Tuesday, 11 October 2016

शिवचरण लाल शुक्ल 'शम्भू पद'
(1900-1960)
ज्यों त्यों रह्यों अब लौं जिय तू,
अब आओ वसन्त कछू ना बिसैहै,
शम्भू सुगंधित शीतल मन्द,
समीरन पीर गम्भीर उठैहै,
क्यों ठहरैगो करै गो कहा,
जब कोकिल कूक के हूक सुनैहै,
और न तेरी चलैगी कछू बस,
संग कुहू के तुहू कढ़ि जैहै,
शिवचरनलाल शुक्ल शम्भूपद
(1900-1960)

आजु मैं गई ती शम्भु न्योते नन्द गाँव तहाँ,
सांसत बड़ी रूपवती वनितान की,
घेरि लीन्हो सखिन तमासो करि मेरो मोहि, 
गहि-गहि गुलुफ लुनाई तरवान की,
औरै बलि बोलि-बोलि औरनि दिखावै रीझि,
रीझ सुघराई औ ललाई मेरे पान की,
घूँघट उघारि मुख देखि-देखि एकै रहै,
 एकै लगी नापन बड़ाई अँखियान की,


रामनारायण द्विवेदी रमेश
(1932-1992 विक्रमी)
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आलस त्यागि करौ पुरुषारथ,
ताते यथारत काज फुरैंगे,
उद्यम और उपाय करौ
तब आपुहि देश के दुख टरैगे,
आकरी चाकरी में न चले
इमि दास बने नहि पेट भरैंगे,
भारत भूमि के भाग जगैंगे,
रमेश जू वे दिन फेर फिरैंगे,
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आरत भारत गारत ह्वै रह्यो,
जाने कहा दिन खोटे करैंगे,
काल के गाल के ग्रास भये,
बहु देखे अकाल में केते मरेंगे,
कौलौं रमेश कलेश में देश के वासी
अंदेश के पाले परैंगे,
ह्वैहै कहा अब हे मेरे राम
कहौ कब वे दिन फेरि फिरैंगे,
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रामनारायण जी द्विवेदी रमेश 
(1932-1992 वि.)
विलेलेले
केतिक कराल कलिकाल की कठोर कला,
काम क्रोध कपट कुकर्म कुटिलाई है,
कहै कहा कोऊ कछु करनी कुलीनन की,
करत कुकर्म कहै कर्म ही कराई है,
कोविद रमेश कहूँ किंचित कुशल कैसी,
कामनी कनक कोटि कामना कराई है,
काटिए कलेश कारुणीक कमला के कंत,
करौगे कृपा तौ कहौ कौन कठिनाई है,
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अरुण अनार ऐसी एड़ी अवलोकत ही,
ललकतु नीकी भाँति पावत अनन्द है,
जगमग ज्योति नख-नख पै नखत बृंद,
कोटिचन्द्र वारौं शोभा ललित अमंद की,
पगतल पावन प्रभाव प्रभु ताके पुन्ज,
प्रात के प्रभाकर ते लालिमा दुचन्द हैं,
पद अरविन्द पै रमेश रामचन्द्रजू के,
मन मतवारो मेरो मंजुल मयन्द है,
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जनकसुता के पति ताके जिन ताके पति,
सविताके कुल के पताके प्रभुता के हैं,
हरन धरा के भार कृपा के अगार विभु
वीर विरदैत बाँके विदित सदा के है,
धन्य ध्यान जाके परि पाके मुनि वृन्द औ 
अनन्द मद छाके जाके पति गिरजा के हैं,
पूरण कला के कमला के कंत हैं रमेश, 
तारन शिला के ये कुमार कौसला के हैं,
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Friday, 7 October 2016

कुदरत हमें बचाती हरदम,
इसको हमें बचाना है,
अपनी रग-रग में साँसों में,
इसका आना जाना है,
हम इसके काम आएं न आएं,
पर इसको काम आना है,
इसकी हर शय अपनी खातिर,
इक अनमोल खज़ाना है,