Thursday, 15 September 2016

चेहरे पर प्रकाश हो मेरे,
या प्रकाश में चेहरा,
समझ सको तो समझो मित्रो,
अर्थ है इसमें गहरा,
जीवन में कोशिश हो वैसी,
जो ऐसा हो पाए,
चेहरा पहुँचे जहाँ उस जगह पर,
प्रकाश हो जाए,
समय की नदी तो,बही जा रही है,
तेरी आरजू सब,रही जा रही है,
ठहर तो कुछ एक पल,ज़रा सोच ले तू,
मुखौटे जो पहने, उन्हें नोच ले तू,
क्या आया था करने,क्या करने लगा है,
पता है हर एक पल तू, मरने लगा है,
गलत राह है या, सही जा रही है,
तेरी आरजू सब, रही जा रही है,
बहुत पुण्य तेरे, तू ऐसा बना है,
जरा आईना देख, कैसा बना है ?
नहीं ऐसा अवसर, दोबारा मिलेगा,
न जाने कमल ऐसा, फिर कब खिलेगा ?
कथा ये चिरंतन, कही जा रही है,
तेरी आरजू सब, रही जा रही है,
चले जा रहे हैं,ये साँझ और सवेरे,
ये सूरज ये चंदा, न तेरे न मेरे,
भले पास आएं, न तेरे उजाले,
कोई मन से मीठी सी, धुन गुनगुना ले,
ये नईया किधर भी, नहीं जा रही है,
तेरी आरजू सब, रही जा रही है,
समय की नदी तो...
रखो कदम तुम ऐसे जो,
पैरों से पदचाप न हो,
पहले सोचो फिर बोलो,
कहके फिर संताप न हो,
मन वाणी और कर्म सभी,
निर्मल कर लो कुछ ऐसे,
जो व्यवहार करो जग से,
उसमें कोई पाप न हो,
लगता मुझसे बड़ा कोई,
साथ चले मेरे साया,
सोच रहा तो लगता है,
वो खुद अपना आप न हो,
रेत औ पानी पर लिक्खे,
नाम सभी मिट जाएंगे,
काम ही क्या जिनकी,
मन की चट्टानों पर छाप न हो,
सब सोते मैं जगता हूँ,
पता नहीं क्या बकता हूँ,
मैं समझा वरदान जिसे,
पता नहीं अभिशाप न हो,
ऐसे तुम जलो दीपक,
ऐसे तुम चलो दीपक,
आस पाएं सब तुमसे,
ऐसे श्वांस लो दीपक,
जीत क्या सफलता क्या,
हार क्या विफलता क्या ?
डूबता अगर सूरज,
फिर नहीं निकलता क्या ?
साथ कोई न हो तो,
रंज मन न लो दीपक,
ढ़ूँढ़ कर मिलाओ तुम,
हाथ अब अंधेरों से,
वास्ता भी मत रखना,
मतलबी सवेरों से,
ये तुझे बुझा देंगे,
अपनी राह लो दीपक,
जब विकट अंधेरा हो,
पास ना सवेरा हो,
मुश्किलों ने घेरा हो,
आसरा ही तेरा हो,
तब वहीं डटो दीपक,
तब न तुम टलो दीपक,
कितनी दूर मंज़िल हो,
रास्ता न हासिल हो,
फनफनाती लहरों में,
पास में ना साहिल हो,
तुम कदम कदम चलकर,
सबको जीत लो दीपक,
डर अब किस बात का है,
तम की बिसात क्या है,
अंधकार रौशन है,
तू सूरज रात का है,
अपनी आग में खुद ही,
ऐसे ही जलो दीपक,
लक्ष्य अंतिम है विसर्जन,
प्रात बनकर ढलो दीपक,
"चलाचल पथिक तू लहर के सहारे,
पहुँच जाएगा एक दिन उस किनारे,
लहर ये तेरे मन की ही तो लहर है,
चले एक पल या कि पहरों पहर है,
ये मन की लहर तुझको रुकने न देगी,
चलेगा तेरी राह, रौशन करेगी,
तू चल तो,बिना कुछ भी सोचे विचारे,
पहुँच जाएगा एक दिन उस किनारे,
विफलता कहेगी, अभी तू है कच्चा,
अगर दिल में होगा,तेरा प्यार सच्चा,
न ठोकर लगेगी न खाएगा गच्चा,
मगर मान फिर भी अभी तो है बच्चा,
तेरे साथ चलता,परम वो पिता रे,
पहुँच जाएगा एक दिन उस किनारे,
न दुनिया न दौलत न साथी मिलेगा,
ये वो राह, जिस पर अकेला चलेगा,
न रखना कोई मोह रिश्ता न नाता,
तू खुद का है साथी ये क्यों भूल जाता,
सफर तो है लंबा मगर डर न प्यारे,
पहुँच जाएगा एक दिन उस किनारे,
नहीं पाएगा मुक्ति खुद के बिना रे,
पहुँच जाएगा एक दिन उस किनारे,
चलाचल पथिक तू...
वृक्ष लगाए , वृक्ष लगाए,
सबने मिलकर वृक्ष लगाए,
कुछ खुरपी को लेकर आए,
साथ फावड़ा कुछ ले आए,
गड्ढ़े मिलकर तुरत बनाए,
उनमें फिर पौधे रखवाए,
बच्चों का उत्साह देखकर,
वहाँ प्रिंसिपल जी भी आए,
सर जी फोटो भी तो खींचो,
मिलकर यह सारे चिल्लाए,
इन्हें सुरक्षित भी रखेंगे,
बढ़कर आगे हमें बताए,
पिछली बार किया था ये सब,
अब फिर जल्दी नम्बर आए,
साफ सफाई करने में,
ये बिच्छू निकली घर में,
पीठ सफेद, चकत्ते हैं,
ये सब इसके बच्चे हैं,
ज्यों ही बड़े - बड़े होंगे,
अपनी माँ को खा लेंगे,
मैं भी था अब तक अंजान,
पता लगा तब पाया जान,
कैसी प्रकृति विचित्र बनी,
आश्चर्य से भरी पड़ी,
साँपिन खाती बच्चों को,
ये बच्चे अपनी माँ को,