मुझको वो उम्रे-गुजश्ता का सफर याद आया,
बहुत अंजान खयालों ने दिल को त़ड़पाया,
कितने रंगीन सुहाने थे वो प्यारे सपने,
नहीं था ग़ैर कोई लगते थे सारे अपने,
सुबह और शाम थी अपनी और रात अपनी थी,
सारी दुनिया से अलग थी वो जात अपनी थी,
है मुझे याद तब इतना नहीं गरीब था मैं,
वही था वक्त जब उसके बहुत करीब था मैं,
सोच में हूँ कि मैंने खोया क्या औ क्या पाया,
फिक्रो-अलम से दूर थे वो गीत सुहाने थे,
होठों पे तराने थे मस्ती के खज़ाने थे,
उस वक्त थी चारों तरफ प्यारी हसी कलियाँ,
पर आज मुझे घेरे हैं कांटों भरी गलियाँ,
सफर बढ़ता ही गया साथ ग़म भी बढ़ता गया,
नहीं जिस राह थी मंज़िल वो राह चढ़ता गया,
दिल को बाजार में लाके,बहुत मैं पछताया,
आगे कदम बढ़ाया तो घिर आए हैं तूफां,
जब भी बनाया आशियाँ, तड़पीं हैं बिजलियाँ,
दिल ने तो यहाँ एक अजब रीत है देखी,
इन्सानियत की राह में चलतीं हैं बरछिया,
हर नग्मे से मिठास जुदा हो गई यहाँ,
हर फूल की खुशबू न जाने खो गई कहाँ,
पग-पग पे लुटेरों ने यहाँ जाल बिछाया,
मुझे फिर उम्रे-गुजश्ता का सफर याद आया,
हजार फूलों ने गुलशन जब दिल का महकाया