Friday, 8 July 2016

आसमान में छाए बादल,
जल भर भर कर लाए बादल,
लगता अब ये नहीं रुकेंगे,
कितना ऊपर और झुकेंगे,
ताल तलैया सब प्यासे थे,
आना ही था चौमासे थे,
धूल भरे थे पेड,नहाएं,
बच्चे घर से बाहर आएं,
ठंडी हवा बदन को भाती,
तन और मन दोनों सिहराती,
तबियत खुश कर जाए बादल,
आसमान में छाए बादल,
रोज झेलते घोर प्रदूषण,
सड़कों के ये प्यारे फूल,
जहर पी रहे हँसते-हँसते,
सारे जग से न्यारे फूल,
खिले-खिले चेहरे लेकर ये,
स्वागत करते हम सबका,
भले इन्हें हम नहीं सराहें,
फिर भी गिला नहीं दिखता,
हाथ हिला अभिवादन करते,
कैसे मस्त रहे हैं झूल,
जहर पी रहे हँसते-हँसते,
सारे जग से न्यारे फूल,
झूम रहे हैं, झूल रहे हैं,
जब - जब तेज हवा चलती,
खुश हो-होकर हाथ हिलाते,
कोई गाड़ी तेज निकलती,
खुश रहना हर हाल में हमको,
काँटे मिलें मिलें या फूल,
जहर पी रहे हँँसते-हँसते,
सारे जग से न्यारे फूल,
रंग कहाँ से लाती इतने,
सुंदर पंखों वाली,
सब दिन रहो फुदकती,
फिरती इस डाली उस डाली,
कभी हमें ले चलो घुमाने,
अपने गाँव शहर में,
कहाँ बैठ गाने गाती,
गर्मी की दो पहर में,
बारिश में भीगती, न मिलती,
दूर -दूर तक छाँव,
सर्दी में बिन स्वेटर कैसे रहती,
भला बताओ,
समय बिताती हो तुम कैसे,
जब होती हो खाली,
रंग कहाँ से लाती इतने,
सुंदर पंखों वाली,
र श्मियां बिखेरूँगा दीप्त भाल की तेरे,
ज ख्मों का मरहम मैं लाऊँगा खोजकर,
नी रस इन भावों की बंजर इस धरती पर,
कां हाँ की वंशी से पत्थर को तोड़ कर,
त न्हाई के दुखों को सहते, बेबस इन,
प्रा णहीन जिस्मों में फूकूँगा शक्ति नई,
न मक हराम सारे बनेंगे नमक हलाल,
दे खेगी दुनियाँ, रूप वो अनूप दूँगा,
श पथ लाऊँगा समूल सागर निचोड़ कर,
प ल-पल जो तड़पाते, विष के उपचार हेतु,
र ह-रह जो ग्रसते हैं, चन्द्र मेरा राहु केतु,
दे व दानवों के, संघर्ष की कहानी को,
ना म हैं नए मगर, कथा वही पुरानी को,
जा ग्रत हो चेतन हो,शक्ति का प्रवाह कर,
न वल ज्योति आशा ले,काँटों में राह कर,
ता श के महल जैसे गिरेंगे वे आततायी,
है ये सच बच न सकेंगे भी वे चाह कर,
ये जन-जन के मन की वीणा की स्वर लहरी,
स हयोगों की शक्ति, आपसी समझ गहरी,
च मक है जलन दिल की,तड़प प्यास जीवन की,
मां का आशीष संग पाथेय ऐसा हो,
नि कल पड़ेंगे पथ में फिर वो चाह जैसा हो,
ये ही दुआ मांगे, कल न आज जैसा हो,
एक खरगोश और एक कछुआ,
ये दोनों थे मित्र बड़े,
मिलजुलकर रहते आपस में,
कभी नहीं वे थे झगड़े,
एक बार लग गई शर्त,
दोनों में दौड़ हुई,
दौड़़ पड़ा खरगोश,
सोचकर मेरी जीत हुई,
लेकिन आधे पथ में उसने सोचा,
थोड़ा सा सो लूँ,
कछुआ धीमे आता होगा,
तब तक एक नीँद ले लूँ,
धीमे-धीमे चलता कछुआ,
उसके आगे निकल गया,
सोया था खरगोश,
इसी से कछुआ बाजी जीत गया,
जबतक वक्त काम का तबतक,
नहीं करेंगे हम आराम,
जब हो वक्त खेल का खेलें,
इससे होगा ऊँचा नाम
बाल भवन में बच्चे खुश हैं,
हम भी खुश हैं बच्चों में,
खूब यहाँ हुड़दंग मचाओ,
नाम हो फिर भी अच्छों में,
चाहे छुक-छुक ट्रेन पे बैठो,
पेंटिंग, स्केटिंग कर लो,
क्रिकेट, जूड़ो,चेस खेल लो,
मनचाहे गाना गा लो,
नृत्य सीख लो, पुस्तक पढ़ लो,
लिखो कहानी कविता को,
चुन्नू सीख रहे कम्प्यूटर,
फोटोग्राफी सविता को,
गर्मी की छुट्टियां यहाँ पर,
बच्चों का मेला लगता,
सुबह हुई तो उठकर बच्चा,
सीधा बाल भवन भगता,
गर्मी नहीं, छुट्टियां पूरी,
नाम नहीं अब कच्चों में,
बाल भवन में बच्चे खुश हैं,
हम भी खुश हैं बच्चों में,

  खन्ती मन्ती कौड़ी पाई,
कौड़ी मैंने गंग बहाई,
गंगा मोहे बारू दीन्हीं,
बारू मैंने भुज्जी को दीन्हीं,
भुज्जी मोहे चबेना दीन्हों,
चबेना मैंने घसियारे को दीन्हों,
घसियारे ने मोहे घास दीन्हीं,
घास मैंने गईया को दीन्हीं,
गईया मोहे दुद्धू दीन्हों,
दूध की हमनै खीर पकाई,
खीर हती सब घर नै खाई,
बची खुची आरे धरी पिटारे धरी,
जाजमऊ को बिल्लर आओ,
गूदा गूदा खाय गओ ,
बकली बकली डार गओ,
नई भीत उठी पुरानी गिरी धम्म   

नौटंकी को अपना अंदाज़ बदलना होगा

नौटंकी कानपुर उत्तर प्रदेश का ऐसा यशस्वी लोकनाटय रहा है जिसने पूरे भारत में अपनी लोकप्रियता का सिक्का जमाया आज भी इसके मंच की गायकी में जन-जन को आकर्षित करने की गज़ब की क्षमता है।

कहते हैं कि पहले यहां खयाल गायन की परंपरा थी और गायकी में अमरोहा शैली का बोलवाला था। शुरू में ब्रज क्षेत्र में नथाराम गौड़ ने व्यावसायिक आधार पर अपनी मंडली बना ली थी। यही पंडित नथाराम गौड हर साल सावन के महीने में अपनी मंडली के साथ कानपुर की यात्रा करते थे। वे स्वागों का प्रदर्शन करते और फटके सुनाते। ऐसे में उन्होंने एक चुनौती कानपुर के लोगों के सामने रख दी कि कोई ऐसा करके दिखाए। जिसे स्वीकार करते हुए उनके फटकों के जबाव में बंदी खलीफा, मुल्ला राय और मैकू उस्ताद ने करीब 1910 के आसपास एक जबरदस्त प्रदर्शन किया। जिसमें शुरू में लहरा बजाया गया। फिर मैकू उस्ताद की चोब की एक नगाड़े और बारह नगड़ियों पर मात्राओं के हिसाब से बजती टंकार ने ऐसी फुर्ती दिखाई कि सब दंग रह गए। इसके लिए मुम्बई से लछमन नाम का एक गायक भी बुलाया गया था जो एक ही गीत को सत्तरह धुनों में गाता था। हिंदी क्षेत्र के लोक नाटय में नक्कारे का प्रयोग पहले भी होता रहा था मगर उसकी शक्ति को कानपुर में ही पहली बार पहचाना गया। यही से नौटंकी की शुरुआत मानी जाती है।

 इस पहली प्रस्तुति के बाद बंदी खलीफा, मैकू उस्ताद और मुल्ला राय इससे अलग हो गए। इसके बाद श्रीकृष्ण पहलवान ने इस जिम्मेदारी को संभाला। श्रीकृष्ण पहलवान ने मंडली में हाथरस, अलीगढ़ के कलाकारों के साथ मिलकर कई नए-नए प्रयोग किए। उन्होंने नौटंकी के विषय और उसके विचार पक्ष, शिल्प को एक ठोस आधार दिया। पहले खुले मंच पर होने वाले खेल को पारसी रंगमंच की तरह पर्दे में बांधा। मुख्य कथा के साथ हास्य प्रधान उपकथा का प्रचलन शुरू किया। पद्यात्मक संवाद के साथ-साथ गद्य में भी संवादों का चलन शुरू हुआ। हास्य कलाकार मसखरा जिसका नाम पिस्सू या नकलची होता था जिसे जोकर कहते हैं, उसकी रचना की। इस लोक नाटय में उन्होंने देशभक्ति और समाज सुधार वाले खेल जोड़े। उनसे पहले इसका स्वरूप मात्र मनोरंजन और गायकी भर था।

श्रीकृष्ण पहलवान का आर्य समाज के सुधारवादी कथानक पर पहला सांगीत उर्फ नौटंकी ‘धर्मवीर हकीकतराय’ था। फिर जलियांवाला बाग घटना पर ‘खूनेनाहक’ लिखवाकर उन्होंने मंचित कराया। उन दिनों ‘भगतसिंह’ नौटंकी के प्रदर्शन के शुरू में जंजीरों में जकड़ी भारतमाता का सीन होता था। बाद में गांधी, सुभाष, नेहरू, झांसी की रानी, बहादुरशाह जफर आदि खेल आए। ये और इनके जैसे अनेक खेल श्रीकृष्ण पुस्तकालय से छपकर पूरे देश में साप्ताहिक हाटों, मेलों में बिककर छोटी-छोटी मंड़लियों द्वारा खेले जाते थे। उस समय कानपुर की प्रसिद्धि एशिया के मैनचेस्टर के रूप में थी। समृद्धि और सम्पन्नता के साथ-साथ एक बड़ी मजदूर आबादी का बसेरा भी था कानपुर...गणेशशंकर विद्यार्थी, मौलाना हसरत मोहानी, गयाप्रसाद शुक्ल सनेही, मुंशी प्रेमचंद की उपस्थिति से कानपुर में राष्ट्रीय चेतना का प्रवाह बह रहा था इन सबका लाभ नौटंकी को मिलना था और वह भरपूर मिला भी।

उस समय श्रीकृष्ण पहलवान की चार नौटंकियां एक साथ चलतीं थीं। एक टीम शादी व्याहों में जाती थी, दूसरी टीम मेलों तमाशों में टिकट लगाकर प्रदर्शन करती, तीसरी कानपुर में रहती चैथी नौसिखियों की टीम थी जो रिजर्व में रहते सीखते रहते और ज्यादा मांग होने पर सेकेण्ड टीम के तौर पर भेजे जाते थे।

इसके बाद त्रिमोहन जो कन्नौज से थे उन्होंने श्रीकृष्ण पहलवान की परंपरा को आगे बढ़ाया। 1883 में गरीबी में इनका जन्म हुआ। बचपन में बाजीगर बनकर सड़कों पर तमाशा दिखाते थे। इनमें छिपी प्रतिभा पहचान कर मथुरा के नथाराम गौड़ ने इन्हें अपनी मंड़ली में शामिल कर लिया। उनकी दीक्षा हाथरस के उस्ताद इंदरमन से हुई। यहां इन्होंने नक्कारा बजाना सीखा था। हाथरसी स्वांग की गुरु शिष्य परंपरा से होने के बावजूद त्रिमोहन लाल ने हाथरसी परंपरा को न चुनकर कानपुरी नौटंकी को चुना। वे 1920 के आसपास नौटंकी के क्षेत्र में आए। उनके आने से अभिनय पक्ष और संवादों की अदायगी के क्षेत्र में अनेक बड़े परिवर्तन हुए। उन्होंने बोझिल धीमी नाटय गति की जगह पर आंगिक चेष्टाओं ऐक्शन प्रधान भंगिमाओं को उभारा। नौटंकी के मंच पर महिला कलाकारों गुलाबबाई और कृृष्णाबाई जैसी गायिकाओं को लाने का श्रेय भी त्रिमोहन को जाता है। जिनके आने से मंच पर स्वाभविकता आ गई। बाद में इनकी लोकप्रियता को देख हाथरसी मंच पर श्यामा और अन्नो का अवतरण हुआ। त्रिमोहन की खोजों में एक सारंगीवादक गंगादीन भगतिया भी थे। कहते हैं एक बार उन्होंने देश के प्रसिद्ध सारंगीवादक गुलाम साबिर को गलत सारंगी बजाते हुए टोक दिया था। और गुलाम साबिर को मानना पड़ा था कि वे कहां गलती कर रहे थे। मेडू अलीगढ़ के चिरंजीलाल भी इनकी मंडली के मशहूर गायक थे। उन दिनों जब गायक को आठ से दस रुपए मासिक मिलता था तब उनका वेतन पचास रुपए था। वे चिरंजीलाल पचासा के नाम से जाने जाते थे। उनके बेटे मशहूर शंकर शम्भू कव्वाल त्रिमोहन के नौटंकी मंच पर बचपन में नृत्य करते थे।

 त्रिमोहन ने ‘जहांगीरी न्याय’ नाम का खेल लिखा जो बेहद लोकप्रिय हुआ। इतिहास और लोक संवेदना का यह कुशल समन्वय नौटंकी के मंच पर बेहद सफल रहा । स्वांग मंचों और पारसी थियेटरों ने भी इस कथानक को उठाया। सोहराब मोदी ने तो इस विषय पर फिल्म भी बनाई। उनकी नक्कारे की कुशलता और प्रभाव को लेकर तमाम किवदंतियां क्षेत्र में आज भी बिखरी हुईं हैं। उनकी मंडली की प्रस्तुति में हीरोइन का रोल गुलाबबाई ही करतीं थीं। उस समय शायर यासीन ने काफी सारी नौटंकियां उनकी मंड़ली के लिए लिखीं जिनमें खुदा दोस्त, गुलबदन, ग़ाफिल, मुसाफिर, गुलवकाबली काफी चर्चित रहीं। देश की स्वाधीनता के वर्ष के आते-आते वे गंभीर आर्थिक तंगी के शिकार हो गए और अपने नाटयालेखों के कापीराइट मात्र कुछ सौ रुपए में उन्हें श्रीकृष्ण पुस्तकालय को बेचने पड़े। 1942 में गुलाबबाई के अलग कंपनी बना लेने और 1957 में यासीन की मौत से वे टूट गए। ऐसी दुरवस्था में ही 1963 में उनका निधन हो गया।

श्रीकृष्ण पहलवान का प्रकाशन का व्यवसाय चल निकला था। आजादी के आते ही फिल्मों का बोलवाला हुआ। लोगों की रुचियां बदलीं और ऐसे में जब सब नौटंकी को  रहमो करम पर छोड़ कर चले गए। तब गुलाबबाई ने इसकी पताका को थामे रखा। गुलाबबाई आखिरी सांस तक नौटंकी की गौरवशाली परंपरा को बचाए रखने के लिए जूझती रहीं। उन्होंने न केवल इस परंपरा को बचाया बल्कि उन कलाकारों के संरक्षण का भार भी उठाया जो जीवन भर नौटंकी को समर्पित रहे और जीवन की सांझ में जिनकी खोज ख़बर रखने वाला कोई नहीं रहा। भारत सरकार ने गुलाबबाई को 1990 में ‘पदमश्री पुरस्कार’ देकर उनका उचित ही सम्मान किया। 13 जुलाई 1996 को गुलाबबाई ने कानपुर में अंतिम सांस ली।

  बहुत कम कला रूप हैं जो उपेक्षा और तिरस्कार के बाद भी अपने अस्तित्व को बनाए रख सके। नौटंकी लोकाश्रित थी सो सभ्य समाज द्वारा उपेक्षित और तिरस्कृत होने के बावजूद सम्पन्न समाज में आवश्यक बुराई की तरह जीवित रही। किसी भी लोकनाटय शैली के पुर्नसंस्कार की पहल लोक के बीच से ही संभव है। आज लोक अपने पारंपरिक अर्थों में सुरक्षित नहीं है। उसके मनोलोक व संवेदनाओं में भारी बदलाव आ चुके हैं। मगर फिर भी संभावनाएं वहीं से हैं।

यद्यपि नौटंकी में आधुनिक प्रयोगों के रूप में मुद्राराक्षस के ‘डाकू,’ ‘आला अफसर’ और उर्मिल कुमार थपलियाल के ‘हरिचन्नर की लड़ाई’ आदि चर्चित रहे। पर ये प्रस्तुतियां रंगकर्मियों में नए प्रयोगों के प्रति उत्साह न जगा सकीं। ध्यान रहे प्रायोगिक रंगमंच की प्रस्तुतियां लोकनाटय की पूरक या विकल्प नहीं बन सकती। सरकारी संरक्षण उनके वर्तमान के लिए सहायक हो सकता है पर उनके भविष्य के लिए नहीं। इसके लिए तो पेशेवर समाज को ही आगे आना होगा।

वास्तव में प्रायोगिक मंच के शहरी कलाकारों द्वारा लोककलाओं के जुड़ने की परंपरा ने नौटंकी की मौलिकता को क्षति पहुंचाई। तमाम पूर्वाभ्यासों सरकारी प्रशिक्षणों के बावजूद ये कलाकार पारंपरिक कलाकारों की बराबरी न कर सके। रेडियो, दूरदर्शन व लोक साहित्य में इस विधा में कई प्रयोग हुए। एडस, नशा, दहेज आदि विषय पर प्रस्तुतियां इस विधा के साथ खिलवाड़ की तरह हुई है। प्रायोगिक रंगमंच द्वारा की गई नौटंकी पेशेवरों द्वारा सहज स्वीकार न हो सकीं इसके पीछे निजी स्वार्थ अज्ञान और उत्साह की कमी रही। लोक कलाकारो की हीन भावना उनकी निरक्षरता और नए समाज में उनकी पहचान न बनने के पीछे का कारण हमारी सांस्कृतिक सामाजिक व्यवस्था रही।

इस विधा के संरक्षण के लिए आज आवश्यकता है सभी कलाकार एकजुट हो, ‘अखिल भारतीय नौटंकी महासंघ’ या ‘सांगीत नौटंकी स्कूल’ खोला जाए। नए व पुराने नौटंकी कलाकारों को प्रशिक्षण मिले। गायन वेषभूषा, अभिनय, मेकअप, प्रस्तुतीकरण में नई तकनीक का प्रयोग हो। प्राचीन आचरण व मुखौटे बदले जाए। आज अच्छे नौटंकी लेखकों का अभाव है। कुशल नौटंकी लेखक आगे आएं जिनको छंद रचना पर अधिकार हो उनको प्रस्तुति का लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव का अंदाजा हो। उन्हें संगीत का ज्ञान हो और उनका रंगमंच से जुड़ाव हो। उनके द्वारा सामयिक ज्वलंत समस्याओं और विषयों को उठाया जाए। सारी रात की बजाय प्रदर्शन की समय सीमा तीन घंटे की हो साथ ही उनके द्वारा तुलसीदास की तरह लोक भाषा का प्रयोग किया जाए।
आज ऐसे लोगों के मार्गदर्शन की भी इसमें आवश्यकता है जो नौटंकी की आत्मा और मर्म से परिचित हो। दूसरी ओर पेशेवर नौटंकी कलाकारों में आधुनिक चेतना के प्रति उत्साह जगे। वास्तव में रंगकर्मियों की भी गुरु-शिष्य परंपरा होनी चाहिए। इसकी गायकी के शुद्ध रूपों की स्वरलिपियों बनाकर संरक्षित किया जाए। नक्कारा जो सारंगी की तरह दुर्लभ होता जा रहा हैं। संगीत महाविद्यालयों में इसका नियमित प्रशिक्षण हो।

किसी भी कलारूप का देश काल परिस्थितियों और जनरूचियों के अनुरूप स्वरूप निर्धारित होता है। इनके बदलते ही वह अपने बदले स्वरूप में सामने आता है या मिट जाता है। हमें सोचना होगा कि जिस लोकप्रियता के चलते नौटंकी के गायन की नकल सिनेमा जैसे सशक्त माध्यम करते रहे हों। चाहे ‘नदी नारे न जाओ श्याम पैयां परूं’ और ‘मोहे पीहर में मत छेड; जैसे भावप्रणव रसीले गीत रहे हों या ‘मुन्नी बदनाम हुई’ जैसे चालू गीत उसकी लोकप्रियता में कमी नहीं आई। नौटंकी में आज भी ऐसा बहुत कुछ है जो लोकरंजन के लिए आवश्यक खाद का काम करेगा। बदले वक्त और तकनीक में इसका क्या स्वरूप बने इसके लिए पेशेवर और प्रायोगिक रंगमंच के लोगों को मिल बैठ कर गंभीरतापूर्वक कार्य करने की आवश्यकता है।

हालांकि कई वर्ष पूर्व लखनऊ और कुछ समय पूर्व आजमगढ़ में प्रदर्शन हुए थे। परंतु प्रायोगिक रंगमंच और पेशेवर नौटंकी मंडलियों के बीच समन्वय का कोई बहुत गंभीर प्रयास नहीं हुआ। जिससे इनके बीच की दूरी एक गहरी रचनात्मकता से पाटी जा सके। दोनों की अपनी विवशताएं आवश्यकताएं और अहंकार रहे हंै। यह सकारात्मक रूप ले सकें इसकी बहुत आवश्यकता थी।

इसी दिशा में गंभीरता से प्रयास करते हुए संगीत नाटक अकादमी नईदिल्ली इस वर्ष 13 से 17 जुलाई तक पांच दिवसीय कार्यक्रम ‘देशज’ का आयोजन कानपुर नगर और ठठिया (कन्नौज जिले में) ‘गुलाब थिएटर कंपनी कानपुर’ के सहयोग से करने जा रही है। इसमें प्रायोगिक रंगमंच से नए उत्साह के साथ जफर संजरी जहां मिथलेश्वर की नौटंकी ‘बाबूजी’ लेकर ग्वालियर से आ रहे हैं। वहीं आलोक रस्तोगी मुद्रा राक्षस की चर्चित नौटंकी ‘आला अफसर’ की प्रस्तुति देंगे। इलाहाबाद की स्वर्ग संस्था प्रेमचंद की चर्चित कहानी ‘बूढ़ी काकी’ की नौटंकी प्रस्तुति देगी, साथ ही दिल्ली की ‘रंगभूमि’ संस्था ‘कर्मेव धर्म’ को प्रदशित करेगी। तक्षशिला नाटय एवं सांस्कृतिक संस्था कानपुर ‘बहादुर लड़की उर्फ औरत का प्यार’ नौटंकी प्रस्तुत करेगी वहीं गुलाब थियेटर कंपनी कानपुर अपने समय की बेहद चर्चित रही नौटंकी ‘सुल्ताना डाकू’ और ‘राजा हरिश्चंद’ का प्रदर्शन करेगी।

इनके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ का पंाडवानी, नाचा गम्मत, त्रिपुरा का जात्रा, बुदेलखंड की आल्हा, राजस्थान के पांडव के कड़े, कर्नाटक की हरिकथा, हरियाणा की रागिनी,स्वांग, मध्यप्रदेश के राई, स्वांग, जम्मू और काश्मीर का भाण्ड पाथेर, असम का पारिजात हरन जैसी लोक प्रस्तुतियां होंगी।

 विशेष बात यह है कि इस छह दिवसीय आयोजन अकादमिक बहस मुबाहिसे से दूर नौटंकी और देश के अन्य लोकनाटयों के अनूठे आनंद के सागर में डूबकर सुख के मोती खोजने जैसा होगा। ये प्रदर्शन तीन दिन अपने पुराने चहेते नगर कानपुर के दर्शकों के बीच होंगे तो दूसरी ओर दो दिन का प्रदर्शन निपट ग्रामीण अंचल में गुलाबबाई की जन्मस्थली के निकट ठठिया में ठेठ लोक के बीच...

आशा है यह और इस तरह के आयोजन इस लोकनाटय को संजीवनी प्रदान करेंगे। जनरूचि का परिष्कार करेंगे। विचारमंथन, प्रयोग और सही निर्णय लोकनाटय नौटंकी का नया स्वरूप गढ़ेंगे। उम्मीद की जानी चाहिए ऐसे आयोजनों और प्रयोगों से यह लोकनाटय अपने लोक की धूल में इस तरह लोटकर लोकरूचि की पहचान करेगा और स्वयं को फीनिक्स पक्षी की तरह बदल अपनी लोकप्रियता के मानदंड जन समाज में पुनः स्थापित कर सकेगा।
                                                       बादलों के देश में सात दिन

मेघों का आलय यानि बादलों का घर, मेघालय का यही तो अर्थ हुआ न। इस बार मैंने गर्मी की छुट्टियां में बादलों के घर ही जाने का निश्चय किया। जाने के एक दो दिन पहले ही राजधानी दिल्ली और उसके आसपास के आसमान में बादलों ने डेरा जमा लिया। घर के ऊपर चारो ओर से उमड़-घुमड़ कर आए बादलों को देखकर ऐसा लगा मानो मेरे आने की खुशी में वे ऐसे बावरे हो गए कि मुझे मेरे घर से ही लिवाने आ गए हों।
मुझे हवा के पंखों पर चढ़कर जाना था। शाम पांच बजे की इंडिगो की फ्लाइट थी। दिल्ली से गौहाटी तक का सोलह सौ किलोमीटर का सफर लगभग दो घंटे में तय किया जाना था। सुबह से ही मन में एक उत्साह था अनदेखे अनजाने देश में जाने का... सो सामान लेकर साढ़े ग्यारह बजे ही आटो से प्रतापविहार गाजियाबाद से आनंद विहार दिल्ली के लिए निकल गया। वैसे तो आनन्द विहार से मेट्रो में बैठ कर नईदिल्ली और नईदिल्ली से एयरपोर्ट मैट्रो में बैठकर बड़ी आसानी से एयरपोर्ट जाया जा सकता था। मगर अभी हमारे पास लगभग पांच घंटे थे और हमें यह भी पता था कि आनन्दविहार से एयरपोर्ट के लिए दिल्ली ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन यानि डी.टी.सी. की बसें जातीं हैं। सो हमने जाने के लिए इसी माध्यम को चुना। सोचा-‘जब घूमने के लिए निकले हैं तो एयरपोर्ट भी थोड़ा घूमते-घामते ही पहुंचें।’
आनंदविहार से साढ़े ग्यारह बजे बस मिली। किराया मात्र पच्चीस रुपए आराम से सीट भी मिल गई। वाह क्या कहने... दोपहर का समय है ज्यादा टैªफिक भी सड़कों पर नहीं होगा। चार घंटे में तो पहुंच ही जाएंगे,ऐसा हमने सोचा।
मगर ऐसे ही सबका सोचा हुआ हो जाया करे तो सोचो जिंदगी कितनी नीरस हो जाएगी। जीवन से सारा रोमांच विदा हो जाएगा। फिर तो ये हमारा जीवन मशीन में चाबी भरे गुड्डे की तरह हो जाएगा। जीवन का रोमांच तो उसकी अनिश्चतताओं में है। शुक्र है कि सब कुछ निश्चित नहीं है। आगे क्या होनेवाला है ये किसी को नहीं पता...
दिल्ली में अनेक स्थानों पर मेट्रो का निर्माण कार्य चल रहा है। इसलिए कहीं न कहीं ट्रैफिक बाधित होता रहता है। मगर आज तो हद ही हो गई जब पिलर निर्माण के क्रम में कोई क्रेन क्षतिग्रस्त हो गई थी जिसके कारण हमारे रास्ते में पड़ने वाले स्टेशन आश्रम के पास एक ओर का रास्ता पूरी तरह से बंद हो गया था। अब दोनों तरफ का ट्रैफिक एक ओर से ही चल पड़ा और फिर वही हुआ जो होना था भयंकर जाम लग गया। लगभग दो घंटे जाम में बस फंसी रही लेकिन कोई चिंता नहीं हुई क्योंकि हमारे पास बहुत समय था...
धीरे-धीरे जैसे-तैसे करके जाम से निकले तो तीन-तीन मिनट वाली रेड लाइट ने काफी समय ले लिया। इसके बाद बस जरा सी आगे बढ़ी थी कि ड्राइवर ने घोषणा कर दी कि अब बस आगे नहीं जाएगी और नेहरू प्लेस पहुंचते-पहुंचते उसने बस में ब्रेक लगा दिया। अब चिंता के बादल मुझे शनै-शनै अपनी ओर बढ़ते दिखाई देने लगे। मगर मन को कड़ा किया ओर पीछे से आने वाली दूसरी एयरपोर्ट की बस पकड़ी। यह बस वाला ड्राइवर ठीक से बस चला रहा था लग रहा था कि अब समय से पहुंच जाऊँगा।
पड़ोस में खड़े एक युवक से पूछा तो उसने बताया कि यहां से लगभग आधा घ्ंाटा लगेगा। घड़ी में समय देखा तीन बजकर दस मिनट हो रहे थे। कोई नहीं... हंुह... पहुंच ही जाएंगे। सड़क बढ़िया थी शीशे के पार देखा तो एयरपार्ट का साइनेज लगा था। मगर अरे यह क्या बस तो यहां से दूसरी दिशा में मुड़ गई। इधर साकेत, खिड़की गांव, चिराग दिल्ली, महरौली ,मसूदपुर गांव, महिपालपुर... पता नहीं कहां-कहां से है इस बस का रूट... सारी दिल्ली का ही दर्शन करा दिया इसने...
महिपालपुर आया तो लगा कि यह तो एयरपोर्ट के नजदीक ही है। अब बस जा रही थी टर्मिनल-3 पर जो कि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए प्रयोग होता है। मेरे साथ जाने वाले मनीष जैन घरेलू टर्मिनल पर पहुंच चुके थे उनका लगातार फोन आ रहा था। उन्होंने बताया हमें तो घरेलू टर्मिनल 1डी पर जाना है। ओह...अब...क्या करें...
ड्राइवर ने बताया-यहीं से 1डी के लिए कोई न कोई सवारी मिल जाएगी। उतर कर खड़ा हुआ तो सच में एक टैक्सी मिल गई जिसने अंदर ही अंदर जरा सी देर में हमें घरेलू एयरपोर्ट 1डी पर पहुंचा दिया। उसको वाजिब किराए से अपने मन से ही अधिक रुपए देकर मैं टिकट और पहचान पत्र दिखाकर अंदर दाखिल हुआ। बोर्डिग पास लिया और कुछ ही देर में सामान चेक इन करवा कर सिक्योरिटी जांच के बाद चार बजकर बीस मिनट पर नीचे पहुंच गया। अब जान में जान आई। यहां अलग-अलग शहरों के लिए जाने वाले यात्रियों का जमावड़ा लगा हुआ था।
एयरपोर्ट का बहुत बड़ा एरिया वातानुकूलित जरूर था मगर वहां यात्रियों की स्थिति कमोवेश किसी बड़े बस अड्डे की भीड़ से कम न थी। एक भी सीट बैठने के लिए खाली न थी। लोग सीढ़ि़यों पर भी बैठे हुए थे। बावजूद इसके कि सभी की सीटें आरक्षित थीं और अभी जाने का दरवाजा नहीं खुला था और लोग लंबी-लंबी कतारों में एक दूसरे से चिपके खड़े थे ताकि कोई दूसरा उनके बीच न घुस जाए।
यात्रियों को देखते-देखते मेरी नज़र एक परिचित चेहरे पर जा कर ठहर गई। ये जे.एन.यू. में प्रोफेसर शिवप्रकाशजी थे। वे भी उसी विमान के यात्री थे जिसमें हमें जाना था। बातचीत के बीच उन्होने बताया कि वे साहित्य अकादमी के किसी दो दिवसीय कार्यक्रम में भागीदारी करने गौहाटी जा रहे हैं। घड़ी की सुइयां बढ़ती जा रहीं थीं पोर्ट के अंदर जाने का दरवाजा नहीं खुल रहा था लोगों की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। मैं भी उस बेचैन भीड़ का हिस्सा था। आज फ्लाइट संभवतः लेट थी।
अंततः दरवाजा खुला और बोर्डिग पास के बार कोड की जांच के बाद हम सब यात्री विमान तक जाने के लिए बस में चढ़ने लगे। बाहर बारिश हो चुकी थी मौसम कुछ भीगा-भीगा सा था। ओह... बादल यहां भी हमारे साथ थे। अपनी नियत सीट पर बैठने के बाद एक बार फिर चैन की सांस ली। विमान परिचायिका ने बताया कि पुणे के रहने वाले कुलवंत और उनके साथी विमान के चालक और सहचालक हैं तथा दिल्ली की रहने वाली तीन महिलाएं क्रू की सदस्य परिचायिकाएं हैं। उनके नाम भी बताए गए। सुरक्षा संबंधी हिदायतों के बाद विमान ने दिल्ली की धरती को छोड़कर अनंत आकाश की ओर रुख कर लिया।
हालांकि यह मेरी पहली विमान यात्रा नहीं थी मगर पिछली कई विमान यात्राओं के अनुभव के बावजूद रोमांच का जो संचार मन में हुआ वह अनूठा था। आपका भी अनुभव होगा कि आसमान में विमान या हेलीकाप्टर की आवाज सुनते ही क्या बूढ़ा क्या बच्चा और क्या जवान सबकी निगाहें अनायास ही आकाश की ओर उठ जातीं हैं कुछ ऐसा ही है इसका जादू...मुझे भी इसी तरह का अनूठा रोमांच हर बार की विमान यात्रा पर होता है। विशेषकर धरती को छोड़कर आसमान की ओर उठने के उड़ने के क्षणों का अनुभव...
धीरे-धीरे धरती को छोड़कर ऊँचा ओर ऊँचा उठता विमान एक निश्चित ऊँचाई पर पहुंच कर ठहर सा गया। जानकारी करने पर पता चला कि लगभग पैतीस हजार फुट की ऊँचाई पर उड़ता विमान दिल्ली से वाया लखनऊ पटना के एयर रूट से होता हुआ नानस्टाप लगभग दो घंटे में हमें गौहाटी पहुंचा देगा। सीट बेल्ट को खोल लेने के निर्देश मिले साथ ही विमान में खाने-पीने के सामान की बिक्री शुरू हो गई। लोग टायलेट वगैरह जाने के लिए सीटें छोड़ने लगे। विमान में लगभग एक सौ अस्सी सीटें थीं। सामान्य चाय काफी एक सौ रुपए की थी।
हमारी सीट खिड़की से दूसरे नंबर पर थी। खिड़की वाली सीट पर एक महिला बैठी थी। खिड़की के पार बादलों का दृश्य बड़ा मनमोहक था और वह प्रतिपल रंग और आकृति बदलता जा रहा था। शुरू-शुरू में तो बादल तैरते हुए रुई के फाहों की तरह दिखे मगर जल्द ही सूर्य की पड़ती रौशनी से चमकते बादलों का दृश्य मंत्रमुग्ध कर देने वाला था। कहीं बादल फूटते हुए ज्वालामुखी के सदृश्य दिखाई दे रहे थे तो कहीं आभाष हो रहा था कि कहीं हम परीलोक में तो नहीं आ गए। बादलों के ऊपर से गुजरते हुए हमें स्वयं के देवता होने जैसा अहसास हो रहा था। अचानक जरा सी देर में दृश्य बदल गया हमें लगा जैसे हम अंटार्टिका महाद्वीप के ऊपर से होकर गुजर रहे हों और नीचे दूर बहुत दूर तक गड्डमगड्ड बादल ऐसे लग रहे थे मानो चारो ओर बर्फ ही बर्फ बिखरी हो। अस्ताचलगामी सूर्य की किरणों के पड़ने से बननेवाली बादलों की विविध आकृतियों ओर रंगीन मनोहारी छवियों का तो कहना ही क्या... ऐसा लगा मानो यह सारा खेल बादल हमें दिखाने के लिए ही खेल रहे हैं और क्यों न लगता हम बादलों के घर जो जा रहे थे।
काफी देर तक हम इन जादुई दृश्यों में खोए रहे। अचानक उदघोषणा हुई और हमें सीट बेल्ट बांध लेने का निर्देश मिला। अरे... हम पहुंच गए। जिस दूरी को पूरा करने में राजधानी एक्सप्रेस सत्ताइस से लेकर तैंतीस घंटे लेती है उसे लगभग आठ सौ किलोमीटर प्रतिघंटा की गति से चलकर हमने मात्र दो सवा दो घंटे में ही विमान द्वारा पूरा कर लिया था। कुछ ही देर में हम गौहाटी के लोकप्रिय अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरने वाले थे।
यहां भी विमान के रुकते हम सभी अपनी सीटें छोड़कर खड़े हो गए और सामान भी उठा लिए जबकि अभी विमान से नीचे उतरने के लिए सीढ़ियां लगाई जानी शेष थीं। मगर लोगों की बेसब्री का क्या कहना... क्या कोई विमान में छूट जाएगा। सभी को उतार कर ही तो जाएगा। अरे भाई सभी को उतरना है। ये आगे निकलने की होड़ भी अजब है। खुद को ही कष्ट दिए जा रहे हैं। सोचते -सोचते मैं दुबारा सीट पर बैठ गया। कुछ ही देर में सीढ़ी लगी और लोगों ने धीरे-धीरे उतरना शुरू कर दिया। यहां दिल्ली जैसी भीड ़नहीं थी। शाम का धुंधलका छाने लगा था। सभी को अपने गंतव्य तक पहुंचने की जल्दी थी। हम लोग भी अपना सामान लेकर ट्राली समेत बाहर आ गए। हर शहर की तरह टैक्सी वालों ने घेर लिया मगर इनमें उन जैसी आक्रामकता नहीं थी। पूछने पर पता चला कि यहां से लगभग पैंतीस किलोमीटर की दूरी पर गौहाटी है। जहां जाने के लिए तीन सौ रुपए प्रति सवारी और एक हजार रुपए में ए.सी. रूम दिलाने की बात टैक्सीवाले कर रहे थे। हमने सीधे शिलांग जाने का मन बनाया जो यहां से एक सौ किलोमीटर के ऊपर है। टैैक्सीवाले दो और सवारियों के साथ आठ सौ रुपए प्रति सवारी ले जाने को तैयार थे। दिन में एयरपोर्ट से मेघालय सरकार की कुछ बसें सीमित समय के लिए चलतीं हैं जिनका किराया प्रति सवारी दो सौ पचास रुपए है और टैक्सियों का पांच सौ रुपए प्रति सवारी...मगर यहां तो ...
शाम गहराती जा रही थी। हमने अपने मेजबान पत्रिका ‘कर्तव्यचक्र’ के संरक्षक मानसरंजन महापात्र जी को फोन किया। वे शिलांग में उत्तर पूर्व परिषद के सूचना और जनसंपर्क विभाग में निदेशक के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने हमारे लिए टैक्सी की व्यवस्था कर रखी थी। उन्होंने ड्राइवर का नंबर बताया। वह वहीं हमारा इंतजार कर रहा था।
हमें वहां से निकलते-निकलते आठ बज गए थे। अब हमारी एयरपोर्ट से शिलांग की टैक्सी यात्रा शुरू हो गई। ड्राइवर का नाम जयनाथ था। वह त्रिपुरा के रहने वाले थे। उम्र यही कोई चालीस पैतालीस के आसपास... नाम पूछने पर अपने विशिष्ट अंदाज़ में जोयनाथ बताया। जल्दी ही कार एयरपोर्ट की सीमा पार कर शिलांग की ओर फर्राटे भरने लगी। साथी मनीष ने जयनाथ से कहा-रास्ते में हम कहीं कोई अच्छा शाकाहारी होटल देखकर खाना खाएंगे। इसका ध्यान रखना। इतना कहकर वे खिड़की से आती शीतल पर्वतीय हवा के झोंकों में आंखें बंद करके खो गए और मैं जयनाथ द्वारा चलाए गए मनमोहक फिल्मी गीतों में... जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते हैं लोग, एक चेहरे पे कई चेहरे...
एक के बाद एक मनभावन गीत... घुमावदार पहाड़ी रास्ता... हल्की शीतल पवन...रात के करीब नौ बजे का समय...अस्सी और नब्बे की गति पर दौड़ती कार... अकेले ही अकेले चला है कहां, कहेगा क्या कहेगा ये मौसम जवां...
लगभग तीस पैतीस किलोमीटर यात्रा करने के बाद दस बजे एक जोरबाट के पास जयनाथ ने कार रोक दी। एक राजस्थानी भोजनालय में भोजन के उपरान्त हमारी यात्रा एक बार फिर शुरू हो गई। उन्होंने हमें बताया यहां से थोड़ा आगे चलकर ही मेघालय की सीमा शुरू हो जाती है। अगर वे न भी बताते तो कार की खिडकियों से आती कोमल हवा और उसमें घुली ठंडक़ ने चुगली कर दी थी कि लो जी हम बादलों के देश में आ पहुंचे हैं।
इस बार हमारी वार्ता में जयनाथ शामिल थे। उन्होंने बड़ी रोचक कहानियां सुनाईं जैसे मोरनी का आंसू से गर्भधारण करने का रहस्य... हमने हँसते-हँसते उनसे पूछा कि आखिर उन्होंने ऐसी कहानियां कहां से सुनीं। इसका जबाब उन्होंने नहीं दिया। बल्कि ये प्रश्न कर दिया कि हमें उनकी ड्राइविंग कैसी लगी। मैंने कहा गाड़ी तो मैं भी चलाता हूँ मगर इतने घुमावदार रास्ते पर इतनी तेज गति से इतनी कुशलता पूर्वक मैं नहीं चला सकता। मेरे इतना कहते ही मैंने महसूस किया जयनाथ के अंग-प्रत्यंग गर्व से तन गए। उन्होंने कहा आपकी सपाट सीधी सड़कों पर तो मैं एक सै पचास की स्पीड से गाड़ी आसानी से दौड़ा सकता हूँू।
मैंने कारण बताते हुए कहा- ‘पिछले पच्चीस वर्षों से इस परिचित घुमावदार सड़कों पर चलते-चलते तुम्हारी यारी जो हो चुकी है इनसे...’
अब बाहर हल्की बूंदाबांदी शुरू हो चुकी थी। जयनाथ ने कार की गति थोड़ी धीमी कर ली, यह कहते हुए कि अब तेज गति से गाड़ी चलाना खतरनाक होगा। कुछ स्थानीय मुद्दों पर चर्चा करते हुए कार के शीशों से बाहर की खूबसूरती का अनुमान लगाते करीब साढ़े बारह बजे हम शिलांग के मोतीनगर स्थित उत्तरपूर्व परिषद के सरकारी आवास के निकट पहुंचे। हमारे मानस दादा घर के बाहर खड़े हमारी बड़ी आतुरता से प्रतीक्षा कर रहे थे। उनका स्नेह देख रास्ते की सारी थकान जाती रही हम प्रेमपूर्वक गले मिले। अगले दिन ही शिलांग में देश का प्रधानमंत्री पहली बार आने वाले हैं जिसकी मेजबानी उनका अपना विभाग नार्थ ईस्टर्न कौंसिल कर रहा था जिसमें वे डाइरेक्टर थे इस कारण उनकी व्यस्तता काफी बढ़ी हुई थी। बावजूद इसके वे हमारी अगवानी घर के बाहर इस तरह इस समय कर रहे थे। उनका यह भाव मन को अंदर तक छू गया। हम लोग गर्मजोशी से मिले खूब बातें हुईं और अगले दिन की व्यस्तता को देखते हुए भी रात सोते-सोते हमें डेढ़ बजे गया।
बादलों के देश की पहली सुबह...शिलांग की सुबह... पौने पाँच बजे आँख खुलीं बाहर खूब उजाला हो चुका था। रात जब बातोंबातों में जयनाथ ने बताया था कि यहां सवेरा चार बजे ही हो जाता है तो भरोसा नहीं हुआ था। मगर अब तो नजर के सामने था शिलांग का सवेरा और उसका बिखरा सौंदर्य... मार्निंग वाक का मन बनाया और हम दोनों ऊपर पहाड़ी पर अपने फेफड़ों में ताजी हवा भरने चल दिए। जल्दी ही सूर्य ने अपनी किरणों का जाल शिलांग की धरती पर फैला दिया। हम लोग भी कुछ योग की क्रियाओं को करके शिलांग के सौंदर्य को निहारते वापस आ गए।
लौट कर आने पर चाय पी और नहा धो कर जल्द ही तैयार हो गए। आज से ही हमारा शिलांग भ्रमण का कार्यक्रम शुरू होने वाला था। दरवाजे पर गाड़ी आकर खड़ी हो चुकी थी शीघ्र ही हम शिलांग की व्यस्त सड़कों पर निकल पड़े। सड़कों पर स्कूली बच्चों की गहमागहमी और कल आने वाले प्रधानमंत्री के आगमन की तैयारियों के कारण जगह-जगह सुरक्षा व्यवस्था चाक चैबंद दिख रही थी। सड़कों पर ट्रैफिक नियमों का पालन करते दूसरों को रास्ता देते दिखे वाहन चालक... पुरानी कैथेड्रल चर्च ही इमारत राजभवन और शहर की मुख्य सड़कों को पार कर हम शीघ्र ही ऊँचे पहाड़ी रास्ते की ओर मुड़ गए। अब हम ‘शिलांग पीक’ की ओर जा रहे थे। हमारे कार चालक हेनरी ने बताया कि इसी रास्ते पर आगे चलते हुए हम चेरापूँजी की ओर जाते हैं। यह नाम सुनकर बदन में एक झुरझुरी सी हुई। बचपन से यह नाम सुनते हुए बड़े हुए हैं विश्व में सबसे अधिक वर्षा वाला स्थान...चेरापूँजी। हाय कितने घने जंगल होंगे वहां... हर समय बारिश का ही मौसम रहता होगा... पता नहीं कैसा होगा वह स्थान... खैर अब तो आ ही गए हैं। देखा जाएगा।
सड़क के दोनों ओर खड़ी फसलों को देखते यहां के मौसम में उगने वाली वनस्पतियों को देखते हम चेकपोस्ट तक पहुंचे यहां वायु सेना के अधिकारियों को अपना परिचयपत्र दिखाकर हम शीघ्र ही लोकल चेकपोस्ट का शुल्क अदाकर शिलांग पीक पर जा पहुंचे। यहां से समूचे शिलांग का विहंगम दृश्य देखा जा सकता था। जैसे गंगटोक में सुसाइड पाइंट से नीचे खूबसूरत घाटियां और तीस्ता नदी का मनोहारी रूप दिखाई  देता है इसी तरह घाटी में तैरते बादलों के नीचे बसे शिलांग के मकानों का सुंदर दृश्य यहां से दिखता है।
कैमरे को निकाला। फोटो खींचा... मगर हुंह... वो बात कहां... जो बात तुझमें है तेरी तस्वीर में नहीं... बादलों की वजह से नम मौसम की वजह से घाटी से नीचे का दृश्य साफ नहीं आ रहा था। कई बार के प्रयास के बावजूद जब चित्र साफ नहीं आए तो हारकर कैमरा रख दिया और घाटी में तैरते बादलों की धुंध के नीचे छिप रहे शिलांग शहर को देखने लगा। जो समुद्र तल से 1499 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। जो मेघालय राज्य की राजधानी है। जिसे पर्वतों की रानी का खिताब मिला हुआ है। जिसे ‘पूर्व का स्काटलैंड’ कहा जाता है। जो 1970 से पहले वृहत्तर असम की राजधानी था। जिसे 1874 में कर्नल हेनरी होपिडेसन ने यह सुंदर स्वरूप प्रदान किया। अपने आप में कितनी घटनाएं कहानियां, इतिहास को छिपाए हुए है। मैं सोचने लगा।
घाटी में बादल अभी भी तैर रहे थे। मुझे महसूस हुआ जैसे वे मुझ पर हँस रहे हो। मानो कह रहे हों क्यों दोस्त, पहले चित्र खींचकर मुझे भविष्य के लिए सुरक्षित रखना चाहते थे और अब इतिहास की गहराइयों में खोकर भूतकाल में चले गए। अरे भाई, वर्तमान में कब जियोगे। आगे अंधेरा है, पीछे अंधेरा है, ये पल गवाना ना, ये पल ही तेरा है... देखो मैं तो चिंता नहीं करता कैसा अपनी मस्ती में मस्त उड़ रहा हूँ।
मुझे लगा वो ठीक ही तो कह रहा है। धन्यवाद दोस्त... मेजबानी का पूरा फर्ज अदा कर रहे हो। शुक्रिया...
पहाड़ी पर बने कई पाइंटस पर पर्यटक दर्शकों की भीड़भाड़ थी। मेघालय में खासी, गारो जयंतिया और अन्य अनेक जनजातियों के लोग रहते हैं। शिलांग में खासी लोगों की बहुलता है। खासियों के त्योहार के अवसर पर पहनी जाने वाली पारंपरिक पोशाक पहन कर फोटो खिंचवाने का लोभ हम नहीं छोड़ सके। वहां के स्थानीय निवासियों द्वारा लगाई दुकानों पर रखे आकर्षक केलों को देखकर मनीष ने उन्हें खाने की इच्छा व्यक्त की। अभी हम केले खा ही रहे थे कि तभी एक स्थानीय चाय बेचने वाली महिला ने हमें अपनी ओर देखता पाकर आवाज़ लगाई-‘ओ बाबू, चाय खावो ना’ सुनकर काफी अच्छा लगा।
कुछ देर वहां ठहर कर अपनी और मोबाइल की आंखों में वहां के दृश्यों को कैद किया और अगले पड़ाव की ओर चल दिए।