Saturday, 21 November 2015

दुख गड्ढ़ोँ जैसे मिले,
सुख जैसे ये रेत,
मिलकर कर लेँ एक सा,
जीवन का यह खेत,


अब की साल दिवाली में,
हम थे नोआखाली में,
बोतल में राकेट चलाए,
चकरी छोड़ी थाली में,
अबकी साल दीवाली में...
जगमग चमके देश, हमारा,
हिस्सा हो खुशहाली में,
अच्छी बातें मन में रक्खी,
गंदी बातें नाली में,
अब की साल दिवाली में...
चले पटाखे और फुलझड़ी,
धूम धड़ाम धड़ाम,
चकरी नाच रही चकराती,
उसे नहीं आराम,
आसमान को भागा राकेट,
लगी पूँछ में आग,
बम जब फटा जोर से,
बछ्डा गया थान से भाग,
दिए जला, छोड़े पटाखे,
खाई खील मिठाई,
एक बरस तक करी प्रतीक्षा,
तब दीवाली आई,

Wednesday, 14 October 2015



बहुत वीराना है, फिर भी खड़ा हूँ,
कोई दीवाना हूँ, फिर भी खड़ा हूँ,
किसी का गीत हूँ न रुबाई, एक-
भूला फसाना हूँ, फिर भी खड़ा हूँ,
कभी सरसब्ज़ छायादार था,आज-
लुटा खज़ाना हूँ, फिर भी खड़ा हूँ,
हवा थी तेज, पानी भी नहीं था,
गुजर जाना है, फिर भी खड़ा हूँ,
खेत हो या सोना हो,
प्यार या कि अंतर्मन,
ये तभी निखरते हैं,
जबकि पाएं,जल यारो,
होंठ सूखते से हैं,
दिल का साज़ मद्धम हैं,
हम भी लिख के देखेंगे,
इक नई ग़ज़ल यारो,
तुम ही तो सुझाते हो,
रास्ते नए हमको,
और तुम्हीं नहीं करते,
उनपे हो अमल यारो,
बन सकी इमारत ना,
नींव ही रख दें वरना,
उँगलियाँ उठाए ना,
कोई हमपे कल यारो,
जब भी उनको देखा है,
याद हमको आया है,
वो खिला खिला चेहरा,
जैसे हो कमल यारो,

Thursday, 8 October 2015

कैसा है भारतीय भाषाओं का बाल साहित्य
मित्रो,
हमारा देश आर्थिक भौगोलिक सांस्कृतिक विविधताओं वाला देश है। अगर आप गहराई में जाएंगे तो हैरान रह जाएंगे कि कैसे इतनी सारी विविधताओं के बावजूद कोई ऐसा अंतर्सूत्र है जो हमें एक डोर में बाँधे हुए है। भाषा और बोली की विविधता को लेकर तो एक लोकोक्ति ही हमारे यहाँ प्रचलन में रही है। ‘कोस कोस पर पानी बदले चार कोस पर बानी’ यद्यपि यह चार कोस का आंकड़ा औसत में है। इससे पहले भी बदलाव का साक्षी मैं स्वयं हूँ।
इस विशाल देश में सैकड़ों बोलियाँ बिखरी हुईं हैं और उनमें बिखरा हुआ है अलिखित बाल साहित्य। सोचकर हैरत होती है कि सुदूर नागालैंड,मिजोरम ,मेघालय के कबीलों से लेकर ंिहंद महासागर में स्थित दमन, दीव तक कितना बड़ा फलक है हमारे बाल साहित्य का पर कभी इसको लेकर जानने परिचय पाने को लेकर हम सब कितने उदासीन हैं। ऐसा लगता है कि वे हमारी समृद्ध विरासत का हिस्सा न होकर किसी और देश में स्थित हैं। उदासीनता का आलम यह है कि आजादी के इतने वर्ष बीत जाने के बाद आज भी राष्ट्रीय स्तर पर कोई ‘समकालीन भारतीय बाल साहित्य’ जैसी बाल पत्रिका नहीं है जिसके माध्यम से हम इन सब बोलियों में बिखरे बाल साहित्य की तो बात ही छोड़ दें संविधान स्वीकृत भारतीय भाषाओं के बाल साहित्य को भी किसी एक स्थान पर देख पढ़ सकें।
भारतीय साहित्य की राष्ट्रीय संस्था साहित्य अकादमी ने देश आजाद होने के 60 वर्षों बाद पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2010 से बाल साहित्य में पुरस्कार देने की शुरुआत की। ‘समकालीन भारतीय बाल साहित्य’ जैसी पत्रिका के लिए हमें अभी कितनी प्रतीक्षा करनी पडेगी कह नहीं सकते।
मित्रो, यहाँ हम इन भाषाओं के बाल साहित्य का लंबा चैड़ा इतिहास बताकर आपको दुखी नहीं करेंगे बल्कि इस भाषाओं में से कुछ भाषाओं में प्रकाशित अनेक पुस्तकों में से कुछ पुस्तकों की थीम और अन्य जानकारियाँ साझा करेंगे। जिसके माध्यम से हमें पता चल सके कि हमारे देश के इन भाषाओं के बच्चे आखिर पढ़ क्या रहे हैं।
हम शुरुआत अगर उत्तर पूर्व की भाषा असमी से करें तो हम पाते हैं कि यहाँ का बाल साहित्य काफी समृद्ध है।
यहाँ की लोककथाओं से परिचय कराती एक पुस्तक है,‘बुड़ही और साधू’ असमिया साहित्य के प्रसिद्ध लेखक लक्ष्मीनाथ बेजवरुआ ने लिखा है इसे। ये असम के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित वे कहानियाँ हैं जो वर्षों से दादी नानी सुनाया करती रहीं हैं। उनके उसी सुनाने वाले अंदाज़ में इन्हें उनसे सुनकर लिखा गया है।116 पेज की इस पुस्तक की कीमत है मात्र 25 रुपए 12से 14 बर्ष के आयु वर्ग के बच्चों के लिए लिखी गई इस किताब का चित्रांकन किया है अरुननाथ ने और प्रकाशित किया है ज्योति प्रकाशन गौहाटी ने। लोक कथाओं की ‘काकादेवता अरु नाटिलारा’ पुस्तक पेज 140 मूल्य 25 रुपए भी इन्हीं की है।
रंजू हजारिका ने समग्र भारतीय बाल साहित्य के खजाने से असम के बच्चों को परिचित कराया है।‘कथा सरित सागरर साधू’ व ‘वाटरिश सिंहासन’ जैसी पुस्तकें उन्होंने लिखीं। बुद्धिमान और शक्तिशाली सम्राट विक्रमादित्य से परिचय करातीं ये कहानियाँ इस प्रदेश के बच्चों को प्राचीन भारत के जीवन दर्शन से जोड़तीं हैं।
इसी तरह अरुंधती राजखोवा सैकिया द्वारा लिखी पुस्तक ‘गोपाल भांड’ राजा कृष्ण चंद्र के मशहूर दरबारी विदूषक थे। इनकी छोटी छोटी कहानियाँ हैं जो हास्य के माध्यम से सामाजिकता का संदेश देतीं हैं। 139 पेज की यह पुस्तक साठ रुपए की है और इसे बनी मंदिर गौहाटी ने छापा है।
वीरेंद्रनाथ सैकिया असमी साहित्य का एक जाना माना नाम हैं। ‘मोर शोइशव मोर कैशोर’ पुस्तक में वे अपने बचपन की घटनाओं का वर्णन करते हैं जिन स्थानों पर वे रहे जिन लोगों से मिले। वे अध्यापक और सांस्कृतिक घटनाएं जिनके वे साक्षी रहे, इस पुस्तक की विषय वस्तु हैं।
कहानियों की किताबों में ‘आइर मुखर साधू’ नवीन चैधरी की पुस्तक जिसमें असम के पश्चिमी कामरूप व दरंग इलाके में प्रचलित मनमोहक लोककथाओं का संग्रह है।
‘आहेजार इता साधू’ नावा कलिता और निवेदिता बोरा द्वारा संपादित 300 पेज की पुस्तक हैं जिसमें असम के परंपरागत जीवन से परिचय कराती कहानियों का संग्रह है। इसमें कुछ गंभीर ,कुछ हँसी मजाक की कुछ दिल को छू लेने वाली प्रेरणादायी कहानियाँ हैं।
‘अखनीर पृथ्वीत’ पुस्तक में चंदना कलिता ने किशोर मन की संवेदनाओं को छूती हुई अपने बचपन की कहानियों को लिखा हैं।
‘देश विदेशेर शिशु गल्प संग्रह’ पुस्तक लख्याहीरा दास द्वारा लिखित है। जिसमें नाइजीरिया, मंगोलिया, तिब्बत, ग्रीस और जर्मनी की लोककथाओं को असमी में संग्रहीत किया गया है। जो बच्चों को सोचने, हँसने, आश्चर्यचकित होने पर मजबूर कर देतीं हैं।ज्यादातर कहानियाँ सहज रूप से आपकी बुद्धि के छिपे हुए दरवाजों को खोल देतीं हैं।
‘परबतिया साधू’ रमादास द्वारा लिखी गईं ऐसी लोककथाओं का संग्रह है जो नागा, मणिपुरी, बोडो, करबी, लखेर, सेमा, खासी, जयंतिया, गारो और अंगमी कबीलों में प्रचलित हैं। इस पुस्तक में चित्रांकन पिंकू का है जो कहीं कहीं बेहद आकर्षक है। नयनतारा प्रकाशन गौहाटी ने इसे छापा है और कीमत है 25 रुपए।
‘पिंग किफ्रू’ अचिन मोमाइयो द्वारा किया गया ऐसी पाँच कहानियों का संग्रह है जो ग्रामीण क्षेत्रों में किस्सैतों द्वारा कही जातीं हैं। इसके पात्र व चरित्र असम के हर घर में जाने जाते हैं।
‘साहा अरु काचार दौर’ किरन टाॅलमी ने लिखी है।इसमें कछुए और खरगोश में फिर से एक बार दौड़ होती है। जंगल के सारे जानवर इस बार खरगोश को जिताने में लग जाते हें मगर कछुआ इससे परेशान नहीं होता और अपनी लगन से वह यह दौड़ एक बार फिर जीत जाता है।
‘शंखचोर’ एक बेसहारा बुढ़िया और नन्हीं बच्ची की कहानी है। इसमें असम के जन जातीय जीवन की झलक मिलती है। इसे दीना तामुली ने लिखा है।
‘तिखार अरु चटुबी’ दो अनाथ भाई बहन की संवेदनशील कहानी है जिसमें तिखार अपनी बड़ी बहन की सारी परेशानियों को अपने परिश्रम लगन के बल पर दूर करता है उसकी जरूरतों को पूरा करता है।
‘अविष्करोर साधना’ जयंती छुटिया की एक ऐसी पुस्तक है जिसमें पाँच नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों के बारे में व उनके प्रयासों की जानकारी रोचक तरीके से दी गई है। यह पुस्तक विज्ञान की नई खोजों में बच्चों की रुचि को व उनके ज्ञान को बढ़ाती है।
इसी तरह ‘एटम बाम्बर कहानी’ नामक पुस्तक विमलनाथ द्वारा लिखित दिगंता मजूमदार के चित्रांकन से सजी 64 पेज की है। जिसमें मानवता के विकास की अब तक की महत्वपूर्ण खोज एटम बम, की संक्षिप्त जानकारी कहानी में पिरो कर दी है। राजनीतिक व वैज्ञानिक तल पर समझाने वाली यह पुस्तक असमिया साहित्य में अनूठी है।
‘कोने केतिया कोत केनेकोई की अबिष्कार कोरीचिल’ संतेनु कौसिक बरुआ द्वारा लिखित मंजीत राज खोवा के चित्रांकन से सजी इस पुस्तक में दैनिक जीवन में प्रयुक्त विज्ञान की वस्तुओं की खोज कैसे हुई इनकी रोचक जानकारी देती है। उस खोज के पीछे छिपे दर्द और खुशी को बयान करती यह पुस्तक असमिया बाल विज्ञान साहित्य की एक महत्वपूर्ण पुस्तक है।
‘स्ंाधान’ बंदिता फूकन द्वारा लिखित एक रोचक विज्ञान कथा है जिसमें नासा के एक खगोल वैज्ञानिक द्वारा पृथ्वी से सात प्रकाश वर्ष दूर एक ऐसे ग्रह की खोज कर ली जाती है जिसमें मानव अस्तित्व विद्यमान है। कुछ लोगों का समूह वहाँ मानव बस्ती बसाने की योजना बनाते हैं। पल पल रोमांचित करती यह कहानी बच्चों को अखिल ब्रहमांड में रुचि के लिए प्रेरित करती है।
‘शताधिक महान विज्ञानी’ पुस्तक में असम के विख्यात विज्ञान कथा लेखक दिनेशचंद्र गोस्वामी ने सरल सहज भाषा में मानवता के विकास में उल्लेखनीय योगदान देने वाले सौ वैज्ञानिकों के जीवन परिचय व उनके महान कार्यों का वर्णन किया है।
इसी तरह इनकी एक पुस्तक ‘बिज्ञानानार बिनिंदिया जगत’ उनके विज्ञान के लोकप्रिय लेखों का संकलन है। जिसमें ब्रहमांड, पोषकता और बीमारियों तथा अन्य क्षेत्रों की छोटी - छोटी जानकारियाँ हैं जो बच्चों के लिए बेहद उपयोगी हैं।
‘पृथिवीर साधू’ हरिप्रिया वासकियल वोरगोहिन द्वारा लिखी ऐसी कहानियाँ हैं जिनमें उन कारणों की पड़ताल है जिनके कारण बच्चे समाज की मुख्यधारा से दूर हो जाते हंै। यह कहानी संग्रह सारी दुनिया के बच्चों को उस स्थिति में सही कदम उठाने के लिए प्रेरित करता है जब किशोरावस्था की इच्छाएं उनमें जन्म लेतीं हैं।
इसी तरह से ‘मिचात आस बनात बास’ अर्पन दत्ता की एक ऐसी पुस्तक है जो ऐसी समस्याओं के समाधान बताती है जिनसे असम के बच्चे अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में दो चार होते हैं। यह कहानियाँ असम के एक लोकप्रिय समाचारपत्र में नियमित रूप से प्रकाशित होती रहीं हैं।
इसी तरह बंदिता फूकन का बाल उपन्यास ‘अपत्य’ है जो पाक्षिक रूप में असम में धारावाहिक की तरह छपता रहा जिसमें एक किशोर के उस अंतद्र्वंद्व को दर्शाया गया है जो उसके नए पिता के साथ में रहने से पैदा होता है।
‘बनत रंगर मेला’ संतनो तोमुली की पुस्तक है जिसमें प्रकृति और मानव के आंतरिक संबंधों को दर्शाया गया है। सुबह जागने के साथ ही हमारा प्रकृति से साहचर्य शुरू हो जाता है। इसे सुंदर ढ़ंग से पुस्तक में समझाया गया है।
‘बंदर काकार सफर’ पुस्तक में लेखक जीवनदास, बुुजुर्ग बंदर के माध्यम से असम को प्रकृति से मिली अनमोल धरोहर के उजड़ने की कहानी और उससे जानवरों को होने वाली परेशानी को सुंदर कहानी की शक्ल में बताते हंै।
‘ईसू’ मणिकुंतला भट्टाचार्य का एक रोचक बाल उपन्यास है। इसका चित्रांकन अमृत भरद्वाज ने किया है। जिसमें ईशू नाम के एक ऐसे बच्चे की कहानी है जिसे अपने गाँव के आस पास घूमना, जानवरों के साथ खेलना और अनजानी जगहों पर जाना बहुत पसंद है। ऐसे में वह भूतों के चंगुल में फंस जाता है मगर वह घोर मुसीबत में भी झूठ नहीं बोलता। रहस्य रोमांच से भरी यह पुस्तक अंत तक पढ़ने वाले को बांधे रखती है।
‘इखान सरकस अहिसिल’ बंदिता फूकन का जंगल के जानवरों को लेकर बाल उपन्यास है जिसमें जीवन अपने हर रंग में मौजूद है।
‘पानबारी गउत इदिन’ खगेंद्रनाथ बोरा का बाल उपन्यास हे जिसमें एक दयालु अंकल बच्चों के एक दल के साथ जंगल में शैक्षिक भ्रमण पर जाते हैं। वहाँ वे मनुष्य और जानवरों के अंतद्र्वंद्व के साक्षी बनते हैं।
आर जी पब्लिकेशन गौहाटी द्वारा प्रकाशित जुगलोचन दास द्वारा लिखित पुस्तक ‘काजीरंघट अंकू डंकू‘ काजीरंगा अभ्यारण्य के एक लड़के डिंकू की कहानी है। यह पुस्तक हँसाती है, चकित करती है और पढ़ने को मजबूर करती है।
‘गणित अरु सभ्यता’ देश के विख्यात गणितज्ञ बिजय कृष्णदेव शर्मा द्वारा लिखी गई है। इसमें गणित के जन्म, इसके इतिहास मूल्यांकन और विकास की कहानी सरल सहज भाषा में बताई है। जो बच्चों को गणित में रुचि लेने के लिए प्रेरित करती है। चित्रांकन विपुलकुमार दास का है।
‘डिहिगे डिपांगे भूपेन मामा’ दीपिका चैधरी की पुस्तक है जिसका चित्रांकन दादुल चैलिहा ने किया है। यह पुस्तक भूपेन हाजारिका के बहुआयामी व्यक्तित्व से परिचय कराती है। वे कवि, संगीत निर्देशक, गायक, लेखक, फिल्मकार थे। उनका जीवन बच्चों के लिए प्रेरणा पुंज है।
‘किशोर एक्सराथी’ होमेन वोरगोहेन की पुस्तक है जो असम में पठन संस्कृति को बढ़ावा देने वाले आंदोलनकारी हैं। असमिया साहित्य को बच्चों तक पहुँचाने के लिए समय समय पर लिखे गए लेखों का संकलन है यह महत्वपूर्ण पुस्तक।
‘मुमैर पाडुली’ ओचिन मोमाइयो द्वारा लिखी गई है। वे असम के लोकप्रिय साहित्यकार हैं। इसमें उन्होंने बच्चों के लिए छोटे छोटे निबंध और पत्र लिखे हैं। जिसके माध्यम से वे उन्हें इतिहास, साहित्य, कला, संस्कृति, पर्यावरण और हमारे समाज के गुमनाम नायकों के बारे मे जानकारी देते हैं।
नाटकों में ‘शिशु नाटक 7’ पुस्तक असम प्रिंटर्स गौहाटी द्वारा प्रकाशित है जिसमें आतंकवाद, जंगल उजड़ने, ग्लोबल वार्मिग, तथा अंतरिक्ष विज्ञान जैसे विषयों पर असमिया नाटक साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर नरेन पेटगिरि के नाटकों का संकलन है।
‘शिशु नाटक संभार’ हरिकेश गोस्वामी की संपादित पुस्तक है जिसमें असम के 29 महत्वपूर्ण नाटककारों के लोकप्रिय नाटकों का संकलन है।
‘रौ रौ धेमाली’ हीरेन भट्टाचार्य की कविताओं का संकलन है। हीरेन ने कुछ भूले हुए शब्द असमी भाषा से दिए हैं। चित्रांकन रोबिन बरुआ का है जो बहुत अच्छा है।
‘अकौधिमली’ हीरेन भट्टाचार्य द्वारा संपादित एक अन्य काव्य संकलन है जिसमें विश्व की इतिहास की मुख्य घटनाओं को अलग अलग कवियों द्वारा लिखा गया है। वेनू मिश्रा का इसमें सुंदर चित्रांकन है।
असमिया में स्त्रियों द्वारा लिखे बाल साहित्य का एक संग्रह ‘बिंग्शा सतीकार लेखीकार शिशु साहित्य संभार’ नाम से वनलता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ है।
इन सब के अतिरिक्त बड़ी संख्या में बाल साहित्य समग्र के रूप में भी प्रकाशित हुआ है। जिनमें मुख्य रूप से ‘डा भावेंद्र नाथ सैकियार शिशु साहित्य संग्रह’, ज्योतिप्रसाद रचनावली’, त्रिदेव मोहंता रचनावली’, नवकांत बरुआ शिशु साहित्य समग्र’, ‘पूरनचंद गोस्वामी शिशु लेखा मलांच’ साहित्याचार्य अतुलचंद्र हाजारिका शिशु साहित्य संभार’, जैसे अनेक संग्रह प्रकाशित हुए है।
इस तरह हम पाते हैं कि देश के पूर्वोत्तर राज्य की एक महत्वपूर्ण भाषा के बच्चे वह सभी कुछ पा रहे हैं जो आवश्यक है यहाँ परंपरागत रूप से कहानी कविता उपन्यास नाटक तो हैं ही। इनमें विषयों की विविधता भी है। गणित, विज्ञान, पर्यावरण, खगोल जैसे विषय भी है। जहाँ तक थीम की बात करें हमें इसमें भी विविधता नजर आती है।
तमाम दिन के सफर पर, निकल रहा सूरज,
लगन की आग है सीने में, जल रहा सूरज,
पहाड़ पेड़ को, दरिया को, पार कर लेगा,
खुला है आसमान और चल रहा सूरज,
तमाम शब यहाँ मनमानी की अँधेरों ने ,
निकलना ही था उसे औ' निकल रहा सूरज,
सफर तो सफर है गर्दोगुबार होगा ही,
नदी के जल में बदन अपना मल रहा सूरज,
समय बदलता है तो लोग बदल जाते हैं,
मगर है वैसा ही वो, जैसा कल रहा सूरज,
सफर ये कैसा है, जो खत्म ही नहीं होता,
भरी है आग वो,सदियों से जल रहा सूरज,
ज्योति कलश छलके
-----------------------
ज्योति कलश छलके
हुये गुलाबी, लाल सुनहरे,
रंग दल बादल के
ज्योति कलश छलके
घर आँगन वन उपवन उपवन
करती ज्योति अमृत के सिंचन
मंगल घट ढलके,
ज्योति कलश छलके
पात पात बिरवा हरियाला
धरती का मुख हुआ उजाला
सच सपनें कल के,
ज्योति कलश छलके
उषा ने आँचल फैलाया
फैली सुख की शीतल छाया
नीचे आँचल के,
ज्योति कलश छलके
ज्योति यशोदा धरती गैय्या
नील गगन गोपाल कन्हैय्या
श्यामल छवि झलके,
ज्योति कलश छलके
आस का विश्वास का आया सवेरा,
जो करेगा दूर जीवन का अँधेरा,
इक नए उत्साह का सूरज उगा है,
चल पड़ेगा रथ बहुत दिन से रुका है,
क्षितिज के द्वारे से झुककर झाँकती किरनें,
रंग बिखराकर हमारा मन लगी हरने,
जाग जाएं जब तभी समझो सवेरा,
ग़म न कर ग़र राह में है तम घनेेरा,
चल रहा जीवन हमारा, चल रहे हम,
रुक गए ये कारवाँ सब, जाएगा थम,
मीलों चलना बाकी है,
आती अब तैराकी है,
नहीं देखना इधर उधर,
रखनी आँखें मंज़िल पर,
करने हैं बहुतेरे काम,
जय जवान जय किसान,
लक्ष्य सामने,चलना है,
दीपक जैसा बलना है,
आगे बढ़कर जब देखा,
अँधियारा तो छलना है,
नन्हे हों पर बने महान,
जय जवान जय किसान,
प्यारा लगता गीत वही,
मन चाहे मनमीत वही,
अगर सोच लो तो लगती,
शीत ऋतु में शीत नहीं,
मन आत्मा मन ही भगवान,
जय जवान जय किसान,
मन में सबके रावण राम,
जय जवान जय किसान,
(एक बच्चे की माँ से शिकायत)
क्या मैं तेरा बच्चा नईं...
-------------------------
कहना तेरा मानूँ मैं,
अपना तुझको जानूँ मैं,
जो कहती वो करता हूँ,
कितना तुझसे डरता हूँ,
फिर भी मेरी परवा नईं,
क्या मैं तेरा बच्चा नईं,
जल्द सुबह  उठ जाता हूँ,
नियमित पढ़ने जाता हूँ,
जब कहती हो तब खेलूँ,
वरना मुन्नी को ले लूँ,
मुझे उठाकर खुद सो गईं,
क्या मैं तेरा बच्चा नईं,
नींद आ रही कुछ सो लूँ,
दोस्त गए, मै भी खेलूँ,
टी.वी. देखूँ ,मन करता,
लेकिन कहने से डरता,
जब पूछूँ तो कहतीं -'नईं',
क्या मैं तेरा बच्चा नईं...

Thursday, 17 September 2015

साहिर लुधियानवी के गीत आशावादी स्वर,भविष्य के सपने, बेहतर जीवन की प्रेरणा से भरपूर हैं। उनकी एक नज़्म 'आओ कि ख्बाब बुनें कल के वास्ते... उनके ऐसे विचार को ही प्रतिबिम्बित करती है। संघर्ष से टूटे दिलों में आशा और विश्वास की संजीवनी फूंकते हैं उनके गीत...
उन्होंने लिखा है --
'न मुंह छुपा के जिए और न सर झुका के जिए,
सितमग़रों की नज़र से नज़र मिला के जिए,
अब एक रात अग़र कम जिए तो कम ही सही,
यही बहुत है कि हम मशअलें जला के जिए,
उनका जीवन भी इस बात को प्रमाणित करता है, बात चाहे शब्दों की महत्ता को प्रतिस्थापित करने को लेकर एस. डी. बर्मन, ओ.पी. नैयर, लता मंगेशकर की नाराज़गी की रही हो या सरकार के कदमों के खिलाफ लिखने पर पाकिस्तान सरकार द्वारा उनके लिए वारंट निकलने की। वे हमेशा सच और न्याय के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं।
फिल्मों में अपने बिल्कुल शुरुआती दौर में "आजादी की राह पर" सन 1948 में लिखे गए उनके गीतों में से प्रस्तुत गीत है यह --
बदल रही है जिंदगी,
बदल रही है जिंदगी |
ये उजड़ी उजड़ी बस्तियां, ये लूट की निशानियाँ,
ये अजनबी पे अजनबी के ज़ुल्म की कहानियाँ,
अब इन दुखों के भार निकल रही है जिंदगी,
बदल रही है जिंदगी ।
जमीं पे सरसराहटें, फलक पे थरथराहटें,
फिजां में गूँजतीं है एक नए जहां की आहटें
मचल रही है जिंदगी, संवर रही है जिंदगी
बदल रही है जिंदगी ।
आजादी की राह पर' जो 1948 में रिलीज हुई थी,1947 में देश आजाद हुआ था यह उस दौर का लिखा फिल्म में उनके पहले गीतों में एक है। गुलामी के बोझ से कराहता देश आजाद होकर नई उमंग और उत्साह से उठ खड़े होने को तैयार था। उसके उन्हीं भावनाओं को प्रतिबिम्बित करतीं हैं ये पंक्तियाँ...

Saturday, 12 September 2015

क्या ग़म जो अँधेरी हैं रातें,
इक शमा-ए-तमन्ना साथ तो है
कुछ और सहारा हो के न हो,
हाथों में तुम्हारा हाथ तो है ।
क्या जानिए कितने दीवाने
घर फूंक तमाशा देख चुके
जिस प्यार की दुनिया दुश्मन है,
उस प्यार में कोई बात तो है ।
साहिर
यह जीवन तो ऐसे ही निकल जाएगा बाँटो या न बाँटो। मरते वक्त पाओगे कि जिसे बचाया वह जा रहा है।
काश! तुम इसका उपयोग कर लेते ओर बाँट देते और उसे पा लेते जो कभी नहीं जाता।
ओशो
"वो इतना कहते ही माँ के,
गले में झूल जाता है,
भला इतवार के दिन भी,
कोई स्कूल जाता है,...
उठें सूरज से पहले हम,
नमस्ते हम करें किसको,
दिसंबर में तो सूरज भी,
निकलना भूल जाता है,
बल्ली सिंह चीमा
अगर तुमने प्रेम को पकड़ बनाया,तुम्हारा प्रेम नष्ट हो जाएगा। तुमने जिसे प्रेम दिया उसे अगर तुमने स्वतंत्रता भी दी,दूर जाने की सुविधा भी दी, वह तुमसे कभी दूर न जा सकेगा। हमारी चेतना स्वतंत्रता चाहती है, जो बाँधता है उससे हम मुक्त होना चाहते हैं।
इसलिए अगर तुम सच में ही प्रेम करते हो तो स्वतंत्रता देना नहीं तो जिसे तुम प्रेम करोगे वही तुमसे दूर चला जाएगा।
ओशो
सानी नहीं प्यार की माँ के,
झूल रहे बच्चे,
देखो कितने प्यारे लगते,
हैं कितने अच्छे,
इन्हें ग़म नहीं जरा मौत का,
खौफ न चेहरों पर,
साध लिया संतुलन जिस तरह,
नईया लहरों पर,
रजनीकांत शुक्ल
मन हो हर्षित,तन हो प्रमुदित,
पुलकित वसुन्धरा,
जीवन का संतुलन साध लो,
सीखो इसे जरा,
बचपन का अभ्यास बनाता,
सोना तुम्हें खरा,
जो डर गया मौत से पहलेे,
समझो वही मरा,
"दे जो कोई ध्यान तो फिर,
राज़ ये जीवन का सीखे,
बात तो है एक ही पर,
सोचने के दो तरीके,
खाईयां हैं इसलिए ही तो,
हुआ पर्वत बड़ा है,
झूठ का अस्तित्व भी तो,
सत्य के ऊपर खड़ा है,
दो बड़ी रातों में नन्हीं दिन की,
एक लौ झिलमिलाती,
या बड़े दो हैं दिवस,
बस इक जरा सी रात आती,
ढ़ेर सारे दीर्घजीवी कंटकों,
के बीच खिलता,
देर तक जीवन जिए,
वरदान ये उसको न मिलता,
क्षणिक जीवन कुसुम का,
खिल सुबह मरता है उसी दिन,
छोड़ता पर छाप मन में,
याद आता है खुशी बन,
रजनीकात शुक्ल
भइया आज हमारा दिन है,
मै राखी बाधूँगी तुझको,
नन्ही बहना हूँ मैं तेरी,
भूल नहीं जाना तुम हमको,
लड़ते -भिड़ते हैं हम फिर भी,
इक दूजे को प्यारे हैं,
मम्मी और पापा दोनों की,
आँखों के हम तारे हैं,
बहन न तुझसे आज लडूँगा,
तेरी बातें मानूँगा,
पापा से पैसे लेकर मैं,
गिफ्ट तुझे दिलवा दूँगा,
होने दे तू बड़ा मुझे,
मैं ढ़ेरों नोट कमाऊँगा,
लेकिन अभी पकड़ चरखी,
मैं छत पर पतंग उडाऊँगा,
लोकतंत्र आया जंगल में,
नाखुश राजा रानी,
बकरी शेर पिएंगे दोनों,
एक घाट का पानी,
रहकर जल में बैर मगर से,
कैसे निभे बताओ,
सर्व समर्पण तुम्हें,
अगर खाना है हमको खाओ,
कुदरत के सब रंग निराले, गोरे हों या काले,
मन कहता तू मन के अंदर सारे रंग समा ले,
पत्ती हरी, पंख तितली के, लाल श्वेत या काले, 
देखे अगर दुखी मन, फैलें अंदर गहन उजाले,
लहर की मानिन्द चुप - चुप बह रही है चाँदनी,
ग़र सुने कुछ -कुछ यक़ीनन कह रही है चाँदनी,
रात आई, छोड़ कर सब चल दिए तनहा उसेे,
बेवफाई का सितम यूँ , सह रही है चाँदनी,
'देश के रत्नों से उनके नाम कामों से जड़ी,
इस तरह तुमने कभी देखी लिखी बाराखड़ी'
रजनीकांत शुक्ल
'क' से कुल दुनिया हमारी जिसमे भारत देश है
'ख' से खेती जिसमे जीवनदान का सन्देश है ।
'ग' से गंगा सबसे पहले,
आर्य उतरे थे जहाँ
'घ' से घर की आबरू,
रक्षक हैं जिसके नौजवां,
'च' से राजा चन्द्रगुप्त औ,
'छ' से उसका छत्र है
देश के इतिहास का वो युग,
सुनहरा पत्र है ।
क से कुल दुनिया हमारी जिसमे भारत देश है
ख से खेती जिसमे जीवनदान का सन्देश है ।
'ज' जलालुद्दीन अकबर जिसने,
सौ हीले किये,
हिन्दू मुस्लिम नस्ल और,
मजहब मिलाने के लिए,
'झ' से है झाँसी की रानी,
'ट' से टीपू सूरमा
जिसके जीते जी न सिक्का,
चल सका अंग्रेज़ का,
'ठ' से वो ठाकुर जिसे
टैगोर कहता है जहां
विश्व भर में उसकी रचनाओं से,
है भारत का मान ।
'क' से कुल दुनिया हमारी जिसमे भारत देश है
'ख' से खेती जिसमे जीवनदान का सन्देश है ।
'ड' से डल कश्मीर की,
जो हर नज़र का नूर है
'ढ' से ढाका जिसकी मलमल,
आज तक मशहूर है ।
'त' से ताज आगरे का,
इक अछूता शाहकार
शाहजहाँ की लाडली,
मुमताज़ बेगम का मजार
'द' से दिल्ली दिल वतन का,
'ध' से धड़कन प्यार की
'न' से नेहरु जिस पे हैं
नज़रें लगी संसार की,
'प' से उसका पंचशील
और 'फ' से उसका सुर्ख फूल
'ब' से बापू जिसको प्यारे ,
थे अहिंसा के उसूल
'भ' भगत सिंह जिसने ललकारा,
विदेशी राज को
चढ़ के फाँसी पर बचाया,
अपनी माँ की लाज को ।
'क' से कुल दुनिया हमारी जिसमे भारत देश है
'ख' से खेती जिसमे जीवनदान का सन्देश है ।
'म' से हो मजदूर जिसका,
दौर अब आने को है
'य' से युग सरमायादारी का,
जो मिट जाने को है
'र' से रास्ता प्यार का,
'ल' से लगन इन्साफ की
'व' से ऐसा वायुमंडल,
जिससे बरसे शांति
'श' से शाहों का जमाना,
'स' से समझो जा चुका
'ह' से हम सब से एक हों
वक्त ये फरमा चुका ।
'क' से कुल दुनिया हमारी जिसमे भारत देश है
'ख' से खेती जिसमे जीवनदान का सन्देश है ।
साहिर

Tuesday, 4 August 2015

पापा की बेटी

घर के अंदर बैठी रिया पढ़ाई कर रही थी। माँ अंदर रसोई में घरेलू काम में उलझी हुई थी। रिया के पापा भी इस समय घर पर थे। रिया को बचपन से ही पढ़ने का शौक था। सो कभी उसके मम्मी पापा ने उसे पढने से नहीं रोका। न तो बाहर स्कूल में पढ़ने जाने में और न ही घर पर पढ़ने में।
जब भी कभी रिया पढने बैठती मम्मी उसे काम करने की न कहतीं। या तो वे खुद काम कर लेतीं या उसे बाद पर टाल देतीं। अव्वल तो रिया ही उन्हें कुछ भी कहने का मौका न हीं देती। वह माँ के काम में हाथ बँटाना अपनी जिम्मेदारी समझती थी। अपनी समझ से सारे काम निबटाने के बाद ही पढ़ने बैठती थी।
आज भी कुछ ऐसा ही हुआ। रिया का छोटा भाई स्कूल जा चुका था और अभी - अभी वह पढ़ने बैठी थी। यह मार्च महीने की दस तारीख थी। यू पी बोर्ड की परीक्षाएं अमूमन इसी महीने में होतीं हैं।
उसकी पढ़ाई में व्यवधान न हो इसलिए एक - एक कर उसके मम्मी पापा दोनों घर के बाहर निकल गए।
रिया के पापा एक सीधे सादे किसान थे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली जिले में रहते और उसका विशेष ध्यान रखते थे। रिया का भी अपने पापा से विशेष लगाव था।
अभी वह प्रश्नोत्तरों को एक बार पढ़कर उन्हें दोबारा से दोहराने की तैयारी कर रही थी। उसे बाहर की ओर से आता हुआ शोर सुनाई दिया। पहले तो उसने इस ओर ध्यान नहीं दिया मगर जब लड़ाई की आवाजों के बीच जब उसे अपने पापा की आवाज सुनाई दी तो वह अपने आप को ना रोक सकी।
जब वह घर से बाहर निकल कर आई तो बाहर का माहौल बहुत अशांत था। उसके ताऊ और पापा से कुछ लोग जोर - जोर से चिल्लाते हुए लड़ रहे थे। कोई जमीन के बारे में विवाद था। जो उन लोगों और उसके पापा , ताऊ के बीच काफी समय से चल रहा था। वैसे तो रिया के पापा शांत स्वभाव के थे मगर जब कोई घर पर चढ़ कर आए और उल्टा - सीधा बोले तो कोई अपने गुस्से पर काबू कहाँ तक रखे।
अब बातचीत में तेजी आती जा रही थी। विरोधी लगातार हावी होने की कोशिश कर रहे थे। वे हमलावर हो रहे थे। और अब तो उन्होंने हाथों में अवैध हथियार लहराने शुरू कर दिए। रिया को लगा कि आज कुछ बड़ी गड़बड़ होने वाली है। रिया के ताऊ ने उन लोगों से चले जाने के लिए कहा।
मगर वे कई लोग थे और आज कुछ सोच कर ही आए थे। बात बढने पर अचानक उनमें से एक ने आगे बढ़कर हवा में गोली चला दी। चारो तरफ अफरा - तफरी फैल गई। वे तेजी से रिया के पापा की ओर बढ़े।
 किसी अनहोनी की आशंका से रिया पापा की ओर दौड़ी। और फिर वही हुआ जिसका डर था एक हमलावर रिया के पापा का निशाना बनाकर पिस्तौल तान दी।
किसी के ‘हिम्मत है तो चला गोली’- कहते ही उसने हिम्मत दिखाते हुए गोली चला दी। मगर इसी बीच रिया तेजी से पापा और गोली के बीच आ गई। वह गोली रिया को लगी। चारो तरफ ‘हाय’ ‘हाय’ का शोर मच गया। रिया की माँ भी दौड़ती हुई आईं और हमलावरो की चलाई गोली का शिकार बनकर घायल होकर गिर गईं।
लडकी के गोली लगते ही वहाँ का माहौल बदल गया। ऐसे में हमलावरों ने भी भागने में ही अपनी भलाई समझी। इधर रिया के सीने में गोली लगते देख सब उसे बचाने दौड़े। उसके पापा ने उसे बाहों में भर लिया।
वे उसे और उसकी माँ को लेकर डाक्टर के पास पहुँचे मगर तब तक देर हो चुकी थी। रिया की मम्मी तो बच गईं परन्तु रिया को न बचाया जा सका। रिया ने अपने सीने पर गोली खा ली मगर अपने पापा पर आँच न आने दी।
रिया के साहस और बलिदान ने सुनने और जानने वाले सभी लोगों की आँखें नम कर दीं। उसकी बहादुरी और प्रेम ने सभी को हैरत में डाल दिया। देश के प्रधानमंत्री जी ने उसे मरणोपरांत राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया।
बापू गयाधानी राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार पाते समय रिया के पापा और मम्मी की आँखों के सामने उसका प्यारा चेहरा बार - बार आ रहा था। मानो वह कह रही हो - ‘पापा मैं तुम्हारी बेटी हूँ, तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगी।’पापा की आँखों से आँसू रोकने की कोशिश में छलके जा रहे थे।

दोस्तो -

हम चिडियों सी चहक चहक, घर चिचियाहट से भर दें,
हँस-हँस कर गम की सारी स्थिति परिवर्तित कर दें,
इस रोती - धोती दुनिया को हँसने का अवसर दें,
अमृत दें, हमको बदले में चाहे लोग जहर दंे,

     

ऐसे टला ट्रेन हादसा

उसकी उम्र चौदह  साल थी और वह सातवीं कक्षा में पढ़ता था। नाम था वेंकटेश्वर राव । नारागनी वेंकटेश्वर राव, सीधा सादा भोला भाला, गोल मटोल मुँह चेहरे से मासूमियत टपकती हुई।
उस दिन रविवार था छुट्टीवाला दिन, सो खा - पीकर उसने एक बैटनुमा लकड़ी उठाई और घर से निकल लिया। बाहर उसके पड़ोस का दोस्त मिल गया। फिर क्या था दोनों चल दिए खेल के मैदान की ओर। वे आपस में बातचीत करते हुए चले जा रहे थे। घर के पास के छोटे रास्ते को पार करते हुए अब वे दोनों रेलवे ट्रैक के किनारे - किनारे चलने लगे। दरअसल रेलवे लाइन के उस पार खेल का मैदान था।
 सारे इलाके के बच्चे वहीं के खुले मैदान में खेलते थे। बड़े बच्चे क्रिकेट खेलते, छोटे बच्चे उसे देखते या खुद किसी छोटी मोटी टीम का हिस्सा बन जाते और किसी कोने में खेलने लगते। छुट्टी के दिन तो सुबह से ही वहाँ बच्चों का जमावड़ा लग जाता।
बस खाने के समय या उससे कुछ पहले बच्चे वहाँ से फुरसत पाकर घर आ जाते। किसी के घर से स्वीकृति मिल जाती तो कोई चुपके से बहाने बनाकर आ जाता। जिन्हें देर हो जाती तब तक उनकी जगह दर्शकों में से किसी से भर जाती। आपके पास खेल का सामान हो या न हो तो भी आप वहाँ जा सकते हैं। आपको खेलने का अवसर मिलने की पूरी संभावनाएं होती हैं।
वेंकटेश्वर और उसके दोस्त तो अक्सर छुट्टी के दिन वहाँ जाते थे। उसके स्कूल ब्रहमपुर के अनेक लड़के वहाँ खेलने आते थे।उनके साथ वेंकटेश्वर को भी खेलने में अच्छा लगता था। इसी सिलसिले में अपनी व मित्रों की बातें करते हुए वे चले जा रहे थे।
तभी रेलवे ट्रेक के किनारे एक प्लास्टिक की खाली बोतल पर वेंकटेश्वर की नजर पड़ी। हाथ में पकड़ी लकड़ी से अनायास ही उसने उसमें चोट मार दी। बोतल लड़खड़ाती हुई आगे पत्थरों के पास गिरी। आगे बढ़कर उसने उसको फिर हिट किया तो हवा में उछलती बोतल रास्ते के बीचोंबीच गिरी। वेंकटेश्वर ने उसमें फिर लकड़ी की चोट मारी तो बोतल उड़ती हुई रेलवे ट्रेक के बिलकुल बीच में जा गिरी। वह उसे उठाने के लिए फिर आगे बढ़ा। अब उसे इस खेल में मजा आने लगा था।
पहले उसने अपने दोस्त को ही बोतल उठाकर लाने के लिए इशारा किया। लेकिन उसके दोस्त ने मुँह पिचकाते हुए उससे कहा - ‘ छोड़ यार ! चलते हैं जल्दी, देर हो रही है।’
‘अभी चलते हैं’- कहता हुआ वेंकटेश्वर बोतल उठाने के लिए ट्रैक के बीच पहुँचा।
अचानक उसकी नजर पटरी के बीच पड़े खाली स्थान पर गई। पटरी के बीच कम से कम छह इंच का टुकड़ा था ही नहीं । उसने जल्दी से अपने मित्र को पास बुलाकर दिखाया और कहा - देख, इससे तो दुर्घटना हो सकती है। हमें इसकी खबर केबिन मैंन को करनी चाहिए।’
उसका दोस्त झुँझला गया और बोला - ‘ट्रैक टूटा है तो टूटा रहे, हमें क्या ? चलो खेलने चलते हैं।’
‘नहीं’ हमें इसकी सूचना देनी चाहिए।’ मैं तो जाऊँगां’। - वेंकटेश्वर बोला।

तो तू जा, मैं तो चला खेल के मैदान में, खबर करके वहीं आ जाना।’ - उसका दोस्त यह कहकर आगे बढ़ गया।
वेंकटेश्वर उस भयावह पल की कल्पना करके काँप गया, जब उस ट्रैक पर कोई गाड़ी आ जाएगी और दुर्घटना हो जाएगी। अगर उसने समय रहते यह सूचना न पहुँचाई तो उस संभावित भयंकर दुर्घटना का जिम्मेवार वह स्वयं को समझेगा।यह सोचकर वह तेजी से केबिन की ओर दौड़ पड़ा।
केबिन उससे एक सौ पचास गज की दूरी पर था। वह दौड़ता हुआ केबिन के निकट जा पहुँचा।उसे उस समय वहाँ कोई दिखाई नहीं दिया। उसने आवाज भी लगाई,मगर कोई उत्तर न पाकर वह वहाँ से आगे की ओर दौड़ गया।केबिन मैन शायद वहाँ नहीं था या संभवता उस तक बच्चे की आवाज नहीं पहुँच पाई। जो भी हो।
अब वेंकटेश्वर आगे ही आगे दौड़ता चला जा रहा था। उसका लक्ष्य पेड़ना रेलवे स्टेशन था जो वहाँ से सामने दिखाई दे रहा था। उसके पैरों में मानो पंख लग गए। जब वह हाँफता हुआ प्लेटफार्म पर चढ़ा तो उसकी नजर सीधी स्टेशन मास्टर के कमरे की ओर थी।
उसे तेजी से इस तरह भागते देख कई लोग उसकी ओर देखने लगे क्योंकि उस समय कोई ट्रेन प्लेटफार्म पर नहीं थी। मगर उसने उन सब की परवाह नहीं की। जब वह धड़धड़ाते हुए स्टेशन मास्टर के कमरे में घुसा तो कुर्सी पर बैठे स्टेशन मास्टर चैंक गए और प्रश्नसूचक निगाहों से उसकी ओर देखने लगे।
वेंकटेश्वर के मुँह से टूटे - फूटे शब्दों में निकला - ‘वह... वहाँ...टूटा है।’
स्टेशन मास्टर ने पूछा - ‘अरे’ जरा साँस तो ले लो। क्या कहाँ टूटा है ?’
इतनी देर में अपनी साँसों को व्यवस्थित करते हुए वेंकटेश्वर स्टेशन मास्टर से फिर बोला -‘ट्रैक... ट्रैक टूटा है आगे, आने वाली गाड़ी को रोक दो।’
स्टेशन मास्टर ने चैंकते हुए पूछा - ‘कहाँ, किस जगह की बात कर रहे हो?’
‘यहीं केबिन से थोड़ा आगे,पटरी के बीच खाली जगह है।’ - वेंकटेश्वर के स्वर में दृढ़ता थी।
स्टेशन मास्टर ने एक नजर अपनी घड़ी पर डाली फिर वेंकटेश्वर की ओर देखा उन्हें लगा, हो न हो ये लड़का सच बोल रहा हो। अभी गुड़िवाड़ा पैसिंजर के आने में समय है। तब तक ट्रैक की जाँच करवा लेते हैं।
स्टेशन मास्टर को सोच में पड़े देख वेंकटेश्वर ने एक बार फिर कहा - ‘सर, आने वाली ट्रेन को रोक दो।’उसे लगा बच्चा समझकर स्टेशन मास्टर उसकी बात पर कहीं ध्यान न दें।
स्टेशन मास्टर तेजी से एक्शन में आ गए उन्होंने तुरंत ट्रैक की जांच करने वाले कर्मचारियों को बुलाया। फिर वेंकटेश्वर की ओर इशारा करते हुए कहा - ‘इस लड़के के साथ जाओ और देखो, ट्रैक कहाँ खराब है। केबिन के आगे ट्रैक में कहीं कोई गड़बड़ है। जल्दी देखकर मुझे सूचना दो। गुड़िवाड़ा पैसिंजर आने वाली है। मैं यहाँ तुम्हारी खबर का इंतजार कर रहा हूँ।
 वेंकटेश्वर उनके साथ तुरंत चल पड़ा। उसे खुशी थी कि स्टेशन मास्टर ने उसकी सूचना पर एकदम भरोसा नहीं किया तो उसे गलत भी नहीं माना। उन्होंने तथ्यों की जाँच के लिए इन कर्मचारियों को उसके साथ भेज दिया। अब वह उन कर्मचारियों को बता रहा था कि कैसे वह केबिन मैन को बताने गया था मगर उनके न मिलने पर वह दौडता हुआ पेड़ना स्टेशन मास्टर के कमरे में पहुँचा।
बातों - बातों में वे केबिन से आगे उस स्थान तक आ पहुँचे। टूटे टैªेक को देखते ही रेलकर्मियों ने स्टेशन मास्टर को सूचित किया कि वास्तव में वेंकटेश्वर की खबर बिलकुल सही थी। टैªेक में खराबी थी। आने वाली गाड़ी को रोक दिया जाए। स्टेशन मास्टर ने गुड़िवाड़ा से पेड़ना आ पहुँची, पैसेंजर ट्रेन को लाल सिग्नल दिखाकर रोका दिया।
 स्टेशन के पास तक आ पहुªँची ट्रेन के रुक जाने से यात्री उतर - उतर कर आने लगे। कारण जानने पर उन्हें पता लगा कि नन्हें साहसी बालक की सूझबूझ के कारण एक टेªन हादसा होने से बच गया। सभी वेंकटेश्वर की प्रशंसा करने लगे। लगभग एक घंटे बाद ट्रैक सही होने पर ट्रेन आगे बढी।
अगले दिन ‘वार्ता’ समाचार एजेंसी ‘आंध्र ज्योति’ ‘आंध्र भूमि’ ‘विशाल आंध्रा’ आदि अनेक समाचार पत्रों में वेंकटेश्वर की साहस और सूझबूझ की सराहना करते हुए घटना का विवरण प्रकाशित किया। पेड़ना की म्यूनिसिपल चेयरपर्सन पदमजा कुमारी व उसके बार्ड कौंसलर वी. वेणुगोपाल राव ने वेंकटेश्वर के साहस को सलाम करते हुए उसे सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया।
गणतंत्र दिवस के अवसर पर पुलिस परेड ग्राउण्ड में सारे जिले के गणमान्य लोगों के बीच वेंकटेश्वर की सूझबूझ धैर्य और हिम्मत की तारीफ करते हुए जिलाधिकारी के. प्रभाकर रेड्डी ने प्रशंसा पत्र प्रदान किया। इस अवसर पर उन्होंने वर्ष 2000 में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार प्राप्त तेरह बर्षीय बालक त्रिनाथ को भी याद किया।जिसने इसी प्रकार टूटे ट्रैक की सूचना सही समय पर देकर एक बड़ी दुर्घटना होने से बचाई थी।
विद्यालय के प्रधानाचार्य व जिलाधिकारी द्वारा वेंकटेश्वर का नाम भी राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार के लिए राष्ट्रीय बाल कल्याण परिषद नईदिल्ली भेजा गया। नारागनी वेंकटेश्वर राव को 2005 में यह पुरस्कार देश के प्रधानमंत्री जी ने अपने हाथों से प्रदान किया।

नन्हे दोस्तो -

मुðी में हम किस्मत रखते मंजिल अपनी पाँवों में,
घर हो अथवा बेघर हों शहरों में हों या गाँवों में,
पर्वत सागर तूफाँ बिजली चाहे कैसी बाधा हो,
हर इच्छा पूरी होगी , आ देखे अपनी चाहों में,


लील गई लहरें - मोनिका

‘ दीदी कहाँ जा रही हो ? - रितु ने अपनी बडी बहन को बर्तन और कपडे समेटते देखा तो पूछ लिया।
‘ये बर्तन और कपडे धोने चलना है नदी पर, चलो इधर आओ, कुछ बर्तन तुम भी उठाकर ले चलो’ - मोनिका ने रितु को पास बुलाते हुए कहा।
उससे छोटी बहन निकिता जो वहीं खेल रही थी, झट से बोल पड़ी - ‘दीदी, मैं भी चलूँ।
हाँ, आ जाओ ,ये कपडे उठा लो।’- मोनिका ने उसे भी चलने की अनुमति देते हुए कहा।
बडी बहन गरिमा की शादी के बाद घर की सारी जिम्मेदारी का भार मोनिका के कंधों पर ही आ चुका था। उसके पिता विकलांग थे और माँ अक्सर बीमार ही रहती। घर की आय का एकमात्र óोत सैनिक रहे दादा की पेंशन थी। दादी रही नहीं ं थी और अठत्तर साल के दादा के जीवन का भी कोई ठिकाना नहीं था। पता नहीं कब उस बूढ़े पेड़ की छाया और सहारा इस परिवार को मिलना बंद हो जाए।
ऐसे में सत्तरह साल की मोनिका ही थी जो इस परिवार की धुरी के रूप में गृहस्थी की गाड़ी खींच रही थी। तीन महीने पहले बड़ी बहन गरिमा की शादी में जिस जिम्मेदारी से उसने बढ़ - चढ़कर काम किया, उसे देखकर गाँव कालेश्वर के लोगों ने उसकी बड़ी तारीफ की।
बातें करते - करते तीनों बहनें गाँव से लगभग चार सौ मीटर दूर बहने वाली अलकनंदा नदी के पास पहुँचीं। मोनिका कपड़े धोने में लग गई और दोनों बहनें खेल में।
अलकनंदा नदी का प्रवाह गर्मी के बावजूद पहाडी इलाका होने के कारण काफी तेज था। अचानक निकिता ने रितु से पूछा - ‘ दीदी, ये अलकनंदा नदी कहाँ से आती है?
‘हमें नहीं पता, आओ चलो, दीदी ग्यारहवीं में पढ़ती है,उससे चलकर पूछते हैं’- रितु ने मोनिका की तरफ इशारा करते हुए कहा और वे दोनों दौड़कर मोनिका के पास पहुँचीं।
उन्होंने पूछा - ‘दीदी, हमें यह बताओ, ये अलकनंदा नदी कहाँ से निकलती है?
बद्रीनाथ धाम से ऊपर शतपथ और भगीरथ खड़क नाम के हिमनदों से निकलती है हमारी ये अलकनंदा, अब जाओ और खेलो जा के... - मोनिका ने उन्हें समझाया।
जहाँ मोनिका कपड़े धो रही थी वहीं पास में गाँव का दस साल का लड़का साहिल भी था। वह नदी में नहाने रहा था। मोनिका ने एक बार उसे किनारे पर ही रहने की हिदायत दी।
नहाते - नहाते अचानक साहिल का पैर उखडा और वह अलकनंदा के तेज बहाव में बहने लगा। पहले तो उसने स्वयं सँभलने की कोशिश की। मगर जब वह सफल न हुआ तो - ‘दीदी बचाओ’ ‘बचाओ दीदी’ की गुहार लगाने लगा।
कपड़े धोती मोनिका ने आवाज सुनकर नजरें उठाई तो देखा साहिल नदी की तेज धारा में बेसहारा बहने लगा था।
मोनिका ने तुरंत कपड़े छोड़े और तेजी से नदी के किनारे - किनारे दौड़ती हुई साहिल के पास पहुँची। अंदाजा लगाकर वह अलकनंदा की हरहराती तेज धारा में कूद गई। जल्दी ही उसने साहिल को जा पकड़ा।
अब नदी के तेज प्रवाह का सामना करते हुए उसे साहिल को सुरक्षित किनारे तक लाना था।
अलकनंदा का तेज प्रवाह उसे सँभलने नहीं दे रहा था। साहिल बुरी तरह उससे चिपटा हुआ था। ऐसे में साहिल और खुद को बचा पाना मोनिका के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था।
मोनिका ने सारी ताकत समेटते हुए साहिल को किनारे की ओर धकेला। उसने साहिल के बाल पकड़ कर उसे चट्टान की ओर चढ़ाया। साहिल ने झपट कर चट्टान का एक सिरा मजबूती  से पकड़ लिया। वह बुरी तरह हाँफ रहा था।
अब मोनिका ने ऊपर चढ़ने की कोशिश की। उसने एक झटके से ऊपर की ओर एक बड़े पत्थर पर चढ़ने के लिए छलांग लगाई। दुर्भाग्य से पता नहीं पैरों के नीचे कोई दलदली जमीन आई या कोई नुकीला पत्थर जिससे उसका पैर अचानक मुड़ गया और वह लड़खड़ा गई।
इतना समय बहुत था। पानी के तेज प्रवाह नेेे उसे सँभलने का मौका नहीं दिया। अब तक रितु और निकिता भी दौड़कर वहाँ ऊपर आ चुकी थीं। पर वो भी दूर से ‘दीदी’ ‘दीदी’ चिल्ला कर रह गईं, कुछ न कर सकीं। उनके देखतेे-देखते मोनिका अलकनंदा की भीषण लहरों में डूबती उतराती बहती चली गई।      
दोनों बहने और साहिल बदहवास दौड़ते हुए घर पहुँचे और उन्होंने सब हाल कह सुनाया। पर घर में ऐसा था कौन जो सुनकर कुछ कर पाता। वहाँ थे बीमार माँ, विकलांग पिता, बूढ़े दादा और छोटा भाई
मोनिका के चाचा गाँव के प्रधान थे उन्होंने शीघ्र ही पुलिस थाना कर्णप्रयाग में फोन से सूचना दी और गाँव वालों को लेकर अलकनंदा की ओर चल पड़े। मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
अलकनंदा में वहाँ से दस किलोमीटर आगे तक कई दिनो ं की खोज के बाद भी मोनिका का कोई अता पता न लग सका। सारा गाँव शोक में डूब गया। उसका परिवार तो बेसहारा सा हो गया। हर   घर में मोनिका की कर्मठता बहादुरी और कार्यकुशलता के चर्चे थे।
मोनिका के चाचा गाँव के प्रधान हरीश चैहान ने सारे घटनाक्रम का ब्योरा समाचार पत्रों की कटिंग व एफ आई आर के साथ विधिवत भर कर राष्ट्रीय बाल कल्याण परिषद नई दिल्ली को भेजा। मोनिका ने अपनी जान पर खेल कर साहिल के प्राणों की रक्षा की थी।उसकी बहादुरी की सराहना की गई और इस वर्ष गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर उसे देश के प्रधानमंत्री जी द्वारा मरणोपरांत राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार प्रदान किया गया।

नन्हे दोस्तो -

बैेठे भला रहें कैसे, जब कोई सामने डूबे,
होने ना देंगे पूरे हम, मौत के भी मंसूबे,
रहे जान या जाए इसमें भला कौन सी अड़चन,
वक्त पड़े तो दे देते हम, ये नन्हा सा जीवन,




                                                                     असहमति का स्वर 

कहते हैं कि लोग तीन तरह की प्रवृत्ति के होते हैं। एक वे जिन्हें सुनो तो वे हमेशा यही कहते मिलते हैं क्या जमाना था जब घी मात्र इतने रुपए किलो मिलता था गेहूँ इतना सस्ता था। लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे। वगैरह वगैरह...
ऐसे लोग हमेशा पीछे बीते समय को ही देखते रहते हैं। दरअसल वे अतीतजीवी होते हैं। उन्हें पैदा होना चाहिए था तब, गलती से पैदा हो गए अब। अतीतमोह से ग्रस्त ऐसे लोग मृतक समान होते हैं। ऐसे लोगों में न तो कोई भविष्य की दृष्टि होती है न उन्हें  वर्तमान का ही कोई ज्ञान होता है। उनका जन्म अपने समय के बाद हुआ होता है।
दूसरी किस्म के लोग वे होते हैं जो समय के साथ चलते हैं। गाँव में कहते हैं न ‘जैसी चलै बयार पीठ तब तैसी कीजै’। ‘जैसा देश वैसा भेष’ बनाने वाले ऐसे समझौतावादी लोग वक्त के साथ साथ चलते हैं और अवसर मिलने पर किसी के भी साथ मिल जाते हैं, इनका कोई नीति नियम या आदर्श नहीं होता बस होता है तो अपना काम किसी भी तरह बनाना। ऐसे लोग सामान्य कोटि के जन होते हैं।
एक तीसरी श्रेणी के लोग भी होते हैं जो अपने समय से पहले पैदा हुए लोग होते हैं। उनकी दृष्टि भविष्य को देखती है वे जो भी कार्य करते हैं उसका परिणाम भविष्य में आता है इसलिए उनका कार्य  अपने समय से सीधे तौर पर असंदर्भित दिखाई देता है क्योंकि देखने वालों की दृष्टि या तो अतीतमोह से ग्रसित होती है या फिर वे सिर्फ अपने पैरो के पास तक का ही देख पाते हैं। वे उनके कार्यों को नहीं समझ पाते और उनकी आलोचना करते हैं, उन्हें पत्थरों से मारते हैं, उन्हें जिंदा जला देते हैं, उन्हें सूली पर चढ़ा देते हैं या उन्हें गोली मार देते हैं। विश्व का इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा हैं।
भविष्य में जब उनके कार्यों का महत्व आने वाली पीढ़ी को समझ में आता है तो वह उसी सूली को गले में लटका कर घूमती है उन्हीं सबकी पूजा करती है। हम ये सब देखते ही आ रहे हैं।
एक और बात कि प्रत्येक समूह या समुदाय में बहुत कम लोग होते हैं जो अग्रगामी होते हैं,बुद्धिमान होते हैं और कम लोग होते हैे जो मूर्ख होते हैं ज्यादातर संख्या औसत लोगों की होती है जिनकी अपनी कोई सोच नहीं होती है वे तो जिनका बाहुल्य या प्रभुत्व होता है उसी तरफ झुक जाते हैं।
 प्रतिरोध की संस्कृति का अर्थ है धारा के विपरीत चलना यानि कि भीड़ में न चलना। भविष्यदर्शी तो हमेशा अपने समय में अकेला भीड़ से अलग खड़ा दिखाई देगा। उसे पत्थर लाठी गोली खाने को तैयार रहना चाहिए। सूली के लिए प्रतीक्षारत...
एक प्रसंग याद आता है। अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई जारी थी। ‘प्रताप’ में उन दिनों राष्ट्रप्रेम की जो मशाल जल रही थी उसकी लौ में जलने के लिए परवाने देश के कोने कोने से आ रहे थे। उन्हीं में भगतसिंह भी थे जो पंजाब से अपना घर छोड़कर कानपुर आ गए थे और गणेशशंकर विद्यार्थी के यहाँ रह रहे थे। नीचे प्रेस और छपाई का काम चलता और वे उसी के ऊपर बनी एक कोठरी में सो जाते थे। विद्यार्थी जी ने देखा कि सुबह उनका तकिया आँसुओं से भीगा होता था। उन्हें लगा कि कहीं यह युवक जोश जोश में तो घर से नहीं भाग आया और अब इसे घर याद आ रहा है। सो एक दिन उन्होंने भगतसिंह को अपने पास बैठाया और समझाया - देखो भगत, देशसेवा की राह सुगम नहीं है ये तलवार की धार पर चलने के समान है। जोश जोश में लोग कई बार निर्णय ले लेते हैं मगर हकीकत से सामना होने पर  उन्हें अपने निर्णय पर पछतावा होता है ओर कई बार कदम इतने आगे बढ़ जाते हैं कि फिर पीछे लौटना नामुमकिन हो जाता है। लगता है तुम्हें घर की याद आ रही है। अभी तुम्हारे खिलाफ ज्यादा बड़े आरोप नहीं लगे हैं। तुम चाहो तो अभी भी वापस पंजाब जा सकते हो ?
 आखिर उस समय उनकी उमर ही क्या थी। फांसी के तख्ते पर चढ़ते समय कुल तेईस साल के ही तो थे वो और यह उनके क्रांन्तिकारी आंदोलन में कूदने के बिलकुल शुरुआती दिनों की बात थी।
भगतसिंह ने कहा - न तो मुझे घर की याद आ रही है और न ही मुझे अपने निर्णय पर पछतावा हो रहा है। मैंने सोच समझ कर इस राह में कदम रखा है और मुझे यह भी पता है कि देश ज्यादा दिन तक गुलाम नहीं रह पाएगा। देश आजाद होगा ही या मेरे सामने या मेरे बाद। मुझे दुख तो सिर्फ इस बात का है कि मैं जब सामने नौजवानों को निश्चिंत देखता हूँ मानो उन्हें अपने अलावा देश और समाज की कोई चिंता या फिक्र  ही नहीं उनके दिलों में वह आग क्यों नहीं जल रही है जो मुझे बेचैन किए हुए है जो मुझे सोने नहीं देती। बस यही वह बात है जो मुझे परेशान करती है। अगर सारे देश की नौजवान पीढ़ी यह तय कर ले कि उन्हें गुलाम नहीं रहना तो अंग्रेजों को इस देश से जाते देर नहीं लगेगी। आखिर अंग्रेज हैं ही कितने ?
मित्रो, क्या भगतसिंह की वह चिंता आज के संदर्भ में भी उचित प्रतीत नहीं होती। क्या उनकी विचारधारा आज भी उपेक्षित नहीं है ?
आज देश के सामने इस उपेक्षा के चलते समस्याओं का एक पहाड़ सा खड़ा हो गया है। मूल प्रश्न आज भी वही है कि वह आग सबके सीने में क्यों नहीं जल रही है ?
ज्यादातर लोग यथास्थितिवादी होते हैं वे परिवर्तन नहीं चाहते। बहुत थोड़े लोग होते हैं जो भविष्य के सपने देखते हैं। यथास्थिति में परिवर्तन चाहते हैं। मगर इनका हó हमारे समाज में क्या होता है यह किसी से छिपा नहीं हैं।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए प्रतिरोध के स्वर को दबाने के प्रयासों को लेकर युद्धों का जो अटूट सिलसिला चला आ रहा है मैं उसकी बात नहीं करूँगा मगर इस लेख लिखते समय जो विश्व पटल पर आई एस और बोको हरम जैसी मानसिकता वाली दरिंदगी की दास्तानें हो रहीं हैं वे मानवता का सीना छलनी करने के लिए पर्याप्त हैं।
आज राष्ट्रीय स्तर पर जितने भी बड़े राजनीतिक दल हैं उनमें स्वयं में कितना लोकतंत्र है वे असहमति के स्वर का कितना सम्मान करते हैं ये उनके अतीत के अब तक के इतिहास को देखकर जाना जा सकता है। अभी अभी ऐसी ही प्रवृत्तियों के विरोध में उभरे एक नए राजनीतिक दल ने असहमति में उभरे स्वरों के साथ क्या सुलूक किया ये सारे देश ने देखा। वो फलसफे जो हर एक आस्तां के दुश्मन थे, अमल में आए तो वे वक्फे आस्तां निकले, कम से कम इस घटना से तो हमें यही संकेत मिलता है।
जो अपने दल में साथियों के साथ ऐसा कर रहे हैं वे समाज में असहमति के स्वर को कितनी तरजीह देंगे सम्मान देंगे सोचा जा सकता हैं और जो राजनीति व्यक्ति औरसमाज को कदम कदम पर प्रभावित कर रही है आज जब उस राजनीति को संचालित करनेवालों का यह हाल है तो अन्य क्षेत्रों में क्या स्थिति होगी ये किसी से छिपा नहीं है।
इस लेख को लिखते समय ही राष्ट्रीय पटल पर निर्भया के बलात्कारी के बयान के प्रसारित किए जाने पर बहस सुर्खियों में है। जिसमें उसने कहा है - वह इसलिए मारी गई क्योंकि उसने प्रतिरोध किया,उसे प्रतिरोध नहीं करना चाहिए था।
उसका यह बयान न केवल पुरुषवादी समाज में नारी की स्थिति को दर्शाता है बल्कि सारे मनुष्य समाज में जो भी कमजोर है उसकी स्थिति को बयान करता है। वस्तुत हमने कभी असहमति के स्वर को सम्मान नहीं दिया तभी हमें इस विषय पर ढ़ेरांे कानून और नियम बनाने पडे क्योंकि हम नियम तभी बनाते हैं जब वह काम सामान्यता नहीं रुकता।
 एक रोचक प्रसंग यहाँ बताना चाहूँगा एक बार किसी काम के सिलसिले में सर्वोच्च न्यायालय जाना हुआ। लंच के समय में वहाँ की कैंटीन में जाने के लिए आगे बढ़ा तो एक बोर्ड लगा देखकर ठिठक गया। लिखा था - अधिवक्ताओं के अलावा अन्य का जाना प्रतिबंधित
  अब क्या करें ? रुक गए।  साथी मित्र ने कहा- आप भी कितने भोले हो। अरे भाई, बोर्ड लगाने की जरूरत क्यों पड़ी क्योंकि लोग जाते हैं न इसलिए। जहाँ लिखा हो - यहाँ पेशाब करना मना है इसका मतलब है कि लोग वहाँ पेशाब करते हैं न इसलिए तभी तो बोर्ड लगाना पडा। उनकी बात में दम था।
प्रतिरोध के स्वर को दबाने के ये प्रयास सदियों से चलते आए हैं। हम कितना भी दावा करे कि हम सभ्य हो गए हैं मगर हकीकतें कदम कदम पर हमें आइना दिखाती हैं।
बलात्कार जैसे विषय पर बनने वाली फिल्म ‘इंसाफ का तराजू’ के लिए गीत लिखते समय साहिर लुधियानवी ने इस सच्चाई को उजागर किया था - जबर से नस्ल बढ़े ,जुल्म से तन मेल करें,जो अमल हममें है,बेइल्म परिंदों में नहीं,हम जो इंसान की तहज़ीब लिए फिरते हैं, हम सा वहशी कोई जंगल के दंिरंदों में नहीं,
ये दरिंदगी सदियों से कायम है।मगर चाहे जिंदा आग में जलाए गए हो,सूली पर चढ़ाए गए हों या गोलियों से छलनी किए गए हों। प्रतिरोध और असहमति के स्वर कभी बंद नहीं हुए परिस्थितियों में मंद भले ही हो गए हों।
व्यक्ति और समाज की भलाई के लिए ये प्रतिरोध और असहमति के स्वर उठते रहे हैं,उठते रहेंगे ताकि वह सुबह आ सके जिसका हमें सदियों से इंतजार है। भविष्यदर्शी कभी निराश नहीं होता। उसे उम्मीद है कि -
हकीकतें हैं सलामत तो ख्बाब बहुतेरे ,मलाल क्यों हो जो कुछ ख्बाब रायगां निकले,
 

हमें राष्ट्रीय स्तर पर एक बाल साहित्य अकादमी चाहिए

{ निम्नलिखित वक्तव्य अंतराष्ट्रीय बाल साहित्य सम्मेलन 18-19 अक्टूबर 2014 को उत्तराखण्ड बाल कल्याण साहित्य संस्थान खटीमा जिला ऊधमंिसंहनगर उत्तराखण्ड भारत में पढ़ा गया। जिसमें मैंने राष्ट्रीय पुस्तक न्यास यानि नेशनल बुक ट्रस्ट्र नईदिल्ली के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया था।}


मित्रो,

मैं अपनी बात की शुरुआत एक सच्ची घटना से करता हॅंू जो मुझे मेरे एक मित्र ने सुनाई थी। बरसों पूर्व जब वे दिल्ली से वाराणसी के बीच रेलवे के एक रिजर्व कूपे में सफर कर रहे थे। उनके सामने की बर्थ पर एक विदेशी सज्जन बैठे थे। जैसी कि स्वाभाविक जिज्ञासा हम सब की होती है उनकी भी हुई। उन्होंने अभिवादन किया। किताब पढ़ने में व्यस्त उन सज्जन ने जरा सी नज़रें उठाई और अभिवादन का उत्तर दिया और फिर पढ़ने में मशगूल हो गए।

मि़त्र के मन में अनेक प्रश्न कुलबुला रहे थे। सफर लंबा था और पड़ोसी सज्जन किताब से बाहर नहीं आ रहे थे।
मित्र ने उनसे दूसरा प्रश्न किया - आप किस देश के निवासी हैं ?
उन्होंने एक बार फिर धीरे से किताब के पृष्ठों से अपनी नज़रें जरा उपर कीं और संक्षिप्त सा उत्तर दिया - पोलॅैंड

मित्र महोदय ने अपना सामान वगैरह ठीक करके रखा, अब वे आराम से बैठे यह चाह रहे थे कि सहयात्री से कुछ बात करें मगर सहयात्री था कि किताब से बाहर आने का नाम नहीं ले रहा था।

धृष्टता करते हुए मित्र महोदय ने फिर एक प्रश्न कर दिया - क्या आप पहली बार भारत आए हैं?
नहीं दूसरी बार - जबाब देकर वे एक बार फिर किताब में खो गए।

अंग्रेजी भाषा में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर जब ंिहंदी में मिले तो मित्र महोदय की उत्सुकता और भी ज्यादा बढ़ गई।
फिर तो जैसे मित्र के सब्र का बांध ही टूट गया।
उन्होंने एक साथ दो प्रश्न दाग दिए - आपको भारत कैसा लगा ? आप इसके बारे में क्या जानते हैं ?

लगातार हो रहे प्रश्नों के वार से वे सज्जन समझ गए कि ये व्यक्ति उसे पढ़ने नहीं देगा। उन्होंने अपनी किताब को एक तरफ रख दिया और पूरे मन से बात करने के मूड में आ गए।

विदेशी सज्जन ने कहा - मुझे तो भारत जैसा लगा है मैं बताता हूॅ मगर पहले आप मुझे ये बताओ कि आपको भारत कैसा लगा ?

मित्र महोदय चैंके - मुझे कैसा लगा ? हँँसते हुए बोले - मैं तो यहाँ रहता ही हँू।

विदेशी सज्जन ने कहा - रहते तो हो, मगर जानते भी हो कुछ भारत के बारे में ?

मित्र बोले - हाॅं हाॅं क्यों नहीं, पूछिए आप ? क्या जानना चाहते हैं ?

जरा बताएं आप, जिस वाराणसी में जा रहे हैं उसे वाराणसी क्यों कहते हैं ?-विदेशी सज्जन ने प्रश्न पूछा।
यह वरुणा और असी नाम की दो नदियों के पास बसा है इसलिए इसे वाराणसी भी कहते हैं वैसे इसके और भी नाम हैं....-मित्र ने मुस्कराते हुए तत्काल उत्तर दिया।

फिर एक-एक करके प्रश्नों का जो सिलसिला शुरू हुआ तो देश के अन्य राज्यों की ओर जाने लगा।
अब तो मित्र महोदय को पसीना छूटने लगा।

क्योंकि जिस राज्य में हम रहते हैं या जिससे वास्ता होता है उसके बारे में हमको अमूमन पर्याप्त जानकारी होती है मगर अन्य राज्यों की जानकारी को लेकर हम प्रायः कूपमंडूक ही होते हैं।

यही हाल उन मित्र महोदय का हुआ। धीरे-धीरे जबाब चुकने लगे और एक समय आया जब मित्र महोदय सोचने लगे कि कहाँ मैंने इससे पंगा ले लिया इससे तो अच्छा था कि मैं चुप ही रहता।

जब मित्र के उत्तर की जगह मौन ने ले ली तब उन विदेशी सज्जन ने कहा - आपको तो अपने देश की संस्कृति के बारे में नहीं पता। आइए मैं बताता हूँ कि आपके देश की संस्कृति क्या है ?

फिर एक - एक करके उन्होंने जो भारत के बारे में बताना शुरू किया तो मित्र महोदय के दिमाग के परखच्चे उड़ने लगे।
उन्हें लगा कि उनका देश के बारे में ज्ञान कितना थोथा था। वे अपने देश के बारे में कुछ भी तो नहीं जानते और बिना जाने उस पर गर्व करते हैं।

यहाॅ हम आपको ये बताते चलें कि मित्र महोदय राष्ट्रीय स्तर की सांस्कृतिक संस्था में कार्यरत थे और इस घटना से सबक लेते हुए उन्होंने स्वयं को सुधारा, अक्सर वे यह वाकया मित्रों को बताते हैं जिसने उनके जीवन में परिवर्तन ला दिया।
 ं
मित्रो, एक बार सोचें, बच्चों को अगर छोड़ दें तो कमोवेश यह स्थिति कहींे न कहीें हमारी भी तो है।

जब मैंने यह घटना प्रकाशन विभाग की पत्रिका ‘बालभारती’ की संपादक विभा जोशी को बताई तो उन्होंने मुझसे बच्चों को देश की संस्कृति की जानकारी देने के लिए एक श्रंृखला लिखने का आग्रह किया और ‘रंगरंगीला देश’ के नाम से यह लगातार लगभग तीन वर्ष तक ‘बालभारती’ में चली और बेहद लोकप्रिय हुई।

हम आज भी कितना कम जानते हैं अपने देश के बारे में... इसकी समृद्ध संस्कृति के बारे में...

विड़ंवना यह है कि जब हम आम तौर पर देश के बालसाहित्य की बात करते हैं तो केवल ंिहंदी के बाल साहित्य की गिनती करने लगते हैं समग्र भारतीय भाषाओं के बाल साहित्य की नहीें और जब बच्चे की बात करते हैं तो हमारी नज़र में जो छवि होती है वह ज्यादातर एक लड़के की होती है लड़की की नहीें...

राष्ट्रीय पटल पर हमारे पास आज ऐसी कोई नियमित बाल पत्रिका नहीं है जिसमें हम भारतीय भाषाओं के बालसाहित्य को एकसाथ देख सकें।

ऐसा भी नहीं कि कुछ काम न हुआ हो। इधर पिछले कुछ वर्षों में चैबीस भाषाओं में पुस्तकें प्रकाशित करने वाली संस्था साहित्य अकादमी ने बालसाहित्य में पुरस्कार की शुरुआत की है और विदेशी बालसाहित्य के अतिरिक्त अन्य भाषाओं से भी अनूदित करवा कर हिंदी के पाठकों को बालसाहित्य उपलब्ध करवाया हैं।

विशेषकर कथा साहित्य में जो हरिकृष्ण देवसरे जी के संपादन में ‘भारतीय बाल कहानियां’ के नाम से चार पुस्तकों का सेट वर्ष दो हजार नौ में आया। जिसमें असमिया, बांग्ला, डोगरी, अॅंग्रेजी, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकड़ी, मणिपुरी, मराठी, मलयालम, मैथिली, नेपाली, ओड़िया, पंजाबी, राजस्थानी, सिंधी, तमिल, तेलगु और उर्दू से अनूदित प्रतिनिधि बाल कहानियाॅं हैं। उसका गर्मजोशी से पाठकों ने स्वागत किया। जिसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तब से तकरीबन हर वर्ष ही ये पुस्तकें पुर्नमुद्रित हुईं हैं।

ये स्थिति दर्शाती है कि ऐसी भारतीय भाषाओं की पुस्तकों के सेट अन्य विधाओं बालकविता, बालनाटक, संस्मरण, यात्रावृतांत, डायरी में भी आने चाहिए। मैं तो कहना चाहूँगा बल्कि इनके भी उपखंड़ों मसलन साहस कथाएं, हास्य कथाएं, जासूसी कथाएं, विज्ञान कथाएं आदि वर्गीकरण में भी उपलब्द्ध हों।

मेरे देखते - देखते दिल्ली में साहित्य अकादमी की पुस्तक खरीदने के लिए उसके कार्यालय से दूर स्थित उसके स्टोर में जाना पड़़ता था मगर अब उसके कार्यालय में ही बहुत सुन्दर ‘बुक शाॅप’ है। और अभी दिल्ली से चलते - चलते मुझे सूचना मिली कि अब दिल्ली के दो मेट्रो स्टेशनों पर भी वह अपनी पुस्तकें उपलब्द्ध कराएगी। वह भी पंद्रह प्रतिशत छूट के साथ। ये पहल स्वागत योग्य है। यहाॅ उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ऐसी पहल कुछ समय पूर्व कर चुका है।

मगर इसके भी पूर्व राष्ट्रीय फलक पर एक बाल पत्रिका की आवश्यकता है। जिसके माध्यम से समसामयिक बालसाहित्य से एक मंच पर परिचय हो सके। यह एक विडंबना ही कही जाएगी कि जिन बाल साहित्यकारों को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जाता है उनके बाल साहित्य से हमारा परिचय नहीें हो पाता है।
इस दिशा में साहित्य अकादमी को पत्र लिखकर व्यक्तिगत रूप से मैंने कुछ प्रयास किए हैं मगर अभी तक उस प्रयास के कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आए हैं।

यद्यपि राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नई दिल्ली यानि नेशनल बुक ट्रस्ट्र अटठाइस भाषाओं में पुस्तकें प्रकाशित करता है और उसने ‘राष्ट्रीय बाल साहित्य केंद्र’ के नाम से बाल साहित्य संर्वधन के लिए अलग शाखा बना रखी है।
बाल पाठकों की पठन रुचि को बढ़ावा देने के लिए वह अनेक उपयोगी कार्यक्रम संचालित करता है। उसके माध्यम से ही ‘पाठक मंच बुलेटिन’ नामक बाल पत्रिका हिंदी व अंग्रेजी में निकलती है। जो कि चालीस हजार की संख्या में छपकर दूर दराज के पाठक वर्ग तक पहुँचती है,जो अन्य बाल पत्रिकाओं की प्रसार संख्या को देखते हुए वैसे तो काफी बड़ी संख्या है। मगर हमारे देश की जनसंख्या के पैंतीस प्रतिशत अठारह वर्ष तक के पैंतालिस करोड़ बच्चों के सामने यह संख्या भी ऊँट के मंुह में जीरा जैसी ही है।

‘पाठक मंच बुलेटिन’ के वर्ष के दो अंक देश के किसी राज्य के सुदूर क्षेत्र में जाकर बच्चों के साथ तैयार किए जाते हैं जिसमें कहानी, कविता, चित्र, लेख, मुखपृष्ठ सब कुछ बच्चों की भागीदारी से तय होता है। सौभाग्य से ऐसी ही एक कार्यशाला में हिमाचल प्रदेश के ऊना शहर से दूर दराज गाँव में बच्चों के साथ एक अंक तैयार करवाने का अवसर मुझे कुछ वर्ष पूर्व मिला।

एक समय था जब राष्ट्रीय बालभवन, नईदिल्ली द्वारा डा. मधु पंत के निर्देशन में बाल साहित्यकार सम्मेलन आयोजित किए गए। लगातार कई वर्षों तक चले इन सम्मेलनों में पढ़े गए पर्चे बाद में पुस्तक रूप में प्रकाशित किए गए। इनमें से कुछ सम्मेलनों में भाग लेने का अवसर मुझे भी मिला। डा. मधु पंत के वहाँ से जाने के बाद वह सिलसिला रुक गया। यहाँ हम आपको यह बताते चलें कि राष्ट्रीय बाल भवन का मुख्य कार्य बाल साहित्य के संर्वधन नहीं है। बाल प्रतिभा उन्नयन का है साहित्य उसका एक हिस्सा है। हाँ ऐसे बाल साहित्यकार सम्मेलन राष्ट्रीय स्तर पर बनी केंद्रीय हिंदी निदेशालय, हिंदी या अन्य भाषाओं की अकादमियां, राष्ट्रीयविज्ञान प्रसार आदि अनेक संस्थाएं कर सकतीं हैं।

कितनी बड़ी विसंगति है कि हमारी आजादी के छह दशक बीत जाने के बाद अभी कुछ महीने पूर्व ही हमारे सबसे स्वाभाविक पड़ोसी मित्र देश नेपाल का साहित्यिक प्रतिनिधि मंडल पहली बार हमारे देश की साहित्यिक यात्रा पर आया। साहित्य अकादमी के आमंत्रण पर मुझे उनसे मिलने और बात करने का अवसर मिला।

मुझे लगता है कि अब जबकि इस वर्ष का नोबेल शांति पुरस्कार एक बच्चे मलाला यूसुफजई को और ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के माध्यम से बाल अधिकारों के लिए लड़ने वाले कैलाश सत्यार्थी के रूप में पड़ोसी और हमारे देश के सामने आया है। अब हमारी सोच के केंद्र में बच्चे होने चाहिए।

जरा सोचें कि पैंतालिस करोड़ की विशाल संख्या के बीच हजार दो हजार की संख्या में किसी पुस्तक की प्रतियाँ छपवाकर हम किस तरह का भरम पाले बैठे हैं।

हमें राष्ट्रीय स्तर पर एक बाल साहित्य अकादमी चाहिए। जो न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बाल साहित्य की बढ़ती माॅंग को पूरा करे बल्कि ज्यादा बाल साहित्यकार भी तैयार करे।

मित्रो, मुझे लगता है राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय भाषाओं के बाल साहित्यकारों के निकट आने से हमें अपने देश की बच्चों की आशाओं सपनांे और उनकी आकांक्षाओं को निकट से जानने का अवसर मिलेगा। हम और हमारे बच्चे अपनी सांस्कृतिक विविधता से रूबरू होकर अपनी अस्मिता अपनी पहचान अपने भारतीय मूल्यों से परिचित हो सकेंगे।


गत दिनों राजस्थान के बाल साहित्य पर केंद्रित ‘मधुमती’ पत्रिका का अंक पढ़ने को मिला। जिसके अनुसार राजस्थानी बाल साहित्य में बाल उपन्यास, कहानियाँ, कविताएं तो खूब मिलती हैं परंतु, रोमांच, जासूसी कहानियों की अनुपलब्द्धता का जिक्र किया गया था। वहीं अगर हम बांग्ला बाल साहित्य पर नज़र डालते हैं तो हमें एक से बढ़कर एक रहस्य रोमांच जासूसी की कहानियों की पूरी श्रंृखला दिखाई देती है।

दरअसल बंगाल में परंपरा रही है कि कोई साहित्यकार तब तक बड़ा साहित्यकार नहीं माना जाता है जब तक उसने बच्चों के लिए न लिखा हो। यही कारण है कि रवींद्रनाथ टैगोर से लेकर सत्यजीत रे, आशापूर्णा देवी, सुकुमार राय, अवनीद्रनाथ टैगोर, समरेश बसु, सुनील गंगोपाध्याय, सुचित्रा भटटाचार्य, विभूतिभूषण वंधोपाध्याय, गुरुकिशोर घोष आदि अनेक नाम हैं जिन्होंने बच्चों के लिए उत्तम साहित्य रचा।

एक सर्वे में यह बात निकलकर सामने आई कि छह से नौ साल के बच्चे जीवनी पढ़ना पसंद नहीं करते हैं। दरअसल हमारे देश में आयु वर्ग के अनुसार लेखन की परंपरा उस तरह से नहीं रही जैसी अन्य देशों में हुई।  मगर अब राष्ट्रीय पुस्तक न्यास नईदिल्ली व अन्य संस्थाएँ इस दिशा में सँिक्रय हंै।

भारतीय बाल साहित्य में इस पर खूब काम हुआ हैं। असमिया बाल साहित्य में दिनेशचंद गोस्वामी कीे सौ वैज्ञानिकों के परिचय और कार्यों के बारे में ‘शताधिक महान बिजनानी’ नाम की पुस्तक उपलब्ध है। वही बांग्ला बाल साहित्य में स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता की जीवनी ‘आमादेर निवेदिता’ के नाम से स्वामी विवेकानंद के जीवन और कार्यों पर शोध करने वाले शंकरीप्रसाद बसु ने लिखी है वही अवनींद्रनाथ टैगोर ने तो अपने बचपन की कहानी ही ‘अपन कथा’ के नाम से बच्चों के लिए लिखी।

मेरा उद्देश्य यहाँ पुस्तकों की गिनती करना नहीं बल्कि ये बताना है कि दुनिया तेजी से आगे बढ़ रही है और उससे भी अधिक तेजी से बढ़ रहीं हैं हमारे बच्चों की अपेक्षाएं और आकांक्षाएं...

जमाना विशेषज्ञता का है। शिशु साहित्यकार, बाल साहित्यकार, किशोर साहित्यकार, से भी आगे बढ़कर हमें हर आयु - वर्ग के लिए विशेष विशेषज्ञ साहित्यकार की आवश्यकता है। हमारे देश का ही नहीं बल्कि विश्व का विशाल बाल पाठक हमारी ओर उत्सुक नयनों से निहार रहा है। हम कब उनके सपनों के पंखों को नई उड़ान नई ऊँँँँँँचाइयाँ देंगे। अभी ...कब...

मित्रो, कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने कहा था - ‘अरब के तीर तलवार की भाषा जानने वाले हमलावर सिपाहियों की अरबी और भारत के व्यापारिक वर्ग की हिंदी के मेल से इतनी प्यारी भाषा उर्दू का जन्म हुआ है’। तो क्या हम सभी भारतीय बाल साहित्यकार एक मंच पर आकर ऐसी भाषा, ऐसी संस्कृति अपनी आगामी पीढ़ी को नहीं दे सकते जिसमें भारत की समग्रता की खुश्बू हो ? क्यों नहीं दे सकते हैं ? दे सकते हैं।

देश के हर स्थान विशेष की अपनी अलग विशेषता है अपनी महक है। जो राष्ट्रीय स्तर पर बाल साहित्य अकादमी के सामूहिक और बेहतर प्रयासों से सामने निकलकर एक मंच पर  आएगी और देश के नौनिहालों के समग्र विकास में सहायक बनेगी।


 आप सब ने मेरी बातों को ध्यानपूर्वक सुना इसके लिए आप सब का धन्यवाद, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास यानि नेशनल बुक ट्रस्ट्र नईदिल्ली का धन्यवाद जो उसने आप सबके बीच मुझे मेरे मन की बात कहने का मौका दिया।

"देश के रत्नों से उनकेे नाम कामों से जड़ी,
इस तरह तुमने सुनी है,क्या कभी बारहखड़ी,
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रजनीकांत शुक्ल
'क' से कुल दुनिया हमारी,
जिसमें भारत देश है,
'ख' से खेती जिसमें ,
जीवन दान का संदेश है,
'ग' से गंगा सबसे पहले,
आर्य उतरे थे जहाँ,
'घ' से घर की आबरू,
रक्षक हैं जिसके नौजवां,
'च' से राजा चंद्रगुप्त औ,
'छ' से उसका छत्र है,
देश के इतिहास का,
वह युग सुनहरा पत्र है,
'क' से कुल दुनिया हमारी,
जिसमें भारत देश है,
'ख' से खेती जिसमें ,
जीवन दान का संदेश है,...
साहिर
फिल्म - चाँदी की दीवार

रखो कदम तुम ऐसे जो,
पैरों से पदचाप न हो,
पहले सोचो फिर बोलो,
कहके फिर संताप न हो,
मन वाणी और कर्म सभी,
निर्मल कर लो कुछ ऐसे,
जो व्यवहार करो जग से,
उसमें कोई पाप न हो,
लगता मुझसे बड़ा कोई,
साथ चले मेरे साया,
सोच रहा तो लगता है,
वो खुद अपना आप न हो,
रेत औ पानी पर लिक्खे,
नाम सभी मिट जाएंगे,
काम ही क्या जिनकी,
मन की चट्टानों पर छाप न हो,
सब सोते मैं जगता हूँ,
पता नहीं क्या बकता हूँ,
मैं समझा वरदान जिसे,
पता नहीं अभिशाप न हो,

समय की नदी तो,बही जा रही है,
तेरी आरजू सब,रही जा रही है,
ठहर तो कुछ एक पल,ज़रा सोच ले तू,
मुखौटे जो पहने, उन्हें नोच ले तू,
क्या आया था करने,क्या करने लगा है,
पता है हर एक पल तू, मरने लगा है,
गलत राह है या, सही जा रही है,
तेरी आरजू सब, रही जा रही है,
बहुत पुण्य तेरे, तू ऐसा बना है,
जरा आईना देख, कैसा बना है ?
नहीं ऐसा अवसर, दोबारा मिलेगा,
न जाने कमल ऐसा, फिर कब खिलेगा ?
कथा ये चिरंतन, कही जा रही है,
तेरी आरजू सब, रही जा रही है,
चले जा रहे हैं,ये साँझ और सवेरे,
ये सूरज ये चंदा, न तेरे न मेरे,
भले पास आएं, न तेरे उजाले,
कोई मन से मीठी सी, धुन गुनगुना ले,
ये नईया किधर भी, नहीं जा रही है,
तेरी आरजू सब, रही जा रही है,
समय की नदी तो...

कितनी बढ़ गई दीमक,छत पे चढ़ गई दीमक,
चौखटों दीवारों पर, लो पसर गई दीमक,
हम तो बचके चलते थे,देखकर निकलते है,
बस जरा नज़र चूकी, काम कर गई दीमक,
मकड़ियों के जालों की,क्या ख़ता उजालों की,
हम ही देख ना पाए, घर में भर गई दीमक,
सागवान शीशम भी, भरभरा के गिर जाएं,
एक बार अंदर से, जो गुजर गई दीमक,
मिलके साथ रहती है, नोंचके खा जाती है,
छत से ही नहीं दिल से पर उतर गई दीमक,
एक काम कर लेना,इंतजाम कर लेना,
खोखला ही करती है,बस जिधर गई दीमक,
चूके तो मिटा देगी,साफ लिखा था जिसको,
मैं न पढ़ सका था पर इसको पढ़ गई दीमक,
दोस्तो खबर रखो, हर तरफ नज़र रखो,
जब किया तो देखो फिर किधर गई दीमक,

जो सुनता हूँ औरों से,
मेरे मन की बात न हो,
संपति का बँटबारा है,
देखो जूता लात न हो,
छोड़ गया मैदां खुद ही,
लड़ने की औकात न हो,
ऐसा वैसा मत कहना,
जब तक कोई साथ न हो,
हारा,ताकत़वर दुश्मन ?
या अपनो का हाथ न हो,
लोग कहे ख़ुदगर्ज़ मुझे,
मौला ऐसी जात न हो,
एक पल भी तुझको भूलूँ,
ऐसा दिन ये रात न हो,
एक बार ये जी भर लूँ,
फिर चाहे तो बात न हो,

होती जातीं हैं सतत, हमसे ऐसी भूल,
मन दर्पन धुँधला हुआ,हमें झाड़नी धूल,
दुनियाँ से होकर अलग, करना काम विशेष,
आएं वापस लौटकर, जग हो अपना देश,
बदल जाए इस जगत से, अपना यह व्यवहार,
करना है कुछ दिन हमें, खुद से साक्षात्कार,
दौड़ भाग संसार की, चली रहे अविराम,
पर मैं इससे ले रहा, कुछ दिन का विश्राम,
कल बेहतर हो इसलिए, मित्र विदा दो आज,
समझो सर्विस के लिए, जाता हूँ गैराज,

मेरा हर दर्द अपना आप,
दरमा होता जाता है,
चमक में आँसुओं की,
इक हँसी मालूम होती है,
मिटाया था तेरी खातिर,
निशाने अक्शे हस्ती तक,
तेरी हस्ती मगर हस्ती,
मेरी मालूम होती है,
कभी कभी खुदी का,
नाम तक बाकी नहीं रहता,
कभी लेकिन खुदी ही,
बेखुदी मालूम होती है,
चिरागे रह बनेंगे एक दिन,
नक्शे कदम मेरे,
अभी रफ्तार मेरी,
गुमरही मालूम होती है,

जमाने की हर एक शय अब,
नई मालूम होती है,
निशात अंगेज हरसू जिंदगी,
मालूम होती है,
तेरे जल्वों का परतों,
जर्रे -जर्रे में नुमाया है,
मेरी आँखों में तेरी,
रौशनी मालूम होती है,
तेरा जल्वा मेरी आँखों में,
कुछ ऐसा समाया है,
कि हर शक्ले हँसीं,
सूरत तेरी मालूम होती है,
यहाँ तक हो गई है,
तेरे जल्बों से सनाशाई,
कि त़ारीक़ी भी अब तो,
रोशनी मालूम होती है,

झुकाई कदमों में जबसे तेरे खुदी मैंने,
तो पाई जिंदगी में इक नई खुशी मैंने,
न लुत्फ जुर्रते इंकार में रहा बाक़ी,
तो फिर से सीखे हैं आदाबे बंदगी मैंने,
ग़मे जहाँ का असर दिल पे अब नहीं होता,
बदल दिया है अब एहसासे जिंदगी मैंने,
दिखाई दे रहे थे चारो तरफ मुझे अगयार,
रखी थी मुफ्त में ले सबसे दुश्मनी मैंने,
तेरी नजर से जो देखा तो सब हुए अपने,
जहाँ में चारो तरफ पाई दोस्ती मैने,
हँसी खुशी में ग़मे इश्क को नहीं भूला,
गमे जहाँ को सहा है हँसी खुशी मैंने,
ये पा के वादा कि अपनाओगे मुझे आखिर,
तुम्हारे दर्द में होने न दी कमी मैंने,
न उनकी रीत नई है न अपनी प्रीत नई,
न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई,
संकलित

"चश्मेसाक़ी की तरज़मानी से,
जिंदगी भर गई मआनी से,
जहल में बस रहा है जोमे सऊर,
अलअमाँ ऐसी नुक्तादानी से,
सब फ़सूने - जमाल कायम है,
इश्क की अपनी पासवानी से,
चाँद तारों ने नूर पाया है,
इक तबस्सुम की जोसफानी से,
जल्वऐ दोस्त रंगे हुश्ने यकीं,
हिज्र पैदा है बदगुमानी से,
हमने पायी मसरर्ते अबदी,
अपने ही सोजे जाविदानी से,
हासिले जिंदगी है वो आँसू,
जो गिरे फर्दे शादमानी से,
पायी मर्गे खुदी से सच्ची खुशी,
नग्मे उठते हैं,नौहाखानी से,
मुझको करना है राज़ की ग़र बात,
काम लेता हूँ बेजुबानी से,

"नूर का अपने खुद अमीन है तू,
जानता हूँ बहुत हसीन है तू,
है ये लेकिन कसूर क्या मेरा,
जो नही मुझको ताबे-नज्जारा,
शौके दीदार तेजतर कर दे,
शोला सामा मेरी नजर कर दे,
फिर तू आ बेनकाब होकर आ,
नूरे सद आफताब होकर आ,
जोश हुश्नो शबाब होकर आ,
शोरिशो इज़तराब होकर आ,
मेरे रग-रग में मस्तियाँ बन कर,
मेरे दिल में शराब होकर आ,
एक नजर में खराब हो जाऊँ,
तू खुद ऐसे खराब होकर आ,
मुझमें अपना जबाब पैदा कर,
फिर तू मेरा जबाब होकर आ,

जब से देखा मैंने तुमको,
दिल मेरा गाने लगा,

जिंदगी बेलुत्फ थी पर,
अब मज़ा आने लगा,


दिल में तुम धड़कन में तुम,
सांसों में भी हो तुम बसे,


अब तलक नफरत थी,अब
इस दिल पे प्यार आने लगा,

कभी कभी हमें उनका खयाल आता है,
कभी कभी हमें अपनी खबर नहीं होती,

उदास दिल है कि उनकी नजर नहीं होती,
बग़ैर शम्स के ताब -ए - कमर नहीं होती,

कुछ ऐसे लोग भी दुनियाँ में हमने देखे हैं,
समा भी जाते हैं हमको खबर नहीं होती
मेरे माशूक के दायीं तरफ,
रुखसार पर तिल है,
बड़ी मुद्दत से उसमें ही,
मेरा अटका हुआ दिल है,

Monday, 3 August 2015

संकट में सूझबूझ

स्कूल से आते ही जील को पापा का इंतजार था। वह दो बार मम्मी से पूछ चुकी थी।
 ‘मम्मी, पापा कब आएंगे।
‘शाम को, तुम्हें तो पता है, जैसे रोज आते हैं। क्या बात है आज कुछ खास है क्या?- मम्मी ने पूछा।
जील ने नहीं बताया। वह इसे रहस्य रखना चाहती थी।
बोली - कुछ नहीं, बस ऐसे ही। मैने सोचा कहीं आज शायद देर से न आएं, कहीं उन्हें जाना न हो,
उसकी मम्मी को जील की आदत का पता था। वे समझ गईं -‘ये लड़की अब पापा को ही सारी बात बताएगी और किसी को नहीं।’ वह मुस्कराते हुए घर के काम में लग गईं।
जील के पापा जब शाम को घर आए तो वह लपक कर पापा के पास पहुँची, और उनके आगे एक कागज बढ़ा दिया।
क्या है ये ?- पापा ने एक उचटती सी निगाह कागज पर डाली और मुस्कराते हुए पूछा।
‘पापा, हम न स्कूल की तरफ से दोस्तों के साथ कारवाँ रिसार्ट जा रहे है पिकनिक पर’ - जील ने जल्दी से अपनी बात कही।
कहाँ, शिवराजपुर, तो फिर... - पापा ने जानबूझकर वाक्य अधूरा छोड़ दिया।
‘पापा, ! आपको इस कागज पर साइन करने हैं कि आपको मुझे पिकनिक पर भेजने में कोई आपत्ति नहीं है।’ - जील थोड़ा झुंझलाती हुई बोली।
‘अच्छा, तो ऐसा बोलो न, लेकिन सोच लो अगर आपत्ति हुई तो’- उसके पापा ने अपनी जेब से कलम निकालते हुए कहा।
क्यों पापा ? - जील ने सवाल किया।
‘बेटी, मेरे ये साइन करना इस बात की गवाही है कि मेरी बच्ची कोई शरारत नहीं करेगी, सबका कहना मानेगी। अनुशासन में रहेगी। क्या मैं तुम पर भरोसा कर सकता हूँ ?’ - पापा ने कागज पर लिखते हुए पूछा।
पापा के गले में बाहें डालते हुए जील ने कहा - ‘पापा आपको मेरी कभी शिकायत नहीं मिलेगी बल्कि मैं कुछ ऐसा करूँगी जिससे आपको गर्व ही होगा।’
‘हमें तुमसे यही उम्मीद है’ - पापा ने जील के गाल थपथपाते हुए कहा।
धीरे - धीरे बीस फरवरी 2014 का वह दिन भी नजदीक आ गया जिस दिन जील को पिकनिक पर जाना था। पूरे दिन का कार्यक्रम था। सुबह से ही सब उत्साहित थे। उस दिन जील अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ जल्दी उठी। फोन पर एक दूसरे से अपडेटस लेते हुए वे सब नियत समय पर अपने स्कूल में पहुँच गए। स्कूल से कुल चार बसें जा रहीं थी। बस में बैठकर वे सब शीघ्र ही पावागढ के पास जांबुआ गाँव के पास बने कारवाँ रिसार्ट पहुँच गए।
रिजार्ट में बच्चों के मनोरंजन के लिए खूब साधन थे। सो बच्चों को वहाँ खूब मजा आया। करीब चार बजे बार - बार कहने पर वे घर वापसी को राजी हुए। जल्दी - जल्दी तीन बसों के बच्चे सवार हो गए। चैथी बस के बच्चे अभी नहीं आए थे। जब उसके बच्चे आए तब तक आगे की तीनों बसें जा चुकीं थीं। साथ पहुँचने की जल्दी में ड्राइवर ने बस की गति बढ़ा दी। तेज गति में उछलती कूदती बस में बच्चों को खूब आनंद आ रहा था।
तभी सामने जा रहे एक वाहन से आगे निकलने के क्रम में ड्राइवर ने तेजी से अपनी बस की गति बढ़ाई। बस बड़ी तेजी से उसे पार करती हुई उससे आगे निकली। पता नहीं क्या हुआ? बस अचानक साँप की तरह लहराई। बस के एक साथ कई झटके खाने से बच्चों को बड़ा मजा आया और खुशी का एक चिल्लाहट भरा जोर का शोर उभरा। मगर बस की इस चाल से समझदार जील को पता चल गया कि ड्राइवर बस से अपना नियंत्रण खो बैठा है।
उसने तुरंत अपने दोनों हाथों को अपने सिर के पीछे लगाया और अपना सिर अपने दोनों पाँवों के बीच डाल लिया। बस सिर्फ एक ही तरफ के पहियों पर थी। वह कुछ ही क्षणों में पलट गई और काफी दूर तक घिसटती चली गई। उसकी खिड़कियों के शीशे टूटे और बिखर कर बच्चों के शरीर में घुस गए। कुछ क्षण पहले का उनका उल्लास रुदन में परिवर्तित हो गया। ऐसे ही किसी बच्चे का हाथ कटा और लहरा कर जील के सामने आ गिरा। चारों तरफ चीख पुकार मच गई।
कुछ पल तो किसी को कुछ समझ नहीं आया। धीरे -धीरे जील उठी। अपनी सतर्कता के कारण उसे खरोंच भी न आई थी। उसने देखा कि सभी घायल पड़े हैं। उसने जल्दी - जल्दी दो तीन बच्चों को बस से बाहर निकाला और उनकी टीम बनाकर अपना बचाव अभियान शुरू कर दिया। जिन बच्चों की हालत ज्यादा खराब थी वे कोमा में न चले जाएं इसलिए उसने उनके गालों को थपथपाना शुरू कर दिया। ऐसा ही उसने अन्य बच्चों से करने के लिए कहा।
उसने जल्दी ही एक राहगीर को रोक कर 100 नम्बर पर पुलिस और 108 नम्बर पर एम्बूलेंस को फोन कर दिया। जिससे पंद्रह से बीस मिनट के अंदर पुलिस और एम्बूलेंस आ गई और घायलों को नजदीक के रेफरल हाॅस्पिटल में भर्ती कर दिया गया। समय पर सहायता मिल जाने के कारण कोई जन हानि नहीं हुई। इसका श्रेय जील की सूझबूझ ही जाता है।
परंतु जील इसका श्रेय रामकृष्ण मिशन आश्रम के बड़ौदा सेंटर को देती है। जहाँ वह ध्यान और पूजा के लिए जाती है। इससे मजबूत हुई आत्मिक शक्तियों के कारण यह संभव हो सका कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी संयम रख कर वह अपने साथियों की मदद कर सकी उनकी जान बचा सकी।
जील कहती है मैं मानती हूँ कि मैं अपने भाग्य के कारण नहीं बची बल्कि जो घायल हुए थे उनको बचा सकूँ इसलिए उनके भाग्य से बची।
जील को उसके इस साहस पूर्ण कार्य के लिए राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से देश के प्रधानमंत्री जी द्वारा सम्मानित किया गया।
नन्हे दोस्तो,

मन से हो मजबूत, लड़ो तुम संकट को टारो,
कैसी भी बाधा आए तुम हिम्मत मत हारो,
फर्क नहीं पड़ता इससे ज्यादा हो या कम का,
किरन एक ही सीना देती चीर अकेले तम का,