Wednesday, 24 July 2013


मुझको वो उम्रे-गुजश्ता का सफर याद आया,
बहुत अंजान खयालों ने दिल को त़ड़पाया,

कितने रंगीन सुहाने थे वो प्यारे सपने,
नहीं था ग़ैर कोई लगते थे सारे अपने,
सुबह और शाम थी अपनी और रात अपनी थी,
सारी दुनिया से अलग थी वो जात अपनी थी,
है मुझे याद तब इतना नहीं गरीब था मैं,
वही था वक्त जब उसके बहुत करीब था मैं,
सोच में हूँ कि मैंने खोया क्या औ क्या पाया,

फिक्रो-अलम से दूर थे वो गीत सुहाने थे,
होठों पे तराने थे मस्ती के खज़ाने थे,
उस वक्त थी चारों तरफ प्यारी हसी कलियाँ,
पर आज मुझे घेरे हैं कांटों भरी गलियाँ,
सफर बढ़ता ही गया साथ ग़म भी बढ़ता गया,
नहीं जिस राह थी मंज़िल वो राह चढ़ता गया,
दिल को बाजार में लाके,बहुत मैं पछताया,

आगे कदम बढ़ाया तो घिर आए हैं तूफां,
जब भी बनाया आशियाँ, तड़पीं हैं बिजलियाँ,
दिल ने तो यहाँ एक अजब रीत है देखी,
इन्सानियत की राह में चलतीं हैं बरछिया,
हर नग्मे से मिठास जुदा हो गई यहाँ,
हर फूल की खुशबू न जाने खो गई कहाँ,
पग-पग पे लुटेरों ने यहाँ जाल बिछाया,
मुझे फिर उम्रे-गुजश्ता का सफर याद आया,
हजार फूलों ने गुलशन जब दिल का महकाया
साज-ए-ग़म छेड़ न मुतरिब, तू इस वीराने में,
जाएगा दिल की तरह दम भी, याद आने में,

मुतरिब--संगीतकार
वर्ग द्वेष से मुक्त रहित शोषण से देश हमारा,
इन्कलाब जन-जन के मन में हो जीवित उजियारा
झुकना सीखा नहीं यही कहते थे वे अलबेले,
मातृभूमि हो मुक्त कोई ये मेरा जीवन ले ले,
जेल और कालापानी,लाठी गोली डन्डे भी,
कितनों ने हँस-हँस चूमे थे फाँसी के फन्दे भी,
आजादी की तड़प दिलों में भरती थी अंगारे,
कौन भला फिर ऐसे में रह सकता था मन मारे,
नई पीढ़ियां कर के देखें,वो अनुभव कैसा था,
आजादी के दीवाने का वो भारत कैसा था
हिन्दी की बोली- वानी में,
हिन्दी की सुनी कहानी में,
आता वो जोश जवानी में,
जो आग लगा दे पानी में,

आगामी कल अपना होगा,
एक दीप जलाओ आशा का,
अभिनन्दन अपनी संस्कृति का,
अभिवादन अपनी भाषा का,
झील का किनारा हो,
शान्त शमा सारा हो,
आसमाँ पे तारों के संग,
चाँद आवारा हो,

झील में गिरे पत्थर,
याद ऐसी दिल में आए,
कुहुक उठे कोयल लगे,
तुमने पुकारा हो,

जिन्दगी की तल्खियों ने,
 हमें कर दिया उदास,
दिल ये चाहे अब तो,
 तेरी बाँहों का सहारा हो,

जिन्दगी तो यूँ भी
एक ग़म के सिवा कुछ ना थी,
मिले प्यार का तेरे जो ग़म,
वो ग़म भी हमें प्यारा हो,

छोटी-छोटी इन आँखों में
 ख्वाब हैं बड़े-बड़े,
होंगे सच जो ग़र तेरा,
जरा सा इशारा हो,

ये खयाल दिल को मेरे,
 हर घड़ी सताता है,
बिजलियाँ गिरें जिस पर
वो न दिल हमारा हो,

जिन्दगी तो जिन्दगी

 मौत से भी भिड जाऊँ ,
फक्र करूँ जीने में ,

 तू जो ग़र हमारा हो,
पूरी शिद्दत से मेरे दिल ने जिसे चाहा है,
कहीं वो मेरे खयालों का एक वहम तो नहीं,
मुद्दतों आँख में पले हुए, मीठे सपने,
मेरी तनहाई का पाला हुआ भरम तो नहीं,
तेरी शोखी वो शरारत और वो अंदाज़े-बयां,
मुझे तड़पाने का फितूर-ए-ज़ेहन तो नहीं,
ऐसन जो हमकौ सतैहौ,
तुम्हऊँ देखौ कल सै न रहियौ,-2

सासू है दुसमिन कौनौ जनम की,
ननदी हू पीर न जानी मन की,
आए बुलैइबे ना भइयौ,
तुम्हऊ देखौ कल सै न रहियौ,

खाए के बजरवा तू जा री चिरईया,
बैरी गए परदेस सँवरिया,
घूमै तोहे जो मिलैमोरे संइयाँ
गाए गाए के उनकौ सुनैयौ,
तुम्हऊ देखौ कल से न रहियौ,
चली जबसै तू मइके की राह गोरिया,
हमरे दुख्खन के खुलि गए किवार गोरिया,

हमरी इज्जत उतार के,तू मइके न जा,
दुख बाँट के रहैंगे, मन समझा न जा,
लोग बातैं बनैंहैं हजार गोरिया,
हमरे दुख्खन के खुलि गए किवार गोरिया,

जा गरीबी में हमपै दुख ऐसा पड़ा,
जैसे धोती फटी में हो प्यूँदा जड़ा,
का ओर से निबैहिहैं करार गोरिया,
हमरे दुख्खन के खुलि गए किवार गोरिया,

नाही खेती किसानी त मजूरी करूँ,
तेरे साथ बाल बच्चन का पेट भरूँ,
दुख अकिल्ले पड़ेगा पहार गोरिया,
हमरे दुख्खन के खुलि गए किवार गोरिया,


एक बूँद सावन की,
तन मन को सिहराती,
बढ़ा देती प्यास,जगा देती सोए अहसास,

मन की हर धड़कन का गा उठता तार,
जीवन की बगिया में महकती बहार,
जी चाहे भेजूँ मैं हवा से संदेश,
आ जाए प्रिय मेरा गया जो परदेश,
बढ़ जाती जीने की आस,

ठन्डी हवाएं तन में चुभती हैं तीर सी,
मन में जगाती हैं मीठी इक पीर सी,
बीता कल याद आए,बिरहा यूं तड़पाएं,
यादों में घडियां वे लगती शमशीर सी,
साँसों मे घुलती तेरे तन की सुवास,

एक बूँद सावन की,
तनमन को सिहाती,
बढ़ा देती प्यास,जगा देती सोए अहसास

नई पीढ़ी के प्रति
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हमारी आज की हर कामना,तुम पर निछावर है,
हमारी प्रार्थनाओं का पुकारा कल,तुम्हीं तो हो,

तुम्हारी दृष्टि से जुड़कर हमारी दृष्टि कहती है,
हमारी स्वप्नदर्शी आँख का काजल,तुम्हीं तो हो,

हमारी इन्द्रधनुषी कल्पनाओं में फलो-फूलो,
समय के श्याम-पट पर,ज्योति के अक्षर,सजाना तुम,

हमारे चोट खाए पाँव की, हर टीस कहती है ,
हमारी हर पराजय को विजय-गाथा,बनाना तुम,

-- शिवओम अम्बर
जब तक नंगे बदन बिहारी या गोपी मोहताज है,
तब तक कोई कैसे कह दे सचमुच हुआ सुराज है,
पर निराश होने की कोई बात नहीं है साथियो,
सदा नहीं रह सकती वैसी हालत जैसी आज है,

-- बलबीरसिंह रंग
यह भी कितना अजीब है,
कि उगाने वाले भूखे रहते है,
और अनाज पचा जाते है,
चूहे और बिस्तरों पर पड़े लोग,
बुनकर फटे चीथड़ों मे रहते हैं,
और अच्छे-अच्छे कपड़े पहनती हैं,
प्लास्टिक की मूर्तियाँ...(गोरख पाण्डे)

कोई हमको जगाओ नहीं, 
सोते से उठावो नहीं,
सुबह की नींद प्यारी लगे,

सुबह उठे से धन मिलता है,
धन मिलता,जीवन खिलता है,
ये सब कुछ है मुझको पता,
तू हाथ अपना पीछे हटा,
सुबा की नींद प्यारी लगै....

...समय वक्तव्य देने का नहीं भाई,
मुझे हर शब्द से गोली बनानी है,
परिश्रम से उगा कर खेत में सोना,
सिपाही के लिए बन्दूक लानी है,
मुझे फुरसत नहीं है मैं,
फसल को लहलहाकर देश की जय बोलता हूँ,....

पहन कपड़े विचारक के मधुर उपदेश देने की,
मुझे फुरसत नहीं,
मैं,
गली को जगमगा कर,
देश की जय बोलता हूँ,

-- रामावतार त्यागी
हमको गुजरी हुई सदियाँ तो न पहचानेंगी,
आने वाले किसी लम्हे को सदा दी जाए,
हमसे पूछो ग़ज़़ल क्या है,ग़ज़ल का फ़न क्या,
चन्द लफ़़्ज़ों में कोई आग छुपा ली जाए,

-- जाँनिसार अख्तर
ओ प्यारे दिलवर,चल आसमाँ पर,
हम इक बनाएंगे आशियाना,
न बिजलियों का,हो डर जहाँ पर,
न देख पाए हमें जमाना,

है प्यार जिस दिल में,उसका दुश्मन,
है ये जमाना, यक़ीन कर लो,
नहीं ये मुमकिन जमाना बदले,
यही मुनासिब,जमीन बदलो,

सुकरात ईसा जरथुष्ट गाँधी,
की एक जैसी, ही है कहानी,
वफा के बदले में बेवफाई,
है रीत सदियों, की ये पुरानी,

चल उस जहाँ में,कि जिसमें हरसू,
मोहब्बतों का, है बोलबाला,
नहीं है नफरत की रस्म कोई,
न कत्लो-खूँ का रिवाज़ काला,

पनाह पाए जहाँ मोहब्बत,
औ नफरतों का,उठे जनाज़ा,
भटक चुका है, बहुत ये दिल अब,
कसम है तुझको, करीब आ जा,

कहाँ पे हो खो गए, कहो क्या,
पसंद आया, मेरा कहा ना,
ओ प्यारे दिलवर,चल आसमाँ पर,
हम इक बनाएंगे आशियाना...
चाहा था बरस जाए जरा झूम के पानी,
सैलाब वो आया कि जिन्दगी बिखर गई,
प्रलय में खो गए अपने कहाँ,कोई बताए,
नहीं उठ पा रहे हैं सांत्वना को हाथ,- हाय,
न बस चल पा रहा है मौत के आगे किसी का,
हुआ गुम शब्द वो,धीरज बंधाए जो दुखी का,
कि मानव आज दुख में है, तड़पता है,
सिसक सुनकर चलें,आगे बढ़ें,
कि मिलकर पोंछ लें आँसू,उन्हें धीरज बँधाएं,
ये संकट की घड़ी है, आगे आएं,
ये संकट की घड़ी है, आगे आएं,
रात के राही थक मत जाना,सुबह की मंज़िल दूर नहीं,

धरती के फैले आँगन में,पल दो पल है रात का डेरा,
ज़ुल्म का सीना चीर के देखो,झाँक रहा है नया सवेरा,
ढलता दिन मजबूर सही,चढ़ता सूरज मजबूर नही,

सदियों तक चुप रहने वाले अब अपना हक लेके रहेंगे,
जो करना है खुल के करेंगे, जो कहना है साफ कहेंगे,
जीते जी घुट-घुट कर मरना,इस युग का दस्तूर नहीं

टूटेंगी बोझिल ज़ंजीरें, जागेंगी सोई तक़दीरें
लूट पे कब तक पहरा देंगी,जंग लगी खूनी शमशीरें,
रह नहीं सकता इस दुनिया में जो सबको मंजूर नहीं,
(साहिर)