Thursday, 17 October 2013

वक्त का है जो धनी उसकी वाह-वाह है,
वक्त के हाथों पिटा,उसका दिल तबाह है,
बोलो क्या करेंगे हम,

उग रही है खेत में,जिनके श्रम की रोशनी,
फिर भिखारियों सी क्यों,उनकी ये हालत बनी,
क्या यूँ ही सहेंगे हम,

सिसकता किसान औ रोता मजूर आज है,
सामने तो लाओ उनको जिनको इनपे नाज़ है,
सिर्फ है नसीब ग़म,

करनी हैं विफल हमें, ऐसी सारी साजिशें,
किस तरह से होंगी ये,तय ये सारी मंज़िलें,
बाँटें हों खुशी या ग़म,

सुबहो-शाम काम है,काम ही से दाम है,
सच तो ये दोस्तो,काम ही से राम है,
काम ज्यादा बात कम,

राज़ है यही जिसे,जिन्दगी में ढ़ाल लें,
जो हमें सुखी करे,बस वही खयाल लें,
आएगा इसी से दम,


जिन्दगी की राह में,ख्वाब जो तूने बुने,
दे आवाज़ इस तरह कि हर कोई उसे सुने,
साथ चल कदम-कदम,

जिन्दगी कुछ ऐसी बन तू,जिसपे दिल को नाज़ हो,
सारी कोशिश हो इसी की, कल से बेहतर आज हो,

रोशनी दे बाँट सबको जल के सूरज की तरह,
ग़म हटें दिल से, सुहानी भोर का आगाज़ हो,

ज़ुल्म की नगरी में हक़ की गूँज, जो पहली उठे,
मुर्दा दिल में जान फूँके, वो तेरी आवाज़ हो,

साए में तलवार के जिस्मों को जीता, क्या किया,
प्यार की महकाए खुश्बू ,दिल पे तेरा राज हो,

कट गिरें जंजीर, दीवारें हमारे बीच की,
फासले दिल के मिटें,ऐसा अजब अंदाज़ हो,

जिन्दगी कुछ ऐसी बन तू,जिसपे दिल को नाज़ हो,
सारी कोशिश हो इसी की, कल से बेहतर आज हो,

जब कभी प्रकृति के निर्मल निश्छल दर्पन में,
अनजान गगन के अंतहीन इस आँगन में,
सूनी रातों में हो विमुग्ध शिशु सा अधीर,
चाँदी सी उज्ज्वल इस धरती के आँचल में,
जब चाँद ह्रदय की प्रेम सुधा बरसाता है,
सच कहूँ मेरा मन अकथ शान्ति पाता है,

जन कोलाहल से दूर प्रीति की घनी छाँव,
हो घृणा ईर्ष्या नहीं न किंचित बैर भाव,
हक़ जहाँ बराबर मिले न हो शोषित कोई,
सब रहें हँस के ये कहें, है मेरा यही गाँव,
जब ऐसा सपना पलकों को सहलाता है,
सच कहूँ मेरा मन अकथ शान्ति पाता है,

Wednesday, 16 October 2013

रावण तुम मरे नहीं
-----------------------

रावण तुम मरे नहीं,
तुम अभी जिन्दा हो,
मैने सुना है --
तुम्हारा अट्टहास,
फाकाकश तंगहाल इंसानों के ,पेट में,
बलत्कृत अबलाओं की निर्वसन,देह में,
भूख से तड़पते बच्चों के खाली,हाथों में,
जी तोड़ मेहनत के बाद भी,अपने पसीने को,
आँसुओं में बदलते देख मजदूर और किसान की आँखों में,

जुल्मों की इंतहाँ से न निकल पाने वाली आहों में,
मैंने सुना है तुम्हारा अट्टहास,
रावण तुम मरे नहीं,
तुम अभी जिन्दा हो,
रावण...


राम को हमेशा डर लगा है,
समाज से,
मर्यादाओं से,
परम्पराओं से,
नियमों के अनियोजित अनुपालन से,
लेकिन तुम्हें,
तुम्हें कोई भय नहीं,
सारी शक्तियाँ तुम्हारी गुलाम हैं,
तुम्हारी लंका के सोने की चमक ने,
उन्हें अंधा कर दिया है,
तुम्हारा साम्राज्य,
अब लंका की सीमाएं तोड चुका है,
तुम अब पहले से अधिक शक्तिशाली हो रावण,
तुम मरे नहीं,
तुम अभी जिन्दा हो,


यूँ तो हर साल,
तुम्हारा पुतला जलाया जाता है,
और इस तरह,
याद दिलाया जाता है,
कि लोकतंत्र में हमारे पास,
यही एक अन्तिम हथियार है,

जोकि,
सिद्ध हो चुका है,
कि बेकार है रावण,
तुम मरे नहीं,
तुम अभी जिन्दा हो,


कहीं पिछली बार की तरह,
राम को,
वानरों(वन नरों) का सहारा न मिल जाए,
और बिना बात फिर कोई,
मुसीबत न खड़ी हो जाए,तुमने,
तुमने वनों को ही कटवा दिया,
जहाँ से उठ खड़ी हुई थी पहले समस्या,
उसे हटवा दिया,
अब सम्भव है कि,
राम के लिए,
कैकेई को वनवास की जगह,
दूसरी दुनियाँ का वास,
ढूँढ़ना पड़े,
और इस बहाने,
तुम पर आनेवाली आफत,

किसी दूसरी दुनियाँ में टले,

मैंने समझा है,
तुम्हारी दूरदृष्टि को,
रावण,
तुम मरे नहीं,
तुम अभी जिन्दा हो,
मैंने देखा है,
तुम्हारी राजनीति को,
तुम्हें मालूम है,
मनुष्य में विचार शक्ति होती है,
जोकि सृजन के नए सपने बोती है,
तुमने इस समस्या को भी,
सुलझा लिया,
आदमी को बहुत गहरे में,
उलझा दिया,
अब,
अब वह नहीं उबर सकता,
मँहगाई के चंगुल से,
नफरत के जंगल से,
अब नहीं निकल सकता,
रोटी के घेरे से,
ईर्ष्या के फेरे से,
अब वह नहीं बाहर आ सकता,
घर के कुएँ से,
कोल्हू के जुएँ से,
मैंने देखा है,सुना है,समझा है,
रावण,
तुम मरे नहीं,
तुम अभी जिन्दा हो,
सिद्ध हो चुका है,
कि बेकार है रावण,
तुम मरे नहीं,
तुम अभी जिन्दा हो,



काम क्रोध और लोभ का मारा जगत न आया रास,
जब-जब राम ने जनम लिया,तब-तब पाया वनवास,

कलयुग तक चलती आई है सतयुग की यह रीत,
सबकुछ हार चुकें जब अपना तब हो राम की जीत,

जुग बदल पर बदल न पाया अब तक ये इतिहास,
जब-जब राम ने जनम लिया,तब-तब पाया वनवास,

छोड़ के अपने महल-दो-महले जंगल जंगल फिरना,
औरों की सुख-चैन की खातिर दुख संकट में घिरना,

यही है राम के लेख की रेखा आ गया अब विश्वास,
जब-जब राम ने जनम लिया,तब-तब पाया वनवास,

राम हर एक युग में आए पर कौन उन्हें पहचाना,
राम की पूजा की जग ने पर राम का अर्थ न जाना,

तकते-तकते बूढ़े हो गए धरती और आकाश,
जब-जब राम ने जनम लिया तब-तब पाया वनवास,
चुप है धरती चुप हैं चाँद सितारे,
मेरे दिल की धड़कन,तुझको पुकारे,

खोए-खोए से ये मस्त नज़ारे,
ठहरे-ठहरे से ये रंग के धारे,

ढ़ूँढ़ रहे हैं तुझको,साथ हमारे,
चुप है धरती चुप हैं चाँद सितारे,

कोने-कोने मस्ती फैल रही है,
बाँहें बनकर हस्ती फैल रही है,

तुझ बिन डूबे दिल को कौन उभारे,
चुप है धरती चुप हैं चाँद सितारे,

निखरा-निखरा सा है चाँद का जोबन,
बिखरा-बिखरा सा है नूर का दामन,

आ जा मेरी तन्हाई के सहारे,
चुप है धरती चुप हैं चाँद सितारे,
इंसाफ का तराजू जब हाथ में उठाए,जुर्मों को ठीक तोले,
ऐसा न हो कि कल का इतिहासकार बोले,
मुज़रिम से भी जियादा, मुन्सिफ ने जुल्म ढ़ाया,
कीं पेश उसके आगे, ग़म की गवाहियाँ भी,
रक्खीं नज़र के आगे, दिल की तबाहियाँ भी,
उसको यकीं न आया, इंसाफ कर न पाया,
और अपने इस अमल से,बदकार मुज़रिमों के,
नापाक हौसलों को, कुछ और भी बढ़ाया,

इंसाफ का तराजू जो हाथ में उठाए,ये बात याद रक्खे,
सब मुंसिफों से ऊपर,एक और भी है मुन्सिफ,
वो दो जहाँ का मालिक सब हाल जानता है,
नेकी के और बदी के अहवाल जानता है,
दुनिया के फैसलों से मायूस जाने वाला,
ऐसा न हो कि उसके दरबार में पुकारे,
ऐसा न हो कि उसके इंसाफ का तराजू ,एक बार फिर से तोले-
मुज़रिम के ज़ुल्म को भी,मुन्सिफ की भूल को भी,
और अपना फैसला दे,वो फैसला कि जिससे हर रूह काँप उट्ठे,
आइये बहार को हम बाँट लें,
जिन्दगी के प्यार को हम बाँट लें,
मिलके रोएं मिलके मुस्कुराएं हम,
अपनी जीत हार को हम बाँट ले,

जिसके पास हो खुशी,थोड़ी सी खुशी दे दे,
जो बेबस हो बेचारा अपनी बेबसी दे दे,
दर्द की फुहार को हम बाँट ले,
जिन्दगी के प्यार को हम बाँट लें,

प्यासा ना रहे कोई,भूखा ना सोए कोई,
तन्हा न हँसे कोई, तन्हा न रोए कोई,
आँसुओं की धार को हम बाँट लें,
जिन्दगी के प्यार को हम बाँट लें,

आइये बहार को हम बाँट लें,
जिन्दगी के प्यार को हम बाँट लें,
रावण का कद
-----------------

कभी जातिवादी दबाव में,
कभी धर्मवादी प्रभाव में,
कभी अर्थ के ही अभाव में,
कभी व्यक्तिगत स्वार्थभाव में,

सच से जब हम आँख चुराते,
रावण का कद बढ़ जाता है

देख गरीबों की लाचारी,
देख अमीरों की अय्यारी,
देख सियासत की मक्कारी,
देख लुट रही जनता सारी,

मूक बने जब चुप रह जाते,
रावण का कद बढ़ जाता है

सुख समृद्धि ऐश भौतिकता,
खाम-खयाली है नैतिकता,
बनती जब ऐसी मानसिकता,
परदे में छिपती वास्तविकता,

हक़ तब नहीं नज़र आता है,
रावण का कद बढ़ जाता है,

अपने जाने अनजाने में,
या औरों के उकसाने में,
कहें सफलता वह पाने में,
हद से आगे बढ़ जाने में,

जब औरों से होड़ लगाते,
रावण का कद बढ़ जाता है,

Friday, 11 October 2013

पैरों की हड़ताल
------------------

जब ईनाम दौड़ का देने, गरिमा को बुलवाया,
पैरों ने हड़ताल करी,एक कदम न बढ़़ने पाया,

सारे थे हैरान, भला क्यों पैर करें नादानी,
पूछा तो पैरों ने कह दी अपनी राम कहानी,

मैने मेहनत की और दौड़ा पहला नम्बर पाया,
मेहनत जब मेरी ईनाम क्यों हाथों को दिलवाया,

करे उसी को मिले,भला है ये इंसाफ निराला,
मैं तो जाऊँ जब ईनाम हो,मुझको मिलने वाला,

सुनकर पैरों की ये चख-चख पीठ हुसक कर रोई,
बड़े न्याय वाले बनते हो, लाज शरम सब खोई,

कल जब जीभ चटक्खे ले, आमों के बाग गई थी,
रखवाले का लट्ठ पड़ा मुझ पर, ये बात सही थी,

खाया मुँह ने मार पड़ी मुझ पर,क्यों भला बताओ,
आाखिर ये है न्याय कहाँ का भाई मेरे समझाओ,

आपस में अंगों का झगड़ा, सुन शरीर मुसकाया,
मिलजुलकर सब काम करें यदि, सुखी रहेगी काया,

रखवाले को देख, वहाँ से पैर भाग जो जाते,
मुँह को मिलता स्वाद,पीठ पर लट्ठ न पड़ने पाते,

अगर रहें मिलजुलकर हम,तो दुनिया कर लें वश में,
मुट्ठी बंद लाख की, हम जो लड़ें नहीं आपस में,

आई बात समझ में, सबने मिलकर कदम बढ़ाया,
गूँज उठीं तालीं,जब गरिमा ने ईनाम वो पाया,
मेरा सपना
-------------

मेरा सपना कितना अच्छा,
हे ईश्वर हो जाए सच्चा,

बिना पढ़े ही इम्तहान में,
आएं नम्बर सबसे ज्यादा,
सुबह शाम मेरे खेलकूद में,
कोई नहीं पहुँचाए बाधा,

सभी कहे मुझे प्यारा बच्चा,
मेरा सपना कितना अच्छा,

मेरी कभी किसी गलती पर,
मार न बिलकुल पड़ने पाए,
और पापा मम्मी खुश होकर,
मनचाहे सामान दिलाएं,

मन में मेरी ऐसी इच्छा,
मेरा सपना कितना अच्छा,

हे ईश्वर हो जाए सच्चा,
मेरा सपना कितना अच्छा,

आज अकल है आई
-----------------------

कौआ एक कहीं से टुकड़ा रोटी का ले आया,
सोचा उसने बैठ डाल पर,जाए इसको खाया,

तभी कहीं से बिल्ली आई,बोली-कौआ मामा,
सुना बुज़ुर्गों से हमने,तुम गाते अच्छा गाना,

अच्छा अब तुम जल्दी से,तारीफ हमारी पाओ,
हम तो माने तब,जब हमको मीठा गीत सुनाओ,

चोंच से पंजे में कौए ने, रोटी तुरत दबाई,
बोला-बिल्ली मौसी हमको,आज अकल है आई,

आज नहीं आसान हमारी मेहनत को यूँ खाना,
बैठो रोटी खा लूँ, फिर मैं तुम्हें सुनाऊँ गाना,

खाना अच्छा नहीं किसी की मेहनत,धोखा देकर,
चल दी यही सोचती बिल्ली अपना सा मुँह लेकर,

सदियों से कौओं की मेहनत रही बिल्लियाँ खाती,
कोई भी गंदी आदत हो, जाते-जाते जाती,

आसमान में उड़ी पतंग
---------------------------

आसमान में उड़ी पतंग,
ऊपर ऊपर चढ़ी पतंग,
जरा संभालो अपनी डोर,
देखो देखो लड़ी पतंग,

नीचे खींचो ऊपर जाती,
कभी भाग नीचे को आती,
तनिक अँगुलियाँ करें इशारा,
तरह तरह के नाच दिखाती,

भाग रहे पीछे ललचाए,
काश गिरे हमको मिल जाए,
सोनू मोनू ने खुश होकर,
 जी भर भर कर पेंच लड़ाए,

कितने रंगों भरी पतंग,
 लो छत पर गिर पड़ी पतंग,
जिधर इशारा किया हाथ ने,
उधर हवा में मुड़ी पतंग,

हाथ में कापी आँखें ऊपर,
और आँखों में मढ़ी पतंग,
ऊपर ऊपर चढ़ी पतंग,
आसमान में जड़ी पतंग,