Tuesday, 11 October 2016

घाघ कवि (संवत-1750)
उधरा काढ़ि व्योहार चलावै,
छ्प्पर डारै तारो,
सारे के संग बहन पठावै,
तीनौं को मुँह कारो,
-----------------------
लम्बी पूँछ और ऐंठा कान,
सही बैल की है पहचान,
-----------------------
दिन में गरमी रात में ओस,
कहैं घाघ वरषा सौ कोस,
-----------------------
लाल पियर जब होय अकाशा,
तब नाहीं वरषा की आशा,
-----------------------
ढ़ेले ऊपर चील जो बोलै,
गली-गली में पानी डोलै,
----------------------
हँसुआ ठाकुर खसुआ चोर,
इन ससुरन को गहरे बोर,
---------------------
आलस नींद किसानै नासै,
चोरै नासै खाँसी,
---------------------
चढ़त जो बरसै चित्रा,
उतरत बरसै हस्त,
कितनै राजा डॉड़ ले,
हारै नहीं गृहस्त,
--------------------
प्रातकाल खटिया सै उठि के,
पियै तुरन्तै पानी,
ता घर वैद कबहुँ नहिं आवै,
बात घाघ की जानी,
-------------------------------------👍
अपनी खुद तस्वीर बनाओ
-------------------------------👌
रखो आईना खुद के आगे,
देखो सोचो और बताओ,
अपनी खुद तस्वीर बनाओ,
कोई उपेक्षा करे अगर तो,
क्यों ये मन गुमसुम रहता है,
करें सलाम अगर बहुतेरे,
खुशियों का दरिया बहता है,
खुद की कभी पीठ ठोंकी क्या,
खुद को गाली कभी निकाली,
या औरों की नज़रों वाली ही,
मन में तस्वीर बना ली,
औरों की नज़रों में क्या हो,
बस इस पर ही मत इतराओ,
अपनी खुद तस्वीर बनाओ,
लालमण पाण्डे,प्रमोद
(संवत1911-1960)
रचना--प्रमोद प्रकाश)
प्रकाशित-1966
मन तौ उरझो उनपै सजनी ,
तनु तीर तुम्हारे भले हम लाईं,
हमरी रसना की कहा गति है,
जो कहै उनकी छवि की परछाईं,
चलि देखौ प्रमोद कहे न बने,
सुधि भूलि हौ देखत ही उन धाई,
जनु ब्रह्म सिंगार दुऔ अवतार,
धरे नर देह फिरै यहि ठाई,
जिन पर कोई भी गर्व कर सकता है 👌
--------------------------------------------
कोई भी कवि या रचनाकार जीवन में कितना ही क्यों न लिख ले उसकी साध रहती है कि उसका लिखा लोगों की जुबान पर चढ़ जाए। चाहे वो दो ही पंक्तियां क्यों न हों। इसे एक दृष्टि में मरने के बाद भी न मरना कह सकते हैं।
इस मायने में छिबरामऊ के कवि नेहजी की दो पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं। इन्होंने निमंत्रण पत्र के माध्यम से तोे न जाने कहाँ- कहाँ की सैर की ही और न जाने कितने लोगों की भावनाओं का स्वर बनी। लोकजीवन की कई पीढ़ियों की जुबान पर राज करती रहीं जानकर नई पीढ़ी आश्चर्य और रश्क़ कर सकती है लेकिन जो पीढ़ी इन पंक्तियों की धूम की साक्षी रही है वो आज भी हमारे बीच मौजूद है । प्रस्तुत है वे पंक्तियाँ -
भेज रहा हूँ नेह निमंत्रण,
प्रियवर तुम्हें बुलाने को,
हे मानस के राजहंस तुम,
भूल न जाना आने को,
गदाधरराय नवीन
(संवत-1776-1836)
.............................
पवित्र कुरान का कविता में अनुवाद किया,
दिल्ली दरबार में लार्ड हार्डिग्ज को कविता सुनाई।
--------
डमरु विशाल कर,नाचत विनोद युत,
लाल -लाल नैन काहू ध्यान में सुलीन हैं,
अति विषयारे कारे-कारे अहि तीन धारे,
झुकि-झुकि झूमि-झूमि डोलत गलीन हैं,
विमल विचित्र गंगधार है जटान मध्य,
माथे पै विराजत मयंक समीचीन है,
एहो ब्रजरानी ब्रजराज को दिखावो आनि,
ब्रज में सुआयों आज जटिल नवीन है,
-----------------------------------------
जाके रूपरेख न अनिच्छ अद्वतीय अज,
श्रुति स्मृति हु नेति-नेति करि गावती,
अच्युत अनंत अविकारी अविनाशी ताहि, 
देखि अनमनो सब देवन मनावती,
तारी को लगैया त्रिपुरारी हू न पावैं ताहि,
दै- दै करतारी वै नवीन दुलरावती,
जगत अपार की रमैया शेष-शय्या ताकी,
लेकर बलैया मैया पालन झुलावती,👍
ईश्वरी कवि
(संवत -अज्ञात)
सूनो घर पायो दौरि आई लहकान लगी,
पायो लै भाजि गई फेरि न दिखाती हो,
औती घरु फांदि तुम डराती हौ नेक नहिं,
खावौ फैलावौ भड़फोरु कर जाती हो,
कहत कवि गोपी बिन छेड़े न छेड़ी कोई,
 लट्ठ लै खीसैं काढ़ि बहुत ही खिसियाती हो,
ऐसो घर ध्यान कवि कहत राय ईश्वरी,
एक दाँय काट चुकी फेरि गुर्राती हो,
शिवचरण लाल शुक्ल 'शम्भू पद'
(1900-1960)
ज्यों त्यों रह्यों अब लौं जिय तू,
अब आओ वसन्त कछू ना बिसैहै,
शम्भू सुगंधित शीतल मन्द,
समीरन पीर गम्भीर उठैहै,
क्यों ठहरैगो करै गो कहा,
जब कोकिल कूक के हूक सुनैहै,
और न तेरी चलैगी कछू बस,
संग कुहू के तुहू कढ़ि जैहै,
शिवचरनलाल शुक्ल शम्भूपद
(1900-1960)

आजु मैं गई ती शम्भु न्योते नन्द गाँव तहाँ,
सांसत बड़ी रूपवती वनितान की,
घेरि लीन्हो सखिन तमासो करि मेरो मोहि, 
गहि-गहि गुलुफ लुनाई तरवान की,
औरै बलि बोलि-बोलि औरनि दिखावै रीझि,
रीझ सुघराई औ ललाई मेरे पान की,
घूँघट उघारि मुख देखि-देखि एकै रहै,
 एकै लगी नापन बड़ाई अँखियान की,


रामनारायण द्विवेदी रमेश
(1932-1992 विक्रमी)
.........................................................................
आलस त्यागि करौ पुरुषारथ,
ताते यथारत काज फुरैंगे,
उद्यम और उपाय करौ
तब आपुहि देश के दुख टरैगे,
आकरी चाकरी में न चले
इमि दास बने नहि पेट भरैंगे,
भारत भूमि के भाग जगैंगे,
रमेश जू वे दिन फेर फिरैंगे,
...............................................................................
आरत भारत गारत ह्वै रह्यो,
जाने कहा दिन खोटे करैंगे,
काल के गाल के ग्रास भये,
बहु देखे अकाल में केते मरेंगे,
कौलौं रमेश कलेश में देश के वासी
अंदेश के पाले परैंगे,
ह्वैहै कहा अब हे मेरे राम
कहौ कब वे दिन फेरि फिरैंगे,
...............................................................................


रामनारायण जी द्विवेदी रमेश 
(1932-1992 वि.)
विलेलेले
केतिक कराल कलिकाल की कठोर कला,
काम क्रोध कपट कुकर्म कुटिलाई है,
कहै कहा कोऊ कछु करनी कुलीनन की,
करत कुकर्म कहै कर्म ही कराई है,
कोविद रमेश कहूँ किंचित कुशल कैसी,
कामनी कनक कोटि कामना कराई है,
काटिए कलेश कारुणीक कमला के कंत,
करौगे कृपा तौ कहौ कौन कठिनाई है,
.............................................
अरुण अनार ऐसी एड़ी अवलोकत ही,
ललकतु नीकी भाँति पावत अनन्द है,
जगमग ज्योति नख-नख पै नखत बृंद,
कोटिचन्द्र वारौं शोभा ललित अमंद की,
पगतल पावन प्रभाव प्रभु ताके पुन्ज,
प्रात के प्रभाकर ते लालिमा दुचन्द हैं,
पद अरविन्द पै रमेश रामचन्द्रजू के,
मन मतवारो मेरो मंजुल मयन्द है,
.........................................
जनकसुता के पति ताके जिन ताके पति,
सविताके कुल के पताके प्रभुता के हैं,
हरन धरा के भार कृपा के अगार विभु
वीर विरदैत बाँके विदित सदा के है,
धन्य ध्यान जाके परि पाके मुनि वृन्द औ 
अनन्द मद छाके जाके पति गिरजा के हैं,
पूरण कला के कमला के कंत हैं रमेश, 
तारन शिला के ये कुमार कौसला के हैं,
.............................................👌

Friday, 7 October 2016

कुदरत हमें बचाती हरदम,
इसको हमें बचाना है,
अपनी रग-रग में साँसों में,
इसका आना जाना है,
हम इसके काम आएं न आएं,
पर इसको काम आना है,
इसकी हर शय अपनी खातिर,
इक अनमोल खज़ाना है,
कभी कभी मन करता मेरा,
मैं ऐसा बन जाऊँ,
खुली हवा में घूमूं ,
मस्ती करूँ उमंग बढाऊँ,
काश कोई ऐसे में साथी,
आए, हो अलबेला,
उसमें डूबूँ , मुझे डुबो ले ,
मैं न रहूँ अकेला,
जग में कोई चीज भी,
कब होती बेकार,
दृष्टि चाहिए दे सकें,
हम उसको आकार,
हम उसको आकार,
सृजन के विचारों से,
बना टोकरीं लीं ये ,
रद्दी अखबारों से,
सोच सही जो,
नहीं कोई कठिनाई मग में,
कचरा भी कर सके
उजाला, सारे जग में,
कितनी सुंदर दुनिया अपनी,
सागर पर्वत सारे,
सन-सन पवन चले मदमाती, 
हँसते छल-छल धारे,
खुशकिस्मत हम पैदा हो जो,
आए इस धरती पर,
तरह-तरह के जीव-जन्तुओं सहित,
हमारा ये घर,
प्रेम लुटाए हाथ बढ़ाए,
साथ रहें मिलजुलकर,
बाहर जो भी दर्शन है,
अंदर का ही दर्पन है,
देते हम जो दुनिया को,
वापस हमको अर्पन है,
आओ ये संकल्प धरें,
मन को मैला नहीं करें,
रंग बिरंगे ये गुब्बारे,
कितने अच्छे कितने प्यारे,
इन्द्रधनुष से रंगरंगीले,
लाल हरे नीले और पीले,
देखूँ तो मन खुश हो जाए,
हाथों में लूँ मन ललचाए,
लगे हाथ ऊपर को जाए,
संग-संग उछलूँ जी में आए,
हुआ जन्मदिन पापा लाए,
संग दोस्त हम सब हर्षाए,
कटा केक तब फोड़े सारे,
रंग बिरंगे ये गुब्बारे,
सागर से उड़ आएं,नभ के आँगन,
बादल से बरसें हम,बूँदों सा छम्म,
मन में हो कैसी भी कोई उलझन,
फूलों पे मुसकाएँ,शबनम से हम,
फौलादी सीने हैं दिल में सरगम,
मरने से पहले, क्यों मर जाएँ हम,
रस्ता न सूझे हो ऐसा विजन,
तब आएँ ले के हम रिमझिम सावन,
खुश क्यों हैं मत पूछो क्या हैं जी हम,
थिरके तन गाए मन ऐसी रिदम,
सतरह से ज्यादा न बारह से कम,
राजा अपने मन के हम हैं जी हम,
पाकिस्तानी कवयित्री फहमीदा रियाज की कविता...
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
**********************
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
अब तक कहां छुपे थे भाई?
वह मूरखता, वह घामड़पन
जिसमें हमने सदी गंवाई
आखिर पहुंची द्वार तुम्हारे
अरे बधाई, बहुत बधाई
भूत धरम का नाच रहा है
कायम हिन्दू राज करोगे?
सारे उल्टे काज करोगे?
अपना चमन नाराज करोगे?
तुम भी बैठे करोगे सोचा,
पूरी है वैसी तैयारी,
कौन है हिन्दू कौन नहीं है
तुम भी करोगे फतवे जारी
वहां भी मुश्किल होगा जीना
दांतो आ जाएगा पसीना
जैसे-तैसे कटा करेगी
वहां भी सबकी सांस घुटेगी
माथे पर सिंदूर की रेखा
कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा!
क्या हमने दुर्दशा बनायी
कुछ भी तुमको नज़र न आयी?
भाड़ में जाये शिक्षा-विक्षा,
अब जाहिलपन के गुन गाना,
आगे गड्ढा है यह मत देखो
वापस लाओ गया जमाना
हम जिन पर रोया करते थे
तुम ने भी वह बात अब की है
बहुत मलाल है हमको, लेकिन
हा हा हा हा हो हो ही ही
कल दुख से सोचा करती थी
सोच के बहुत हँसी आज आयी
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
हम दो कौम नहीं थे भाई
मश्क करो तुम, आ जाएगा
उल्टे पांवों चलते जाना,
दूजा ध्यान न मन में आए
बस पीछे ही नज़र जमाना
एक जाप-सा करते जाओ,
बारम्बार यह ही दोहराओ
कितना वीर महान था भारत!
कैसा आलीशान था भारत!
फिर तुम लोग पहुंच जाओगे
बस परलोक पहुंच जाओगे!
हम तो हैं पहले से वहां पर,
तुम भी समय निकालते रहना,
अब जिस नरक में जाओ, वहां से
चिट्ठी-विट्ठी डालते रहना!