आज मैं वह ज्योति फिर से माँगता हूँ,
ध्वंस का आह्वान फिर से चाहता हूँ,
जो कि सुख की राह को आगे बढ़ाएगी,
शान्ति की सरिता नहीं तो सूख जाएगी,
कह न पाएगी कलम जिनकी कथा को,
सह सके ना जो कि अंतर की व्यथा को,
हाथ में अपने ज्वलित अंगार लेकर,
हो प्रकंपित शत्रुमद हुंकार लेकर,
मातृ - भू को शीश देकर वंदना की,
स्वत्व को छीना,नहीं बढ़ याचना की,
प्राण दे देना था जिनको खेल जैसा,
वीरता के साथ भय का मेल कैसा,
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