Saturday, 8 June 2013

वक्त से पहले कुछ नहीं मिलता,वक्त आने पे ही कमल खिलता,
जो नहीं बात ये समझते हैं, उनको रोना ईनाम में मिलता,

देखकर वक्त की नज़ाकत को, जो न अपना कदम बढ़ाते हैं,
नहीं खाते हैं जो ठन्डा करके, हाथ मुँह दोनों को जलाते हैं,

सोने का अण्डा देती थी मुर्गी, किस्सा मशहूर है ज़माने में,
लाश ही हाथ लगी थी उसको,वक्त से पहले सोना पाने में,

आज के दौर की इस आँधी की, हमें क्या क़ीमतें देनी होंगी,
वक्त की तेज लहर में कितनी, अनमोल थातियां खोनी होंगी,

वक्त का कर खयाल इंसां तू,वक्त से पहले कुछ न होने का,
 
अपनी संतति को दूर रख वरना,सबब ये होगा उसके रोने का,

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