Tuesday, 30 April 2013
अब न रहा पहले सा गाँव,
ना ही अब रहीं हैं वे गली,
साथ अब हैं कम चलते पाँव,
हो जो विदा पालकी चली..
अब कहाँ हैं फागुनी वे गीत,
वह गोरी घट-पनघट प्रीत,
दुख-सुख की टेर सुने कौन,
दुबक गए शाम ज्यों ढ़ली..
आग पोर की, छिड़े वे किस्से,
अब हैं, गुजरे दिनों के हिस्से
चाचा का नेह, राम-राम काका को,
बीते कल की बात हो चली.
गदराए आमों के बाग,
हर्षित मन वो आल्हा फाग,
खो गए अखाड़ों के जोड़,
रस्म हर पुरानी टली...
वह बूढ़े बरगद की छाँव,
सुख देते थे ऐसे ठाँव,
दाँव-दाँव दन्ना के दाँव,
-की छाँव तक न ढ़ूँढ़ते मिली...
बेटी की शादी, बैल, बेटे की नौकरी,
भोज और मुकदमे में,खेत और आदमी,
टुकड़ा था टुकड़ों में बँट गया,
दर्द ने अभावों की मिरजई सिली...
रिश्ते अब सस्ते है धन से,
फासले हुए मन से मन के,
राहों ने आहों के जंगल में,
जिन्दगी ये किस कदर छली...
जो साथ अब है कम चलते पाँव,
हो जो विदा पालकी चली,
अब न रहा पहले सा गाँव,
ना ही अब रही हैं वे गली,
ना ही अब रहीं हैं वे गली,
साथ अब हैं कम चलते पाँव,
हो जो विदा पालकी चली..
अब कहाँ हैं फागुनी वे गीत,
वह गोरी घट-पनघट प्रीत,
दुख-सुख की टेर सुने कौन,
दुबक गए शाम ज्यों ढ़ली..
आग पोर की, छिड़े वे किस्से,
अब हैं, गुजरे दिनों के हिस्से
चाचा का नेह, राम-राम काका को,
बीते कल की बात हो चली.
गदराए आमों के बाग,
हर्षित मन वो आल्हा फाग,
खो गए अखाड़ों के जोड़,
रस्म हर पुरानी टली...
वह बूढ़े बरगद की छाँव,
सुख देते थे ऐसे ठाँव,
दाँव-दाँव दन्ना के दाँव,
-की छाँव तक न ढ़ूँढ़ते मिली...
बेटी की शादी, बैल, बेटे की नौकरी,
भोज और मुकदमे में,खेत और आदमी,
टुकड़ा था टुकड़ों में बँट गया,
दर्द ने अभावों की मिरजई सिली...
रिश्ते अब सस्ते है धन से,
फासले हुए मन से मन के,
राहों ने आहों के जंगल में,
जिन्दगी ये किस कदर छली...
जो साथ अब है कम चलते पाँव,
हो जो विदा पालकी चली,
अब न रहा पहले सा गाँव,
ना ही अब रही हैं वे गली,
शुभ
प्रभात मित्रो,
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छलेंगे कबतक,
अनुभव के ये विषैले पुत्र,
कबतक डराएंगी,
दूर की भयावह आहटें,
कबतक,
न पराजित होगा रावण,
आखिर कबतक,
पिएगी ये जमीं खून,
कल की,
सुनहरी फसलों को,
उगाने के लिए,
स्वयं को,
बदलते रहेंगें जल में,
ये दल के दल बादल,
कबतक,
आखिर कबतक....
छलेंगे कबतक,
अनुभव के ये विषैले पुत्र,
कबतक डराएंगी,
दूर की भयावह आहटें,
कबतक,
न पराजित होगा रावण,
आखिर कबतक,
पिएगी ये जमीं खून,
कल की,
सुनहरी फसलों को,
उगाने के लिए,
स्वयं को,
बदलते रहेंगें जल में,
ये दल के दल बादल,
कबतक,
आखिर कबतक....
Sunday, 28 April 2013
सोचें, समझे, सुविचार करें, ये तरह की शिक्षा है,
परिणामों का अध्ययन करें, क्या देती हमको दीक्षा है,
कल के सपनों के लिए,न आने वाला आज गँवा देती,
बनता जीवन उद्देश्य यही ,हो जाती अहम परीक्षा है....
हर क्षण जीवन है इम्तहान हर पल अनमोल खजाना है,
ये सोच है क्यों तुझको घेरे,मंज़िल पर क्या पा जाना है,
मंज़िल तो नहीं जीवन कोई ,ये तो एक रस्ता प्यारा है,
जो समझ गया इसको जीता,पाया एक नया सहारा है...
आओ जीवनशैली बदलें, शिक्षा का अर्थ ग्रहण कर लें,
कल की चिंता को छोड,आज को ही हम तुम बेहतर कर लें,
जिस क्षण में जी सकते, उसमें रोयें, कल के सदमें क्यो झेलें
जिंदगी जिए हर पल, खुशियां ग़़म जो हो, आँखों सर ले लें,.....
हों श्रेष्ठ मूल्य विकसित और दृढ़,इस जीवन में जिसके द्वारा,
बंधन से मुक्ति मिले और गिरे अज्ञान अंध तम की कारा,
भर जाय अलौकिक दिव्य ज्योति,हो ह्रदय प्रफुल्लित और प्रमुदित,
आत्मिक संतोष मिले मन को, सुरभित होवे जीवन सारा,
परिणामों का अध्ययन करें, क्या देती हमको दीक्षा है,
कल के सपनों के लिए,न आने वाला आज गँवा देती,
बनता जीवन उद्देश्य यही ,हो जाती अहम परीक्षा है....
हर क्षण जीवन है इम्तहान हर पल अनमोल खजाना है,
ये सोच है क्यों तुझको घेरे,मंज़िल पर क्या पा जाना है,
मंज़िल तो नहीं जीवन कोई ,ये तो एक रस्ता प्यारा है,
जो समझ गया इसको जीता,पाया एक नया सहारा है...
आओ जीवनशैली बदलें, शिक्षा का अर्थ ग्रहण कर लें,
कल की चिंता को छोड,आज को ही हम तुम बेहतर कर लें,
जिस क्षण में जी सकते, उसमें रोयें, कल के सदमें क्यो झेलें
जिंदगी जिए हर पल, खुशियां ग़़म जो हो, आँखों सर ले लें,.....
हों श्रेष्ठ मूल्य विकसित और दृढ़,इस जीवन में जिसके द्वारा,
बंधन से मुक्ति मिले और गिरे अज्ञान अंध तम की कारा,
भर जाय अलौकिक दिव्य ज्योति,हो ह्रदय प्रफुल्लित और प्रमुदित,
आत्मिक संतोष मिले मन को, सुरभित होवे जीवन सारा,
Saturday, 27 April 2013
बनी नज़ीर लड़ी थी जो, मर्दानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
बुंदेलों के मुँह की वही, कहानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
धर्म जाति मज़हब के ऊँचे, कोलाहल में खोया,
न्याय प्रीति का जज़्बा वो, इंसानी ढ़ूँढ रहा हूँ,
शब्दों के फैले जंगल में, मानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
कभी आम थी चीज वही, लासानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ...
समता न्याय विभेद नहीं है, संविधान के अंदर,
वर्ग जाति अन्याय भेद का, कोलाहल है घर-घर,
प्रजातंत्र और समानता है,मुर्दा शब्द किताबों के,
कितनी बार खोखले होते देखे, दावे वादों के,
नहीं आँख में करूणा का मैं पानी,ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
अंतर में अंगार लिए कुर्बानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ...
दबी निरीह बिवश समझौतों की आदी लगती है,
पैरों खेली जाने वाली, एक गेंद दिखती है,
ज़ुल्म सामने देख रही, और नहीं बोल पाती है,
कुचले जाते हक़, आगे बढ़ नहीं छीन लाती है,
तूफानों में नइया, भाग्य भरोसे पर खे ती है,
हर सवाल का उत्तर एक,हमें क्या,से देती है,
नहीं झूठ के घर की मैं दरबानी, ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
झुके नहीं मिट जाए,वही जवानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
बदली परिभाषा में,बात पुरानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
कभी आम थी चीज वही,लासानी ढ़ूंढ़ रहा हूँ,
शब्दों के फैले जंगल में,मानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
बुंदेलों के मुँह की वही कहानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ....
बुंदेलों के मुँह की वही, कहानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
धर्म जाति मज़हब के ऊँचे, कोलाहल में खोया,
न्याय प्रीति का जज़्बा वो, इंसानी ढ़ूँढ रहा हूँ,
शब्दों के फैले जंगल में, मानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
कभी आम थी चीज वही, लासानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ...
समता न्याय विभेद नहीं है, संविधान के अंदर,
वर्ग जाति अन्याय भेद का, कोलाहल है घर-घर,
प्रजातंत्र और समानता है,मुर्दा शब्द किताबों के,
कितनी बार खोखले होते देखे, दावे वादों के,
नहीं आँख में करूणा का मैं पानी,ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
अंतर में अंगार लिए कुर्बानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ...
दबी निरीह बिवश समझौतों की आदी लगती है,
पैरों खेली जाने वाली, एक गेंद दिखती है,
ज़ुल्म सामने देख रही, और नहीं बोल पाती है,
कुचले जाते हक़, आगे बढ़ नहीं छीन लाती है,
तूफानों में नइया, भाग्य भरोसे पर खे ती है,
हर सवाल का उत्तर एक,हमें क्या,से देती है,
नहीं झूठ के घर की मैं दरबानी, ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
झुके नहीं मिट जाए,वही जवानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
बदली परिभाषा में,बात पुरानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
कभी आम थी चीज वही,लासानी ढ़ूंढ़ रहा हूँ,
शब्दों के फैले जंगल में,मानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ,
बुंदेलों के मुँह की वही कहानी ढ़ूँढ़ रहा हूँ....
बता अय दिल मुझे वो कौन सी मंज़िल, कि जहाँ,
इतनी बेताबी से ये कारवां, रवाना है,
अनगिनत पढ़ो अनपढ़ो का ये हुज़ूम बड़ा,
है जगह कौन सी, जहाँ कि इन्हें जाना है,
है चाह कौन सी बतला, जिसे पाने के लिए,
आदमी आदमी से, दूर हुआ जाता है,
आज के दौर में हर बूढ़ा, जवां और बच्चा,
अपने ही घर में, एक मेहमान हुआ जाता है,
अदबो तहज़ीब की है आज, जल रही होली,
दिल में नफरत के दिए, रोज नए जलते हैं,
राम के गुण पढ़ाए जाते मगर,
आचरण राक्षसों के पलते हैं,
ऐसी तदबीर करो दोस्तो, मोहब्बत और,
दिल से तहज़ीब का जज़्बा, न कहीं दूर जाए,
करो तरक्की मगर, ऐसी वो तरक्की हो,
मंज़िलें खुद ही अपने पास, खिंच के आ जाए,
इतनी बेताबी से ये कारवां, रवाना है,
अनगिनत पढ़ो अनपढ़ो का ये हुज़ूम बड़ा,
है जगह कौन सी, जहाँ कि इन्हें जाना है,
है चाह कौन सी बतला, जिसे पाने के लिए,
आदमी आदमी से, दूर हुआ जाता है,
आज के दौर में हर बूढ़ा, जवां और बच्चा,
अपने ही घर में, एक मेहमान हुआ जाता है,
अदबो तहज़ीब की है आज, जल रही होली,
दिल में नफरत के दिए, रोज नए जलते हैं,
राम के गुण पढ़ाए जाते मगर,
आचरण राक्षसों के पलते हैं,
ऐसी तदबीर करो दोस्तो, मोहब्बत और,
दिल से तहज़ीब का जज़्बा, न कहीं दूर जाए,
करो तरक्की मगर, ऐसी वो तरक्की हो,
मंज़िलें खुद ही अपने पास, खिंच के आ जाए,
Friday, 26 April 2013
खामोशी की खामोशी चुभन, सघन है चारो ओर उदासी,
खामोशी की खामोशी चुभन, सघन है चारो ओर उदासी,
तड़प रही हो विकल,राष्ट्र की आत्मा भूखी प्यासी,
चिंतक सर्जक अकुलाए कोलाहल में खोए हैं,
आज शहीदों के आँसू भी, बार- बार रोए हैं,
हिंसा बनी धर्म का साधन,मानवता सिर फोड़े,
स्वार्थी राजनीति है, प्रतिभा तड़प-तड़प दम तोड़े,
बीते दशक लदी है अबतक,ओढ़ी हुई गुलामी,
शासक बदले मगर, न मिल पाई सच्ची आजादी,
ऊपर उजले कपड़े पहने,अंदर दिल के काले,
खड़ी तमाशा देखे जनता,खुलते रोज घोटाले,
जहाँ ज्ञान ईमान जान की कीमत केवल पैसा,
गाँधी नेहरू के सपनों का,ये भारत है कैसा...
वर्ग द्वेष से मुक्त, रहित शोषण से देश हमारा,
इंकलाब जन-जन के मन में,हो जीवित उजियारा,
झुकना सीखा नहीं, यही कहते थे वे अलबेले,
मातृभूमि हो मुक्त, कोई ये मेरा जीवन ले ले,
जेल और कालापानी, लाठी गोली ड़ंड़े भी,
कितनों ने हँस-हँस चूमे थे,फाँसी के फंदे भी,
आजादी की तड़प, दिलों में भरती थी अंगारे
कौन भला फिर ऐसे में, रह सकता था मन मारे,
नई पीढ़ियाँ करके देखें,वो अनुभव कैसा था,
भगतसिंह के सपनों वाला, वो भारत कैसा था,
आजादी के दीवानों का, वो भारत कैसा था...
भिन्न समय श्रम और स्थिति के,अलग-अलग हल होते,
कालक्षेत्र में वीर सृजन के, नव सपने हैं बोते,
समय अभी भी है, सुन पाएं यदि सन्नाटे का स्वर,
अनुभव कर पाएं, मथते सागर के अंतर का ज्वर,
कल का हल था ठीक,गलत है आज, अगर तो छोड़े,
यही वक्त की माँग, विषमता की दीवारें तोड़े,
विघटन के स्वर की चिन्गारी, आग लगा सकती है,
हाँ, प्रबल राष्ट्र भावना, आज भी देश बचा सकती है,
यदि इज्ज़त की कीमत में, ये झूठा पैसा होगा,
तो सदियों के सपनों वाला, ये भारत कैसा होगा,
सोचें भारत कैसा होगा...
तड़प रही हो विकल,राष्ट्र की आत्मा भूखी प्यासी,
चिंतक सर्जक अकुलाए कोलाहल में खोए हैं,
आज शहीदों के आँसू भी, बार- बार रोए हैं,
हिंसा बनी धर्म का साधन,मानवता सिर फोड़े,
स्वार्थी राजनीति है, प्रतिभा तड़प-तड़प दम तोड़े,
बीते दशक लदी है अबतक,ओढ़ी हुई गुलामी,
शासक बदले मगर, न मिल पाई सच्ची आजादी,
ऊपर उजले कपड़े पहने,अंदर दिल के काले,
खड़ी तमाशा देखे जनता,खुलते रोज घोटाले,
जहाँ ज्ञान ईमान जान की कीमत केवल पैसा,
गाँधी नेहरू के सपनों का,ये भारत है कैसा...
वर्ग द्वेष से मुक्त, रहित शोषण से देश हमारा,
इंकलाब जन-जन के मन में,हो जीवित उजियारा,
झुकना सीखा नहीं, यही कहते थे वे अलबेले,
मातृभूमि हो मुक्त, कोई ये मेरा जीवन ले ले,
जेल और कालापानी, लाठी गोली ड़ंड़े भी,
कितनों ने हँस-हँस चूमे थे,फाँसी के फंदे भी,
आजादी की तड़प, दिलों में भरती थी अंगारे
कौन भला फिर ऐसे में, रह सकता था मन मारे,
नई पीढ़ियाँ करके देखें,वो अनुभव कैसा था,
भगतसिंह के सपनों वाला, वो भारत कैसा था,
आजादी के दीवानों का, वो भारत कैसा था...
भिन्न समय श्रम और स्थिति के,अलग-अलग हल होते,
कालक्षेत्र में वीर सृजन के, नव सपने हैं बोते,
समय अभी भी है, सुन पाएं यदि सन्नाटे का स्वर,
अनुभव कर पाएं, मथते सागर के अंतर का ज्वर,
कल का हल था ठीक,गलत है आज, अगर तो छोड़े,
यही वक्त की माँग, विषमता की दीवारें तोड़े,
विघटन के स्वर की चिन्गारी, आग लगा सकती है,
हाँ, प्रबल राष्ट्र भावना, आज भी देश बचा सकती है,
यदि इज्ज़त की कीमत में, ये झूठा पैसा होगा,
तो सदियों के सपनों वाला, ये भारत कैसा होगा,
सोचें भारत कैसा होगा...
Wednesday, 24 April 2013
बेवजह यूँ ही जीने से क्या फायदा,
बेसबब अश्क पीने से क्या फायदा,
जिसके जीवन में साहिल न तूफाँ कोई,
तू ही कह उस सफीने से क्या फायदा,
बिना मेहनत पसीने से क्या फायदा,
बिना साक़ी के पीने से क्या फायदा
दिल दुखाया जो तूने किसी ग़ैर का,
काशी काबे मदीने से क्या फायदा,
रूह के ग़म भुला कर जहाँ में अगर,
जिस्म रक्खे क़रीने से क्या फायदा,
दिल में उल्फ़त को रख बाजू दमदार तू,
हक़ किसी का भी छीने से, क्या फायदा..
.गुजरा पल ना मिले फिर कभी भी तुझे,
रोए साल और महीने से क्या फायदा,
राज़़ जीवन का है बस इसी में तू सुन,
चमके ना जो नगीने सा क्या फायदा..
.हुश्न कुदरत का बिखरा है, हरसू मगर,
तूने पत्थर ही बीने, तो क्या फायदा,
जिसमें धड़कन न हो, प्यार की दर्द की,
दिल वो नाहक हो सीने में,क्या फायदा,
बेसबब अश्क पीने से क्या फायदा,
जिसके जीवन में साहिल न तूफाँ कोई,
तू ही कह उस सफीने से क्या फायदा,
बिना मेहनत पसीने से क्या फायदा,
बिना साक़ी के पीने से क्या फायदा
दिल दुखाया जो तूने किसी ग़ैर का,
काशी काबे मदीने से क्या फायदा,
रूह के ग़म भुला कर जहाँ में अगर,
जिस्म रक्खे क़रीने से क्या फायदा,
दिल में उल्फ़त को रख बाजू दमदार तू,
हक़ किसी का भी छीने से, क्या फायदा..
.गुजरा पल ना मिले फिर कभी भी तुझे,
रोए साल और महीने से क्या फायदा,
राज़़ जीवन का है बस इसी में तू सुन,
चमके ना जो नगीने सा क्या फायदा..
.हुश्न कुदरत का बिखरा है, हरसू मगर,
तूने पत्थर ही बीने, तो क्या फायदा,
जिसमें धड़कन न हो, प्यार की दर्द की,
दिल वो नाहक हो सीने में,क्या फायदा,
रोज लुटाए सोना सूरज,चाँदी चन्दा रात,
फिर भी हम निर्धन हैं कितने,ये अचरज की बात,
विवश लगता है जीवन,सोच क्यूँ अय मेरे मन,
दूर आज होती जाती है परछाई भी,बढ़ती जाती देखो अंतर की खाई भी,
मूल रूप में विद्यमान बर्बरता अब तक,नए विचारों में है यद्यपि गहराई भी,
तुझको मुझपे मुझको तुझपे क्यों न रहा विश्वास,
जीवन रस का स्रोत सुखाए, कौन अजनबी हाथ,
आज है हर उदास मन,सोच क्यों अय मेरे मन,
खुशी मनाती गाती धूम मचाती हरदम,थी जिनमें हैं आज कहाँ वैसे वे आँगन,
रोज ब रोज लगे आगे बढ़ते जाते हम,पाते हैं या खोते खुशी करें या मातम,
चीख-चीख खोईं आवाजें सन्नाटा है आज,
अंतर का बादल तक भूला आँसू की सौगात,
देख ग़म को भी है ग़म,सोच क्यों अय मेरे मन,
फिर भी हम निर्धन हैं कितने,ये अचरज की बात,
विवश लगता है जीवन,सोच क्यूँ अय मेरे मन,
दूर आज होती जाती है परछाई भी,बढ़ती जाती देखो अंतर की खाई भी,
मूल रूप में विद्यमान बर्बरता अब तक,नए विचारों में है यद्यपि गहराई भी,
तुझको मुझपे मुझको तुझपे क्यों न रहा विश्वास,
जीवन रस का स्रोत सुखाए, कौन अजनबी हाथ,
आज है हर उदास मन,सोच क्यों अय मेरे मन,
खुशी मनाती गाती धूम मचाती हरदम,थी जिनमें हैं आज कहाँ वैसे वे आँगन,
रोज ब रोज लगे आगे बढ़ते जाते हम,पाते हैं या खोते खुशी करें या मातम,
चीख-चीख खोईं आवाजें सन्नाटा है आज,
अंतर का बादल तक भूला आँसू की सौगात,
देख ग़म को भी है ग़म,सोच क्यों अय मेरे मन,
मेरी नज़र के नूर नजारे तुम्हीं तो हो,
इस टूटे हुए दिल के सहारे तुम्हीं तो हो,
इस बेवफा जहाँ में एक उम्मीद की किरन,
दिल का सुकून आँख के तारे तुम्हीं तो हो,
जल जाते हैं परवाने जिस आग में हँस-2 कर,
शम्मा की लौ के शोख शरारे तुम्हीं तो हो,
तूफाँ घिरी कश्ती का मुसाफिर डरे तो,
दिल का सहारा उसके किनारे तुम्हीं तो हो,
लोगों की बेवफाई से दिल डूब ही जाता,
उबरा जो देखकर वो इशारे तुम्ही तो हो,
इस टूटे हुए दिल के सहारे तुम्हीं तो हो,
इस बेवफा जहाँ में एक उम्मीद की किरन,
दिल का सुकून आँख के तारे तुम्हीं तो हो,
जल जाते हैं परवाने जिस आग में हँस-2 कर,
शम्मा की लौ के शोख शरारे तुम्हीं तो हो,
तूफाँ घिरी कश्ती का मुसाफिर डरे तो,
दिल का सहारा उसके किनारे तुम्हीं तो हो,
लोगों की बेवफाई से दिल डूब ही जाता,
उबरा जो देखकर वो इशारे तुम्ही तो हो,
Tuesday, 23 April 2013
राह बोझिल न हो
राह बोझिल न हो मुस्कराते चलो,पथ ये सूना न हो गुनगुनाते चलो,
राह बोझिल न हो पथ ये सूना न हो,मुस्कुराते चलो, गुनगुनाते चलो,
आज चढ़ने हमें हैं,नये आसमां, फासले वो मिटाने जो हैं दरमियां,
इस नये दौर में हम लुटाएंगे यूँ, प्यार जैसे लुटातीं हैं ये वादियां,
दे खुशी ग़म के आँसू चुराते चलो,वो जो रूठा उसे भी मनाते चलो,
इन हवाओं में घुटता है दम आजकल,ये घटाएं भी देतीं जलन आजकल,
हो के बेचैन टकरा रही हर नज़र, इस प्रतीक्षा में पाऊँ कोई तो डगर,
अपने तलुवों की ज्वाला जलाते चलो,जंगलों में नया पथ बनाते चलो...
ये गरीबी उदासी ये तनहाइयां,ये सियासत की बदरंग परछाइयां,
मुल्क के नौजवां जैसे सोए हुए,छल भरी रोशनी में हैं खोए हुए,
तोड़़ जादू डगर जगमगाते चलो,कल जो होगी वो सूरत दिखाते चलो,
फूल पत्ते अलग रंग खुश्बू अलग,पर ये सच है कि अपना चमन एक है,
जिससे जीवन का रस पी जवाँ हम हुए,कर्ज उस माँ का हम पर अभी शेष है,
दुख में धरती है धीरज बंधाते चलो,खोल दो आँख सबको जगाते चलो,...
पीतवर्णी हर एक शय का है चेहरा,गूँजता प्रश्न किसका करें आसरा,
वायु दूषित है संजीवनी प्राण की,भीत हिलती है जीवन के आधार की,
जीवनी जल तृषित को पिलाते चलो,रोशनी को अँधेरों में लाते चलो,
आज जीवन की पुस्तक को फिर से पढ़ो,दुख बढ़ाते हैं जो चित्र सब फाड़ दो,
आगमन शुभ कहो उस खुशी के लिए, जो जलाए बुझे जिन्दगी के दिए,
हर किरन रोशनी की बुलाते चलो, इस अँधेरे में मश्अल जलाते चलो,
आज हो तुम जवाँ कोई भय ना करो,बेसबब यूँ ही ये शक्ति क्षय न करो,
ढ़ाल जीवन में दो चेतना एक नई,तुम जो आओ लगे यूँ बहार आ गई,
एक खुश्बू हवा में लुटाते चलो,बन के नग्मा हर एक दिल पे छाते चलो,
जिन्दगी एक संघर्ष का नाम है,तेज तूफान ही जिसकी पहचान है,
लहर सागर पे लिक्खी कहानी है जो,टूट जाए झुके ना जवानी है वो,
पथ चलो जो भी काँटे उठाते चलो,जो भी सीखो उसे आजमाते चलो,
सत्य शिव सुन्दरम् की विजय के लिए,वक्त की है जो उलझी गिरह खोलिए,
सब सवालों का हल आप आ जाएगा,ये जमाना नयी रोशनी पाएगा ,
पग से पग दिल से दिल को मिलाते चलो,एकता शान्ति के गीत गाते चलो,
ज्ञान की ढ़ेरियों के हैं गुन अनगिनत,गुन जो पाएँ तो हैं ढ़ाई आखर बहुत,
तोड़ दें ये दुई की जो दीवार हम, लौ में जाए पिघल बंधनों का भी दम,
दे सहारा गिरे को उठाते चलो, मीत बन प्रीत दे गीत गाते चलो,
राह बोझिल न हो,मुस्कराते चलो,पथ ये सूना न हो गुनगुनाते चलो,
राह बोझिल न हो,पथ ये सूना न हो,मुस्कुराते चलोगुनगुनाते चलो,
राह बोझिल न हो पथ ये सूना न हो,मुस्कुराते चलो, गुनगुनाते चलो,
आज चढ़ने हमें हैं,नये आसमां, फासले वो मिटाने जो हैं दरमियां,
इस नये दौर में हम लुटाएंगे यूँ, प्यार जैसे लुटातीं हैं ये वादियां,
दे खुशी ग़म के आँसू चुराते चलो,वो जो रूठा उसे भी मनाते चलो,
इन हवाओं में घुटता है दम आजकल,ये घटाएं भी देतीं जलन आजकल,
हो के बेचैन टकरा रही हर नज़र, इस प्रतीक्षा में पाऊँ कोई तो डगर,
अपने तलुवों की ज्वाला जलाते चलो,जंगलों में नया पथ बनाते चलो...
ये गरीबी उदासी ये तनहाइयां,ये सियासत की बदरंग परछाइयां,
मुल्क के नौजवां जैसे सोए हुए,छल भरी रोशनी में हैं खोए हुए,
तोड़़ जादू डगर जगमगाते चलो,कल जो होगी वो सूरत दिखाते चलो,
फूल पत्ते अलग रंग खुश्बू अलग,पर ये सच है कि अपना चमन एक है,
जिससे जीवन का रस पी जवाँ हम हुए,कर्ज उस माँ का हम पर अभी शेष है,
दुख में धरती है धीरज बंधाते चलो,खोल दो आँख सबको जगाते चलो,...
पीतवर्णी हर एक शय का है चेहरा,गूँजता प्रश्न किसका करें आसरा,
वायु दूषित है संजीवनी प्राण की,भीत हिलती है जीवन के आधार की,
जीवनी जल तृषित को पिलाते चलो,रोशनी को अँधेरों में लाते चलो,
आज जीवन की पुस्तक को फिर से पढ़ो,दुख बढ़ाते हैं जो चित्र सब फाड़ दो,
आगमन शुभ कहो उस खुशी के लिए, जो जलाए बुझे जिन्दगी के दिए,
हर किरन रोशनी की बुलाते चलो, इस अँधेरे में मश्अल जलाते चलो,
आज हो तुम जवाँ कोई भय ना करो,बेसबब यूँ ही ये शक्ति क्षय न करो,
ढ़ाल जीवन में दो चेतना एक नई,तुम जो आओ लगे यूँ बहार आ गई,
एक खुश्बू हवा में लुटाते चलो,बन के नग्मा हर एक दिल पे छाते चलो,
जिन्दगी एक संघर्ष का नाम है,तेज तूफान ही जिसकी पहचान है,
लहर सागर पे लिक्खी कहानी है जो,टूट जाए झुके ना जवानी है वो,
पथ चलो जो भी काँटे उठाते चलो,जो भी सीखो उसे आजमाते चलो,
सत्य शिव सुन्दरम् की विजय के लिए,वक्त की है जो उलझी गिरह खोलिए,
सब सवालों का हल आप आ जाएगा,ये जमाना नयी रोशनी पाएगा ,
पग से पग दिल से दिल को मिलाते चलो,एकता शान्ति के गीत गाते चलो,
ज्ञान की ढ़ेरियों के हैं गुन अनगिनत,गुन जो पाएँ तो हैं ढ़ाई आखर बहुत,
तोड़ दें ये दुई की जो दीवार हम, लौ में जाए पिघल बंधनों का भी दम,
दे सहारा गिरे को उठाते चलो, मीत बन प्रीत दे गीत गाते चलो,
राह बोझिल न हो,मुस्कराते चलो,पथ ये सूना न हो गुनगुनाते चलो,
राह बोझिल न हो,पथ ये सूना न हो,मुस्कुराते चलोगुनगुनाते चलो,
हमने जिस काम को बचपन से दबाना चाहा,
मन में कूड़े की तरह ढ़ेर किया था जिसका,
जिक्र तक जिसका जुबाँ पर था एक गुनाह जैसा,
एक आवाज थी तूती की, जो सुनी न गई,
परत -दर- परत राख चढ़ती गई शोलों पर,
रेत में गहरे छिपे आग के लावे की तरह,
दब के पानी भी शिला तोड़ के बाहर आता
कैसे ये रोकतीं कमजोर दीवारें मन की,
बांध को तोड़ वो बह निकला है गलियो-गलियों,
कहीं पोस्टर कहीं पिक्चर तो कहीं गानों में,
मुँह से जो फूट रहा है किशोर बच्चों के,
आज अनजाने में कल जोर से यकीन के साथ आएगा,
आएगा फिर ये हवा और फिज़ा बदलेगी,
इससे भी ज्यादा कहीं वैसा वो आलम होगा,
प्रश्न वेताल सा फिर-फिर जवाब माँगेगा,
व्यूह में उत्तर के परेशान सा विक्रम होगा,
हश्र क्या होगा भला सोच के देखो तो जरा,
ग़र यूँ ही बढ़ता गया शोर किधर जाएगा,
हमने जो वक्त की आवाज को अनदेखा किया,
वक्त रक्खेगा हम पे पाँव गुजर जाएगा,...
मन में कूड़े की तरह ढ़ेर किया था जिसका,
जिक्र तक जिसका जुबाँ पर था एक गुनाह जैसा,
एक आवाज थी तूती की, जो सुनी न गई,
परत -दर- परत राख चढ़ती गई शोलों पर,
रेत में गहरे छिपे आग के लावे की तरह,
दब के पानी भी शिला तोड़ के बाहर आता
कैसे ये रोकतीं कमजोर दीवारें मन की,
बांध को तोड़ वो बह निकला है गलियो-गलियों,
कहीं पोस्टर कहीं पिक्चर तो कहीं गानों में,
मुँह से जो फूट रहा है किशोर बच्चों के,
आज अनजाने में कल जोर से यकीन के साथ आएगा,
आएगा फिर ये हवा और फिज़ा बदलेगी,
इससे भी ज्यादा कहीं वैसा वो आलम होगा,
प्रश्न वेताल सा फिर-फिर जवाब माँगेगा,
व्यूह में उत्तर के परेशान सा विक्रम होगा,
हश्र क्या होगा भला सोच के देखो तो जरा,
ग़र यूँ ही बढ़ता गया शोर किधर जाएगा,
हमने जो वक्त की आवाज को अनदेखा किया,
वक्त रक्खेगा हम पे पाँव गुजर जाएगा,...
Monday, 22 April 2013
यूँ तो नग्में आम बहुत,पर उनमें से कुछ खास मेरे हैं,
रिमझिम बरखा की बूँदों में,जलने के अहसास मेरे हैं,
नहीं आज की वरन युगों की,पीड़ा घुली हुई है स्वर में,
राज तुम्हारा रहा बचे जो,हिस्से में वनवास मेरे हैं,
कौन निबाहेगा ये फासला,दर्द तेरे और पास मेरे हैं,
शोषित तन और बोझिल मन में,अपराजित ये श्वाँस मेरे हैं,
शायद यह भी वजह कि जिसने,मुझे बनाया है दीवाना,
गुम हो गये खलाओं में तुम,बने हैं जो इतिहास मेरे है,
बढ़ो कि मंज़िल दूर नहीं है,जिसने दिल को दिया हौसला,
जलती हुई मशाल सरीखे, रौशन जो विश्वास मेरे हैं,
रिमझिम बरखा की बूँदों में,जलने के अहसास मेरे हैं,
नहीं आज की वरन युगों की,पीड़ा घुली हुई है स्वर में,
राज तुम्हारा रहा बचे जो,हिस्से में वनवास मेरे हैं,
कौन निबाहेगा ये फासला,दर्द तेरे और पास मेरे हैं,
शोषित तन और बोझिल मन में,अपराजित ये श्वाँस मेरे हैं,
शायद यह भी वजह कि जिसने,मुझे बनाया है दीवाना,
गुम हो गये खलाओं में तुम,बने हैं जो इतिहास मेरे है,
बढ़ो कि मंज़िल दूर नहीं है,जिसने दिल को दिया हौसला,
जलती हुई मशाल सरीखे, रौशन जो विश्वास मेरे हैं,
रोशन हैं अपनी राह में,अरमानों के दिए
कोई चले चले न चले, हम तो चल दिए,
उस रुत का इंतजार करें, इससे फायदा,
सुख को लगा दिए हैं, हमने खुद ही हाशिए
मंजि़ल को पाएंगे, कभी हमने नहीं कहा,
पैरों ने अपने आप, कदम हैं बढ़ा दिए,
दिल के मुआमले में, नतीजा अहम नहीं,
हल प्रश्न थे वो हमने, कभी के भुला दिए,
कोई चले चले न चले, हम तो चल दिए,
उस रुत का इंतजार करें, इससे फायदा,
सुख को लगा दिए हैं, हमने खुद ही हाशिए
मंजि़ल को पाएंगे, कभी हमने नहीं कहा,
पैरों ने अपने आप, कदम हैं बढ़ा दिए,
दिल के मुआमले में, नतीजा अहम नहीं,
हल प्रश्न थे वो हमने, कभी के भुला दिए,
Sunday, 21 April 2013
हर एक वक्त का अंदाज़ जुदा होता है,हर एक वक्त का अपना एक खुदा होता है,
हर एक चीज के यहाँ मायने बदलते हैं,हैं वे ही चेहरे मगर आईने बदलते हैं,
एक था वक्त जब फूलों से थी उल्फत सबको,लोग घर में ही क्या दिल से उन्हें लगाते थे,
आज के दौर में देखो वही चीजें हैं सभी,नफ़ीस दिखने को काँटों से घर सजाते हैं,
एक था वक्त जो दिल में था वही होठों पर,लोग इंसानियत की कद्र किया करते थे,
आज के दौर में सिक्कों की खनक के बदले,अपने ईमान का लोग सौदा किया करते हैं,
एक वो ख्वाब की बातों की आन रखने को,बीबी बच्चे ही क्या खुद को ही बेच देते थे,
आज के दौर में इंसाफ के बदले मानी,झूठ को सर पे सच को सूली चढ़ा देते है,
कभी जो खुशियों का सैलाब ले के आाते थे,वही त्योहार आज ग़म नया जगाते हैं,
चिराग जलना हमेशा पवित्र माना गया,दिये बुझा के आज जन्मदिन मनाते है,
ऐ मेरे दिल कहीं ये रस्मे न खा जाये हमें,उजेली रातों में मैं सो नहीं पाता हूँ कभी,
चाँदनी की कसम बेताब हुए दिल की जलन का दर्द दिल में लिए पहरों तिलमिला हूँ,
अपने बेख्वाब खयालों के साये में छुपकर,एक अंजान सी दुनिया में मैं खो जाता हूँ,
जहाँ पे प्यार का बदला वफा से मिलता है,जहाँ पे जा के दिल बेइख्तियार खिलता है,
जहाँ से नग्मों को मेरे पुकारती है जमीं,जहाँ कि जिन्दगी के मायने अभी हैं वही,
अपनी ये बातें खयालों में किया करता हूँ,जहर या अमिय हो अपने में पिया करता हूँ,
जान ले ग़र ये जमाना तो ख़फा होता है,क्योंकि हर वक्त का अंदाज जुदा होता है...
हर एक चीज के यहाँ मायने बदलते हैं,हैं वे ही चेहरे मगर आईने बदलते हैं,
एक था वक्त जब फूलों से थी उल्फत सबको,लोग घर में ही क्या दिल से उन्हें लगाते थे,
आज के दौर में देखो वही चीजें हैं सभी,नफ़ीस दिखने को काँटों से घर सजाते हैं,
एक था वक्त जो दिल में था वही होठों पर,लोग इंसानियत की कद्र किया करते थे,
आज के दौर में सिक्कों की खनक के बदले,अपने ईमान का लोग सौदा किया करते हैं,
एक वो ख्वाब की बातों की आन रखने को,बीबी बच्चे ही क्या खुद को ही बेच देते थे,
आज के दौर में इंसाफ के बदले मानी,झूठ को सर पे सच को सूली चढ़ा देते है,
कभी जो खुशियों का सैलाब ले के आाते थे,वही त्योहार आज ग़म नया जगाते हैं,
चिराग जलना हमेशा पवित्र माना गया,दिये बुझा के आज जन्मदिन मनाते है,
ऐ मेरे दिल कहीं ये रस्मे न खा जाये हमें,उजेली रातों में मैं सो नहीं पाता हूँ कभी,
चाँदनी की कसम बेताब हुए दिल की जलन का दर्द दिल में लिए पहरों तिलमिला हूँ,
अपने बेख्वाब खयालों के साये में छुपकर,एक अंजान सी दुनिया में मैं खो जाता हूँ,
जहाँ पे प्यार का बदला वफा से मिलता है,जहाँ पे जा के दिल बेइख्तियार खिलता है,
जहाँ से नग्मों को मेरे पुकारती है जमीं,जहाँ कि जिन्दगी के मायने अभी हैं वही,
अपनी ये बातें खयालों में किया करता हूँ,जहर या अमिय हो अपने में पिया करता हूँ,
जान ले ग़र ये जमाना तो ख़फा होता है,क्योंकि हर वक्त का अंदाज जुदा होता है...
ग़र नही खुशी तो क्या, जिन्दगी की झोली में,
ग़म में खुश हैं,यूँ रोकर उम्र क्या बिताना है,
कोठरी में काजल की, दाग ना लगे कोई,
जग में रह के जीना है,,रूह भी बचाना है,
प्यार चाहते यारो, खार और गुल दोनों,
एक का चयन करना, ये चलन पुराना है,
आप क्यों खफा,हम तो हैं अलग जमाने से,
तुमने ये सुना होगा,बेवफा जमाना है,
कल सुकून की खातिर जो किया,जलाता ग़र,
दें बदल उसे, लोगों को यही बताना है,
आज की चुनौती है,हों प्रयासरत् हम तुम,
मंजिलें दिलाएगा, सब्र वो खजाना है
दो घड़ी के जीवन से, उम्र एक चुराना है,
ग़म ही तो हकीकत हैं, और खुशी बहाना है,
हम तो कब से गाते हैं,तुम भी यार कुछ बोलो,
साज दिल का छेडो तो, जिन्दगी तराना है,
ग़म में खुश हैं,यूँ रोकर उम्र क्या बिताना है,
कोठरी में काजल की, दाग ना लगे कोई,
जग में रह के जीना है,,रूह भी बचाना है,
प्यार चाहते यारो, खार और गुल दोनों,
एक का चयन करना, ये चलन पुराना है,
आप क्यों खफा,हम तो हैं अलग जमाने से,
तुमने ये सुना होगा,बेवफा जमाना है,
कल सुकून की खातिर जो किया,जलाता ग़र,
दें बदल उसे, लोगों को यही बताना है,
आज की चुनौती है,हों प्रयासरत् हम तुम,
मंजिलें दिलाएगा, सब्र वो खजाना है
दो घड़ी के जीवन से, उम्र एक चुराना है,
ग़म ही तो हकीकत हैं, और खुशी बहाना है,
हम तो कब से गाते हैं,तुम भी यार कुछ बोलो,
साज दिल का छेडो तो, जिन्दगी तराना है,
भटक न जाना नई प्रगति के भारी शोर शराबों में,
प्रेम दया के फूल दबें ना, नफरत की मेहराबों में,
आबादी की बाढ़ बढ़ा, इंसां इंसा से दूर हुआ,
कानूनों को बढ़ा,जुर्म हर करने को मजबूर हुआ,
दिल में हल मौजूद प्रश्न का,ढ़ूँढ़े उसे बजारों में,
कुछ पाने की आस में हमको,कुछ खोना भी पड़ता है,
हँसने में है मज़ा तभी, जब कुछ रोना भी पडता है,
बिना सांस के आस न पलती,संस्कृति स्वांस हमारी है,
पथ की बाधाओं की खातिर, जो तलवार दुधारी है,
जो आनन्द मिले तूफाँ में,मिलता नहीं किनारों में,
वर्ष नहीं बीती हैं सदियां,हमने जो कुछ पाया है,
धरोहरें जो दिखा विश्व में,देश कभी इतराया है,
अपनी नासमझी में हमने,कल और आज गँवाया है,
वक्त ने अपने रण का डंका, अंतिम बार बजाया है,
आज खुला ऐलान किया है,बात न कही इशारों में,
प्रेम दया के फूल दबें ना, नफरत की मेहराबों में,
आबादी की बाढ़ बढ़ा, इंसां इंसा से दूर हुआ,
कानूनों को बढ़ा,जुर्म हर करने को मजबूर हुआ,
दिल में हल मौजूद प्रश्न का,ढ़ूँढ़े उसे बजारों में,
कुछ पाने की आस में हमको,कुछ खोना भी पड़ता है,
हँसने में है मज़ा तभी, जब कुछ रोना भी पडता है,
बिना सांस के आस न पलती,संस्कृति स्वांस हमारी है,
पथ की बाधाओं की खातिर, जो तलवार दुधारी है,
जो आनन्द मिले तूफाँ में,मिलता नहीं किनारों में,
वर्ष नहीं बीती हैं सदियां,हमने जो कुछ पाया है,
धरोहरें जो दिखा विश्व में,देश कभी इतराया है,
अपनी नासमझी में हमने,कल और आज गँवाया है,
वक्त ने अपने रण का डंका, अंतिम बार बजाया है,
आज खुला ऐलान किया है,बात न कही इशारों में,
धीरज का धीरज डोला है,रो कर सूनापन बोला है,
साँसों की पीड़ा गाती है,इस युग ने भेजी पाती है,
उत्तर की तू खोज खबर ले,कलम आज तैयारी कर ले,
सुन अय रोष दिलाने वाले,सुन अय होश गँवाने वाले,
तेरी नइया बीच भँवर है,आने वाला घोर समर है,
जान हथेली पर तू धर ले,,कलम आज तैयारी कर ले,
संघर्षों में घुस कर जीना,तम के सब आँसू हैं पीना,
देख जुल्म जब खाय सनाका,ज़़ुल्मी की औकात भला क्या,
भृकुटि आज तू तिरछी कर ले,इस मौसम का रूप निखर ले,
साँसों की पीड़ा गाती है,इस युग ने भेजी पाती है,
उत्तर की तू खोज खबर ले,कलम आज तैयारी कर ले,
सुन अय रोष दिलाने वाले,सुन अय होश गँवाने वाले,
तेरी नइया बीच भँवर है,आने वाला घोर समर है,
जान हथेली पर तू धर ले,,कलम आज तैयारी कर ले,
संघर्षों में घुस कर जीना,तम के सब आँसू हैं पीना,
देख जुल्म जब खाय सनाका,ज़़ुल्मी की औकात भला क्या,
भृकुटि आज तू तिरछी कर ले,इस मौसम का रूप निखर ले,
कह न पाएगी कलम जिनकी कथा को,
सह सके थे, जो न अंतर की व्यथा को,
हाथ में अपने ज्वलित अंगार लेकर,
हो प्रकंपित शत्रुमद हुँकार लेकर,
मातृ भू को शीश देकर वंदना की,
स्वत्व को छीना,नहीं झुक याचना की,
प्राण दे देना था,जिनको खेल जैसा,
वीरता के साथ भय का मेल कैसा,
आज मैं वह ज्योति फिर से माँगता हूँ,
ध्वंस का आह्वान फिर से चाहता हूँ,
जो कि सुख की राह को आगे बढ़ाएगी,
शांति की सरिता नहीं तो सूख जाएगी,
सह सके थे, जो न अंतर की व्यथा को,
हाथ में अपने ज्वलित अंगार लेकर,
हो प्रकंपित शत्रुमद हुँकार लेकर,
मातृ भू को शीश देकर वंदना की,
स्वत्व को छीना,नहीं झुक याचना की,
प्राण दे देना था,जिनको खेल जैसा,
वीरता के साथ भय का मेल कैसा,
आज मैं वह ज्योति फिर से माँगता हूँ,
ध्वंस का आह्वान फिर से चाहता हूँ,
जो कि सुख की राह को आगे बढ़ाएगी,
शांति की सरिता नहीं तो सूख जाएगी,
Wednesday, 17 April 2013
सुबह हो गयी बिल्लू बेटे,अब तो आँखें खोलो,
सुबह हो गयी बिल्लू बेटे,
अब तो आँखें खोलो,
आलस भाग जाएगा सारा,
पानी से मुँह धोलो,
अच्छा उठता हूँ कह पहले,
आँख जरा सी खोली,
उठ कर लिपट गया मम्मी से,
तब मम्मी यह बोली-
पहले शौच जाओ फिर बेटे,
साफ करो दाँतों को,
खाने-पीने से पहले तुम,
साफ करो हाथों को,
अगर करोगे ऐसा फिर तुम,
कभी न हो बीमार,
राजा बेटा बन पाओगे,
माँ का पूरा प्यार,
अब तो आँखें खोलो,
आलस भाग जाएगा सारा,
पानी से मुँह धोलो,
अच्छा उठता हूँ कह पहले,
आँख जरा सी खोली,
उठ कर लिपट गया मम्मी से,
तब मम्मी यह बोली-
पहले शौच जाओ फिर बेटे,
साफ करो दाँतों को,
खाने-पीने से पहले तुम,
साफ करो हाथों को,
अगर करोगे ऐसा फिर तुम,
कभी न हो बीमार,
राजा बेटा बन पाओगे,
माँ का पूरा प्यार,
पापा खाते दही बड़े,मम्मी खातीं दही बड़े,
पापा खाते दही बड़े,
मम्मी खातीं दही बड़े,
दादी कहें यहाँ बैठो,
मत खाओ तुम खड़़े-खड़े,
पिसी दाल के गोले हैं,
सेंक दही में घोले हैं,
सजा मसाला चटनी पर,
राजा जैसे मुकुट जड़े,
मीठा खा सब उकताए,
भइया प्लेट में ले आए,
मुन्नी ढ़ूँढ़ रही छोटे,
चुन्नू छाँटे बडे-बड़े,
दादी हँसकर कहती यूँ,
मिट्टी की हंड़िया में हों,
स्वाद बहुत बढ़ जाता पर,
कहाँ शहर में धरे घड़े,
खील खिलौना लाई भी,
गुझिया और मिठाई भी,
छोड़ उन्हें खुद भाई भी,
खाता देखो दही बड़े,
पापा खाते दही बड़े,
मम्मी खातीं दही बड़े,
मम्मी खातीं दही बड़े,
दादी कहें यहाँ बैठो,
मत खाओ तुम खड़़े-खड़े,
पिसी दाल के गोले हैं,
सेंक दही में घोले हैं,
सजा मसाला चटनी पर,
राजा जैसे मुकुट जड़े,
मीठा खा सब उकताए,
भइया प्लेट में ले आए,
मुन्नी ढ़ूँढ़ रही छोटे,
चुन्नू छाँटे बडे-बड़े,
दादी हँसकर कहती यूँ,
मिट्टी की हंड़िया में हों,
स्वाद बहुत बढ़ जाता पर,
कहाँ शहर में धरे घड़े,
खील खिलौना लाई भी,
गुझिया और मिठाई भी,
छोड़ उन्हें खुद भाई भी,
खाता देखो दही बड़े,
पापा खाते दही बड़े,
मम्मी खातीं दही बड़े,
सर्दी जानेवाली है,गर्मी आनेवाली है,
सर्दी जानेवाली है,
गर्मी आनेवाली है,
दूर हटेगी रजईया,
मच्छर काटेंगे भइया,
स्वेटर बक्से में होंगे,
अपने खूब मजे होंगे,
होली में रंग खेलेंगे,
गुझिया पूरी लेंगे,
अब तो रोज नहाएगे,
फिर स्कूल को जाएंगे,
दो आशीष हमें ईश्वर,
आएं जो अच्छे नंम्बर,
मेहनत का हम फल पाएं,
अगली कक्षा में जाएं
गर्मी आनेवाली है,
दूर हटेगी रजईया,
मच्छर काटेंगे भइया,
स्वेटर बक्से में होंगे,
अपने खूब मजे होंगे,
होली में रंग खेलेंगे,
गुझिया पूरी लेंगे,
अब तो रोज नहाएगे,
फिर स्कूल को जाएंगे,
दो आशीष हमें ईश्वर,
आएं जो अच्छे नंम्बर,
मेहनत का हम फल पाएं,
अगली कक्षा में जाएं
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