Saturday, 8 June 2013

सुनते थे हम शहर में, कोई शोर उठा है,
घर अपना ही जला था नहीं कुछ खबर हुई,
वो डूबती तमन्ना हाय तड़पती उम्मीद,
तेरी रहगुजर को देख के पत्थर नज़र हुई,
ख़्वाहिश थी बरस जाय जरा झूम के पानी,
सैलाब वो आया कि जिन्दगी उजड़ गई,
सुनते थे कि खुश्बू के चमन हैं कई यहाँ,
सहरा ही नज़र आया जहाँ तक नज़र गई,
मायूसियों के साये में डूबे कुछ इस तरह,
तफ़रीक न कर पाया दिल कब शब सहर हुई,
दिल में बना रखी थी इक तस्वीर जो हमने,
जब रूबरू हुए तो, नज़र ही बदल गई
मंज़ूर नहीं दिल को तेरे फैसले हुए,
कहते ये वरना हम भी कि किस्मत सँवर गई,
दीवारों का जंगल, जिसका आबादी है नाम,
बाहर से चुप चुप लगता है, अंदर है कोहराम,
दर्द न बांटे प्यार न समझें, इस बस्ती के लोग,
अपना अपना सुख है सबका, अपना अपना सोग, (साहिर)
जहाँ सच न चले, वहाँ झूट सही,
जहाँ हक़़ न मिले, वहाँ लूट सही,
यहाँ चोर हैं सब कोई साध नहीं,
सुख ढ़ूँढ़ ले, सुख अपराध नहीं,
प्यारे तू ग़म न कर,क्योंकि-
जिन्दगी,हँसने गाने के लिए है,
इसे खोना नहीं,खो के रोना नहीं,

तेरे गिरने मे भी तेरी हार नहीं,
कि तू आदमी है अवतार नहीं,
जो हो देश वो भेष बना प्यारे,
चले जैसे भी काम चला प्यारे,
प्यारे तू ग़म न कर,क्योंकि-
जिन्दगी हँसने गाने के लिए है
पल दो पल,इसे खोना नहीं....(साहिर)
ये दुनियाँ दोरंगी है---
एक तरफ से रेशम ओढ़े,एक तरफ से नंगी है,

एक तरफ अंधी दौलत की, पागल ऐश परस्ती है,
एक तरफ जिस्मों की कीमत रोटी से भी सस्ती है,
एक तरफ है सोनागाछी,एक तरफ चौरंगी है,..ये दुनिया दोरंगी है,

आधे तन पर नूर बरसता,आधे तन पर चीरे,
आधे तन पर कोढ़ के धब्बे,आधे तन पर हीरे,
आधे घर में खुशहाली है,आधे घर में तंगी है,...ये दुनिया दो रंगी है,

माथे ऊपर मुकुट सजाए,सर पर ढ़ोए गंदा,
दाँएं हाथ से भिक्षा माँगे बाँएं से दे चन्दा,
एक तरफ भंडार चलाए,एक तरफ भिखमंगी है,...ये दुनिया दो रंगी है,

इक संगम पर लानी होगी,सुख और दुख की धारा,
नए सिरे से करना होगा,दौलत का बँटवारा,
जब तक ऊँच और नीच है बाकी हर सूरत बेढ़ंगी है,...ये दुनिया दो रंगी है,
(साहिर)
विश्व पर्यावरण दिवस
वन से सीने में धड़कन, वन से गीतों में सरगम,
वन से खुशियों का मौसम,वन से जिन्दा हम और तुम,
जीवन है ही जीव और वन,

वन से दुनिया में हरियाली,वन से जीवन में खुशहाली,
वन से होली और दीवाली, वन जिन्दा तो जिन्दा हम,
जीवन है ही जीव और वन,

वन से है साँसों की डोर, वन से हैं खुशियाँ चंहु ओर,
वन है तभी नाचते मोर, वन से धरती पर सावन,
जीवन है ही जीव और वन,

वन से ही बनता वनराज,वन से तीतर हुदहुद बाज,
वन से बनें अनेकों साज,वन से औषधि और ईंधन,
जीवन है ही जीव और वन,

वन से चीते की रफ्तार,वन से हाथी की चिंघार,
वन के अनगिन उपहार,वन से कोयल की सरगम,
जीवन है ही जीव और वन,

वन से है उपयोगी फल,वन बादल से लेते जल,
वन से कविता गीत ग़ज़ल,वन जीवन का आकर्षन,
जीवन है ही जीव और वन,

वन हैं धरती का श्रंगार,वन हैं कुदरत का उपहार,
वन के हैं उपयोग अपार, वन से उऋण न होंगे हम,
जीवन है ही जीव और वन,

वन सेवा करते रह मौन,वन समान उपकारी कौन,
वन बिन सांस चलाता कौन,वन से मिलती आक्सीजन,
जीवन है ही जीव और वन,
सुन ऐ दिल दुनिया से तेरी, आशनाई देख ली,
सिर्फ रुसवाई ही तेरे हाथ आई , देख ली,
अब से पहले दिल ने भी कुछ ख्बाव पाले थे, मगर,
नज़रों के आगे हक़ीकत आज आई, देख ली,
हाथ लेकर हम वफा को, दर-ब-दर घूमा किए,
हर कदम पर भरम टूटा, बेवफाई देख ली,
हर दुकां की चमक ने था,मुझको अपनी ओर खींचा,
वर्क चाँदी में, वो गोबर की मिठाई देख ली,
मैंने तो हर कदम पर,तुझको बताया था यही,
इस जगह गिरतों को कोई भी उठाता है नहीं,
दौर है रुसवाइयों का, तू ये माना ही नहीं,
पर लगी ठोकर खुली आंखें, तो दुनिया देख ली,
तेरी हर मनचाही, लोगों ने कुचल कर फेंक दी,
सिर्फ रुसवाई ही तेरे हाथ आई, देख ली,
भूलकर समझा तू हीरा,हर चमकता सा वो पत्थर,
सारी समझाई हुई बातें गुमी, नज़रें गईं फिर,
और फिर अपने बनाए जाल में तू, खुद गया घिर,
चाक दामन हो गया, करके भलाई देख ली,
हाथ तेरे सिर्फ रुसवाई ही आई, देख ली,
जिसकी किस्मत में सवेरा है नहीं, वो रात आई,
हर तरफ ग़म की घटा है,राह ना पड़ती दिखाई,
फासले मंज़िल के आकर पास फिर,गुम हो रहे हैं,
राह के रहबर भी अब सब,हर कदम पर खो रहे हैं,
हर एक शय से इस जहाँ में चोट खाई, देख ली,
आँख के आगे हक़ीकत आज आई, देख ली,
सुन ऐ दिल दुनिया से तेरी, आशनाई देख ली, (एक पुरानी रचना)

आओ बादल, आओ बादल,
अब तो जल बरसाओ बादल,

चिप-चिप हुआ पसीने से तन,
लगता नहीं, कहीं भी ये मन,

धरती मांग रही है पानी,
इसकी चूनर फिर हो धानी,

जलता है हम सबका आँगन,
आकर अब बरसा दो सावन,

ताल-तलैया सब प्यासे है,
आने वाले चौमासे है,

जी भर-भर कर खूब नहाएं,
कागज़ की नावें तैराएं,

अब ना अधिक सताओ बादल,
अब तो जल बरसाओ बादल,
मैंने जो गीत तेरे प्यार की खातिर लिक्खे,
आज उन गीतों को बाज़ार में ले आया हूँ,

आज दूकान पर नीलाम उठेगा उनका,
तूने जिन गीतों पे रक्खी थी मोहब्बत की असास(नींव),
आज चाँदी के तराजू में तुलेगी हर चीज,
मेरे अफ़़कार(रचनाएं),मेरी शायरी, मेरे अहसास,

जो तेरी जात से मंसूब थे,उन गीतों को,
मुफ़लिसी जिन्स बनाने पे उतर आई है,
भूक तेरे रुखे-रंगी के फसानों के एवज़,
चन्द अशिया-ए-जरुरत की तमन्नाई है,

देख इस कार-गहे-मेहनतो-सरमाया में,
मेरे नग़्मे भी मेरे पास नहीं रह सकते,
तेरे जल्वे किसी जरदार(पूंजीपति)की मीरास सही,
तेरे ख़ाके(शब्द चित्र)भी मेरे पास सकते,

आज इन गीतों को बाज़ार में ले आया हूँ,
मैंने जो गीत तेरे प्यार की खातिर लिक्खे, (साहिर)
वक्त से पहले कुछ नहीं मिलता,वक्त आने पे ही कमल खिलता,
जो नहीं बात ये समझते हैं, उनको रोना ईनाम में मिलता,

देखकर वक्त की नज़ाकत को, जो न अपना कदम बढ़ाते हैं,
नहीं खाते हैं जो ठन्डा करके, हाथ मुँह दोनों को जलाते हैं,

सोने का अण्डा देती थी मुर्गी, किस्सा मशहूर है ज़माने में,
लाश ही हाथ लगी थी उसको,वक्त से पहले सोना पाने में,

आज के दौर की इस आँधी की, हमें क्या क़ीमतें देनी होंगी,
वक्त की तेज लहर में कितनी, अनमोल थातियां खोनी होंगी,

वक्त का कर खयाल इंसां तू,वक्त से पहले कुछ न होने का,
 
अपनी संतति को दूर रख वरना,सबब ये होगा उसके रोने का,
जिन्दगी सिर्फ मोहब्बत नहीं, कुछ और भी है,
ज़ुल्फो-रुखसार की जन्नत नहीं कुछ और भी है,
भूख और प्यास से मारी हुई इस दुनिया में,
इश्क ही एक हक़ीकत नहीं, कुछ और भी है,
(साहिर)
जिसके मिलने से ख़ुदा बन जाऊँ,
ऐ ख़ुदा मुझको वो दौलत न मिले,

इतना मसरुफ न कर तू कि मुझे,
तुझसे मिलने की भी, फुरसत न मिले,
(ताहिर फराज)
बहुत मशहूर होता जा रहा हूँ,

मैं खुद से दूर होता जा रहा हूँ,

यक़ीनन अब कोई ठोकर लगेगी,
बहुत मग़रूर होता जा रहा हूँ,

नदीम सिद्दीक़़ी
उसको पढ़ने को जी मचलता है,
हुश्न उसका किताब जैसा है,

तुम चिराग़ों की बात करते हो,
हमने सूरज को बुझते देखा है,

खाक उड़़कर जमीं पे आती है,
आदमी क्यों हवा में उड़ता है,

खुद को दुश्मन की आँख से देखो,
आईना भी फरेब देता है,

मस्जिदों में चिराग़़ रोशन है,
दिल में ईमां बुझा-बुझा सा है, (आदिल लखनवी)
चेहरे का सबके अक्स दिखाता है आईना,
अच्छे बुरे में फ़र्क कराता है आईना,
इसमें जो हो जैसा, उसे वैसा ही दिखेगा,
दिल में हुए ज़ख्मों
की खबर, क्यों पर आई ना,
सौ तीर चला जो नज़रों के,
मज़रूह करे मेरे दिल को,
रब तू ही बता,क्या दूँ मैं सजा,
मासूम उस अपने कातिल को,
...आँच देने लगा कदमों तले ये बर्फ का फर्श,
आज जाना कि मुहब्बत में है गरमी कितनी,
संगमरमर की तरह सख्त, बदन में तेरे,
आ गई है, मेरे छू लेने से नरमी कितनी,...(साहिर)
आदमी को जीना है,
ज़हर हो कि अमृत हो मुस्करा के पीना है,

धूप भी है छाँव भी है जिन्दगी की राहों में,
जितने दुख है जितने सुख है सबको ले ले बांहों में,

ग़म उन्ही को घेरता है ग़म से जो घबराए हैं,
क्या बुरे दिन क्या भले दिन,सब गुजरते साये हैं,

मैंने माना इक अनोखा दर्द तेरे दिल में है,
वह खुशी क्यों खो रहा है,जो खुशी महफ़िल में है,
रात भर का है मेहमां अंधेरा,किसके रोके रुका है सवेरा,

रात जितनी ही संगीन होगी,सुबह उतनी ही रंगीन होगी,
ग़म न कर ग़र है बादल घनेरा,....

लब पे शिकवा न ला अश्क पी ले,जिस तरह भी हो कुछ देर जी ले,
अब उखड़ने को है ग़म का डेरा,...

यूँ ही दुनिया में आकर न जाना,सिर्फ आँसू बहाकर न जाना,
मुस्कराहट पे भी हक़ है तेरा,...

Monday, 3 June 2013

ये जो दीवार है,वो जो बीमार है,
क्यों है कैसे है,अब प्रश्न हल ये करो,
सामने आओगे, बच नहीं पाओगे,
मन के दरपन से,अब अपने छल ना करो,
किस भय से इन्हें डराते हो, कर जाएंगे ये पान गरल,
इनकी दधीच सी हड्डी है,इनमें अगस्त्य सा तेज प्रबल,
अपनी पर जब हम आते है, दोनों आलम थर्राते हैं,
फिर सागर हाथ जोड़ता है, चुटकी में पुल बन जाते हैं,
तुम्हें तुम्हारा खुदा मुबारक,मुझे तो मेरा सनम मिला है,
जहाँ में खुशियाँ बिखर दे जो,हसीन प्यारा सा ग़म मिला है,
र श्मियां बिखेरूँगा दीप्त भाल की तेरे,
ज ख्मों का मरहम मैं लाऊँगा खोजकर,
नी रस इन भावों की बंजर इस धरती पर,
कां हां की वंशी से पत्थर को तोड़ कर,
त न्हाई के दुखों को सहते, बेबस इन,
प्रा णहीन जिस्मों में फूकूँगा शक्ति नई,
न मक हराम सारे बनेंगे नमक हलाल,
दे खेगी दुनियाँ, रूप वो अनूप दूँगा,
श पथ लाऊँगा समूल सागर निचोड़ कर,
प ल-पल जो तड़पाते, विष के उपचार हेतु,
र ह-रह जो ग्रसते हैं, चन्द्र मेरा राहु केतु,
दे व दानवों के, संघर्ष की कहानी को,
ना म हैं नए मगर, कथा वही पुरानी को,
जा ग्रत हो चेतन हो,शक्ति का प्रवाह कर,
न वल ज्योति आशा ले,काँटों में राह कर,
ता श के महल जैसे गिरेंगे वे आततायी,
है ये सच बच न सकेंगे भी वे चाह कर,
ये जन-जन के मन की वीणा की स्वर लहरी,
स हयोगों की शक्ति, आपसी समझ गहरी,
च मक है जलन दिल की,तड़प प्यास जीवन की,
मां का आशीष संग पाथेय ऐसा हो,
नि कल पड़ेंगे पथ में फिर वो चाह जैसा हो,
ये ही दुआ मांगे, कल न आज जैसा हो,(15-7-1990)
हवाएं गंध भर देंगी,फज़ाएं रंग भर देंगी,
कि हँसती खेलती ये प्यार की वादी न उजड़ेगी,
हमेशा खुश रहे तू है यही हसरत मेरे दिल की,
न हूँगा एक मैं तो क्या तेरी महफिल न बिगड़ेगी,
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते,
वरना ये रात आज के संगीन दौर की,
डस लेगी जानो-दिल को कुछ ऐसे कि जानो-दिल,
ताउम्र फिर न कोई हंसी ख़्वाब बुन सकें,
गो हमसे भागती रही ये तेज़गाम उम्र,
ख़्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र,

जुल्फ़ों के ख़्वाब,होटों के ख़्वाब और बदन के ख़्वाब,
मेराजे-फन के ख़्वाब,कमाले-सुखन के ख़्वाब,
तहज़ीबे-जिन्दगी के,फरोगे-वतन के ख़्वाब,
जि़ंदां के ख़्वाब कूचा-ए-दारो-रसन के ख़्वाब,

ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे,
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल की असास थे,
ये ख़्वाब मर गए हैं तो बेरंग है हयात,
यूं है कि जैसे दस्ते-तहे-संग है हयात,

आओ कि कोई ख़्वाब बुने कल के वास्ते,...(साहिर)
आज मैं वह ज्योति फिर से माँगता हूँ,
ध्वंस का आह्वान फिर से चाहता हूँ,
जो कि सुख की राह को आगे बढ़ाएगी,
शान्ति की सरिता नहीं तो सूख जाएगी,

कह न पाएगी कलम जिनकी कथा को,
सह सके ना जो कि अंतर की व्यथा को,
हाथ में अपने ज्वलित अंगार लेकर,
हो प्रकंपित शत्रुमद हुंकार लेकर,

मातृ - भू को शीश देकर वंदना की,
स्वत्व को छीना,नहीं बढ़ याचना की,
प्राण दे देना था जिनको खेल जैसा,
वीरता के साथ भय का मेल कैसा,
व्यक्ति के जीवन में जो भी श्रेष्ठ है सुन्दर है सत्य है उसे जिया जा सकता है,अनुभव किया जा सकता है,जाना जा सकता है,हुआ जा सकता है लेकिन व्यक्त नहीं किया जा सकता है,कहा नहीं जा सकता,कहना बहुत मुश्किल है। (ओशो)
जगमग - जगमग दीप जले,
छुक छुक छुक छुक रेल चले,

टन टन टन टन घन्टी बोले,
मन को कितनी भली लगे,
जगमग - जगमग दीप जले,
छुक छुक छुक छुक रेल चले,

टन टन टन टन घन्टी बोले,
मन को कितनी भली लगे,