Sunday, 26 February 2017

उत्साही हर पल, जो कह दो, करने को तैयार,
नहीं किसी से कोई दुश्मनी, हैं जो सबके यार,
जन्मदिवस के इस अवसर पर हम सब है तैयार,
भर लो जितनी चाहो झोली, सभी लुटाते प्यार,
एक दो तीन चार,
पढ़े लिखे सारा परिवार,
इस युग का कहना,
अनपढ़ न रहना,
मुशकिल है जी वन,
कैसे चले ए टी एम,
पढ़ेंगे जब हम,
निकलेगा तब धन,
आओ साथ-साथ चलें,
कदम-कदम आगे बढ़े,
सागर में तैरें और,
पर्वत की चोटी चढ़ें,
शिक्षित हों सारे जने,
खुशदिल परिवार बने,
सारे मिल साथ चलें,
सुखमय संसार बने,
घूम-घूम कर देख रहे हैं ,
मेले को बच्चे,
संग किताबों के ये,
लगते हैं कितने अच्छे,
दोस्त किताबें सबसे अच्छीं,
सभी बताते हैं,
अगर पढोगे तभी बढोगे,
सब समझाते हैं,
मानी बात बडों की,
आया मज़ा बड़ा हमको,
चेहरे देख बताओ,
कैसा लगता है तुमको,
अपनी मट्टी की खुशबू सै,
भीजै तन मन सारो,
घाट घाट को पानी पी लेेव,
घर को पानी प्यारो,
अम्मा को बोली मै बोलैं,
जाको सुख है न्यारो,
जब जब बोलैं तब तब फैलै,
घर आँगन उजियारो,
करता हूँ मैं सलाम मादरी जुबान को,
जिसमें पुकारा सबसे पहले माँ के नाम को,
बहती है जिसमें दरिया की मानिंद मेरी सोच,
खुशदिल बनाया जिसने मेरी सुबह शाम को,
कल पुस्तक मेले में हम थे,
पुस्तक थीं और बच्चे थे,
दोस्त दोस्तों के संग संग थे,
वे क्षण कितने अच्छे थे,
वादा है यह अपना खुद से,
आगे भी हम संग रहें,
मजे करें, बातें आपस में,
मिलें जुलें ना बंद रहें,
पढने का आनंद भला,
ना पढने वाले क्या जाने,
जिनका दिल खुश हुआ,
वही तो मोल इन्ही का पहचाने,
वर्ष महीने हफ्ते दिन,
आते ही हैं सुबहो-शाम,
सूरज चन्दा तारे पृथ्वी,
करते कब आराम,
कितने प्राणी जन्में जग में
रह जाते गुमनाम,
नहीं वक्त का पता ठिकाना,
कर दे कब वीरान,
जीते जी जग में कर जाएँ,
हम ऐसे कुछ काम,
मरने के भी बाद हमारा,
याद रखें सब नाम,
कूड़ा-कूड़ा घर दरवाजा,
कचरा कचरा गली मुहल्ला,
फिर भी आप और हम बैठे,
बिलकुल खाली बने निठल्ला,
दोष देखते हैं औरों में,
खुद की ओर नज़र दौड़ाएं,
सारा देश हमारा मंदिर,
आओ सुंदर इसे बनाएं,

Tuesday, 7 February 2017

आई पुस्तक एक नवीन,
'हँसते गाते नाटक तीन'
इसे पढ़ो और हँसो हँसाओ,
स्वस्थ रहो और स्वास्थ बनाओ,
चाहो मिलकर इसको खेलो,
मन जो चाहे पात्र, उसे लो,
और बनाओ रोचक सीन,
'हँसते गाते नाटक तीन,'
इसमें साथ कहानी कविता,
चुन्नू - मुन्नू हो या बबिता,
सारे मिल खेले ये खेल,
झगड़ा करें न करें झमेल,
लो जब मन हो जरा मलीन,
'हँसते गाते नाटक तीन',
जीवन में तनाव को भूलें,
सहज उड़़ें और नभ को छू लें,
प्यार बढ़ाएं हँसें हँसाएं,
जीवन को खुशनुमा बनाएं,
सीख ये देते बेहतरीन,
'हँसते गाते नाटक तीन',
जिसे दुश्मन समझता हूँ वही अपना निकलता है
हर इक पत्थर से मेरे सर का कुछ रिश्ता निकलता है
डरा - धमका के तुम हमसे वफ़ा करने को कहते हो
कहीं तलवार से भी पांव का काँटा निकलता है
ज़रा -सा झुटपुटा होते ही छुप जाता है सूरज भी
मगर एक चाँद है जो शब् में भी तनहा निकलता है
फ़ज़ा में घोल दी हैं नफरतें अहले सियासत ने
मगर पानी कुएँ से आज तक मीठा निकलता है
दुआएँ माँ की , पहुँचाने को मीलों मील जाती हैं
कि जब परदेश जाने के लिए बेटा निकलता है
मुन्नवर राना
दिल कहे रुक जा रे रुक जा,
यहीं पे कहीं,
जो बात,जो बात इस जगह है,
वो कहीं पे नहीं,
दिल कहे रुक जा रे रुक जा,
पर्वत ऊपर खिड़की खोले,
झाँके सुन्दर भोर,
चले पवन सुहानी,
नदियों के ये राग रसीले,
झरनों का ये शोर,
बहे झर-झर पानी,
मद-भरा मद-भरा समां,
वन धुला-धुला,
हर कली रस पली यहाँ,
रस घुला-घुला,
तो दिल कहे रुक जा रे रुक जा,
यहीं पे कहीं,
जो बात जो बात इस जगह है
वो कहीं पे नहीं,
नीली-नीली झील में झलके,
नील गगन का रूप,
बहें रंग के धारे,
ऊँचे-ऊँचे पेंड़ घनेरे,
छनती जिनसे धूप,
खड़े बाँह पसारे,
चम्पई-चम्पई फिज़ा ,
दिन खिला-खिला,
डाली-डाली चिड़ियों की सदा,
सुर मिला-मिला,
तो दिल कहे रुक जा रे रुक जा,
यहीं पे कहीं,
जो बात जो बात इस जगह है
कहीं पर नहीं,
परियों के ये जमघट जिनके,
फूलों जैसे गाल,
सभी शोख हठीली,
इनमें है वो अल्हड़,
जिसकी हिरनी जैसी चाल,
बड़ी छैल-छबीली,
मनचली-मनचली अदा,
छवि जवाँ-जवाँ,
हर घड़ी चढ़ रहा नशा,
सुध रही कहाँ,
तो दिल कहे रुक जा रे रुक जा,
यहीं पे कहीं,
जो बात जो बात इस जगह है
कहीं पर नहीं,
एक वर्ष और गया,
गाँठ से,
बताता है,
समय का पहिया,
जिसे कि तुम,
सुनना मत,
पुनर्मूल्यांकन कर,
बीते समय का,
पुनः,
लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में,
सउत्साह,
होना रत,
बीता सो रीत गया,
आएगा वह लाएगा,
रस की हर बूँद,
आप उसकी पी जाईये,
वर्तमान का हर एक क्षण है,
मादक सुरा सा,
जीवन की प्यास,
इस उल्लास से बुझाईये,
आपकी शुभकामनाओं से,
मुझे संबल मिला है,
इसलिए उपलब्धियों में,
श्रेय भी तो आपका है,
प्राप्ति हर,देती निराशा,
कामना उत्साह भरती,
नित नए पल्लव सजाती,
उर्वरा मन की ये धरती,
आइए हम नयी सुबह के,
नए सपने सजाएं,
नित बदलते इस जहाँ को,
और कुछ बेहतर बनाएं,
फर फर फर फर फर फर फर फर,
हवा घुसी बैलून में,
सर सर सर सर सर सर सर सर,
सरदी घुस गई ऊन में,
खर खर खर खर चरखा काते,
बुढ़िया बैठी मून में,
टप टप टप टप टप टप टप टप,
बारिश बरसी जून में,
गुर्र गुर्र गर गुर्र गुर्र गर,
कितनी गरमी खून में,
ट्रिन ट्रिन ट्रिन ट्रिन ट्रिन ट्रिन ट्रिन ट्रिन,
घंटी टेलीफून में,
पूछो हमसे कितनी ताकत,
चटनी रोटी नून में,
जाना था रंगून,
पहुँच गए, हम तो देहरादून में,
कुछ ऐसी बहारें आईं हैं,
बदली है फ़िजा इस गुलशन की,
दुनियाँ में खुशी छाई है पर, 
दिल को है वहम मालूम नहीं,
उम्मीद से भी आगे बढ़कर,
कुछ ख्वाब सजाए बैठे हम,
भटके जो कदम टूटा जो भरम,
होंगे कहाँ हम मालूम नहीं,
सूनी है नज़र रस्ता वीराँ,
मंज़िल के पते का इल्म नहीं,
बढ़ते हैं कदम आगे-आगे,
कैसी है लगन मालूम नहीं,
तकते रहे मकान और गोदाम में कंबल,
बाहर खुले में ठिठुर के इंसान मर गए,
 तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है
उधर जम्हूरियत का ढोल पीते जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी है
लगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है
तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है
अदम गोंडवी
नज़र से दिल में समानेवाले
मेरी मोहब्बत तेरे लिए है,
वफ़ा की दुनिया में आनेवाले,
वफ़ा की दौलत तेरे लिए है,
खड़ी हूँ मैं, तेरे रास्ते में,
जवां उम्मीदों, के फूल लेकर,
महकती जुल्फ़ों,बहकती नज़रों,
की गर्म जन्नत,तेरे लिए है,
सिवा तेरी आरजू के, इस दिल में
कोई आरजू नहीं है,
हर एक जज़्बा,हर एक धड़कन,
हर एक हसरत,तेरे लिए है,
मेरे खयालों के नर्म परदों
में झाँककर मुस्कराने वाले,
हज़ार ख्वाबों,से जो सजी है,
वो एक हक़ीकत,तेरे लिए है
टूटे अज्ञानों की कारा,
असहायों को मिले सहारा,
सबल पाएं सद्ज्ञान खुदारा,
अमर रहे गणतंत्र हमारा,
राज़ है यही जिसे,जिन्दगी में ढ़ाल लें,
जो हमें सुखी करे,बस वही खयाल लें,
आएगा इसी से दम,
जिन्दगी की राह में,ख्वाब जो तूने बुने,
दे आवाज़ इस तरह कि हर कोई उसे सुने,
साथ चल कदम-कदम,
कोड़ा जमाल शाही,
पीछे देखा मार खाई,
घूम -घूम दौड़-दौड़,
पीछे कहीं कोड़ा छोड़,
भागना-भगाना है,
पकड़ा ना जाना है,
दौड़ो और दौड़ो भाई,
देना है नहीं छुआई,
कोड़ा जमाल शाही,
पीछे देखा मार खाई,
गोल-गोल घेरा है,
तेरा है ना मेरा है,
जो कोई बताएगा,
वही मार खाएगा,
बच पाओ बचो भाई,
पीठ पीछे आफत आई,
कोड़ा जमाल शाही,
पीछे देखा मार खाई,
छब्बीस जनवरी
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साहिर ने यह नज़्म बरसोंबरस पहले लिखी थी। देखें उन्होंने जो प्रश्न उठाए थे क्या वे आज भी प्रासंगिक नहीं हैं?
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आओ कि आज गौर करें, इस सवाल पर,
देखे थे हमने जो, वो हसीं ख्वाब क्या हुए,
दौलत बढ़ी तो मुल्क में, इफ़्लास(दरिद्रता) क्यों बढ़ा,
खुशहालिए-अवाम के असबाब(संसाधन) क्या हुए,
जो अपने साथ-साथ चले कूए दार(फाँसी की कोठरी) तक,
वह दोस्त वह रफीक वो अहबाब(साथी)क्या हुए,
क्या मोल लग रहा है शहीदों के खून का,
मरते थे जिनपे हम वो सजायाब(दण्ड)क्या हुए,
बेकस बरहनगी (विवश नग्नता)को कफ़न तक नहीं नसीब,
वो वादा- हाए-अतलसो कमख्वाब(बहुमूल्य बस्त्रो के वादे)क्या हुए,
जमहूरियत नवाज़, बशर दोस्त, अम्न ख्वाह,
खुद को जो खुद दिए थे,वो अल्क़ाब (उपाधियाँ)क्या हुए,
मज़हब का रोग आज भी क्यों लाइलाज है,
वह नुस्खा हाए नादिरो-नायाब क्या हुए,
हर कूचा शोलाज़ार है,हर शहर कत्लगाह,
यकजहतिए-हयात के आदाब क्या हुए,
सहरा-ए-तीरगी(अंधे मरुस्थल) में भटकती है जिंदगी ,
उभरे थे जो उफ़क(क्षितिज)पे जो महताब(चाँद)क्या हुए,
मुजरिम हूँ अगर मैं तो गुनहगार तुम भी हो,
ऐ रहबरान-ए-कौम(देश के नेताओं) खताकार तुम भी हो,
तुम्हारी नज़र क्यों खफ़ा हो गई,
खता बख्श दो ग़र खता हो गई,
हमारा इरादा तो कुछ भी न था,
तुम्हारी खता खुद सजा हो गई
सज़ा ही सही आज कुछ तो मिला है,
सज़ा में भी एक प्यार का सिलसिला है,
मोहब्बत का अब कुछ भी अंज़ाम हो,
मुलाकात की इब्दता हो गई,
मुलाकात पर इतने मगरूर क्यों हो,
हमारी खुशामद पे मजबूर क्यों हो,
मनाने की आदत कहाँ पड़ गई,
सताने की तालीम क्या हो गई,
सताते न हम तो मनाते ही कैसे,
तुम्हें अपने नज़दीक लाते ही कैसे,
इसी दिन का चाहत को अरमान था,
कबूल आज दिल की दुआ हो गई,
ये हुस्न तेरा ये इश्क़ मेरा
रंगीन तो है बदनाम सही
मुझ पर तो कई इल्ज़ाम लगे
तुझ पर भी कोई इल्ज़ाम सही
इस रात की निखरी रंगत को
कुछ और निखर जाने दे ज़रा
नज़रों को बहक जाने दे ज़रा
ज़ुल्फ़ों को बिखर जाने दे ज़रा
कुछ देर की ही तस्कीन सही
कुछ देर का ही आराम सही
जज़्बात की कलियाँ चुनना है
और प्यार का तोहफ़ा देना है
लोगों की निगाहें कुछ भी कहें
लोगों से हमें क्या लेना है
ये ख़ास त'अल्लुक़ आपस का
दुनिया की नज़र में आम सही
रुसवाई के डर से घबरा कर
हम तर्क-ए-वफ़ा कब करते हैं
जिस दिल को बसा लें पहलू में
उस दिल को जुदा कब करते हैं
जो हश्र हुआ है लाखों का
अपना भी वही अंजाम सही
ये हुस्न तेरा ये इश्क़ मेरा
रंगीन तो है बदनाम सही
मुझ पर तो कई इल्ज़ाम लगे
तुझ पर भी कोई इल्ज़ाम सही
अब न कर विलम्ब अम्ब,
कंठ में विराज आज,
साज ले सितार,
तार-तार झनकार दे,
प्यार दे पुकार पर,
गुहार पर सँभार स्वर,
जीभ पर सजीव,
शब्द-शब्द रस धार दे,
भाव दे प्रभाव दे,
स्वभाव दे कि काव्य भव्य,
भावना भरी हुई,
विभावना विहार दे,
मातु मैं कहूँ तो सत्य,
सत्य में शिवत्व तत्व,
तत्व में सदैव अभय,
सुंदरतम साज दे,
अब न कर विलंब अम्ब,
कंठ में विराज आज,
साज ले सितार,
तार-तार झनकार दे,
********************
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला
या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा
या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकर
प्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती
भगवती निःशेषजाड्यापहा।।
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
माँ तुम्हीं कहो कि,
किस तरह तुम्हें पुकार लें,
प्रत्यक्ष लक्ष के समक्ष,
आरती उतार लें,
तेरे पाद पंकजों का,
पंकजों के भी रजों का,
कोटि-कोटि बार-बार,
प्रेम से पुकार लें,
तुम्हारे ज्ञान पुञ्ज को,
विवेक के निकुञ्ज को
दया करो हे देवि हम,
कर तो नमस्कार लें,
माँ तुम्हीं कहो कि....
कहीं यादें पुरानी हैं,
कहीं फोटो पुरानी है,
नई हरपल नई हरदम, 
हमारी जिन्दगानी है,
वो जो क्षण जी रहे है हम,
वही तो है मेरा जीवन,
जो गुजरा था भला या कि बुरा,
वो सब कहानी है,
प्रतिपल मदमाती प्यास रहे,
हमसे लोगों की आस रहे,
जब तक साँसों में साँस रहे,
हो जुड़ा यही विश्वास रहे,
रोना या हँसना रहे खरा,
जीवन में रहे बसंत भरा,
वृक्षों पर मंजरियाँ झूलें,
अरमान उछल नभ को छू लें,
ग़म सारी दुनियाँ के भूलें,
खिल-खिला उठें कलियाँ फूलें,
हो पुलकित सारी वसुन्धरा,
जीवन में रहे बसंत भरा,
माँ तेरी वीणा के तारों की सुमधुर धुन,
सुनकर और गुनकर मैं जग को समझा पाऊँ,
बुद्धि दे हर स्वर के अंतर को पहचानूँ,
वीणा की पीड़ा को गीतों में गा पाऊँ,
'सा'गर में छुपी हुई उन अशान्त लहरों को,
'रे'ती में गहरे जो दबे, ज्वलित ईंधन को,
'गा'फिल हैं जो कल से ऐसे अनजानों को,
'मा'सूमी के क़ातिल, रंघ्रहीन कानों को,
'पा'ञ्चजन्य का स्वर दूँ, ऐसी तू शक्ति दे,
'धा'रण करने में होऊँ समर्थ भक्ति दे,
'नी'रव इस संध्या के अंतर का कोलाहल,
'सा'नुरोध व्यक्त करूँ, नेह शक्ति पा जाऊँ,
माँ तेरी वीणा के तारों की सुमधुर धुन,
सुनकर और गुनकर मैं जग को समझा पाऊँ,
यह सोच न लेना कल को दूसरे पहनूँगा,
फैशन के तहत नहीं ओढ़े मैंने विचार,
रग-रग में लहू उबलता, आग मचलती है,
जब कभी सुनाई देती है, शोषित पुकार,
ज्यों चुभे दंश, अनुभूति न सोने देती है,
चाँदनी रात में सौ-सौ ज्वार उठाती है,
तनहाई का यह जहर चाटता है मन को,
मत पूछ, अकेलेपन की पीड़ा, खाती है,
हम ग़मज़दा हैं, लाएं कहां से खुशी के गीत,
देंगे वही जो पाएंगे, इस जिंदगी से हम,
है आज नहीं कुछ हाथों में,
अपने भी नहीं तो ग़म क्यों हो, 

सूरज भी नहीं,चंदा भी नहीं,
तारे भी नहीं,जुगनू भी नहीं,
हम दूत उजाले के,किरनें बन,
अपनी डगर चमकाएंगे,


बादल भी नहीं,सागर भी नहीं,
नदिया भी नहीं,पोखर भी नहीं,
हम बूँद उम्मीद की,पत्तों पर,
मोती सा बिखरता जाएंगे,


तूफां भी नहीं,आंधी भी नहीं,
लूका भी नहीं,झोंका भी नहीं,
हम सांस की चलती डोरी हैं,
मंज़िल पे सफर ले जाएंगे,


है पास नहीं,कुछ परवा नहीं,
अपने भी नहीं तो क्यों ग़म हो,
हिम्मत से जो पत्थर जोड़े हैं,
हम उनसे राह बनाएंगे,