस रुपए आराम से सीट भी मिल गई। वाह क्या कहने... दोपहर का समय है ज्यादा टैªफिक भी सड़कों पर नहीं होगा। चार घंटे में तो पहुंच ही जाएंगे,ऐसा हमने सोचा।
मगर ऐसे ही सबका सोचा हुआ हो जाया करे तो सोचो जिंदगी कितनी नीरस हो जाएगी। जीवन से सारा रोमांच विदा हो जाएगा। फिर तो ये हमारा जीवन मशीन में चाबी भरे गुड्डे की तरह हो जाएगा। जीवन का रोमांच तो उसकी अनिश्चतताओं में है। शुक्र है कि सब कुछ निश्चित नहीं है। आगे क्या होनेवाला है ये किसी को नहीं पता...
दिल्ली में अनेक स्थानों पर मेट्रो का निर्माण कार्य चल रहा है। इसलिए कहीं न कहीं ट्रैफिक बाधित होता रहता है। मगर आज तो हद ही हो गई जब पिलर निर्माण के क्रम में कोई क्रेन क्षतिग्रस्त हो गई थी जिसके कारण हमारे रास्ते में पड़ने वाले स्टेशन आश्रम के पास एक ओर का रास्ता पूरी तरह से बंद हो गया था। अब दोनों तरफ का ट्रैफिक एक ओर से ही चल पड़ा और फिर वही हुआ जो होना था भयंकर जाम लग गया। लगभग दो घंटे जाम में बस फंसी रही लेकिन कोई चिंता नहीं हुई क्योंकि हमारे पास बहुत समय था...
धीरे-धीरे जैसे-तैसे करके जाम से निकले तो तीन-तीन मिनट वाली रेड लाइट ने काफी समय ले लिया। इसके बाद बस जरा सी आगे बढ़ी थी कि ड्राइवर ने घोषणा कर दी कि अब बस आगे नहीं जाएगी और नेहरू प्लेस पहुंचते-पहुंचते उसने बस में ब्रेक लगा दिया। अब चिंता के बादल मुझे शनै-शनै अपनी ओर बढ़ते दिखाई देने लगे। मगर मन को कड़ा किया ओर पीछे से आने वाली दूसरी एयरपोर्ट की बस पकड़ी। यह बस वाला ड्राइवर ठीक से बस चला रहा था लग रहा था कि अब समय से पहुंच जाऊँगा।
पड़ोस में खड़े एक युवक से पूछा तो उसने बताया कि यहां से लगभग आधा घ्ंाटा लगेगा। घड़ी में समय देखा तीन बजकर दस मिनट हो रहे थे। कोई नहीं... हंुह... पहुंच ही जाएंगे। सड़क बढ़िया थी शीशे के पार देखा तो एयरपार्ट का साइनेज लगा था। मगर अरे यह क्या बस तो यहां से दूसरी दिशा में मुड़ गई। इधर साकेत, खिड़की गांव, चिराग दिल्ली, महरौली ,मसूदपुर गांव, महिपालपुर... पता नहीं कहां-कहां से है इस बस का रूट... सारी दिल्ली का ही दर्शन करा दिया इसने...
महिपालपुर आया तो लगा कि यह तो एयरपोर्ट के नजदीक ही है। अब बस जा रही थी टर्मिनल-3 पर जो कि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए प्रयोग होता है। मेरे साथ जाने वाले मनीष जैन घरेलू टर्मिनल पर पहुंच चुके थे उनका लगातार फोन आ रहा था। उन्होंने बताया हमें तो घरेलू टर्मिनल 1डी पर जाना है। ओह...अब...क्या करें...
ड्राइवर ने बताया-यहीं से 1डी के लिए कोई न कोई सवारी मिल जाएगी। उतर कर खड़ा हुआ तो सच में एक टैक्सी मिल गई जिसने अंदर ही अंदर जरा सी देर में हमें घरेलू एयरपोर्ट 1डी पर पहुंचा दिया। उसको वाजिब किराए से अपने मन से ही अधिक रुपए देकर मैं टिकट और पहचान पत्र दिखाकर अंदर दाखिल हुआ। बोर्डिग पास लिया और कुछ ही देर में सामान चेक इन करवा कर सिक्योरिटी जांच के बाद चार बजकर बीस मिनट पर नीचे पहुंच गया। अब जान में जान आई। यहां अलग-अलग शहरों के लिए जाने वाले यात्रियों का जमावड़ा लगा हुआ था।
एयरपोर्ट का बहुत बड़ा एरिया वातानुकूलित जरूर था मगर वहां यात्रियों की स्थिति कमोवेश किसी बड़े बस अड्डे की भीड़ से कम न थी। एक भी सीट बैठने के लिए खाली न थी। लोग सीढ़ि़यों पर भी बैठे हुए थे। बावजूद इसके कि सभी की सीटें आरक्षित थीं और अभी जाने का दरवाजा नहीं खुला था और लोग लंबी-लंबी कतारों में एक दूसरे से चिपके खड़े थे ताकि कोई दूसरा उनके बीच न घुस जाए।
यात्रियों को देखते-देखते मेरी नज़र एक परिचित चेहरे पर जा कर ठहर गई। ये जे.एन.यू. में प्रोफेसर शिवप्रकाशजी थे। वे भी उसी विमान के यात्री थे जिसमें हमें जाना था। बातचीत के बीच उन्होने बताया कि वे साहित्य अकादमी के किसी दो दिवसीय कार्यक्रम में भागीदारी करने गौहाटी जा रहे हैं। घड़ी की सुइयां बढ़ती जा रहीं थीं पोर्ट के अंदर जाने का दरवाजा नहीं खुल रहा था लोगों की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। मैं भी उस बेचैन भीड़ का हिस्सा था। आज फ्लाइट संभवतः लेट थी।
अंततः दरवाजा खुला और बोर्डिग पास के बार कोड की जांच के बाद हम सब यात्री विमान तक जाने के लिए बस में चढ़ने लगे। बाहर बारिश हो चुकी थी मौसम कुछ भीगा-भीगा सा था। ओह... बादल यहां भी हमारे साथ थे। अपनी नियत सीट पर बैठने के बाद एक बार फिर चैन की सांस ली। विमान परिचायिका ने बताया कि पुणे के रहने वाले कुलवंत और उनके साथी विमान के चालक और सहचालक हैं तथा दिल्ली की रहने वाली तीन महिलाएं क्रू की सदस्य परिचायिकाएं हैं। उनके नाम भी बताए गए। सुरक्षा संबंधी हिदायतों के बाद विमान ने दिल्ली की धरती को छोड़कर अनंत आकाश की ओर रुख कर लिया।
हालांकि यह मेरी पहली विमान यात्रा नहीं थी मगर पिछली कई विमान यात्राओं के अनुभव के बावजूद रोमांच का जो संचार मन में हुआ वह अनूठा था। आपका भी अनुभव होगा कि आसमान में विमान या हेलीकाप्टर की आवाज सुनते ही क्या बूढ़ा क्या बच्चा और क्या जवान सबकी निगाहें अनायास ही आकाश की ओर उठ जातीं हैं कुछ ऐसा ही है इसका जादू...मुझे भी इसी तरह का अनूठा रोमांच हर बार की विमान यात्रा पर होता है। विशेषकर धरती को छोड़कर आसमान की ओर उठने के उड़ने के क्षणों का अनुभव...
धीरे-धीरे धरती को छोड़कर ऊँचा ओर ऊँचा उठता विमान एक निश्चित ऊँचाई पर पहुंच कर ठहर सा गया। जानकारी करने पर पता चला कि लगभग पैतीस हजार फुट की ऊँचाई पर उड़ता विमान दिल्ली से वाया लखनऊ पटना के एयर रूट से होता हुआ नानस्टाप लगभग दो घंटे में हमें गौहाटी पहुंचा देगा। सीट बेल्ट को खोल लेने के निर्देश मिले साथ ही विमान में खाने-पीने के सामान की बिक्री शुरू हो गई। लोग टायलेट वगैरह जाने के लिए सीटें छोड़ने लगे। विमान में लगभग एक सौ अस्सी सीटें थीं। सामान्य चाय काफी एक सौ रुपए की थी।
हमारी सीट खिड़की से दूसरे नंबर पर थी। खिड़की वाली सीट पर एक महिला बैठी थी। खिड़की के पार बादलों का दृश्य बड़ा मनमोहक था और वह प्रतिपल रंग और आकृति बदलता जा रहा था। शुरू-शुरू में तो बादल तैरते हुए रुई के फाहों की तरह दिखे मगर जल्द ही सूर्य की पड़ती रौशनी से चमकते बादलों का दृश्य मंत्रमुग्ध कर देने वाला था। कहीं बादल फूटते हुए ज्वालामुखी के सदृश्य दिखाई दे रहे थे तो कहीं आभाष हो रहा था कि कहीं हम परीलोक में तो नहीं आ गए। बादलों के ऊपर से गुजरते हुए हमें स्वयं के देवता होने जैसा अहसास हो रहा था। अचानक जरा सी देर में दृश्य बदल गया हमें लगा जैसे हम अंटार्टिका महाद्वीप के ऊपर से होकर गुजर रहे हों और नीचे दूर बहुत दूर तक गड्डमगड्ड बादल ऐसे लग रहे थे मानो चारो ओर बर्फ ही बर्फ बिखरी हो। अस्ताचलगामी सूर्य की किरणों के पड़ने से बननेवाली बादलों की विविध आकृतियों ओर रंगीन मनोहारी छवियों का तो कहना ही क्या... ऐसा लगा मानो यह सारा खेल बादल हमें दिखाने के लिए ही खेल रहे हैं और क्यों न लगता हम बादलों के घर जो जा रहे थे।
काफी देर तक हम इन जादुई दृश्यों में खोए रहे। अचानक उदघोषणा हुई और हमें सीट बेल्ट बांध लेने का निर्देश मिला। अरे... हम पहुंच गए। जिस दूरी को पूरा करने में राजधानी एक्सप्रेस सत्ताइस से लेकर तैंतीस घंटे लेती है उसे लगभग आठ सौ किलोमीटर प्रतिघंटा की गति से चलकर हमने मात्र दो सवा दो घंटे में ही विमान द्वारा पूरा कर लिया था। कुछ ही देर में हम गौहाटी के लोकप्रिय अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरने वाले थे।
यहां भी विमान के रुकते हम सभी अपनी सीटें छोड़कर खड़े हो गए और सामान भी उठा लिए जबकि अभी विमान से नीचे उतरने के लिए सीढ़ियां लगाई जानी शेष थीं। मगर लोगों की बेसब्री का क्या कहना... क्या कोई विमान में छूट जाएगा। सभी को उतार कर ही तो जाएगा। अरे भाई सभी को उतरना है। ये आगे निकलने की होड़ भी अजब है। खुद को ही कष्ट दिए जा रहे हैं। सोचते -सोचते मैं दुबारा सीट पर बैठ गया। कुछ ही देर में सीढ़ी लगी और लोगों ने धीरे-धीरे उतरना शुरू कर दिया। यहां दिल्ली जैसी भीड ़नहीं थी। शाम का धुंधलका छाने लगा था। सभी को अपने गंतव्य तक पहुंचने की जल्दी थी। हम लोग भी अपना सामान लेकर ट्राली समेत बाहर आ गए। हर शहर की तरह टैक्सी वालों ने घेर लिया मगर इनमें उन जैसी आक्रामकता नहीं थी। पूछने पर पता चला कि यहां से लगभग पैंतीस किलोमीटर की दूरी पर गौहाटी है। जहां जाने के लिए तीन सौ रुपए प्रति सवारी और एक हजार रुपए में ए.सी. रूम दिलाने की बात टैक्सीवाले कर रहे थे। हमने सीधे शिलांग जाने का मन बनाया जो यहां से एक सौ किलोमीटर के ऊपर है। टैैक्सीवाले दो और सवारियों के साथ आठ सौ रुपए प्रति सवारी ले जाने को तैयार थे। दिन में एयरपोर्ट से मेघालय सरकार की कुछ बसें सीमित समय के लिए चलतीं हैं जिनका किराया प्रति सवारी दो सौ पचास रुपए है और टैक्सियों का पांच सौ रुपए प्रति सवारी...मगर यहां तो ...
शाम गहराती जा रही थी। हमने अपने मेजबान पत्रिका ‘कर्तव्यचक्र’ के संरक्षक मानसरंजन महापात्र जी को फोन किया। वे शिलांग में उत्तर पूर्व परिषद के सूचना और जनसंपर्क विभाग में निदेशक के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने हमारे लिए टैक्सी की व्यवस्था कर रखी थी। उन्होंने ड्राइवर का नंबर बताया। वह वहीं हमारा इंतजार कर रहा था।
हमें वहां से निकलते-निकलते आठ बज गए थे। अब हमारी एयरपोर्ट से शिलांग की टैक्सी यात्रा शुरू हो गई। ड्राइवर का नाम जयनाथ था। वह त्रिपुरा के रहने वाले थे। उम्र यही कोई चालीस पैतालीस के आसपास... नाम पूछने पर अपने विशिष्ट अंदाज़ में जोयनाथ बताया। जल्दी ही कार एयरपोर्ट की सीमा पार कर शिलांग की ओर फर्राटे भरने लगी। साथी मनीष ने जयनाथ से कहा-रास्ते में हम कहीं कोई अच्छा शाकाहारी होटल देखकर खाना खाएंगे। इसका ध्यान रखना। इतना कहकर वे खिड़की से आती शीतल पर्वतीय हवा के झोंकों में आंखें बंद करके खो गए और मैं जयनाथ द्वारा चलाए गए मनमोहक फिल्मी गीतों में... जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते हैं लोग, एक चेहरे पे कई चेहरे...
एक के बाद एक मनभावन गीत... घुमावदार पहाड़ी रास्ता... हल्की शीतल पवन...रात के करीब नौ बजे का समय...अस्सी और नब्बे की गति पर दौड़ती कार... अकेले ही अकेले चला है कहां, कहेगा क्या कहेगा ये मौसम जवां...
लगभग तीस पैतीस किलोमीटर यात्रा करने के बाद दस बजे एक जोरबाट के पास जयनाथ ने कार रोक दी। एक राजस्थानी भोजनालय में भोजन के उपरान्त हमारी यात्रा एक बार फिर शुरू हो गई। उन्होंने हमें बताया यहां से थोड़ा आगे चलकर ही मेघालय की सीमा शुरू हो जाती है। अगर वे न भी बताते तो कार की खिडकियों से आती कोमल हवा और उसमें घुली ठंडक़ ने चुगली कर दी थी कि लो जी हम बादलों के देश में आ पहुंचे हैं।
इस बार हमारी वार्ता में जयनाथ शामिल थे। उन्होंने बड़ी रोचक कहानियां सुनाईं जैसे मोरनी का आंसू से गर्भधारण करने का रहस्य... हमने हँसते-हँसते उनसे पूछा कि आखिर उन्होंने ऐसी कहानियां कहां से सुनीं। इसका जबाब उन्होंने नहीं दिया। बल्कि ये प्रश्न कर दिया कि हमें उनकी ड्राइविंग कैसी लगी। मैंने कहा गाड़ी तो मैं भी चलाता हूँ मगर इतने घुमावदार रास्ते पर इतनी तेज गति से इतनी कुशलता पूर्वक मैं नहीं चला सकता। मेरे इतना कहते ही मैंने महसूस किया जयनाथ के अंग-प्रत्यंग गर्व से तन गए। उन्होंने कहा आपकी सपाट सीधी सड़कों पर तो मैं एक सै पचास की स्पीड से गाड़ी आसानी से दौड़ा सकता हूँू।
मैंने कारण बताते हुए कहा- ‘पिछले पच्चीस वर्षों से इस परिचित घुमावदार सड़कों पर चलते-चलते तुम्हारी यारी जो हो चुकी है इनसे...’
अब बाहर हल्की बूंदाबांदी शुरू हो चुकी थी। जयनाथ ने कार की गति थोड़ी धीमी कर ली, यह कहते हुए कि अब तेज गति से गाड़ी चलाना खतरनाक होगा। कुछ स्थानीय मुद्दों पर चर्चा करते हुए कार के शीशों से बाहर की खूबसूरती का अनुमान लगाते करीब साढ़े बारह बजे हम शिलांग के मोतीनगर स्थित उत्तरपूर्व परिषद के सरकारी आवास के निकट पहुंचे। हमारे मानस दादा घर के बाहर खड़े हमारी बड़ी आतुरता से प्रतीक्षा कर रहे थे। उनका स्नेह देख रास्ते की सारी थकान जाती रही हम प्रेमपूर्वक गले मिले। अगले दिन ही शिलांग में देश का प्रधानमंत्री पहली बार आने वाले हैं जिसकी मेजबानी उनका अपना विभाग नार्थ ईस्टर्न कौंसिल कर रहा था जिसमें वे डाइरेक्टर थे इस कारण उनकी व्यस्तता काफी बढ़ी हुई थी। बावजूद इसके वे हमारी अगवानी घर के बाहर इस तरह इस समय कर रहे थे। उनका यह भाव मन को अंदर तक छू गया। हम लोग गर्मजोशी से मिले खूब बातें हुईं और अगले दिन की व्यस्तता को देखते हुए भी रात सोते-सोते हमें डेढ़ बजे गया।
बादलों के देश की पहली सुबह...शिलांग की सुबह... पौने पाँच बजे आँख खुलीं बाहर खूब उजाला हो चुका था। रात जब बातोंबातों में जयनाथ ने बताया था कि यहां सवेरा चार बजे ही हो जाता है तो भरोसा नहीं हुआ था। मगर अब तो नजर के सामने था शिलांग का सवेरा और उसका बिखरा सौंदर्य... मार्निंग वाक का मन बनाया और हम दोनों ऊपर पहाड़ी पर अपने फेफड़ों में ताजी हवा भरने चल दिए। जल्दी ही सूर्य ने अपनी किरणों का जाल शिलांग की धरती पर फैला दिया। हम लोग भी कुछ योग की क्रियाओं को करके शिलांग के सौंदर्य को निहारते वापस आ गए।
लौट कर आने पर चाय पी और नहा धो कर जल्द ही तैयार हो गए। आज से ही हमारा शिलांग भ्रमण का कार्यक्रम शुरू होने वाला था। दरवाजे पर गाड़ी आकर खड़ी हो चुकी थी शीघ्र ही हम शिलांग की व्यस्त सड़कों पर निकल पड़े। सड़कों पर स्कूली बच्चों की गहमागहमी और कल आने वाले प्रधानमंत्री के आगमन की तैयारियों के कारण जगह-जगह सुरक्षा व्यवस्था चाक चैबंद दिख रही थी। सड़कों पर ट्रैफिक नियमों का पालन करते दूसरों को रास्ता देते दिखे वाहन चालक... पुरानी कैथेड्रल चर्च ही इमारत राजभवन और शहर की मुख्य सड़कों को पार कर हम शीघ्र ही ऊँचे पहाड़ी रास्ते की ओर मुड़ गए। अब हम ‘शिलांग पीक’ की ओर जा रहे थे। हमारे कार चालक हेनरी ने बताया कि इसी रास्ते पर आगे चलते हुए हम चेरापूँजी की ओर जाते हैं। यह नाम सुनकर बदन में एक झुरझुरी सी हुई। बचपन से यह नाम सुनते हुए बड़े हुए हैं विश्व में सबसे अधिक वर्षा वाला स्थान...चेरापूँजी। हाय कितने घने जंगल होंगे वहां... हर समय बारिश का ही मौसम रहता होगा... पता नहीं कैसा होगा वह स्थान... खैर अब तो आ ही गए हैं। देखा जाएगा।
सड़क के दोनों ओर खड़ी फसलों को देखते यहां के मौसम में उगने वाली वनस्पतियों को देखते हम चेकपोस्ट तक पहुंचे यहां वायु सेना के अधिकारियों को अपना परिचयपत्र दिखाकर हम शीघ्र ही लोकल चेकपोस्ट का शुल्क अदाकर शिलांग पीक पर जा पहुंचे। यहां से समूचे शिलांग का विहंगम दृश्य देखा जा सकता था। जैसे गंगटोक में सुसाइड पाइंट से नीचे खूबसूरत घाटियां और तीस्ता नदी का मनोहारी रूप दिखाई  देता है इसी तरह घाटी में तैरते बादलों के नीचे बसे शिलांग के मकानों का सुंदर दृश्य यहां से दिखता है।
कैमरे को निकाला। फोटो खींचा... मगर हुंह... वो बात कहां... जो बात तुझमें है तेरी तस्वीर में नहीं... बादलों की वजह से नम मौसम की वजह से घाटी से नीचे का दृश्य साफ नहीं आ रहा था। कई बार के प्रयास के बावजूद जब चित्र साफ नहीं आए तो हारकर कैमरा रख दिया और घाटी में तैरते बादलों की धुंध के नीचे छिप रहे शिलांग शहर को देखने लगा। जो समुद्र तल से 1499 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। जो मेघालय राज्य की राजधानी है। जिसे पर्वतों की रानी का खिताब मिला हुआ है। जिसे ‘पूर्व का स्काटलैंड’ कहा जाता है। जो 1970 से पहले वृहत्तर असम की राजधानी था। जिसे 1874 में कर्नल हेनरी होपिडेसन ने यह सुंदर स्वरूप प्रदान किया। अपने आप में कितनी घटनाएं कहानियां, इतिहास को छिपाए हुए है। मैं सोचने लगा।
घाटी में बादल अभी भी तैर रहे थे। मुझे महसूस हुआ जैसे वे मुझ पर हँस रहे हो। मानो कह रहे हों क्यों दोस्त, पहले चित्र खींचकर मुझे भविष्य के लिए सुरक्षित रखना चाहते थे और अब इतिहास की गहराइयों में खोकर भूतकाल में चले गए। अरे भाई, वर्तमान में कब जियोगे। आगे अंधेरा है, पीछे अंधेरा है, ये पल गवाना ना, ये पल ही तेरा है... देखो मैं तो चिंता नहीं करता कैसा अपनी मस्ती में मस्त उड़ रहा हूँ।
मुझे लगा वो ठीक ही तो कह रहा है। धन्यवाद दोस्त... मेजबानी का पूरा फर्ज अदा कर रहे हो। शुक्रिया...
पहाड़ी पर बने कई पाइंटस पर पर्यटक दर्शकों की भीड़भाड़ थी। मेघालय में खासी, गारो जयंतिया और अन्य अनेक जनजातियों के लोग रहते हैं। शिलांग में खासी लोगों की बहुलता है। खासियों के त्योहार के अवसर पर पहनी जाने वाली पारंपरिक पोशाक पहन कर फोटो खिंचवाने का लोभ हम नहीं छोड़ सके। वहां के स्थानीय निवासियों द्वारा लगाई दुकानों पर रखे आकर्षक केलों को देखकर मनीष ने उन्हें खाने की इच्छा व्यक्त की। अभी हम केले खा ही रहे थे कि तभी एक स्थानीय चाय बेचने वाली महिला ने हमें अपनी ओर देखता पाकर आवाज़ लगाई-‘ओ बाबू, चाय खावो ना’ सुनकर काफी अच्छा लगा।
कुछ देर वहां ठहर कर अपनी और मोबाइल की आंखों में वहां के दृश्यों को कैद किया और अगले पड़ाव की ओर चल दिए।

1 comment:

Abhishek Dubey said...

behad Sajeev Sanmaran..Kmaal hai aap aur aapki lekhni,

Sadar,
Abhishek