नौटंकी कानपुर उत्तर प्रदेश का ऐसा यशस्वी लोकनाटय रहा है जिसने पूरे भारत में अपनी लोकप्रियता का सिक्का जमाया आज भी इसके मंच की गायकी में जन-जन को आकर्षित करने की गज़ब की क्षमता है।
कहते हैं कि पहले यहां खयाल गायन की परंपरा थी और गायकी में अमरोहा शैली का बोलवाला था। शुरू में ब्रज क्षेत्र में नथाराम गौड़ ने व्यावसायिक आधार पर अपनी मंडली बना ली थी। यही पंडित नथाराम गौड हर साल सावन के महीने में अपनी मंडली के साथ कानपुर की यात्रा करते थे। वे स्वागों का प्रदर्शन करते और फटके सुनाते। ऐसे में उन्होंने एक चुनौती कानपुर के लोगों के सामने रख दी कि कोई ऐसा करके दिखाए। जिसे स्वीकार करते हुए उनके फटकों के जबाव में बंदी खलीफा, मुल्ला राय और मैकू उस्ताद ने करीब 1910 के आसपास एक जबरदस्त प्रदर्शन किया। जिसमें शुरू में लहरा बजाया गया। फिर मैकू उस्ताद की चोब की एक नगाड़े और बारह नगड़ियों पर मात्राओं के हिसाब से बजती टंकार ने ऐसी फुर्ती दिखाई कि सब दंग रह गए। इसके लिए मुम्बई से लछमन नाम का एक गायक भी बुलाया गया था जो एक ही गीत को सत्तरह धुनों में गाता था। हिंदी क्षेत्र के लोक नाटय में नक्कारे का प्रयोग पहले भी होता रहा था मगर उसकी शक्ति को कानपुर में ही पहली बार पहचाना गया। यही से नौटंकी की शुरुआत मानी जाती है।
इस पहली प्रस्तुति के बाद बंदी खलीफा, मैकू उस्ताद और मुल्ला राय इससे अलग हो गए। इसके बाद श्रीकृष्ण पहलवान ने इस जिम्मेदारी को संभाला। श्रीकृष्ण पहलवान ने मंडली में हाथरस, अलीगढ़ के कलाकारों के साथ मिलकर कई नए-नए प्रयोग किए। उन्होंने नौटंकी के विषय और उसके विचार पक्ष, शिल्प को एक ठोस आधार दिया। पहले खुले मंच पर होने वाले खेल को पारसी रंगमंच की तरह पर्दे में बांधा। मुख्य कथा के साथ हास्य प्रधान उपकथा का प्रचलन शुरू किया। पद्यात्मक संवाद के साथ-साथ गद्य में भी संवादों का चलन शुरू हुआ। हास्य कलाकार मसखरा जिसका नाम पिस्सू या नकलची होता था जिसे जोकर कहते हैं, उसकी रचना की। इस लोक नाटय में उन्होंने देशभक्ति और समाज सुधार वाले खेल जोड़े। उनसे पहले इसका स्वरूप मात्र मनोरंजन और गायकी भर था।
श्रीकृष्ण पहलवान का आर्य समाज के सुधारवादी कथानक पर पहला सांगीत उर्फ नौटंकी ‘धर्मवीर हकीकतराय’ था। फिर जलियांवाला बाग घटना पर ‘खूनेनाहक’ लिखवाकर उन्होंने मंचित कराया। उन दिनों ‘भगतसिंह’ नौटंकी के प्रदर्शन के शुरू में जंजीरों में जकड़ी भारतमाता का सीन होता था। बाद में गांधी, सुभाष, नेहरू, झांसी की रानी, बहादुरशाह जफर आदि खेल आए। ये और इनके जैसे अनेक खेल श्रीकृष्ण पुस्तकालय से छपकर पूरे देश में साप्ताहिक हाटों, मेलों में बिककर छोटी-छोटी मंड़लियों द्वारा खेले जाते थे। उस समय कानपुर की प्रसिद्धि एशिया के मैनचेस्टर के रूप में थी। समृद्धि और सम्पन्नता के साथ-साथ एक बड़ी मजदूर आबादी का बसेरा भी था कानपुर...गणेशशंकर विद्यार्थी, मौलाना हसरत मोहानी, गयाप्रसाद शुक्ल सनेही, मुंशी प्रेमचंद की उपस्थिति से कानपुर में राष्ट्रीय चेतना का प्रवाह बह रहा था इन सबका लाभ नौटंकी को मिलना था और वह भरपूर मिला भी।
उस समय श्रीकृष्ण पहलवान की चार नौटंकियां एक साथ चलतीं थीं। एक टीम शादी व्याहों में जाती थी, दूसरी टीम मेलों तमाशों में टिकट लगाकर प्रदर्शन करती, तीसरी कानपुर में रहती चैथी नौसिखियों की टीम थी जो रिजर्व में रहते सीखते रहते और ज्यादा मांग होने पर सेकेण्ड टीम के तौर पर भेजे जाते थे।
इसके बाद त्रिमोहन जो कन्नौज से थे उन्होंने श्रीकृष्ण पहलवान की परंपरा को आगे बढ़ाया। 1883 में गरीबी में इनका जन्म हुआ। बचपन में बाजीगर बनकर सड़कों पर तमाशा दिखाते थे। इनमें छिपी प्रतिभा पहचान कर मथुरा के नथाराम गौड़ ने इन्हें अपनी मंड़ली में शामिल कर लिया। उनकी दीक्षा हाथरस के उस्ताद इंदरमन से हुई। यहां इन्होंने नक्कारा बजाना सीखा था। हाथरसी स्वांग की गुरु शिष्य परंपरा से होने के बावजूद त्रिमोहन लाल ने हाथरसी परंपरा को न चुनकर कानपुरी नौटंकी को चुना। वे 1920 के आसपास नौटंकी के क्षेत्र में आए। उनके आने से अभिनय पक्ष और संवादों की अदायगी के क्षेत्र में अनेक बड़े परिवर्तन हुए। उन्होंने बोझिल धीमी नाटय गति की जगह पर आंगिक चेष्टाओं ऐक्शन प्रधान भंगिमाओं को उभारा। नौटंकी के मंच पर महिला कलाकारों गुलाबबाई और कृृष्णाबाई जैसी गायिकाओं को लाने का श्रेय भी त्रिमोहन को जाता है। जिनके आने से मंच पर स्वाभविकता आ गई। बाद में इनकी लोकप्रियता को देख हाथरसी मंच पर श्यामा और अन्नो का अवतरण हुआ। त्रिमोहन की खोजों में एक सारंगीवादक गंगादीन भगतिया भी थे। कहते हैं एक बार उन्होंने देश के प्रसिद्ध सारंगीवादक गुलाम साबिर को गलत सारंगी बजाते हुए टोक दिया था। और गुलाम साबिर को मानना पड़ा था कि वे कहां गलती कर रहे थे। मेडू अलीगढ़ के चिरंजीलाल भी इनकी मंडली के मशहूर गायक थे। उन दिनों जब गायक को आठ से दस रुपए मासिक मिलता था तब उनका वेतन पचास रुपए था। वे चिरंजीलाल पचासा के नाम से जाने जाते थे। उनके बेटे मशहूर शंकर शम्भू कव्वाल त्रिमोहन के नौटंकी मंच पर बचपन में नृत्य करते थे।
त्रिमोहन ने ‘जहांगीरी न्याय’ नाम का खेल लिखा जो बेहद लोकप्रिय हुआ। इतिहास और लोक संवेदना का यह कुशल समन्वय नौटंकी के मंच पर बेहद सफल रहा । स्वांग मंचों और पारसी थियेटरों ने भी इस कथानक को उठाया। सोहराब मोदी ने तो इस विषय पर फिल्म भी बनाई। उनकी नक्कारे की कुशलता और प्रभाव को लेकर तमाम किवदंतियां क्षेत्र में आज भी बिखरी हुईं हैं। उनकी मंडली की प्रस्तुति में हीरोइन का रोल गुलाबबाई ही करतीं थीं। उस समय शायर यासीन ने काफी सारी नौटंकियां उनकी मंड़ली के लिए लिखीं जिनमें खुदा दोस्त, गुलबदन, ग़ाफिल, मुसाफिर, गुलवकाबली काफी चर्चित रहीं। देश की स्वाधीनता के वर्ष के आते-आते वे गंभीर आर्थिक तंगी के शिकार हो गए और अपने नाटयालेखों के कापीराइट मात्र कुछ सौ रुपए में उन्हें श्रीकृष्ण पुस्तकालय को बेचने पड़े। 1942 में गुलाबबाई के अलग कंपनी बना लेने और 1957 में यासीन की मौत से वे टूट गए। ऐसी दुरवस्था में ही 1963 में उनका निधन हो गया।
श्रीकृष्ण पहलवान का प्रकाशन का व्यवसाय चल निकला था। आजादी के आते ही फिल्मों का बोलवाला हुआ। लोगों की रुचियां बदलीं और ऐसे में जब सब नौटंकी को रहमो करम पर छोड़ कर चले गए। तब गुलाबबाई ने इसकी पताका को थामे रखा। गुलाबबाई आखिरी सांस तक नौटंकी की गौरवशाली परंपरा को बचाए रखने के लिए जूझती रहीं। उन्होंने न केवल इस परंपरा को बचाया बल्कि उन कलाकारों के संरक्षण का भार भी उठाया जो जीवन भर नौटंकी को समर्पित रहे और जीवन की सांझ में जिनकी खोज ख़बर रखने वाला कोई नहीं रहा। भारत सरकार ने गुलाबबाई को 1990 में ‘पदमश्री पुरस्कार’ देकर उनका उचित ही सम्मान किया। 13 जुलाई 1996 को गुलाबबाई ने कानपुर में अंतिम सांस ली।
बहुत कम कला रूप हैं जो उपेक्षा और तिरस्कार के बाद भी अपने अस्तित्व को बनाए रख सके। नौटंकी लोकाश्रित थी सो सभ्य समाज द्वारा उपेक्षित और तिरस्कृत होने के बावजूद सम्पन्न समाज में आवश्यक बुराई की तरह जीवित रही। किसी भी लोकनाटय शैली के पुर्नसंस्कार की पहल लोक के बीच से ही संभव है। आज लोक अपने पारंपरिक अर्थों में सुरक्षित नहीं है। उसके मनोलोक व संवेदनाओं में भारी बदलाव आ चुके हैं। मगर फिर भी संभावनाएं वहीं से हैं।
यद्यपि नौटंकी में आधुनिक प्रयोगों के रूप में मुद्राराक्षस के ‘डाकू,’ ‘आला अफसर’ और उर्मिल कुमार थपलियाल के ‘हरिचन्नर की लड़ाई’ आदि चर्चित रहे। पर ये प्रस्तुतियां रंगकर्मियों में नए प्रयोगों के प्रति उत्साह न जगा सकीं। ध्यान रहे प्रायोगिक रंगमंच की प्रस्तुतियां लोकनाटय की पूरक या विकल्प नहीं बन सकती। सरकारी संरक्षण उनके वर्तमान के लिए सहायक हो सकता है पर उनके भविष्य के लिए नहीं। इसके लिए तो पेशेवर समाज को ही आगे आना होगा।
वास्तव में प्रायोगिक मंच के शहरी कलाकारों द्वारा लोककलाओं के जुड़ने की परंपरा ने नौटंकी की मौलिकता को क्षति पहुंचाई। तमाम पूर्वाभ्यासों सरकारी प्रशिक्षणों के बावजूद ये कलाकार पारंपरिक कलाकारों की बराबरी न कर सके। रेडियो, दूरदर्शन व लोक साहित्य में इस विधा में कई प्रयोग हुए। एडस, नशा, दहेज आदि विषय पर प्रस्तुतियां इस विधा के साथ खिलवाड़ की तरह हुई है। प्रायोगिक रंगमंच द्वारा की गई नौटंकी पेशेवरों द्वारा सहज स्वीकार न हो सकीं इसके पीछे निजी स्वार्थ अज्ञान और उत्साह की कमी रही। लोक कलाकारो की हीन भावना उनकी निरक्षरता और नए समाज में उनकी पहचान न बनने के पीछे का कारण हमारी सांस्कृतिक सामाजिक व्यवस्था रही।
इस विधा के संरक्षण के लिए आज आवश्यकता है सभी कलाकार एकजुट हो, ‘अखिल भारतीय नौटंकी महासंघ’ या ‘सांगीत नौटंकी स्कूल’ खोला जाए। नए व पुराने नौटंकी कलाकारों को प्रशिक्षण मिले। गायन वेषभूषा, अभिनय, मेकअप, प्रस्तुतीकरण में नई तकनीक का प्रयोग हो। प्राचीन आचरण व मुखौटे बदले जाए। आज अच्छे नौटंकी लेखकों का अभाव है। कुशल नौटंकी लेखक आगे आएं जिनको छंद रचना पर अधिकार हो उनको प्रस्तुति का लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव का अंदाजा हो। उन्हें संगीत का ज्ञान हो और उनका रंगमंच से जुड़ाव हो। उनके द्वारा सामयिक ज्वलंत समस्याओं और विषयों को उठाया जाए। सारी रात की बजाय प्रदर्शन की समय सीमा तीन घंटे की हो साथ ही उनके द्वारा तुलसीदास की तरह लोक भाषा का प्रयोग किया जाए।
आज ऐसे लोगों के मार्गदर्शन की भी इसमें आवश्यकता है जो नौटंकी की आत्मा और मर्म से परिचित हो। दूसरी ओर पेशेवर नौटंकी कलाकारों में आधुनिक चेतना के प्रति उत्साह जगे। वास्तव में रंगकर्मियों की भी गुरु-शिष्य परंपरा होनी चाहिए। इसकी गायकी के शुद्ध रूपों की स्वरलिपियों बनाकर संरक्षित किया जाए। नक्कारा जो सारंगी की तरह दुर्लभ होता जा रहा हैं। संगीत महाविद्यालयों में इसका नियमित प्रशिक्षण हो।
किसी भी कलारूप का देश काल परिस्थितियों और जनरूचियों के अनुरूप स्वरूप निर्धारित होता है। इनके बदलते ही वह अपने बदले स्वरूप में सामने आता है या मिट जाता है। हमें सोचना होगा कि जिस लोकप्रियता के चलते नौटंकी के गायन की नकल सिनेमा जैसे सशक्त माध्यम करते रहे हों। चाहे ‘नदी नारे न जाओ श्याम पैयां परूं’ और ‘मोहे पीहर में मत छेड; जैसे भावप्रणव रसीले गीत रहे हों या ‘मुन्नी बदनाम हुई’ जैसे चालू गीत उसकी लोकप्रियता में कमी नहीं आई। नौटंकी में आज भी ऐसा बहुत कुछ है जो लोकरंजन के लिए आवश्यक खाद का काम करेगा। बदले वक्त और तकनीक में इसका क्या स्वरूप बने इसके लिए पेशेवर और प्रायोगिक रंगमंच के लोगों को मिल बैठ कर गंभीरतापूर्वक कार्य करने की आवश्यकता है।
हालांकि कई वर्ष पूर्व लखनऊ और कुछ समय पूर्व आजमगढ़ में प्रदर्शन हुए थे। परंतु प्रायोगिक रंगमंच और पेशेवर नौटंकी मंडलियों के बीच समन्वय का कोई बहुत गंभीर प्रयास नहीं हुआ। जिससे इनके बीच की दूरी एक गहरी रचनात्मकता से पाटी जा सके। दोनों की अपनी विवशताएं आवश्यकताएं और अहंकार रहे हंै। यह सकारात्मक रूप ले सकें इसकी बहुत आवश्यकता थी।
इसी दिशा में गंभीरता से प्रयास करते हुए संगीत नाटक अकादमी नईदिल्ली इस वर्ष 13 से 17 जुलाई तक पांच दिवसीय कार्यक्रम ‘देशज’ का आयोजन कानपुर नगर और ठठिया (कन्नौज जिले में) ‘गुलाब थिएटर कंपनी कानपुर’ के सहयोग से करने जा रही है। इसमें प्रायोगिक रंगमंच से नए उत्साह के साथ जफर संजरी जहां मिथलेश्वर की नौटंकी ‘बाबूजी’ लेकर ग्वालियर से आ रहे हैं। वहीं आलोक रस्तोगी मुद्रा राक्षस की चर्चित नौटंकी ‘आला अफसर’ की प्रस्तुति देंगे। इलाहाबाद की स्वर्ग संस्था प्रेमचंद की चर्चित कहानी ‘बूढ़ी काकी’ की नौटंकी प्रस्तुति देगी, साथ ही दिल्ली की ‘रंगभूमि’ संस्था ‘कर्मेव धर्म’ को प्रदशित करेगी। तक्षशिला नाटय एवं सांस्कृतिक संस्था कानपुर ‘बहादुर लड़की उर्फ औरत का प्यार’ नौटंकी प्रस्तुत करेगी वहीं गुलाब थियेटर कंपनी कानपुर अपने समय की बेहद चर्चित रही नौटंकी ‘सुल्ताना डाकू’ और ‘राजा हरिश्चंद’ का प्रदर्शन करेगी।
इनके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ का पंाडवानी, नाचा गम्मत, त्रिपुरा का जात्रा, बुदेलखंड की आल्हा, राजस्थान के पांडव के कड़े, कर्नाटक की हरिकथा, हरियाणा की रागिनी,स्वांग, मध्यप्रदेश के राई, स्वांग, जम्मू और काश्मीर का भाण्ड पाथेर, असम का पारिजात हरन जैसी लोक प्रस्तुतियां होंगी।
विशेष बात यह है कि इस छह दिवसीय आयोजन अकादमिक बहस मुबाहिसे से दूर नौटंकी और देश के अन्य लोकनाटयों के अनूठे आनंद के सागर में डूबकर सुख के मोती खोजने जैसा होगा। ये प्रदर्शन तीन दिन अपने पुराने चहेते नगर कानपुर के दर्शकों के बीच होंगे तो दूसरी ओर दो दिन का प्रदर्शन निपट ग्रामीण अंचल में गुलाबबाई की जन्मस्थली के निकट ठठिया में ठेठ लोक के बीच...
आशा है यह और इस तरह के आयोजन इस लोकनाटय को संजीवनी प्रदान करेंगे। जनरूचि का परिष्कार करेंगे। विचारमंथन, प्रयोग और सही निर्णय लोकनाटय नौटंकी का नया स्वरूप गढ़ेंगे। उम्मीद की जानी चाहिए ऐसे आयोजनों और प्रयोगों से यह लोकनाटय अपने लोक की धूल में इस तरह लोटकर लोकरूचि की पहचान करेगा और स्वयं को फीनिक्स पक्षी की तरह बदल अपनी लोकप्रियता के मानदंड जन समाज में पुनः स्थापित कर सकेगा।