Saturday, 8 June 2013

उसको पढ़ने को जी मचलता है,
हुश्न उसका किताब जैसा है,

तुम चिराग़ों की बात करते हो,
हमने सूरज को बुझते देखा है,

खाक उड़़कर जमीं पे आती है,
आदमी क्यों हवा में उड़ता है,

खुद को दुश्मन की आँख से देखो,
आईना भी फरेब देता है,

मस्जिदों में चिराग़़ रोशन है,
दिल में ईमां बुझा-बुझा सा है, (आदिल लखनवी)

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