असहमति का स्वर
कहते हैं कि लोग तीन तरह की प्रवृत्ति के होते हैं। एक वे जिन्हें सुनो तो वे हमेशा यही कहते मिलते हैं क्या जमाना था जब घी मात्र इतने रुपए किलो मिलता था गेहूँ इतना सस्ता था। लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे। वगैरह वगैरह...
ऐसे लोग हमेशा पीछे बीते समय को ही देखते रहते हैं। दरअसल वे अतीतजीवी होते हैं। उन्हें पैदा होना चाहिए था तब, गलती से पैदा हो गए अब। अतीतमोह से ग्रस्त ऐसे लोग मृतक समान होते हैं। ऐसे लोगों में न तो कोई भविष्य की दृष्टि होती है न उन्हें वर्तमान का ही कोई ज्ञान होता है। उनका जन्म अपने समय के बाद हुआ होता है।
दूसरी किस्म के लोग वे होते हैं जो समय के साथ चलते हैं। गाँव में कहते हैं न ‘जैसी चलै बयार पीठ तब तैसी कीजै’। ‘जैसा देश वैसा भेष’ बनाने वाले ऐसे समझौतावादी लोग वक्त के साथ साथ चलते हैं और अवसर मिलने पर किसी के भी साथ मिल जाते हैं, इनका कोई नीति नियम या आदर्श नहीं होता बस होता है तो अपना काम किसी भी तरह बनाना। ऐसे लोग सामान्य कोटि के जन होते हैं।
एक तीसरी श्रेणी के लोग भी होते हैं जो अपने समय से पहले पैदा हुए लोग होते हैं। उनकी दृष्टि भविष्य को देखती है वे जो भी कार्य करते हैं उसका परिणाम भविष्य में आता है इसलिए उनका कार्य अपने समय से सीधे तौर पर असंदर्भित दिखाई देता है क्योंकि देखने वालों की दृष्टि या तो अतीतमोह से ग्रसित होती है या फिर वे सिर्फ अपने पैरो के पास तक का ही देख पाते हैं। वे उनके कार्यों को नहीं समझ पाते और उनकी आलोचना करते हैं, उन्हें पत्थरों से मारते हैं, उन्हें जिंदा जला देते हैं, उन्हें सूली पर चढ़ा देते हैं या उन्हें गोली मार देते हैं। विश्व का इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा हैं।
भविष्य में जब उनके कार्यों का महत्व आने वाली पीढ़ी को समझ में आता है तो वह उसी सूली को गले में लटका कर घूमती है उन्हीं सबकी पूजा करती है। हम ये सब देखते ही आ रहे हैं।
एक और बात कि प्रत्येक समूह या समुदाय में बहुत कम लोग होते हैं जो अग्रगामी होते हैं,बुद्धिमान होते हैं और कम लोग होते हैे जो मूर्ख होते हैं ज्यादातर संख्या औसत लोगों की होती है जिनकी अपनी कोई सोच नहीं होती है वे तो जिनका बाहुल्य या प्रभुत्व होता है उसी तरफ झुक जाते हैं।
प्रतिरोध की संस्कृति का अर्थ है धारा के विपरीत चलना यानि कि भीड़ में न चलना। भविष्यदर्शी तो हमेशा अपने समय में अकेला भीड़ से अलग खड़ा दिखाई देगा। उसे पत्थर लाठी गोली खाने को तैयार रहना चाहिए। सूली के लिए प्रतीक्षारत...
एक प्रसंग याद आता है। अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई जारी थी। ‘प्रताप’ में उन दिनों राष्ट्रप्रेम की जो मशाल जल रही थी उसकी लौ में जलने के लिए परवाने देश के कोने कोने से आ रहे थे। उन्हीं में भगतसिंह भी थे जो पंजाब से अपना घर छोड़कर कानपुर आ गए थे और गणेशशंकर विद्यार्थी के यहाँ रह रहे थे। नीचे प्रेस और छपाई का काम चलता और वे उसी के ऊपर बनी एक कोठरी में सो जाते थे। विद्यार्थी जी ने देखा कि सुबह उनका तकिया आँसुओं से भीगा होता था। उन्हें लगा कि कहीं यह युवक जोश जोश में तो घर से नहीं भाग आया और अब इसे घर याद आ रहा है। सो एक दिन उन्होंने भगतसिंह को अपने पास बैठाया और समझाया - देखो भगत, देशसेवा की राह सुगम नहीं है ये तलवार की धार पर चलने के समान है। जोश जोश में लोग कई बार निर्णय ले लेते हैं मगर हकीकत से सामना होने पर उन्हें अपने निर्णय पर पछतावा होता है ओर कई बार कदम इतने आगे बढ़ जाते हैं कि फिर पीछे लौटना नामुमकिन हो जाता है। लगता है तुम्हें घर की याद आ रही है। अभी तुम्हारे खिलाफ ज्यादा बड़े आरोप नहीं लगे हैं। तुम चाहो तो अभी भी वापस पंजाब जा सकते हो ?
आखिर उस समय उनकी उमर ही क्या थी। फांसी के तख्ते पर चढ़ते समय कुल तेईस साल के ही तो थे वो और यह उनके क्रांन्तिकारी आंदोलन में कूदने के बिलकुल शुरुआती दिनों की बात थी।
भगतसिंह ने कहा - न तो मुझे घर की याद आ रही है और न ही मुझे अपने निर्णय पर पछतावा हो रहा है। मैंने सोच समझ कर इस राह में कदम रखा है और मुझे यह भी पता है कि देश ज्यादा दिन तक गुलाम नहीं रह पाएगा। देश आजाद होगा ही या मेरे सामने या मेरे बाद। मुझे दुख तो सिर्फ इस बात का है कि मैं जब सामने नौजवानों को निश्चिंत देखता हूँ मानो उन्हें अपने अलावा देश और समाज की कोई चिंता या फिक्र ही नहीं उनके दिलों में वह आग क्यों नहीं जल रही है जो मुझे बेचैन किए हुए है जो मुझे सोने नहीं देती। बस यही वह बात है जो मुझे परेशान करती है। अगर सारे देश की नौजवान पीढ़ी यह तय कर ले कि उन्हें गुलाम नहीं रहना तो अंग्रेजों को इस देश से जाते देर नहीं लगेगी। आखिर अंग्रेज हैं ही कितने ?
मित्रो, क्या भगतसिंह की वह चिंता आज के संदर्भ में भी उचित प्रतीत नहीं होती। क्या उनकी विचारधारा आज भी उपेक्षित नहीं है ?
आज देश के सामने इस उपेक्षा के चलते समस्याओं का एक पहाड़ सा खड़ा हो गया है। मूल प्रश्न आज भी वही है कि वह आग सबके सीने में क्यों नहीं जल रही है ?
ज्यादातर लोग यथास्थितिवादी होते हैं वे परिवर्तन नहीं चाहते। बहुत थोड़े लोग होते हैं जो भविष्य के सपने देखते हैं। यथास्थिति में परिवर्तन चाहते हैं। मगर इनका हó हमारे समाज में क्या होता है यह किसी से छिपा नहीं हैं।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए प्रतिरोध के स्वर को दबाने के प्रयासों को लेकर युद्धों का जो अटूट सिलसिला चला आ रहा है मैं उसकी बात नहीं करूँगा मगर इस लेख लिखते समय जो विश्व पटल पर आई एस और बोको हरम जैसी मानसिकता वाली दरिंदगी की दास्तानें हो रहीं हैं वे मानवता का सीना छलनी करने के लिए पर्याप्त हैं।
आज राष्ट्रीय स्तर पर जितने भी बड़े राजनीतिक दल हैं उनमें स्वयं में कितना लोकतंत्र है वे असहमति के स्वर का कितना सम्मान करते हैं ये उनके अतीत के अब तक के इतिहास को देखकर जाना जा सकता है। अभी अभी ऐसी ही प्रवृत्तियों के विरोध में उभरे एक नए राजनीतिक दल ने असहमति में उभरे स्वरों के साथ क्या सुलूक किया ये सारे देश ने देखा। वो फलसफे जो हर एक आस्तां के दुश्मन थे, अमल में आए तो वे वक्फे आस्तां निकले, कम से कम इस घटना से तो हमें यही संकेत मिलता है।
जो अपने दल में साथियों के साथ ऐसा कर रहे हैं वे समाज में असहमति के स्वर को कितनी तरजीह देंगे सम्मान देंगे सोचा जा सकता हैं और जो राजनीति व्यक्ति औरसमाज को कदम कदम पर प्रभावित कर रही है आज जब उस राजनीति को संचालित करनेवालों का यह हाल है तो अन्य क्षेत्रों में क्या स्थिति होगी ये किसी से छिपा नहीं है।
इस लेख को लिखते समय ही राष्ट्रीय पटल पर निर्भया के बलात्कारी के बयान के प्रसारित किए जाने पर बहस सुर्खियों में है। जिसमें उसने कहा है - वह इसलिए मारी गई क्योंकि उसने प्रतिरोध किया,उसे प्रतिरोध नहीं करना चाहिए था।
उसका यह बयान न केवल पुरुषवादी समाज में नारी की स्थिति को दर्शाता है बल्कि सारे मनुष्य समाज में जो भी कमजोर है उसकी स्थिति को बयान करता है। वस्तुत हमने कभी असहमति के स्वर को सम्मान नहीं दिया तभी हमें इस विषय पर ढ़ेरांे कानून और नियम बनाने पडे क्योंकि हम नियम तभी बनाते हैं जब वह काम सामान्यता नहीं रुकता।
एक रोचक प्रसंग यहाँ बताना चाहूँगा एक बार किसी काम के सिलसिले में सर्वोच्च न्यायालय जाना हुआ। लंच के समय में वहाँ की कैंटीन में जाने के लिए आगे बढ़ा तो एक बोर्ड लगा देखकर ठिठक गया। लिखा था - अधिवक्ताओं के अलावा अन्य का जाना प्रतिबंधित
अब क्या करें ? रुक गए। साथी मित्र ने कहा- आप भी कितने भोले हो। अरे भाई, बोर्ड लगाने की जरूरत क्यों पड़ी क्योंकि लोग जाते हैं न इसलिए। जहाँ लिखा हो - यहाँ पेशाब करना मना है इसका मतलब है कि लोग वहाँ पेशाब करते हैं न इसलिए तभी तो बोर्ड लगाना पडा। उनकी बात में दम था।
प्रतिरोध के स्वर को दबाने के ये प्रयास सदियों से चलते आए हैं। हम कितना भी दावा करे कि हम सभ्य हो गए हैं मगर हकीकतें कदम कदम पर हमें आइना दिखाती हैं।
बलात्कार जैसे विषय पर बनने वाली फिल्म ‘इंसाफ का तराजू’ के लिए गीत लिखते समय साहिर लुधियानवी ने इस सच्चाई को उजागर किया था - जबर से नस्ल बढ़े ,जुल्म से तन मेल करें,जो अमल हममें है,बेइल्म परिंदों में नहीं,हम जो इंसान की तहज़ीब लिए फिरते हैं, हम सा वहशी कोई जंगल के दंिरंदों में नहीं,
ये दरिंदगी सदियों से कायम है।मगर चाहे जिंदा आग में जलाए गए हो,सूली पर चढ़ाए गए हों या गोलियों से छलनी किए गए हों। प्रतिरोध और असहमति के स्वर कभी बंद नहीं हुए परिस्थितियों में मंद भले ही हो गए हों।
व्यक्ति और समाज की भलाई के लिए ये प्रतिरोध और असहमति के स्वर उठते रहे हैं,उठते रहेंगे ताकि वह सुबह आ सके जिसका हमें सदियों से इंतजार है। भविष्यदर्शी कभी निराश नहीं होता। उसे उम्मीद है कि -
हकीकतें हैं सलामत तो ख्बाब बहुतेरे ,मलाल क्यों हो जो कुछ ख्बाब रायगां निकले,