Tuesday, 30 April 2013

देश आपका एक कूड़ाघर
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बुरा लगा सुनकर,
तो फिर क्यों,खाकर पान थूक देते हो, बीड़ी पीकर उसके टुकड़े,सिगरेट पीकर उसके टोटे, केले खाकर उसके छिलके,टाफी खाकर उसका रैपर, किसी हाल में,कभी कहीं भी,जानबूझ कर,नासमझी में, फेंक देश में कूड़ा भरते,माँ का आँचल मैला करते,देश के प्रति क्या ये ही भक्ती है,नहीं रही हममें शक्ती है,जो हम थोड़ी मेहनत करके,ये कूड़ेदानों में ड़ाले,जो ऐसा करते हैं अक्सर,उनको रोके उन्हे सुधारें,घर के सब कमरों को झारा,दरवाजे पर कूड़ा सारा,अपने दरवाजे को झारा,बीच सड़क पर कूड़ा सारा,जमा कहीं भी कूड़ा पाया,आग लगाकर उसे जलाया,करके वातावरण विषैला,उसको भी गन्दा कर डाला,चाहे जानवर या पशु पक्षी,कितनी साफ- सफाई रखते,पढे-लिखे होकर भी हमसब,हरपल कितना गन्दा करते,ध्यान नहीं देते हैं हम सब,कहता है कोई बूढ़ा ग़र,जो देखेगा वो कह देगा,पूरा भारत एक कूड़ाघर...
अब न रहा पहले सा गाँव,
ना ही अब रहीं हैं वे गली,
साथ अब हैं कम चलते पाँव,
हो जो विदा पालकी चली..


अब कहाँ हैं फागुनी वे गीत,
वह गोरी घट-पनघट प्रीत,
दुख-सुख की टेर सुने कौन,
दुबक गए शाम ज्यों ढ़ली..


आग पोर की, छिड़े वे किस्से,
अब हैं, गुजरे दिनों के हिस्से
चाचा का नेह
, राम-राम काका को,
बीते कल की बात हो चली.


गदराए आमों के बाग,
हर्षित मन वो आल्हा फाग,
खो गए अखाड़ों के जोड़,
रस्म हर पुरानी टली...


 वह बूढ़े बरगद की छाँव,
सुख देते थे ऐसे ठाँव,
दाँव-दाँव दन्ना के दाँव,

-की छाँव तक न ढ़ूँढ़ते मिली...
 

बेटी की शादी, बैल, बेटे की नौकरी,
भोज और मुकदमे में,खेत और आदमी,
टुकड़ा था टुकड़ों में बँट गया,
दर्द ने अभावों की मिरजई सिली...


रिश्ते अब सस्ते है धन से,
फासले हुए मन से मन के,
राहों ने आहों के जंगल में,
जिन्दगी ये किस कदर छली...


 जो साथ अब है कम चलते पाँव,
हो जो विदा पालकी चली,
अब न रहा पहले सा गाँव,
ना ही अब रही हैं वे गली,
शुभ प्रभात मित्रो, ------------------
छलेंगे कबतक,
अनुभव के ये विषैले पुत्र,
कबतक डराएंगी,
दूर की भयावह आहटें,
कबतक,
न पराजित होगा रावण,
आखिर कबतक,
पिएगी ये जमीं खून,
कल की,
सुनहरी फसलों को,
उगाने के लिए,
स्वयं को,
बदलते रहेंगें जल में,
ये दल के दल बादल,
कबतक,
आखिर कबतक....

Sunday, 28 April 2013

सोचें, समझे, सुविचार करें, ये तरह की शिक्षा है,
परिणामों का अध्ययन करें, क्या देती हमको दीक्षा है,
कल के सपनों के लिए,न आने वाला आज गँवा देती,
बनता जीवन उद्देश्य यही ,हो जाती अहम परीक्षा है....


 हर क्षण जीवन है इम्तहान हर पल अनमोल खजाना है,
ये सोच है क्यों तुझको घेरे,मंज़िल पर क्या पा जाना है,
मंज़िल तो नहीं जीवन कोई ,ये तो एक रस्ता प्यारा है,
जो समझ गया इसको जीता,पाया एक नया सहारा है...


आओ जीवनशैली बदलें, शिक्षा का अर्थ ग्रहण कर लें,
कल की चिंता को छोड,आज को ही हम तुम बेहतर कर लें,
जिस क्षण में जी सकते, उसमें रोयें, कल के सदमें क्यो झेलें

जिंदगी जिए हर पल, खुशियां ग़़म जो हो, आँखों सर ले लें,.....

हों श्रेष्ठ मूल्य विकसित और दृढ़,इस जीवन में जिसके द्वारा,
बंधन से मुक्ति मिले और गिरे अज्ञान अंध तम की कारा,
भर जाय अलौकिक दिव्य ज्योति,हो ह्रदय प्रफुल्लित और प्रमुदित,
आत्मिक संतोष मिले मन को, सुरभित होवे जीवन सारा,



 

Saturday, 27 April 2013

बनी नज़ीर लड़ी थी जो, मर्दानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
बुंदेलों के मुँह की वही, कहानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
धर्म जाति मज़हब के ऊँचे, कोलाहल में खोया,
न्याय प्रीति का जज़्बा वो, इंसानी ढ़ूँढ रहा हूँ,

शब्दों के फैले जंगल में, मानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
कभी आम थी चीज वही, लासानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ...


 समता न्याय विभेद नहीं है, संविधान के अंदर,
वर्ग जाति अन्याय भेद का, कोलाहल है घर-घर,
प्रजातंत्र और समानता है,मुर्दा शब्द किताबों के,
कितनी बार खोखले होते देखे, दावे वादों के,


 नहीं आँख में करूणा का मैं पानी,ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
अंतर में अंगार लिए कुर्बानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ...


 दबी निरीह बिवश समझौतों की आदी लगती है,
पैरों खेली जाने वाली, एक गेंद दिखती है,
ज़ुल्म सामने देख रही, और नहीं बोल पाती है,
कुचले जाते हक़, आगे बढ़ नहीं छीन लाती है,

तूफानों में नइया, भाग्य भरोसे पर खे ती है,
हर सवाल का उत्तर एक,हमें क्या,से देती है,

नहीं झूठ के घर की मैं दरबानी, ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
झुके नहीं मिट जाए,वही जवानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
बदली परिभाषा में,बात पुरानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
कभी आम थी चीज वही,लासानी ढ़ूंढ़ रहा हूँ,

शब्दों के फैले जंगल में,मानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
बुंदेलों के मुँह की वही कहानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ....





बता अय दिल मुझे वो कौन सी मंज़िल, कि जहाँ,
इतनी  बेताबी से  ये कारवां, रवाना  है,
अनगिनत पढ़ो अनपढ़ो का ये हुज़ूम बड़ा,
है जगह कौन सी, जहाँ कि इन्हें जाना है,

है चाह कौन सी बतला, जिसे पाने के लिए,
आदमी  आदमी से,   दूर हुआ जाता है,
आज के दौर में हर बूढ़ा, जवां और बच्चा,
अपने ही घर में, एक मेहमान हुआ जाता है,

अदबो तहज़ीब की है आज, जल रही होली,
दिल में नफरत के दिए, रोज नए जलते हैं,
राम   के  गुण   पढ़ाए   जाते   मगर,
आचरण   राक्षसों   के    पलते    हैं,

ऐसी तदबीर करो दोस्तो, मोहब्बत और,
दिल से तहज़ीब का जज़्बा, न कहीं दूर जाए,
करो तरक्की मगर, ऐसी वो तरक्की हो,
मंज़िलें खुद ही अपने पास, खिंच के आ जाए,


Friday, 26 April 2013

खामोशी की खामोशी चुभन, सघन है चारो ओर उदासी,

खामोशी की खामोशी चुभन, सघन है चारो ओर उदासी,
तड़प रही हो विकल,राष्ट्र की आत्मा भूखी प्यासी,
चिंतक सर्जक अकुलाए कोलाहल में खोए हैं,
आज शहीदों के आँसू भी, बार- बार रोए हैं,
हिंसा बनी धर्म का साधन,मानवता सिर फोड़े,
स्वार्थी राजनीति है, प्रतिभा तड़प-तड़प दम तोड़े,
बीते दशक लदी है अबतक,ओढ़ी हुई गुलामी,
शासक बदले मगर, न मिल पाई सच्ची आजादी,
ऊपर उजले कपड़े पहने,अंदर दिल के काले,
खड़ी तमाशा देखे जनता,खुलते रोज घोटाले,
जहाँ ज्ञान ईमान जान की कीमत केवल पैसा,
गाँधी नेहरू के सपनों का,ये भारत है कैसा...


 वर्ग द्वेष से मुक्त, रहित शोषण से देश हमारा,
इंकलाब जन-जन के मन में,हो जीवित उजियारा,
झुकना सीखा नहीं, यही कहते थे वे अलबेले,
मातृभूमि हो मुक्त, कोई ये मेरा जीवन ले ले,
जेल और कालापानी, लाठी गोली ड़ंड़े भी,
कितनों ने हँस-हँस चूमे थे,फाँसी के फंदे भी,
आजादी की तड़प, दिलों में भरती थी अंगारे

कौन भला फिर ऐसे में, रह सकता था मन मारे,
नई पीढ़ियाँ करके देखें,वो अनुभव कैसा था,
भगतसिंह के सपनों वाला, वो भारत कैसा था,
आजादी के दीवानों का, वो भारत कैसा था...

 भिन्न समय श्रम और स्थिति के,अलग-अलग हल होते,
कालक्षेत्र में वीर सृजन के, नव सपने हैं बोते,
समय अभी भी है, सुन पाएं यदि सन्नाटे का स्वर,
अनुभव कर पाएं, मथते सागर के अंतर का ज्वर,
कल का हल था ठीक,गलत है आज, अगर तो छोड़े,
यही वक्त की माँग, विषमता की दीवारें तोड़े,
विघटन के स्वर की चिन्गारी, आग लगा सकती है,
हाँ, प्रबल राष्ट्र भावना, आज भी देश बचा सकती है,
यदि इज्ज़त की कीमत में, ये झूठा पैसा होगा,
तो सदियों के सपनों वाला, ये भारत कैसा होगा,
सोचें भारत कैसा होगा...