Saturday, 12 September 2015

"दे जो कोई ध्यान तो फिर,
राज़ ये जीवन का सीखे,
बात तो है एक ही पर,
सोचने के दो तरीके,
खाईयां हैं इसलिए ही तो,
हुआ पर्वत बड़ा है,
झूठ का अस्तित्व भी तो,
सत्य के ऊपर खड़ा है,
दो बड़ी रातों में नन्हीं दिन की,
एक लौ झिलमिलाती,
या बड़े दो हैं दिवस,
बस इक जरा सी रात आती,
ढ़ेर सारे दीर्घजीवी कंटकों,
के बीच खिलता,
देर तक जीवन जिए,
वरदान ये उसको न मिलता,
क्षणिक जीवन कुसुम का,
खिल सुबह मरता है उसी दिन,
छोड़ता पर छाप मन में,
याद आता है खुशी बन,
रजनीकात शुक्ल

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