Thursday, 15 September 2016

सारी दुनिया की माँ अच्छी,
पर अपनी माँ अपनी होती,
तुम हँसते हो तो वो हँसती,
तुम रो देते तो वो रोती,
अपनी भाषा से प्यार करो,
अपनी भाषा व्यवहार करो,
जिसमें पल बढ़कर बड़े हुए,
उस भाषा का सत्कार करो,
मातृ भाषा कनउजी में
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फैली बीमारी,है बुखार सब 
असपताल भर डारे हैं,
जे आस पास के हाल देख,
अब काँपत प्रान हमारे हैं,
घुटना हड्डी सब जोड़ दुखैं,
नाहीं कछु दिखत सहारे हैं,
हमहूँ कहुँ गौतर खाय आंय,
मन मैं अब जहे हमारे है,
जो रो न सकें निज भाषा में,
उससे बेचारा और कौन?
मन में घुट कर रह जाए बोल,
जब मजबूरी में रहें मौन,
जिसमें हम सोकर जाग रहे,
जिसमें हम रोकर हँसते है
उस मइया की भाषा ही में तो,
बस प्रान हमारे बसते हैं,
कथक के पर्याय - पंड़ित बिरजू महाराज

कथक सम्राट पंडित बिरजू महाराज का जन्म चार फरवरी 1938 को लखनऊ में हुआ था। इन्होंने नृत्य की आरंभिक शिक्षा अपने पिता अच्छन महाराज अपनी माँ व चाचा शंभू महाराज से ली। चैदह वर्ष की उम्र में ही वे दिल्ली संगीत भारती में नृत्य शिक्षक हुए।

1970 से कथक केंद्र से उन्होंने गुरू के रूप में अनेक शिष्यों को तैयार किया। उनके शिष्यों ने अपनी उत्कृष्ट कला से नृत्य नाटिकाओं के माध्यम से लखनऊ घराने की कथक शैली को देश विदेश में लोकप्रियता दिलाई। उन्होंने कथक शैली को अंतर्राष्ट्रीय नृत्य जगत में सुस्थापित किया।

उनकी कुछ प्रमुख नृत्य नाटिकाएं  कुमार संभवम, गीतोपदेश, होरी, धूम मचायो रे, कथा रघुनाथ की, हव्वा खातून, गीत गोविंद हैं।

कथक के लिए पल - पल समर्पित सृजनशील पंड़ित बिरजू महाराज को उनकी सेवाओं के लिए 1966 में केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी ने ‘राष्ट्रीय पुरस्कार’ से सम्मानित किया। वर्ष 1986 में ‘पदम भूषण’ व इसी वर्ष मध्यप्रदेश सरकार ने इन्हें ‘कालीदास सम्मान’ दिया। 1987 में वे पुनः ‘पदमविभूषण’ से सम्मानित हुए।

उत्तरप्रदेश संगीत नाटक अकादमी ने 1974 में ‘अकादमी पुरस्कार’ व 1988 में अकादमी की ‘रत्न सदस्यता’ प्रदान की। उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग ने 1994 में ‘यश भारती’ सम्मान दिया।

पंड़ित बिरजू महाराज इस समय कथक केंद्र नई दिल्ली में निदेशक वरिष्ठ गुरू के पद पर कार्यरत हैं। मेरी यहीं पर उनसे मुलाकात हुई। अपनी व्यस्त दिनचर्या में से समय निकाल कर उन्होंने पूछे गए प्रश्नों के उत्तर कुछ इस प्रकार दिए -

क्या कुछ छूट गया, जिसे अभी तक आपने नहीं किया ?

यह एक अंतहीन विद्या है, कला की प्यास है, जो कभी समाप्त नहीं होने वाली है।

जीवन के बारे में आप किस तरह सोचते हैं ?

जीवन जैसे गुरू के द्वारा दिया गया कोई कार्य है, जिसे अपने परिश्रम के द्वारा पूरा करने का प्रयास चलता रहे।

आपका प्रिय स्वप्न क्या है ?

मेरा प्रिय स्वप्न है कि यह कला फलती फूलती रहे। अच्छे शिष्यों के द्वारा यह कला नए शिखरों को छुए और नए प्रतिमान स्थापित करे।

और आपका दुःस्वप्न ?

शास्त्रीय नृत्य संगीत पर विदेशी असर न होने पाए और भारतीयता पर आँच न आए।

प्रेम के बारे में आपका क्या कहना है ?

प्रेम एक लगाव है, और हमें अपना कार्य , जिम्मेदारी , विद्या तथा ईश्वर से प्रेम होना चाहिए।

किस तरह की स्थितियाँ आप नापसंद करते हैं ?

बहुत भीड ़- भाड़, शोर, फालतू की बातें, ये सभी स्थितियाँ, कोई भी दिन जो संगीत की चर्चा के बिना हो मुझे पसंद नहीं है।

 आपके आदर्श कौन - कौन रहे ?

मेरी माँ पिताजी और पूर्वज

कथक में भविष्य की आशा के रूप में आप किसका नाम लेना चाहेंगे ?

शाश्वती सेन, दुर्गा आर्या, मालती श्याम, किरण चैहान, वेरोनिक अजान, वैसे और भी नाम हैं जिनसे भविष्य के लिए आशा है। बाकी हमारे बेटे और भाई दीपक, जयकिशन, कृष्णमोहन और राममोहन तो हैं ही।

कथक का शास्त्र लिपिबद्ध होने में क्या प्रगति हुई है ?

ठुंमरी की एक किताब मेरे द्वारा छपवाई गई है, जिसमें बिंदादीन महाराज की रचनाएं स्वर लिपिबद्ध हैं। इसका अगला संस्करण जल्द ही प्रकाशित होने वाला है। और भी कुछ किताबें प्रकाशित करने की योजना है।

एक ओर विदेशी हमारे शास्त्रीय नृत्य संगीत की ओर आकर्षित हो रहे हैं जबकि भारतीय युवा पाश्चात्य व फिल्मी नृत्य की ओर ... आप क्या कहना चाहेंगे  ?

पुरानी फिल्मों के नृत्य व लेखन में जो गहराई थी, वह अब नहीं रह गई है। कई विदेशी शिष्य भी हमारी परंपरा को सीख रहे हैं।

आप कथक कला के विकास के लिए और क्या करना चाहते हैं ?

मेरी इच्छा है कि गुरूकुल पूरे भारत में अनेक जगह स्थापित हों व भारतीय परंपरा को सुरक्षित रखते हुए सही शिक्षा दी जाय।

प्रयोग को आप किस रूप में देखते हैं ?

सही ढं़ग का प्रयोग विद्या नृत्य कला व संगीत का नायाब पथप्रदर्शक है।





 

ऐसा है राक गार्डन

राक गार्डन चार हेक्टेयर जमीन पर फैला हुआ है। यह कई भागों में बँटा हुआ है। प्रत्येक भाग एक अलग तरह के मूर्तिशिल्प से दर्शकों का परिचय और एक अलग तरह का अनुभव कराता है। प्रत्येक ब्लाक में एक से दूसरे में जाने के लिए रहस्यमय छोटे से दरवाजे हैं।
यद्यपि यह आसान बात नहीं है कि हर कोई कलाकार की दृष्टि को संपूर्णता से समझ सके। लेकिन फिर भी इसे देखते हुए उन अकेले व्यक्ति के कृतित्व की विशालता को देखकर उनके प्रति मन में निश्चय ही विशिष्ट सम्मान के भाव जन्म लेते हैं।
     मूर्तिशिल्प में खाली बेकार ड्रम जिनसे कि राक गार्डन की बाहरी चहारदीवारी भी बनी हुई है। टूटे बर्तन, टूटी क्राकरी के टुकड़े,साइकिल के विभिन्न पुर्जे,उसके फ्रेम,बिजली के टूटे फूटे सामान, जंग लगे लोहे और स्टील के फर्नीचर,प्राकृतिक पथरीली चट्टानों के टुकड़े, काँच की टूटी - फूटी रंगबिरंगी चूड़ियाँ, बोतलों के ढ़क्कन, फ्यूज ट्यूब लाइटें पक्षियों के पंख और कंकड़ पत्थर यहाँ तक कि नाइयों की दुकानों से कटे हुए बाल,इसके अलावा सैकड़ों बेकार वस्तुओं के टुकड़े।
ऐसा महसूस होता है कि जैसे उन सभी बेकार की वस्तुओं से उनकी लगातार बातचीत चलती रहती है कि उसे किस सौंदर्य में ढ़लना है। बरसों बरस की उनकी इस मेहनत की प्रक्रिया में उन्होंने राकगार्डन को एशिया के सबसे बड़े पुनर्नवीकरण केंद्र के रूप में विकसित कर दिया। जो कि उसकी महान प्रतिभा के प्रतीक के रूप में चंड़ीगढ़ में स्थित है। राक गार्डन इस बात का अद्वितीय उदाहरण है कि हम बेकार के सामान का कितना अच्छा उपयोग कर सकते हैं।


नेकचंद कहते थे कि प्रकृति स्वयं ही वस्तुओं को पुर्नउत्पादित करती है और हम सबको इससे सीखना चाहिए कि हम भी उसकी भाँति उपयोगी वस्तुओं का पुनर्निमाण कैसे कर सके। उनका विश्वास था कि प्रकृति की इच्छा और मानव की रचनात्मकता में कोई विरोध नहीं है। ऐसा वे सिर्फ कहते ही नहीं थे उन्होंने इसे करके दिखाया था। सौंदर्य की दिशा में उनकी प्रस्तुति ‘राक गार्डन’ मानव और प्रकृति के बीच की इसी एकता को प्रदर्शित करती है।
एक कलाकार के रूप में नेकचंद ने सीमेंट के घोल का अदभुत प्रयोग कर मनचाही आकृतियों का निर्माण किया। विशेष रूप से झरने की दीवार या खाई, जो झरने के लिए बनाई गई हैं। इसके लिए उन्होंने भारी टाट के कपड़ों का उपयोग किया है। जिससे सीमेंट के खंबों और दीवारों पर विशेष आकर्षण और प्रभाव उत्पन्न हो गया है। झरने का पानी रिसाइकल होकर वापस आता है। इसके लिए उन्होंने मोटर लगाए हैं लेकिन वे इतनी दूरी पर हैं कि इनकी आवाज झरने के संगीत में खो जाती हैं। ऐसा महसूस होता है कि यह प्राकृतिक ही हैं
कहाँ पर  प्राकृतिक शुरू होता है और मानव निर्मित खत्म यह अंतर करना बहुत मुशकिल है। उन्होंने कंकरीट के पेड़ बनाए हैं जो बिलकुल असली जैसे हैं।
पुरुष ओर स्त्री चिड़िया और जानवर सभी जैसे उनके हाथों के चमत्कारिक स्पर्श से जीवंत बन गए हैं। उन्होंने अनुपयोगी लोहे का भी अच्छा उपयोग किया है। जिसमें साइकिल के पुर्जों के ऊपर सीमेंट लगाकर उन्हें भी विभिन्न आकार दिया गया है। साइकिल की सीट को जहाँ चेहरे में तब्दील किया गया है वहीं फ्रेम को टाँगों में बदल दिया है।

प्रत्येक आकृति में भिन्न - भिन्न ढ़ंग की पच्चीकारी की गई है। बाह्य आवरण सीमेंट की पृष्ठभूमि में काँच की रंगबिरंगी चूड़ियों बोतल के ढ़क्कनों, टूटी क्राकरी के टुकड़ों या अन्य अनुपयोगी वस्तुओं से कलात्मक ढंग से जड़ा गया है। अधिकतर मूर्तियाँ, जानवर या मानवीय आकार में हैं। कुछ आकृतियाँ सामान्य से बड़ी हैं तो कुछ छोटी भी।
उनके द्वारा निर्मित चरित्रों में सुंदर काँच की चूड़ियों से बनी स्त्री आकृतियाँ भी हैं। जो कलात्मक ढ़ंग से इंच - इंच रंगबिरंगी व सुनहरी चूड़ियों से ढ़की है। उनके चेहरों को नजदीक से देखने पर विभिन्न भाव प्रकट होते हैं। वे आकृतियाँ भारतीय स्त्रियों की खुशी को अभिव्यक्त करतीं हैं। उनके सिर पर असली बालों का प्रयोग हुआ है। विभिन्न मूर्तिशिल्पों में टूटी केतली, टूटे कप व टूटी ट्रे का खूबसूरती से प्रयोग कर विभिन्न शेड बनाए गए हैं।
नेकचंद की इस महान प्रतिभा और कला के कद्रदान देश में ही नहीं बल्कि दुनिया के अन्य देशों में भी रहे। जहाँ एक ओर चंड़ीगढ़ के एअरफोर्स सेंटर में बेकार पड़े नाकारा सामान को उपयोगी बनाने के लिए उनके मार्गनिर्देशन में ‘मिनी राकगार्डन’ बनाया गया, वहीं अन्य देशों में भी उनके उपयोगी सुझाव पाने के लिए उन्हें समय - समय पर आमंत्रित किया जाता रहा।
स्विटजरलैंड में उनकी कला पर एक पुस्तक ‘नेकचंद आउटसाइडर आर्टस’ नाम से प्रकाशित हुई। भारत के विभिन्न राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री समय - समय पर राकगार्डन में जाकर नेकचंद की कला  की सराहना कर चुके हैं। अमेरिका इंग्लैंड़ जर्मनी आदि देशों में उनके प्रशंसकों ने ‘नेकचंद फाउण्डेशन’ नामक संस्था बनाई है जिसका मुख्यालय इग्लैंड में है। वे सभी समय - समय पर राकगार्डन की बेहतरी के लिए प्रयास करते रहते हैं। राकगार्डन के विस्तार चरण के लिए उन्होंने महंगे ‘मैजिक मिरर’ भेंट किए थे।
आज राकगार्डन में ओपन एयर स्टेज, झूले, ऊँट की सवारी, बच्चों के लिए अंदर मोटर बाइक आदि विविध आकर्षण हैं। अब शहर के बीचोबीच यह शांत सुरम्य अनोखा संसार, बच्चों और युवाओं के लिए एक अच्छा पिकनिक स्थल जैसा है। जहाँ आकर वे नेकचंद के इस स्वप्निल संसार के बीच बैठकर अपने भविष्य के लिए भी सपनों का संसार कल्पित करते हैं। नेकचंद का रचनात्मक मन भी अनुपयोगी से कुछ न कुछ उपयोगी रचता रहता था।
राकगार्डन में घूमते - घूमते आपको एक स्थान पर लोहे के कुँए के ऊपर का ढ़ांचा नजर आएगा जिसके चारों ओर घिरनियाँ लगीं हैं जिसे देखकर हो सकता है आपको अमीर खुसरो के जीवन की घटी वह घटना याद आ जाए जिसमें जब वे प्यासे एक ऐसे ही किसी कुँए के पास पहुँचे थे और उन्हें पहचान कर चार पनिहारियों ने पानी पिलाने के लिए उनसे चार अलग - अलग विषयों खीर, चरखा, कुत्ता और ढ़ोल पर कविता सुनाने की शर्त रखी। विलक्षण प्रतिभा के धनी खुसरो ने चारों की फरमाइश दो पंक्तियों में पूरी कर उन्हें खुश करके पानी पिया। कविता कुछ यूँ थी -‘खीर पकाई जतन से ,चरखा दिया चलाय, आया कुत्ता खा गया,तू बैठी ढ़ोल बजा,। अब न ऐसे कुएँ रहे न उनके कद्रदान। तो वह लोहे का फ्रेम भी अनुपयोगी हो गया। मगर नेकचंद की कलात्मक दृष्टि ने उसे उपयोगी बना लिया। आज राकगार्डन में दर्शक उसके पानी में पैसे फेंक कर अपने भाग्य की आजमाइश करते हैं और मनोरंजन करते हैं।




 

साहिर के रचना संसार में बच्चे
हिंदी फिल्म संसार में अपने भावपूर्ण गीतों से एक अलग मुकाम हासिल करने वाले शायर थे साहिर लुधियानवी। उत्कृष्टता के मापदण्ड पर अपने समकालीनों की अपेक्षा उन्होंने ऐसे गीत लिखे जो भाव और कला पक्ष दोनों में अनूठे थे। उनके फिल्मी और गैर फिल्मी रचनाओं को देखने से यह पता चलता है कि भविष्य का भारत उनके लिए काफी अहम था।
उनकी शुरुआती दौर की एक रचना है - आओ कि कोई ख्वाब बुने,कल के वास्ते, वरना ये रात आज के संगीन दौर की, डस लेगी जानो - दिल कि कुछ ऐसे कि जानो - दिल, ताउम्र फिर न कोई हसीं ख्वाब बुन सकें... गो हमसे भागती रही ये तेज गाम उम्र, ख्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र...आओ कि कोई ख्वाब बुनें, कल के वास्ते,
उन्होंने बेहतर भविष्य के सपने देखे थे और भविष्य का जीवन तो हमेशा बच्चों का ही होता है। उनका एक गीत जो फिल्म ‘दो कलियां’ में था बेहद लोकप्रिय हुआ। व्यवहारिक जीवन में अनुभवों से पगे उनके विचार मन पर सीधे असर करते थे। इसका एक बड़ा कारण यह था कि उनके शब्द सरल और सहज होते थे। उनकी विशेषता थी कि उन्होंने बड़े-बड़े दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों को अपने गीतों के जरिए आम जन को सुलभ कराया। अब अगर हम इसी फिल्म के गीत की बात करें तो हम देखते हैंु कि उन्होंने बाल मनोविज्ञान और जीवन के यथार्थ की इतनी बड़ी और गहरी समझ कितनी सहजता से हमारे सामने रख दी है -
खुद रूठें खुद मन जाएं,फिर हमजोली बन जाएं, झगडा जिसके साथ करें,अगले पल फिर बात करें,
इनको किसी से बैर नहीं, इनके लिए कोई गैर नहीं, इनका भोलापन मिलता है सबको बांह पसारे,
इंसां जब तक बच्चा है, तब तक ही वो सच्चा है, ज्यों-ज्यों उसकी उमर बढे,़ मन पर झूठ का मैल चढ़े,
पाप बढ़े नफरत घेरे, लालच की आदत घेरे, बचपन इन सब से हटकर, अपनी उमर गुजारे,
तन कोमल मन सुंदर है,बच्चे बड़ो से बेहतर हैं, इनमें छूत औ छात नहीं, झूठी जात और पात नहीं,
भाषा की तकरार नहीं मज़हब की दीवार नहीं, इनकी नज़रों में एक हैं मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे,
बच्चे मन के सच्चे, सारे जग की आंख के तारे, ये वो नन्हें फूल हैं जो, भगवान को लगते प्यारे,
 उनके कई गीतों के केंद्र में बच्चे हैं। इससे पता लगता है कि उन्हें देश की आगामी पीढ़ी की कितनी चिंता थी। उनकी यह चिंता अनेक गीतों में बार - बार मुखरित हुई है। सन 1959 में बनी फिल्म दीदी के लिए लिखा गया यह गीत आंखें खोल देने वाला है। इसका केन्द्रीय भाव यह है कि बच्चे स्कूल की किताबों में तो कुछ और पढ़ते हैं मगर रोजमर्रा की जिंदगी में उन्हें कुछ और ही देखने को मिलता है। किताबों में लिखे आदर्श और आम जिंदगी के भोगे जा रहे यथार्थ के बीच का ये अंतर उन्हें भ्रमित करता है। उनके सवालों के जबाब न घर में मिलते हैं और न स्कूल में। एक अजब पाखण्ड का सामना बच्चा हर पल करता है। वह देखता है लोग कहते कुछ हैं और करते कुछ और हैं। इसी दुविधा में वह जीने लगता है और फिर कहीं से जबाब न पाकर अंततः वह भी उसी दोहरे व्यक्तित्व को अपना लेता है, जो हमारे समाज का हिस्सा है। इस मायने में साहिर की इस पहल का क्रांतिकारी महत्व है कि उन्होंने इस जड़ता को तोड़ने का जबरदस्त प्रयास किया। मेरा मानना है वस्तुतः छोटे - छोटे प्रश्न और उत्तरों वाला अध्यापक और बच्चों के बीच हुआ ये संवाद गीत हमारे शैक्षिक पाठ्यक्रम का हिस्सा होना चाहिए था। आइए इस संवाद गीत को पढ़कर आप खुद आकलन करें कि मेरा यह कहना कहाँ तक उचित है --
बच्चे - हमने सुना था एक है भारत, सब मुल्कों में नेक है भारत, लेकिन जब नजदीक से देखा, सोच समझ कर ठीक से देखा, हमने नक्शे और ही पाए, बदले हुए सब तौर ही पाए, एक से एक की बात जुदा है, धर्म जुदा है जात जुदा है,  आपने जो भी हमको पढ़ाया, वो तो कहीं भी नज़र न आया,
अध्यापक - मैंने जो भी तुमको पढ़ाया, उसमें कुछ भी झूठ नहीं,भाषा से भाषा न मिले तो, इसका मतलब फूट नहीं, एक डाली पर रहकर भी जब, फूल जुदा और पात जुदा, बुरा नहीं ग़र यूँँ ही वतन में, धर्म जुदा और जात जुदा,
बच्चे - वही है जब कुरआन का कहना, जो है वेद पुरान का कहना, फिर ये शोर शराबा क्यों है,? इतना खून खराबा क्यों है ?
अध्यापक - सदियों तक इस देश पे बच्चो, रही हुकूमत ग़ैरों की, आज तलक हम सबके मुँँह पर धूल है उनके पैरों की, लड़वाओ और राज करो, ये उन लोगों की हिक़मत थी, उन लोगों की चाल में आना, हम लोगों की ज़िल्लत थी,यह जो बैर है इक दूजे से, ये जो फूट औ रंजिश है, उन्हीं विदेशी आकाओं की सोची समझी बख़्शिश है,
बच्चे - ़कुछ इंसान ब्रह्मन क्यों हैं, कुछ इंसान हरिजन क्यों ? एक को इतनी इज़्जत क्यों है, एक को इतनी ज़िल्लत क्यों ?
अध्यापक - धन और ज्ञान को, ताकत वालों ने अपनी जागीर कहा, मेहनत और गुलामी को कमजोरों को तक़दीर कहा, इंसानों का ये बटवारा, वहशत और जहालत है, जो नफरत की शिक्षा दे, वह धर्म नहीं है लानत है, जनम से कोई नीच नहीं है, जनम से कोई महान नहीं, करम से बढ़कर किसी मनुज की कोई भी पहचान नहीं,
बच्चे-ऊँचे महल बनाने वाले, फ़ुटपाथों पर क्यों रहते हैं,दिन भर मेहनत करने वाले, फ़ाँक़ों का दुख क्यों सहते हैं ?
अध्यापक - खेतों और मिलों पर अब तक, धनवालों का इज़ारा है, हमको अपना देश है प्यारा, उन्हें मुनाफ़ा प्यारा है, उनके राज में बनती है, हर चीज तिजारत की खातिर, अपने राज में बना करेगी, ‘सब’की जरूरत की खातिर,
बच्चे - अब तो देश में आजादी है, अब क्यों जनता फरियादी है ? कब जाएगा दौर पुराना, कब आएगा नया ज़माना ?
अध्यापक - सदियों की भूख और बेकारी, क्या एक दिन में जाएगी, इस उजड़े गुलशन पर रौनक आते - आते आएगी, ये जो नए मंसूबे हैं, ये जो नई तामीरें हैं, आने वाले दौर की कुछ, धुंधली - धुंधंली तस्वीरें हैं, तुम ही रंग भरोगे इनमें तुम ही इन्हें चमकाओगे, नवयुग आप नहीं आएगा, नवयुग को तुम लाओगे,
वास्तव में देश के हर विद्यालय के शिक्षक की यही सोच होनी चाहिए जो कि हमारे देश के संविधान की आत्मा का मूल स्वर भी है। कितनी सरलता से इतने बड़े - बड़े सवालों के हल साहिर ने उन्हें बताए जिन्हें वास्तव में इनकी बेहद जरूरत है। माता पिता अज्ञानता के कारण और राजनेता निहित स्वार्थ के कारण बच्चों को इस हक़ीकत से रूबरू नहीं कराते या नहीं कराना चाहते। मगर ये हमारी इस नई पीढ़ी के साथ धोखा है, सही मायने में कहें तो यह देश के भविष्य के साथ धोखा है।
मगर साहिर ने अपनी सामथ्र्य भर हल बताने की कोशिश की। इसी फिल्म में बच्चों को संबोधित करते हुए एक अन्य महत्वपूर्ण गीत में वे जो बातें लिखते हैं वे ऐसी हैं जिनकी एक - एक पंक्ति पर किताब लिखी जा सकती है। यही कविता की खूबसूरती है और यही कविता की शक्ति भी।
 हमारा समाज मूलतः अतीतजीवी है। आज की हर समस्या का हल हम हमेशा बीते हुए कल में ढँ़ूढ़ने की कोशिश करते हैं। यही कारण है कि विज्ञान हमारे यहाँँ ज्यादा नहीं फल फूल सका। वे बड़ी - बड़ी बातें जिन्होंने देश की प्रगति के पाँवों में जंजीर डाल रखी है वास्तव में उतनी बड़ी नहीं हैं। अगर हम नई पीढ़ी को वास्तविकता से परिचित करा कर सही शिक्षा दे ंतो देश दिन दूनी रात चैगुनी गुनी तरक्की कर सकता है। मुझे लगता है कि देश के संविधान निर्माताओं ने जिस स्वप्न को देखते हुए उसे लिखा वह साहिर की रचनाओं में पूर्णतया प्रतिबिंबित हुआ है। गीत कुछ इस तरह से है -
बच्चो! तुम तक़दीर हो, कल के हिंदुस्तान की, बापू के वरदान की, नेहरू के अरमान की,
आज के टूटे खंड़हरों पर, तुम कल का देश बसाओगे,जो हम लोगों से न हुआ वो तुम करके दिखलाओगे,
तुम नन्हीं बुनियादें हो, दुनिया के नए विधान की, बच्चो! तुम तक़दीर हो, कल के हिंदुस्तान की,
जो सदियों के बाद मिली है, वो आजादी खोए ना, दीन धर्म के नाम पे कोई बीज फूट का बोए ना,
हर मज़हब से ऊँची है क़ीमत इंसानी जान की, बच्चो! तुम तक़दीर हो, कल के हिंदुस्तान की,
फिर कोई ‘जयचंद’न उभरे,फिर कोई ‘जाफ़र’न उठे, ग़ैरों का दिल खुश करने को अपनों पर खंज़र न उठे,
धन - दौलत के लालच में तौहीन न हो ईमान की, बच्चो! तुम तक़दीर हो, कल के हिंदुस्तान की,
बहुत दिनों तक इस दुनिया में, रीत रही है जंगों की, लड़ी हंै धनवालों की खातिर फौजें भूखे नंगों की,
कोई लुटेरा ले न सके अब कुर्बानी इंसान की, बच्चो! तुम तक़दीर हो, कल के हिंदुस्तान की,
नारी को इस देश ने देवी कहकर दासी माना है, जिसको कुछ अधिकार नहीं, वह घर की रानी माना है,
तुम ऐसा आदर मत लेना, आड़ जो हो अपमान की, बच्चो! तुम तक़दीर हो, कल के हिंदुस्तान की,
 उनके गीतों में बच्चों को लेकर यह चिंताएं लगातार मुखरित हुई हंै। प्रख्यात कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने भी बच्चों के बारे में चिंता जताते हुए उन्हें स्वस्थ माहौल देने की वकालत की है। साहिर के एक अन्य गीत में एक अध्यापक के मन की भावना कुछ ऐसे व्यक्त हुई है कि अपनी सीमाओं में रहते हुए वह श्रेष्ठ नागरिकों के निर्माण की जिम्मेदारी को कैसे निभाए। बच्चों को समाज की संकीर्ण सोच से बचाते हुए उनकी कोमल कल्पनाओं की उड़ान को सकारात्मक सोच के पंख कैसे मिलें। उनकी सोच का दायरा कैसे विस्तृत हो। यह कोशिश लगातार उनके गीतों में दिखती है। गुरुदीक्षा के रूप में उनकी ये पंक्तियाँ सारे शिक्षक और अभिभावक समाज के लिए अनुकरणीय हैं -
भारत माँ की आँख के तारो नन्हें मुन्ने राजदुलारो, जैसे मैंने तुमको सँवारा, वैसे ही तुम देश सँवारो,
ये जो है छोटा सा बस्ता, इल्म के फूलों का गुलदस्ता, कृष्ण हैं इसमें राम हैं इसमें, बुध मत और इस्लाम है इसमें,
ये बस्ता ईसा की कहानी, ये बस्ता नानक की वानी, इसमें छुपी है हर सच्चाई, अपना सुख औरों की भलाई,
इस बस्ते को शीश नवाओ, इस बस्ते पर तन - मन वारो,
छोड़ के झूठी जातें-पातें, सबसे सीखो अच्छी बातंें, जग मे किसी को ग़ैर न समझो, अपना किसी से बैर न समझो,
आप पढ़ो औरों को पढ़ाओ, घर घर ज्ञान की ज्योति जलाओ, नव जीवन की आस तुम्हीं हो, बनता हुआ इतिहास तुम्हीं हों,
जितना गहरा अँधियारा हो, उतने ऊँचे दीप उभारो,
ये संसार जो हमने सजाया, ये संसार जो तुमने पाया, इस संसार में झूठ बहुत है, जुल्म बहुत है लूट बहुत है,
ज़ुल्म के आगे सिर न झुकाना, हर एक झूठ से टकरा जाना, इस संसार का रंग बदलना,ऊँच और नीच का ढंग बदलना,
सारा जग है देश तुम्हारा ,सारे जग का रूप निखारो,
आज आतंक और ज़ुल्म से विश्व मानवता कराह रही है। इसके लिए भारत की विश्व बंधुत्व वाली इस सोच को सामने लाती साहिर की नई पीढ़ी के लिए लिखी गईं उपरोक्त पंक्तियाँ किसी धरोहर से कम नहीं हंै।
 किसी भी रचनाकार की रचना खासोआम में तब मकबूल होती है जब उन्हें लगे - ‘अरे यही तो मैं कहना चाह रहा था।’ इसके लिए रचनाकार को जिसके लिए वह लिख रहा है उसके अंतर्मन में प्रवेश कर उसी की तरह सोचना पडता है। अब जरा आप इस गीत को देखिए जिसमें नन्हें बच्चे देश में अपनी सरकार बनाने का सपना देखते हैं। उसमें उनकी सोच में रचनाकार अपने सपने जोड़कर कैसा सपना देखता है। आप भी देखें और महसूस करें -
बड़ों का राज तो सदियों से है जमाने में, कभी हुआ नहीं दुनिया में राज छोटों का,अगर हमें भी मिले इखित्यार अय लोगों,तो हम दिखाएं तुम्हें काम काज छोटों का,
मुल्क में बच्चों की ग़र सरकार हो, जिंदगी एक जश्न एक त्योहार हो,
हुक्म दें ऐसे कैलेंडर के लिए, जिसमें दो दिन बाद इक इतवार हो,
सबको दें स्कूल जैसा यूनिफार्म ,एक सी हो पैंट हर शलवार हो,
हाॅस्टल तामीर हों सबके लिए,कोई भी इंसां न बेघर वार हो,
राष्ट्र भाषा हम इशारों को बनाएं, दक्खिन उत्तर में न फिर तकरार हो,
हम मिनिस्टर हों तो वो सिस्टम बनें, जिसमें मुफलिस हो न साहूकार हो,
कौमी दौलत से खजाने हों भरे, ले ले उससे जिसको जो दरकार हो,
ईद दीवाली सभी मिल के मनाएं, आदमी को आदमी से प्यार हो,
मुल्क में बच्चों की ग़र सरकार हो,
राष्ट्रभाषा की लाइलाज समस्या का कितना खूबसूरत और सार्थक हल सुझाया है उन्होंने। कभी मुंशी प्रेमचंद ने भी इसके लिए सुझाव देते हुए कहा था। अरब के मूर्ख सिपाहियों और हिंदुस्तान के ग्रामीण बाशिंदों के आपसी बोलचाल के मेल से जब इतनी खूबसूरत भाषा उर्दू का जन्म हुआ है तो सभी भारतीय भाषाओं के मेल से बहुत प्यारी भाषा बनेगी।
साहिर की रचनाओं की विषयवस्तु के बच्चे वे जन सामान्य तो थे ही मगर सामाजिक विषमता के शिकार असामान्य परिस्थितियों में पल रहे वे बच्चे भी रहे जो सड़कों पर पल रहे थे।
इन उजले महलों के तले,हम गंदी गलियों में पले,सौ सौ बोझे मन पे लिए,मैल और माटी तन पर लिए,
दुख सहते ग़म खाते रहे, फिर भी हँसते गाते रहे, हम दीपक तूफाँ में जले... दुनिया ने ठुकराया हमें, रस्तों ने अपनाया हमें, सड़कें माँ सड़कें ही पिता, सड़कें घर सड़कें ही चिता, क्यों आए क्या करके चले... दिल में खटका कुछ भी नहीं, हमको परवा कुछ भी नहीं, चाहो तो नाकारा कहो,चाहो तो आवारा कहो, हम ही बुरे तुम सब हो भले..
उनके कई गीत इन बच्चों पर केंद्रित हैं। मगर यहाँ यह बात देखने योग्य है कि उनकी कलम ने उन्हें कहीं हेय नहीं बनाया, बल्कि उनके उल्लास उनके बेफिक्रेपन खिलंदड़े अंदाज़ को ही उभारा क्योंकि उनका स्पष्ट मत था कि अपनी इस स्थिति के लिए वे कतई जिम्मेदार नहीं हैं। इसके लिए सामाजिक परिस्थितियों की जिम्मेदारी है।
परिस्थितियाँ जब नहीं बदलनी हैं समाज के सारे कारोबार निहित स्वार्थी तत्वों के कारण ऐसे ही चलने हैं तो फिर हम भी इसकी चिंता में दुबले क्यों हों । ‘कोउ नृप होय हमैं का हानी, चेरी छोड़ न हुइहंय रानी’ की जब स्थिति रहनी है तो फिर वे कर ही क्या सकते हैं। फिल्म धूल का फूल का गीत लिखते समय साहिर ने लिखा है -
अपनी खातिर जीना है अपनी खातिर मरना है, होने दो जो होता है अपने को क्या करना है,
जिनको जग की चिंता है वे जग का दुख झेलेंगे, हम सड़कों पर नाचेंगे फुटपाथों पर खेलेंगे,
उनको आहें भरने दो जिनको आहें भरना है...
प्यार की शिक्षा मागी तो लोगों ने दुदकार दिया, आखिर हमने दुनिया को बूट की नोक से मार दिया,
यूँ ही उमर गुजरनी थी यूँ ही उमर है,
अपने जैसे बेफिकरे और नहीं इस बस्ती में ,दुनिया  ग़म में डूबी है, हम डूबे हैं मस्ती में,
जीना है तो जीना है मरना है तो मरना है
 मनोवैज्ञानिकों का कहना हैं कि व्यक्ति सारे जीवन में जो सीखता है उसका आधार सात साल की उमर तक रख जाता हैं बाकी आजीवन उसमें कोई मूलभूत बदलाव नहीं होता। उस समय उसे जैसी शिक्षा माहौल और ज्ञान मिलता है, बाकी का सारा जीवन उस पर ही आधारित होता है।इसी कारण पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली में प्राथमिक शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता है। दुर्भाग्य से हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा ही सर्वाधिक उपेक्षित है। देश की नई पीढ़ी के लिए उस समय रवींद्रनाथ टैगोर ने प्रकृतिवादी शिक्षा और महात्मा गांधी ने बुनियादी शिक्षा के विचार दिए। मगर साहिर ने व्यवहारिक जीवन में पगी ऐसी सूक्तियां दीं जिनका सार्वकालिक महत्व है। वर्ष 1964 में ‘चाँदी की दीवर’ फिल्म  के लिए गीत लिखते समय उन्होंने ऐसी बारहखड़ी लिख दी जिसका इस बहुधर्मी बहुभाषी देश के लिए क्या महत्व है इसका अंदाज़ा आप स्वयं इसे पढ़कर लगा सकते हैं -
‘क’ से कुल दुनियां हमारी जिसमें भारत देश है, ‘ख’ से खेती जिसमें जीवन दान का संदेश है,
‘ग’ से गंगा जिसमें पहले आर्य उतरे थे जहाँ,‘घ’से घर की आबरू रक्षक हैं जिसके नौजवाँ,
‘च’ से राजा चंद्रगुप्त और ‘छ’ से उसका छत्र है, देश के इतिहास का वो युग सुनहरा पत्र है,
‘ज’ जलालुद्दीन अकबर जिसने सौ कीले किए, हिंदू मुस्लिम नस्ल और मजहब मिलाने के लिए,
‘झ’ से है झाँसी की रानी, ‘ट’ से टीपू सूरमा, जिनके जीते जी न सिक्का चल सका अंग्रेज का,
‘ठ’ से वो ठाकुर जिसे टैगोर कहता है जहाँ,विश्व भर में उसकी रचनाओं से है भारत का मान,
‘ड’ से डल कश्मीर की जो हर नज़्ार का नूर है, ‘ढ’ से ढाका जिसकी मलमल आज तक मशहूर है,
‘त’ है ताज़ आगरे का इक अछूता शाहकार, शाहजहाँ की लाड़ली मुमताज़ बेगम का मज़ार,
‘द’ से दिल्ली दिल वतन का ‘ध’ से धड़कन प्यार की,‘न’ से नेहरू जिसपे हैं नज़रें लगीं संसार की,
‘प’ से उसका पंचशील और फ’ से उसका सुर्ख फूल,‘ब’ से बापू जिसको प्यारे थे अहिंसा के असूल,
‘भ’ भगतसिंह जिसने ललकारा विदेशी राज़ को, चढ़ के फाँसी पर बचाया अपनी माँ की लाज को,
‘म’ से वो मजदूर जिसका दौर अब आने को है, ‘य’ से युग सरमायादारी का जो मिट जाने को है,
‘र’ से रस्ता प्यार का, ‘ल’ से लगन इंसाफ की, ‘व’ से ऐसा वायुमंडल, जिससे बरसे शान्ती,
‘श’ से शाहों का जमाना ‘स’ से समझो जा चुका, ‘ह’ से हम सब एक से हों वक्त ये समझा चुका,
‘क’ से कुल दुनियां हमारी जिसमें भारत देश है, ‘ख’ से खेती जिसमें जीवन दान का संदेश है,
साहिर की नजरों में कैसा बच्चा भविष्य के भारत का सही प्रतिनिधित्व कर सकता है। इसे उन्होंने ‘धूल का फूल फिल्म का गीत लिखते समय स्पष्ट कर दिया। हम लोग पढ़ लिख कर भी जब बचकानी हरकतें करते हैं तो हँसी आती है। इस गीत में वे देश की नई पीढ़ी को जो संदेश देते हैं। वह वही भारतीय संस्कृति का ‘वसुधैव कुटुंबकम का’ सर्वे भवंतु सुखिनः का उदारवादी स्वर है जिसको लेकर हम गर्वित होते हैं। जो वक्त की धुंध से धंुधला गया हैं। जरूरत है आज इस स्वर को ऊँचा करने की, वक्त के दर्पण पर जमी अनावश्यक धूल हटाने की। लीजिए प़िढ़ए इस गीत को और आकलन करिए कि क्या सही है और क्या गलत  -
तू हिंदू बनेगा, न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा,
अच्छा है अभी तक तेरा कुछ नाम नहीं है, तुझको किसी मजहब से कोई काम नहीं है,
जिस इल्म ने इंसान को तक्सीम किया है, उस इल्म का तुझ पर कोई इल्जाम नहीं है,
तू बदले हुए वक्त की पहचान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा,
मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया, हमने उसे हिंदू या मुसलमान बनाया,
कुदरत ने तो बख्शी थी हमें एक ही धरती, हमने कहीं भारत कहीं ईरान बनाया,
जो तोड़ दे हर बंध वो तूफान बनेगा,
नफरत जो सिखाए वो धरम तेरा नहीं है, इंसां को जो रौंदे वो कदम तेरा नहीं है,
कुरआन न हो जिसमें वो मंदिर नहीं तेरा, गीता न हो जिसमंे वो हरम तेरा नहीं,
तू अमन का और सुलह का अरमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा
ये दीन के ताज़र ये वतन बेचने वाले, इंसानों की लाशों के कफन बेचने वाले,
ये महलों में बैठे हुए कातिल ये लुटेरे,काँटों की ऐवज रूहे चमन बेचने वाले,
तू इनके लिए मौत का ऐलान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा

अंत में यही कहना चाहूँगा कि साहिर भारतीय आत्मा के स्वर थे। हमारी मनीषा हमारी पहचान से हमें परिचित कराने वाले साहित्यकार थे। भले ही जमाने ने उनका विभिन्न कारणों से सही मूल्यांकन न किया हो। मगर वे भारत के ही नहीं विश्व मानवता की अनमोल धरोहर थे। जीवन को उन्होंने इतने आयामों अंदाजों से देखा और लिखा कि हमें कहना ही पडता है कि वे हर एक पल के शायर थे।



 



सफलता की कहानी

राक गार्डन के निर्माता-नेकचंद सैनी


कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता है। अगर इंसान अपने मन में ठान लंे तो मुश्किलों में राह निकलती चली जाती है। ऐसे ही धुन के पक्के धुनी थे चंड़ीगढ़ में राक गार्डन के निर्माता नेकचंद सैनी।उनका जीवन एक ऐसे व्यक्ति की सफलता की कहानी है जो सभी को प्रेरित और रोमांचित करती है। यह कहानी यह भी बताती है कि कोई भी अच्छा काम करने की कोई उम्र नहीं होती है उसे किसी भी आयु में शुरू किया जा सकता है।
 15 दिसंबर 1924 को जिला गुरदासपुर (अब पाकिस्तान में) के शंकरगढ़ में जन्में नेकचंद की प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय स्तर पर हुई।उन्होंने 1943 में दसवीं की परीक्षा पास की और पी. डब्ल्यू. डी. में नौकर हो गए।सन 1947 में देश के हिंसात्मक विभाजन के बाद वे अपना पैतृक गाँव छोड़कर भारत आ गए थे। देश में बड़े पैमाने पर होने वाले नव निर्माण के कार्यक्रमों में अपने विभाग के माध्यम से लग गए। चूँकि वे वहाँ पी डब्ल्यू. डी. में नौकर थे इसलिए यहाँ आकर भी इसी विभाग में नौकरी पा गए। शुरू में करनाल में रहे फिर पानीपत फरीदाबाद होते हुए वे सन 1953 में चंड़ीगढ़ आ गए। इस बीच 1950 में उनका विवाह दिल्ली के दरियागंज में हो गया।
 उन दिनों रोड़ इंस्पेक्टर के रूप में उनका काम सड़कों का निरीक्षण करना होता था। अब तक उनका जीवन एक आम शहरी व्यक्ति का जीवन था।
उन दिनों चंड़ीगढ़ शहर धीरे - धीरे विकसित होना शुरू हुआ था। साइकिल से सड़कों का निरीक्षण करते हुए नेकचंद को वहाँ के टूटे पत्थरों ने आकर्षित किया। वे भारत की प्राचीनतम पहाड़ी संृखला की चट्टानों के टूटे पत्थर थे।
वह सन 1958 का कोई दिन था जब नेकचंद खेल खेल में ही
बेकार अनुपयोगी घड़े और पत्थर अपनी साइकिल के पीछे रखकर लाने लगे । इन्हें वे एक स्थान पर जमा करने लगे। यह स्थान मुख्य शहर से दूर जंगल का एक हिस्सा था। जहाँ आम तौर पर कोई आता जाता न था।
अब तो नेकचंद का यह रोज का काम हो गया,सारे दिन घूम - घूम कर साइकिल से सड़कों का निरीक्षण करते और वापसी में लौटते हुए अनुपयोगी,बेकार, कबाड़ समझी जाने वाली वस्तुओं को साइकिल के पीछे रखकर उस स्थान तक लेकर आते।
उन्होंने धीरे -धीरे जंगल के उस हिस्से की सफाई कर वहाँ पेड़ लगाए। कंधे पर बाँस रख कर उसके दोनों सिरों पर कनस्तर बाँध कर वहाँ दूर से पानी लाते। इस तरह उन्होंने सबसे पहले वहाँ झोपड़ीनुमा कमरा बनाया।
अब उन्होंने उन बेकार चीजों को आकार देना शुरू किया। शाम को आकर वे जैसे ही काम में लगते जल्दी ही अँधेरे की चादर फैलनी शुरू हो जाती। रात का सुनसान अँधेरा वातावरण और साँप मच्छरों से भरा जंगल भाँय-भाँय करता।उस जंगल में बिजली तो थी नहीं।
आवश्यकता आविष्कार की जननी है यह बात ऐसे ही नहीं कही गई है। यह उनका जुनून ही था जिसने उन्हें रास्ता दिखाया।
नेकचंद ने बताया  - मैंने कबाड़ में पड़े टायरों को ढूँढ़ा और उन्हें जलाकर उनकी रोशनी में रात में घंटों काम करने लगा। जब फुरसत पाते तो घर चले जाते, अगले दिन आकर फिर यही क्रम जारी रहता। पति की इस लगन को देखकर पत्नी ने भी उनका साथ दिया। वे भी अक्सर आ जातीं और उन्हें सहयोग करतीं।
एक गहन आध्यात्मिक व्यक्ति की तरह नेकचंद ने इस गार्डन को एक ध्यान और प्रार्थना की तरह निर्मित किया। उनके लिए जंगल का यह एकांत स्थान एक पवित्र स्थल की तरह रहा जहाँ पहुँच कर वे मूर्तियों जानवर चिड़िया आदमी आदि की आकृतियों को अपनी कल्पना के रंगों में सजाते उन्हें निर्मित करते उनके लिए ये आकृतियाँ निर्जीव जड़ वस्तुएँ न होकर उनकी साथी थीं जिनसे वे अक्सर निर्माण की प्रक्रिया के दौरान वे ठोकते ,पीटते,सहलाते, पुचकारते,प्यार करते और उन पर अधिकार जताते।
इस तरह से लगे लगे उन्होंने एक दो नहीं,सौ पचास नहीं, बीस हजार आकृतियाँ तैयार कर लीं। ये सारी आकृतियाँ एक दूसरे से भिन्न थीं। वे धीरे - धीरे अपने उस संसार को सजाते रहे,जिसके
कि वे स्वयं निर्माता थे। उस संसार के एक एक निवासियों में रंग भरते रहे। इनमें कलाकार, मदारी , नौकर, राजा, सिपाही, पक्षी, जानवर जैसे तरह तरह के प्राणी थे।इस सृजन कार्य में उनके साथ होते बहती हवा, मौसम, तरह - तरह की चिड़ियाँ व कीट पतंगे। जो अपनी बोली भाषा में नेकचंद के इस कार्य को देखते और सराहते।
   सन 1973 में सरकार की एक सर्वेक्षण टीम ने अचानक जंगल के बीच छिपे इस खूबसूरत रचना संसार को खोज निकाला। सर्वे टीम के सारे सदस्य इसकी विशालता और अद्वितीय खूबसूरती को देखकर दंग रह गए। चूँकि यह सब सरकारी जमीन पर अवैध रूप से बना हुआ था इसलिए कानूनन इसे उस स्थान पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं था। एक ओर विश्व विख्यात स्विस वास्तुकार ली कूर्बिजियर द्वारा डिजाइन किया गया नियोजित चंडीगढ़ शहर और दूसरी ओर सरकारी दृष्टि से अनियोजित और अनधिकृत भूमि पर बसा नेकचंद का यह अद्वितीय रचना संसार। फिर नेकचंद बेहद सीधे सरल व्यक्ति। उनके पीछे कोई राजनीतिक या किसी अन्य प्रकार का कोई समर्थन नहीं। अगर कुछ था तो एक जुनून एक समर्पण...
  आज तो उनके कार्य का इतना महत्व समझ में आता है लेकिन उस शुरुआती दौर में जब कोई सहारा नहीं था तब भी उनकी महान प्रतिभा और किए गए कार्य को समझने वाले भले लोग सामने आए और आगे बढ़कर न केवल उनके इस अद्वितीय कार्य की प्रशंसा की बल्कि उन्हें सहयोग और सहारा भी दिया। सौभाग्यवश स्थानीय प्रशासन ने भी इस कार्य के महत्व को समझा और नेकचंद को अपने प्रयास जारी रखने को कहा। उन्होंने नेकचंद को कार्यकर्ता उपलब्ध कराए और ट्रक भी सामान की ढुलाई के लिए दिया। अब तो नागरिक भी यदा कदा अनुपयोगी कबाड़ आदि को वहाँ पहँुचाने लगे। सन 1976 में जब सरकार ने इसे अपने अधिकार क्षेत्र में लिया तो जमीन पर रखीं वे मूर्तिशिल्प आकृतियों को व्यवस्थित क्रम में रखा गया।
इस स्थान की विशालता और आकृतियों में प्रयुक्त पत्थरों की बहुतायत के देखते हुए इसे ‘राक गार्डन’ नाम दिया गया। जंगल में छिपे इस रचना संसार का पता जब पहली बार लोगों को हुआ तो वे इसे देखने के लिए टूट पड़े। दस मई 1978 को इस स्वप्निल कलाकृतियों के अनूठे संसार को औपचारिक रूप से आम जनता के दर्शनार्थ खोल दिया गया।
यद्यपि कहने सुनने में ये सब बातें इतनी सीधी सरल कहानी की तरह आसान लगतीं हैं मगर यह इतना सरल और आसान नहीं रहा। नेकचंद को ईष्यालु लोगों स्थानीय कई नौकरशाहों और वकीलों का विरोध झेलना पडा। राक गार्डन के विस्तार और इसके खर्चों को लेकर हुए विरोध की लड़ाईयाँ में उलझना पड़ा। इसमें अदालत के केस भी शामिल हैं। लेकिन सन 1989 में यह सब पूर्ण रूप से उनके पक्ष में हो गया। उन्हें राकगार्डन के खर्चों और सुरक्षा संबंधी सारे अधिकार प्राप्त हो गए। यद्यपि इस बीच कई बार बाजी पक्ष में आती दिखाई दी ओर कभी विपक्ष में। एक बार तो राक गार्डन को उजाड़ने के आदेश भी हो गए थें लेकिन शहर की सौदर्य पारखी जनता व संभ्रान्त लोगों ने मानव सृंखला बनाकर उसे रोका।
वे बोले - ‘ये बुलडोजर पहले हम पर चलेगा फिर राक गार्डन पर।’
उनके इस महत कार्य की पहली बड़ी मान्यता विदेश से मिली जब मार्च अप्रैल 1980 में उनकी इन कलाकृतियों की प्रदर्शनी पेरिस में लगी। जहाँ पेरिस के मेयर ने कबाड़ से बनाई गईं इन खूबसूरत कलाकृतियों की सराहना करते हुए नेकचंद को वहाँ का सर्वोच्च सम्मान प्रदान किया।
सन 1983 में भारत सरकार ने राक गार्डन चंडीगढ़ पर एक डाक टिकट जारी किया। 24 मार्च 1984 को भारत के महामहिम राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने उन्हें ‘पदम श्री’ सम्मान  से सम्मानित किया।
सन 1985 में नौकरी से सेवानिवृत होने के बाद इन्हें राक गार्डन का ‘क्रियेटिव डाइरेक्टर’ बना दिया गया।एक मुलाकात में नेकचंद ने बताया था कि वैसे तो बहुत लोगों का साथ और सहयोग मुझे मिला मगर चंड़ीगढ़ के गर्वनर रहे महामहिम सिद्धार्थशंकर राय के सद प्रयासों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
प्रसिद्ध कामेडी सीरियलों के निर्माता व हास्य अभिनेता जसपाल भट्टी ने एक मुलाकात में अपने अंदाज में बताया था कि -‘इस पत्थरों के शहर में है ही क्या? अगर नेकचंद को निकाल दे ंतो, उन्होंने सचमुच बडा काम किया है। कितने सारे लोग तो चंडीगढ़ राक गार्डन देखने आते हैं। यह उनका बहुत बड़ा योगदान है। उनमें ‘गजब का सेंस आफ ह्यूमर’ है। इस बड़े को करने में बड़ी बाधाएं आईं लेकिन उन्होंने परवाह नहीं की और मुस्कराकर हर स्थिति को स्वीकार किया।’
सचमुच ही जैसे चंड़ीगढ़ रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही ‘जय जवान’ ‘जय किसान’ के नारे को याद दिलाती मूर्ति आकृतियाँ आपका स्वागत करतीं हैं ठीक उसी तरह राक गार्डन के मुख्य द्वार के पास कैफेटेरिया के निकट अपने आॅफिस में नेकचंद। जब तक वे जीवित रहे कोई भी सरल सहज व्यक्तित्व के धनी इस कलाकार से मिलकर अपनापन महसूस कर सकता था।
पिछले दिनों 91 वर्ष की अवस्था में उनका निधन हो गया। आज वे भौतिक रूप से हमारे बीच बेशक न हों मगर उनके विचार और उनका बनाया ‘राक गार्डन’ अगली पीढ़ी को हमेशा प्रेरित करते रहेंगे।