Tuesday, 8 November 2016

धरती मेरी प्यारी धरती,
हम सब का इससे नाता,
हम हैं इसके बेटे जैसे,
सचमुच ये अपनी माता,
इतना सुंदर इसे बनाया,
रखी उठा न कोई कसर,
स्वर्ग नहीं देखा हमने पर,
है ये उससे भी बढ़ कर,
रहम करो इस पर अय लोगो,
इसे न यूँ बरबाद करो,
कहाँ रहोगे खुद, ये सोचो,
इसको फिर आबाद करो,
नहीं पीढ़ियां आने वाली,
माफ करेंगी कहते हैं,
सिर्फ नहीं हम ही धरती पर,
और बहुत से रहते हैं,

Thursday, 3 November 2016

रात अचानक आँख खुली तो,
खिड़की के बाहर देखा,

खूब रोशनी बिखर रही थी,
सोचा बल्ब खुला छोड़ा,


आया बाहर धवल चाँदनी,
पसरी हुई सकल भू पर,


अप्रतिम था सौंदर्य खज़ाना,
खुला हुआ नीचे-ऊपर,
भीड़ जुटी है, अपने चारो ओर प्रिये,
नहीं दिखाई देता है, कुछ और प्रिये,
सब थे सबकुछ हम ना कुछ थे ऐसा भी,
गुजर चुका है इस जीवन में, दौर प्रिये,
वक्त एक सा कब रहता इस जीवन में,
सिर पर कभी नदी में जाता, मौर प्रिये,
करें उपासा नौ दिन या नौ महिनों का,
मुँह से बड़ा न मुँह में जाता कौर प्रिये,
थोड़ा लिखा, समझना ज्यादा इसको तुम,
क्या लिक्खूँ मैं तुमको,अब कुछ और प्रिये,
नीलकंठ तुम नीले रहियो, मेरी बात भगवान से कहियो,
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प्रेम सै दुनिया आय जो बस में,
फिर क्यों लोग लड़ैं आपस में,
आवौ फिर सै जा समझईयो,
मेरी बात...
खाय न पामैं रोटी कल सै,
हमैं निकारौ जा दल दल सै,
हम खुस रहैं, रहै खुस भईयौ,
मेरी बात...
चार दिना की जा जिनगानी,
सिगरी दुनिया आनी जानी,
कौन हमेसा के लये रईयौ,
मेरी बात...
रजनीकान्त शुक्ल
कभी कुछ बात कहना और कहना ... चलो रहने दो
कभी कुछ कहते कहते कह देना ... चलो रहने दो
ये अदाएं तुम्हारी ख़ास लगती हैं न जाने क्यूँ
कभी सोचा की कह डालूं,कभी सोचा ... चलो रहने दो
जताना भी नहीं आता कि ये तुमसे कैसा रिश्ता है
तुम्हारे साथ चलता मैं , फिर सोचा ... चलो रहने दो
मेरी बेक़रारी का आलम क्या है किसे जा कर बताऊँ मैं
था ये सोचा तुम को बताऊंगा , फिर सोचा...चलो रहने दो
ख्वाहिश है ये मेरी तुम्हे जी भर कर देखूं मैं
तुम्हारी तस्वीर बनाता मैं , फिर सोचा ... चलो रहने दो
जो तुम रूठ जाओगी तो ग़ज़ल कह कर मना लूँगा
ऐसे जो मानूं तो कहती हो , अच्छा ... चलो रहने दो
रहेगी उम्मीद जब तक ये हमारे एक होने की
डर है तुम कह न दो , उम्मीद को ... चलो रहने दो.
दीवाली के दीप जले,
मन को लगते बहुत भले,
तम मन का बाहर निकले,
अंतर ज्योती विमल जले,
अंधियारा जग से फिसले,
दीवाली के दीप जले,
बैर दूर हो, हाथ मले,
सदभावों की हवा चले,
नफरत की जो वर्फ,गले,
प्रीत लपक कर गले मिले,
मन पर कोई हर्फ न ले,
दीवाली के दीप जले,
धमाके ही धमाके थे,
पटाखे ही पटाखे थे,
हुई जब शाम रौशन तो,
तिमिर के घर में फाके थे,
मनाई रात दीवाली,
नहीं था कोई अँधियारा,
दिए की लड़ियों के आगे,
अँधेरा डर गया, हारा,
अगर सब साथ मिल यूं ही,
भगाएंगे अँधेरों कोे,
न रोके रोका जा पाएगा,
आने से सवेरों को,