Thursday, 17 September 2015

साहिर लुधियानवी के गीत आशावादी स्वर,भविष्य के सपने, बेहतर जीवन की प्रेरणा से भरपूर हैं। उनकी एक नज़्म 'आओ कि ख्बाब बुनें कल के वास्ते... उनके ऐसे विचार को ही प्रतिबिम्बित करती है। संघर्ष से टूटे दिलों में आशा और विश्वास की संजीवनी फूंकते हैं उनके गीत...
उन्होंने लिखा है --
'न मुंह छुपा के जिए और न सर झुका के जिए,
सितमग़रों की नज़र से नज़र मिला के जिए,
अब एक रात अग़र कम जिए तो कम ही सही,
यही बहुत है कि हम मशअलें जला के जिए,
उनका जीवन भी इस बात को प्रमाणित करता है, बात चाहे शब्दों की महत्ता को प्रतिस्थापित करने को लेकर एस. डी. बर्मन, ओ.पी. नैयर, लता मंगेशकर की नाराज़गी की रही हो या सरकार के कदमों के खिलाफ लिखने पर पाकिस्तान सरकार द्वारा उनके लिए वारंट निकलने की। वे हमेशा सच और न्याय के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं।
फिल्मों में अपने बिल्कुल शुरुआती दौर में "आजादी की राह पर" सन 1948 में लिखे गए उनके गीतों में से प्रस्तुत गीत है यह --
बदल रही है जिंदगी,
बदल रही है जिंदगी |
ये उजड़ी उजड़ी बस्तियां, ये लूट की निशानियाँ,
ये अजनबी पे अजनबी के ज़ुल्म की कहानियाँ,
अब इन दुखों के भार निकल रही है जिंदगी,
बदल रही है जिंदगी ।
जमीं पे सरसराहटें, फलक पे थरथराहटें,
फिजां में गूँजतीं है एक नए जहां की आहटें
मचल रही है जिंदगी, संवर रही है जिंदगी
बदल रही है जिंदगी ।
आजादी की राह पर' जो 1948 में रिलीज हुई थी,1947 में देश आजाद हुआ था यह उस दौर का लिखा फिल्म में उनके पहले गीतों में एक है। गुलामी के बोझ से कराहता देश आजाद होकर नई उमंग और उत्साह से उठ खड़े होने को तैयार था। उसके उन्हीं भावनाओं को प्रतिबिम्बित करतीं हैं ये पंक्तियाँ...

Saturday, 12 September 2015

क्या ग़म जो अँधेरी हैं रातें,
इक शमा-ए-तमन्ना साथ तो है
कुछ और सहारा हो के न हो,
हाथों में तुम्हारा हाथ तो है ।
क्या जानिए कितने दीवाने
घर फूंक तमाशा देख चुके
जिस प्यार की दुनिया दुश्मन है,
उस प्यार में कोई बात तो है ।
साहिर
यह जीवन तो ऐसे ही निकल जाएगा बाँटो या न बाँटो। मरते वक्त पाओगे कि जिसे बचाया वह जा रहा है।
काश! तुम इसका उपयोग कर लेते ओर बाँट देते और उसे पा लेते जो कभी नहीं जाता।
ओशो
"वो इतना कहते ही माँ के,
गले में झूल जाता है,
भला इतवार के दिन भी,
कोई स्कूल जाता है,...
उठें सूरज से पहले हम,
नमस्ते हम करें किसको,
दिसंबर में तो सूरज भी,
निकलना भूल जाता है,
बल्ली सिंह चीमा
अगर तुमने प्रेम को पकड़ बनाया,तुम्हारा प्रेम नष्ट हो जाएगा। तुमने जिसे प्रेम दिया उसे अगर तुमने स्वतंत्रता भी दी,दूर जाने की सुविधा भी दी, वह तुमसे कभी दूर न जा सकेगा। हमारी चेतना स्वतंत्रता चाहती है, जो बाँधता है उससे हम मुक्त होना चाहते हैं।
इसलिए अगर तुम सच में ही प्रेम करते हो तो स्वतंत्रता देना नहीं तो जिसे तुम प्रेम करोगे वही तुमसे दूर चला जाएगा।
ओशो
सानी नहीं प्यार की माँ के,
झूल रहे बच्चे,
देखो कितने प्यारे लगते,
हैं कितने अच्छे,
इन्हें ग़म नहीं जरा मौत का,
खौफ न चेहरों पर,
साध लिया संतुलन जिस तरह,
नईया लहरों पर,
रजनीकांत शुक्ल
मन हो हर्षित,तन हो प्रमुदित,
पुलकित वसुन्धरा,
जीवन का संतुलन साध लो,
सीखो इसे जरा,
बचपन का अभ्यास बनाता,
सोना तुम्हें खरा,
जो डर गया मौत से पहलेे,
समझो वही मरा,
"दे जो कोई ध्यान तो फिर,
राज़ ये जीवन का सीखे,
बात तो है एक ही पर,
सोचने के दो तरीके,
खाईयां हैं इसलिए ही तो,
हुआ पर्वत बड़ा है,
झूठ का अस्तित्व भी तो,
सत्य के ऊपर खड़ा है,
दो बड़ी रातों में नन्हीं दिन की,
एक लौ झिलमिलाती,
या बड़े दो हैं दिवस,
बस इक जरा सी रात आती,
ढ़ेर सारे दीर्घजीवी कंटकों,
के बीच खिलता,
देर तक जीवन जिए,
वरदान ये उसको न मिलता,
क्षणिक जीवन कुसुम का,
खिल सुबह मरता है उसी दिन,
छोड़ता पर छाप मन में,
याद आता है खुशी बन,
रजनीकात शुक्ल
भइया आज हमारा दिन है,
मै राखी बाधूँगी तुझको,
नन्ही बहना हूँ मैं तेरी,
भूल नहीं जाना तुम हमको,
लड़ते -भिड़ते हैं हम फिर भी,
इक दूजे को प्यारे हैं,
मम्मी और पापा दोनों की,
आँखों के हम तारे हैं,
बहन न तुझसे आज लडूँगा,
तेरी बातें मानूँगा,
पापा से पैसे लेकर मैं,
गिफ्ट तुझे दिलवा दूँगा,
होने दे तू बड़ा मुझे,
मैं ढ़ेरों नोट कमाऊँगा,
लेकिन अभी पकड़ चरखी,
मैं छत पर पतंग उडाऊँगा,
लोकतंत्र आया जंगल में,
नाखुश राजा रानी,
बकरी शेर पिएंगे दोनों,
एक घाट का पानी,
रहकर जल में बैर मगर से,
कैसे निभे बताओ,
सर्व समर्पण तुम्हें,
अगर खाना है हमको खाओ,
कुदरत के सब रंग निराले, गोरे हों या काले,
मन कहता तू मन के अंदर सारे रंग समा ले,
पत्ती हरी, पंख तितली के, लाल श्वेत या काले, 
देखे अगर दुखी मन, फैलें अंदर गहन उजाले,
लहर की मानिन्द चुप - चुप बह रही है चाँदनी,
ग़र सुने कुछ -कुछ यक़ीनन कह रही है चाँदनी,
रात आई, छोड़ कर सब चल दिए तनहा उसेे,
बेवफाई का सितम यूँ , सह रही है चाँदनी,
'देश के रत्नों से उनके नाम कामों से जड़ी,
इस तरह तुमने कभी देखी लिखी बाराखड़ी'
रजनीकांत शुक्ल
'क' से कुल दुनिया हमारी जिसमे भारत देश है
'ख' से खेती जिसमे जीवनदान का सन्देश है ।
'ग' से गंगा सबसे पहले,
आर्य उतरे थे जहाँ
'घ' से घर की आबरू,
रक्षक हैं जिसके नौजवां,
'च' से राजा चन्द्रगुप्त औ,
'छ' से उसका छत्र है
देश के इतिहास का वो युग,
सुनहरा पत्र है ।
क से कुल दुनिया हमारी जिसमे भारत देश है
ख से खेती जिसमे जीवनदान का सन्देश है ।
'ज' जलालुद्दीन अकबर जिसने,
सौ हीले किये,
हिन्दू मुस्लिम नस्ल और,
मजहब मिलाने के लिए,
'झ' से है झाँसी की रानी,
'ट' से टीपू सूरमा
जिसके जीते जी न सिक्का,
चल सका अंग्रेज़ का,
'ठ' से वो ठाकुर जिसे
टैगोर कहता है जहां
विश्व भर में उसकी रचनाओं से,
है भारत का मान ।
'क' से कुल दुनिया हमारी जिसमे भारत देश है
'ख' से खेती जिसमे जीवनदान का सन्देश है ।
'ड' से डल कश्मीर की,
जो हर नज़र का नूर है
'ढ' से ढाका जिसकी मलमल,
आज तक मशहूर है ।
'त' से ताज आगरे का,
इक अछूता शाहकार
शाहजहाँ की लाडली,
मुमताज़ बेगम का मजार
'द' से दिल्ली दिल वतन का,
'ध' से धड़कन प्यार की
'न' से नेहरु जिस पे हैं
नज़रें लगी संसार की,
'प' से उसका पंचशील
और 'फ' से उसका सुर्ख फूल
'ब' से बापू जिसको प्यारे ,
थे अहिंसा के उसूल
'भ' भगत सिंह जिसने ललकारा,
विदेशी राज को
चढ़ के फाँसी पर बचाया,
अपनी माँ की लाज को ।
'क' से कुल दुनिया हमारी जिसमे भारत देश है
'ख' से खेती जिसमे जीवनदान का सन्देश है ।
'म' से हो मजदूर जिसका,
दौर अब आने को है
'य' से युग सरमायादारी का,
जो मिट जाने को है
'र' से रास्ता प्यार का,
'ल' से लगन इन्साफ की
'व' से ऐसा वायुमंडल,
जिससे बरसे शांति
'श' से शाहों का जमाना,
'स' से समझो जा चुका
'ह' से हम सब से एक हों
वक्त ये फरमा चुका ।
'क' से कुल दुनिया हमारी जिसमे भारत देश है
'ख' से खेती जिसमे जीवनदान का सन्देश है ।
साहिर