Saturday, 23 December 2017

हम दीवाने जरा अलग

मनचाहा मिल सका नहीं ग़र,
सबके बहाने अलग-अलग थे,

उम्र - उम्र की बातें होती,
सबके खजाने अलग-अलग थे,

तुमने प्यार के पैसे माँगे,
मैंने दिल से बदला दिल को,

तुम तो निकले बड़े सयाने,
हम दीवाने जरा अलग थे,

हम कितने लायक हैं

आज घूमने गए सभी हम
छोड़ के अपनी बस्ती,
पैसे खर्चो नहीं मिलेगी
मिली ये खुशियाँ सस्ती,
छोड़ किताबों की बंदिश से,
देखी बाहर दुनिया,
आई जो फुर्ती चुस्ती तो,
बस में कर ली मस्ती,
इस मस्ती में झूम रहे,
हम कितने लायक हैं

जीवन में एक मित्र बनाएं

सोते हैं तो अब जग जाएं,
धरती को कपड़े पहनाएं,
आओ आगे बढ़कर आएं,
जीवन में एक मित्र बनाएं,
प्रतिपल मदद हमारी करते,
गर्मी में आतप को हरते,
फूल औ फल पत्तियाँ दवाएं,
देते शीतल मंद हवाएं,
पानी देकर बड़ा बनाएं,
जीवन में एक मित्र बनाएं
बेचैन बहुत फिरना घबराए हुए रहना
इक आग सी जज़्बों की दहकाए हुए रहना
छलकाए हुए चलना ख़ुशबू लब-ए-लालीं की
इक बाग़ सा साथ अपने महकाए हुए रहना
उस हुस्न का शेवा है जब इश्क़ नज़र आए
पर्दे में चले जाना शरमाए हुए रहना
इक शाम सी कर रखना काजल के करिश्मे से
इक चाँद सा आँखों में चमकाए हुए रहना
आदत ही बना ली है तुम ने तो 'मुनीर' अपनी
जिस शहर में भी रहना उकताए हुए रहना
मुनीर नियाज़ी
पल-पल बदलें,कल अलग
और आज अलग,
हर साजिंदा लिए हुए है,
साज अलग,
क्यों ना बदलें हम ऐसे में,
रंग अपने,
होती अलग जगह,
होते अंदाज़ अलग,
झुंड में हैं ये बच्चे,
अथवा फूलों का गुलदस्ता,
साथ में हों जब इनके
तो लगता हमको अच्छा,
इस जहान में हैं जितने,
वे सब दुखदर्द भुलाकर,
बच्चों के संग में ये मन भी
हो जाता है बच्चा,
आओ आज करे सब मिलकर,
चिड़ियाघर की सैर,
देखें समझें पशु पक्षी को,
हल्ला किए वगैर,
एक सींग का गैंडा देखो,
जिसकी मोटी खाल,
पानी के राजा लेटे हैं,
मगरमच्छ घड़ियाल,
सुंदर मोर देखते जाओ,
तोता हरियल वाला,
भाग न पिंजरे से जाए,
सो लगा हुआ है ताला,
हाथी शेर जिराफ लकड़बग्घे,
कंगारू भालू,
प्यारा पांडा चढ़ा पेड़ पर,
खाता देखो आलू,
देख न पाओ एक बार में,
फिर आ जाना खैर,
आओ आज करे सब मिलकर,
चिड़ियाघर की सैर,
कचहरी तो बेवा का तन देखती है,
कहाँ से खुलेगा बटन देखती है
- कैलाश गौतम
भले डांट घर में तू बीबी की खाना
भले जैसे-तैसे गिरस्ती चलाना
भले जा के जंगल में धूनी रमाना
मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना
कचहरी न जाना
कचहरी न जाना
कचहरी हमारी तुम्हारी नहीं है
कहीं से कोई रिश्तेदारी नहीं है
अहलमद से भी कोरी यारी नहीं है
तिवारी था पहले तिवारी नहीं है
कचहरी तो बेवा का तन देखती है
कहाँ से खुलेगा बटन देखती है
कचहरी ही गुंडों की खेती है बेटे
यही जिन्दगी उनको देती है बेटे
खुले आम कातिल यहाँ घूमते हैं
सिपाही दारोगा चरण चूमतें है
कचहरी में सच की बड़ी दुर्दशा है
भला आदमी किस तरह से फंसा है
यहाँ झूठ की ही कमाई है बेटे
यहाँ झूठ का रेट हाई है बेटे
कचहरी का मारा कचहरी में भागे
कचहरी में सोये कचहरी में जागे
मर जी रहा है गवाही में ऐसे
है तांबे का हंडा सुराही में जैसे
लगाते-बुझाते सिखाते मिलेंगे
हथेली पे सरसों उगाते मिलेंगे
कचहरी तो बेवा का तन देखती है
कहाँ से खुलेगा बटन देखती है
कचहरी शरीफों की खातिर नहीं है
उसी की कसम लो जो हाज़िर नहीं है
है बासी मुंह घर से बुलाती कचहरी
बुलाकर के दिन भर रुलाती कचहरी
मुकदमें की फाइल दबाती कचहरी
हमेशा नया गुल खिलाती कचहरी
कचहरी का पानी जहर से भरा है
कचहरी के नल पर मुवक्किल मरा है
मुकदमा बहुत पैसा खाता है बेटे
मेरे जैसा कैसे निभाता है बेटे
दलालों ने घेरा सुझाया-बुझाया
वकीलों ने हाकिम से सटकर दिखाया
धनुष हो गया हूँ मैं टूटा नहीं हूँ
मैं मुट्ठी हूँ केवल अंगूठा नहीं हूँ
नहीं कर सका मैं मुकदमें का सौदा
जहाँ था करौदा वहीं है करौदा
कचहरी का पानी कचहरी का दाना
तुम्हे लग न जाये तू बचना बचाना
भले और कोई मुसीबत बुलाना
कचहरी की नौबत कभी घर न लाना
कभी भूल कर भी न आँखें उठाना
न आँखें उठाना न गर्दन फसाना
जहाँ पांडवों को नरक है कचहरी
वहीं कौरवों को सरग है कचहरी ||
कागज के थैले अपनाओ,
पर्यावरण को स्वच्छ बनाओ,
अगर गंदगी हो तो उसको,
कूड़ेदानों में पहुँचाओ,
देश हमारा है घर जैसा,
इसको साफ रखो रखवाओ,
हम जैसे करते हैं देखो,
तुम भी निकलो आगे आओ,
एक से एक जुडे़ं तो मिलकर,
दरिया बन एक लहर उठाओ,
देश हमारा सबसे न्यारा,
बढ़ो, इसे आगे बढ़वाओ,
कोई बोले कोमल हमको,
कोई कहे कठोर,
हिम्मत नहीं बपौती कोई,
इस पर सबका जोर,
बनें साहसी वीर बहादुर,
हो जाएं सिरमौर,
करें इरादा बनें,
रहें हम आखिर क्यों कमजोर,

Saturday, 14 October 2017

भाव भरा हो,
नित नूतन स्वर,
लाएँ अर्थ
शब्द में भरकर,

कविता है
तो बोलेगी ही,
लोगों की
जुबान पर चढ़कर,
गुड्डी है तो
डोलेगी ही,
नीले आसमान
में बढ़कर,
चाँद हो सामने,
तारों की जरूरत क्या है,
तुम नज़र में हो,
नज़ारों की जरूरत क्या है,
यूँ तो दुनिया में,
बहुत से हैे मेरी राम सलाम,
दोस्त तुम सा हो,
हजारों की जरूरत क्या है,
फिर कहाँ मंज़िलों से दूरी है,
काम कुछ हो,ज़ुनू जरूरी है,
कुदरत हमें बचाती हरदम,
इसको हमें बचाना,
अपनी रग-रग में साँसों में,
इसका आना जाना,
हम इसके काम आएं न आएं,
पर इसको काम आना,
इसकी हर शय अपनी खातिर,
इक अनमोल खज़ाना,
पुरानी है हवेली पर चमक,
इसकी अनूठी है,
नगीना है ये गौरव देश का,
जैसे अगूंठी है,
अपना रावण मारें
----------------------

चुन्नू गया दशहरा मेला,
रावण फूँका गया वहाँ पर, 


चुन्नू कहे-बताओ पापा,
क्यों हर साल जलाते रावण, 


पापा बोले-चुन्नू तुमको,
क्यों ये बात समझ ना आई,

नाम सिर्फ पुतले का रावण,
खड़ी सामने यहाँ बुराई,

कहना है बस सबसे इतना,
अपने को हम आप सँवारें,

देख बुराई अपने अंदर,
हम अपने रावण को मारें,
आस का विश्वास का आया सवेरा,
जो करेगा दूर जीवन का अँधेरा,

इक नए उत्साह का सूरज उगा है,
चल पड़ेगा रथ बहुत दिन से रुका है,

क्षितिज के द्वारे से झुककर झाँकती किरनें,
रंग बिखराकर हमारा मन लगी हरने,

जाग जाएं जब तभी समझो सवेरा,
ग़म न कर ग़र राह में है तम घनेेरा,

चल रहा जीवन हमारा, चल रहे हम,
रुक गए ये कारवाँ सब, जाएगा थम,
चेहरों पे लगे चेहरे,
हमको ये बताते हैं,
हम दोस्त रहें मिलकर,
चेहरे खो जाते हैं,
दिल में तो एक जैसे,
अरमान मचलते हैं,
चेहरे तो झूठे हैं,
चेहरे तो बदलते हैं,
कहती हैं वीरान दिवारें मुझको भी पहचान,
आज दिख रही ऐसी,कल तक थी मेरी भी शान,
नज़र फेरकर यूँ मत जाओ, बैठो पास हमारे,
देखो कितना बड़ा खज़ाना अंदर मेरे छिपा रे,
कुदरत के कण-कण में सरगम,
नए सृजन का चाव,
सुनना चाहो, छोड़ जगत को,
कुछ पल यहाँ बिताओ,
रंग-रंगीले कपड़े पहने मैं जहाज रेगिस्तानी,
क्या-क्या मेरी विशेषताएँ क्या तुमने हैं वे जानी,
करें सवारी बैठें ऊपर कोई, राजा या रानी,
एक बार में पी लेता हूँ मैं हफ्ते भर का पानी,
प्रथम द्वितीय तृतीय पुरस्कृत हुए कहानीकारो,
जिम्मेदारी है तुम पर अब ज्यादा, यह स्वीकारो,
सरस सुगम स्वीकार्य कहानी की बहने दो सलिला,
देतीं शुभकामना खड़ी संग,भंडारी श्री विमला,
दूर-दूर तक पानी जिसमें,
कमल खिल रहे प्यारे,
बीच ताल जलमहल बना है,
यहाँ घूमने आ रे,
जगह सलूम्बर जिला उदयपुर-
का सेरिंग तालाब,
कैसा लगा देखकर तुमको,
कहिए जरा जनाब,
अधूरा निष्कर्ष
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एक छोटा सा बच्चा अपने दोनों हाथों में एक एक एप्पल लेकर खड़ा था.
उसके पापा ने मुस्कराते हुए कहा कि"बेटा एक एप्पल मुझे दे दो"
इतना सुनते ही उस बच्चे ने एक एप्पल को दांतो से कुतर लिया.
उसके पापा कुछ बोल पाते उसके पहले ही
उसने अपने दूसरे एप्पल को भी दांतों से कुतर लिया. अपने छोटे से बेटे की इस हरकत को देखकर बाप ठगा सा रह गया और
उसके चेहरे पर मुस्कान गायब हो गई थी....
तभी उसके बेटे ने अपने नन्हे हाथ आगे की ओर बढाते हुए पापा को कहा....
पापा ये लो ये वाला ज्यादा मीठा है...
शायद हम कभी कभी पूरी बात जाने बिना निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं.
नजर का आपरेशन तो सम्भव है,
पर नजरिये का नही..!!!
फर्क सिर्फ सोच का होता है......
वरना , वही सीढ़ियां ऊपर भी जाती है ,
और नीचे भी आती हैं ।
बहुत वीराना हूँ, फिर भी खड़ा हूँ,
कोई दीवाना हूँ, फिर भी खड़ा हूँ,
किसी का गीत ना कोई रुबाई,
महज भूला फसाना हूँ, फिर भी खड़ा हूँ,
कभी सरसब्ज़ छायादार था पर, फकत लूटा खज़ाना हूँ, फिर भी खड़ा हूँ,
हवा थी तेज, पानी भी नहीं था,
गुजर इसको भी जाना, फिर भी खड़ा हूँ,
नीलकण्ठ ट्रेकिंग अभियान
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यह पहला विश्राम ,
यहाँ से ऊपर चढ़ना होगा,
ऊँचे-नीचे राहों में,
संग-संग ही बढ़ना होगा,
हैं बन्दर लंगूर,
घास मत छूना,बिच्छू वाली,
जीव-जन्तु फल-फूल,
देखना मनमोहक हरियाली,
नीलकण्ठ ट्रेकिंग अभियान
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ले नीबू का पानी
या फिर चाय ले ले,
जरा धूप ले या
कहीं छाँव ले ले,
जो बारिश की बूँदें
पडें तेरे ऊपर,
लगा छाता पत्थर का,
आराम ले ले,
नीलकण्ठ ट्रेकिंग अभियान
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चेहरों पे खुशी छा जाती है,
आँखों में भी नूर आ जाता है,
कुदरत के करीब आ, तन मन में,
मस्ती का सुरूर आ जाता है,
एक से कोई दूसरा,
करता नहीं क्यों बातचीत,
एक सन्नाटा कि जैसे,
बिखरा हुआ महफिल में है,
वक्त आने दे बता देंगे,
ऐ अय जंगल तुझे ,
हम अभी से क्या बताएँ,
क्या हमारे दिल में है?
बहते हुए ये झरने,
मनमोहती हरियाली,
होली है ईद है ये,
ये दशहरा दीवाली,
खुश कर रहे ये मन को,
ग़म दूर भागते हैं,
पाते वे ऐसे लम्हे,
जिनके भाग्य जागते हैं,
नीलकण्ठ ट्रेकिंग अभियान
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जिन्दगी भी बह रही है,
ज्यों बहे झरना,
मौत आई तो मरेंगे,
आज क्यों मरना,
जो मिले पल उसमें जी लें,
हो के खुश कर दें,
चाँद से अमृत निचोडे़ं,
हाथ पर धर लें,
मेरे सपने इस झरने से हरदम रहते बहते,
सुनता हूँ आवाज़ें उनकी वे मुझसे ये कहते,
चले चलो अविराम इसी से खुशियां होंगी हासिल,
सोचो मत बस चले चलो पैरों लिपटेगी मंज़िल,
कहते हैं इसे पैसा बच्चों
ये चीज़ बड़ी मामूली है
लेकिन इस पैसे के पीछे
सब दुनिया रस्ता भूली हैं

इंसान की बनायी चीज़ है ये
लेकिन इंसान पे भारी हैं
हलकी सी झलक इस पैसे की
धर्म और ईमान पे भारी है
ये झूठ कों सच कर देता है
और सच कों झूठ बनाता है
भगवान नहीं पर हर घर में
भगवान की पदवी पाता है
इस पैसे के बदले दुनिया में
इंसानों की मेहनत बिकती है
जिस्मों की हरारत बिकती है
रूहों ही शराफत बिकती है
सरदार खरीदें जाते हैं
दिलदार खरीदें जाते हैं
मिट्टी के सही पर इस से ही
अवतार खरीदें जाते हैं
इस पैसे की खातिर दुनिया में
आबाद वतन बंट जाते हैं
धरती टुकड़े हो जाती है
लाशों के कफ़न बंट जाते हैं
इज्ज़त भी इस से मिलती है
ताजीम भी इस से मिलती है
तहज़ीब भी इस से आती हैं
तालीम भी इस से मिलती हैं
हम आज तुम्हे इस पैसे का
सारा इतिहास बताते हैं
कितने युग अब तक गुजरें हैं
उन सब की झलक दिखलातें हैं
इक ऐसा वक्त भी था जग में
जब इस पैसे का नाम न था
चीज़ें चीज़ों से तुलती थीं
चीज़ों का कुछ भी दाम न था
चीज़ों से चीज़ बदलने का
यह ढंग बहुत बेकार सा था
लाना भी कठिन था चीज़ों का
ले जाना भी दुश्वार सा था
इंसान ने तब मिलकर सोचा
क्यों वक्त इतना बर्बाद करें
हर चीज़ की जो कीमत ठहरे
वो चीज़ न क्यों इजाद करें
इस तरह हमारी दुनिया में
पहला पैसा तैयार हुआ
और इस पैसे की हसरत में
इंसान ज़लील ओ खार हुआ
पैसे वाले इस दुनिया में
जागीरों के मालिक बन बैठे
मजदूरों और किसानों की
तकदीरों के मालिक बन बैठे
जंगों में लड़ाया भूखों कों
और अपने सर पर ताज रखा
निर्धन कों दिया परलोक का सुख
अपने लिए जग का राज रखा
पंडित और मुल्ला इन के लिए
मज़हब के सहीफे लाते रहे
शायर तारीफें लिखते रहे
गायक दरबारी गाते रहे
ओ ओ ओ ओ
ओ ओ ओ ओ
वैसा ही करेंगे हम जैसा
तुझे चाहिए
पैसा हमें चाहिए
वैसा ही करेंगे हम जैसा
तुझे चाहिए
पैसा हमें चाहिए
हल तेरे जोतेंगे
खेत तेरे बोयेंगे
ढोर तेरे हाकेंगे
बोझ तेरा ढोएंगे
पैसा हमें चाहिए
पैसा
पैसा
वैसा ही करेंगे हम
जैसा तुझे चाहिए
पैसा हमें चाहिए
पैसा हाथ में दे दे राजा
गुण तेरे गायेंगे
तेरे बच्चे बच्चियों की
खैर मनाएंगे
पैसा हमें चाहिए
वैसा ही करेंगे हम
जैसा तुझे चाहिए
पैसा हमें चाहिए
युग युग से यूँ ही इस दुनिया में
हम दान के टुकड़े मांगते हैं
हल जोत के फसलें काट के भी
पकवान के टुकड़े मांगते हैं
लेकिन इन भीख के टुकड़ों से
कब भूख का संकट दूर हुआ
इंसान सदा दुःख झेलेगा
गर खत्म न ये दस्तूर हुआ
ज़ंजीर बनी है क़दमों की
वो चीज़ जो पहले गहना थी
भारत के सपूतों आज तुम्हे
बस इतनी बात ही कहना थी
जिस वक्त बड़े हो जाओ तुम
पैसे का राज मिटा देना
अपना और अपने जैसों का
युग युग का क़र्ज़ चुका देना
युग युग का क़र्ज़ चुका देना
साहिर


एक तरफ से
आओ आओ पी लो भाई ,
मटके का पानी,
स्वाद अलग है पीकर होगी ,
तुमको हैरानी,

फ्रिज का पानी, सादा पानी,
नलके का पानी,
बिना हाथ धोए मत पीना,
झलके नादानी,
आओ आओ पी लो भाई,
मटके का पानी,
नीलकण्ठ ट्रेकिंग अभियान
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उड़ने वालों उड़ो हवा में ,
ध्यान रहे इन बातों में,
फँस ना जाना कदम-कदम पर,
ऐसी बिछी बिसातों में,
नहीं साबका पड़े तुम्हारा,
आफत के परकालों से,
सारा जंगल भरा पड़ा है,
इन मकड़ी के जालों से,
ख़्वाब आँखों में, मैं पाँवों में सफ़र रखता हूँ
रेत पर लेट के तारों पे नज़र रखता हूँ

धूल हालात को हर बार चटाई मैंने
मैं मुक़द्दर तो नहीं रखता जिगर रखता हूँ

मेरी मंजि़ल को मेरी कितनी तलब है देखो
राह बन जाती है, मैं पांव जिधर रखता हूँ

चाँद तारों से उजालों से मुझे क्या लेना
मैं तो जुगनू हूँ अंधेरों की ख़बर रखता हूँ

हरमन दिनेश
खुशियाँ कहतीं हैं ?
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जीवन के पत्तों पर
बूँदों सी हम,
सोचो तो ज्यादा हैं
तोलो तो कम,
खुशियाँ इन बूँदों सी,
बरसे हर दम,
हम पर है ले पाएँ
ज्यादा या कम,
नीलकण्ठ ट्रेकिंग अभियान
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मौसम भी हुआ भीगा,
रुत पे भी जवानी है,
है आग कोई अन्दर,
बाहर से ये पानी है,
औरों की तो छोड़ो,
हैं पेड़ भी बौराए,
कुदरत की हर शय की
ये ही तो कहानी है,
नीलकण्ठ ट्रेकिंग अभियान
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नीलकण्ठ जो है अखण्ड,
ऊँची-नीची राह,
क्या वाह वाह,
सब एक रंग,
हों संग-संग,
हम क्या करेंगे,
बोलो क्या करेंगे,
मज़े करेंगे,मज़े करेंगे,मज़े करेंगे,
मज़े करेंगे,मज़े करेंगे,मज़े करेंगे,
नीलकण्ठ ट्रेकिंग अभियान
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ऊँचे नीचे रस्ते होइंगे,
चल-चल हालत खस्ते होइंगे,
भूलभुलैया हो जाएँगे,
भटके तो हम खो जाइंगे,
क्या करेंगे,
बोलो क्या करेंगे,
संग चलेंगे संग चलेंगे संग चलेंगे
संग चलेंगे संग चलेंगे संग चलेंगे,
पत्तों पर ठहरी-ठहरी
ये बारिश की बूँदें,
सोचें हम ये हैं
गालों पर आँखों को मूदें,
बंद करे पलकों को
पल-पल जीवन को जी लें,
मदिर-मदिर मन से साँसों की
मदिरा को पीलें,
क्या अच्छा है और बुरा
कहते किसको भूलें,
आज उम्मीदों के झूले चढ़
अम्बर को छू लें,
जीवन के रास्तों में
चलना है रुक के थम के,
खुशियों के फूल होंगे,
काँटे भी होंगे ग़म के,
आराम से दोनों से
हमको निबाह करना,
चलना उसूल पर ही,
जीना हो चाहे मरना,
खेल अब होने वाला है
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हल्ला गुल्ला शोर मचाएं,
आउट कर जल्दी भग जाएं,
जाएं तो पकड़े ना जाएं,
गया सामने बुना एक,
मकड़ी सा जाला है,
खेल अब होने वाला है,
छूकर भागें, साँस न टूटें,
एक साथ मिलकर सब छूटें,
जरा देर में यहाँ पे या कोई,
हँसने वाला है,
या कि फिर रोने वाला है,
खेल अब होने वाला है,

Saturday, 2 September 2017

बस में बैठे चले घूमने,
मस्ती में भाई,
पीछे वालो भी बैठो,
करना मत लड़ाई,
कभी-कभी ऐसे भी मौके ,
मिल जाते हमको,
तीखी फीकी खट्टी मीठी,
अपनी पढ़ाई,
महक मिट्टी की जिस दम,
ज़ेहन को पागल बनाती है,
नहीं रुक सकता बेटा,
माँ उसे मन से बुलाती है,
एक गांव में एक महिला का पति शहर में नौकरी करता था|
काफी दिनों तक जब वो नहीं आया तो महिला ने सोचा कि एक चिट्ठी लिखनी चाहिए, लेकिन उस महिला को यह पता नहीं था कि पूर्ण विराम कहां लगाते हैं और उसने जहां मन आया पूर्ण विराम लगा दिए|
उसने चिट्ठी कुछ इस प्रकार लिखी...

मेरे प्यारे जीवनसाथी..
मेरा प्रणाम आपके चरणों में| आप ने अभी तक चिट्ठी नहीं लिखी मेरी सहेली को| नौकरी मिल गई है हमारी बकरी ने| बछड़ा दिया है दादाजी ने| शराब शुरू कर दी है मैंने| तुमको बहुत ख़त लिखे पर तुम नहीं आए कुत्ते के बच्चे| भेड़िया खा गया दो महीने का राशन| छुट्टी पर आते वक्त लेते आना एक खूबसूरत औरत| मेरी सहेली बन गई है| और इस वक़्त टीवी पर गाना गा रही है हमारी बकरी| बेच दी गई है तुम्हारी मां| तुमको बहुत याद करती है एक पड़ोसन| हमें बहुत तंग करती है तुम्हारी बहन| सिरदर्द से लेटी है तुम्हारी पत्नी|
कुदरत का अनमोल इशारा,
भाषा रूप विविध पहनावा,
कितना सुंदर कितना प्यारा,
रंग-रंगीला देश हमारा,
मेरी चिड़िया तेरी चिड़िया,
किसकी चिड़िया सबसे बढ़िया,
रंगबिरंगी चलती-फिरती,
जिधर घुमा दें,उधर ही मुड़ती,
मगर नहीं उड़ पाती हैं ये,
और नहीं कुछ खाती है ये,
काश जान इनमें आ जाए,
संग उड़ा हमको ले जाए,
हम बच्चे पड़कुड़ियों जैसे,
हँसें फुदकते चिड़ियों जैसे,
मामाजी के राकेट पर
हम चाँद की सैर को जाएंगे,
वहाँ के बच्चों से मिलजुलकर,
दूध मलाई खाएंगे,
दीदी साथ न जाएगी तो
कौन तुम्हें नहलाएगा,
कौन करेगा कंघी पट्टी
कपड़े कौन पहनाएगा,
हवा करेगी कंघी पट्टी
और बादल नहलाएंगे,
परियां कपड़े पहनाएंगी,
तारे मुँह धुलवाएंगे,
मामाजी के राकेट पर
हम चाँद की सैर को जाएंगे,
साहिर
फिल्म-दीदी (वर्ष-1959)
लोक रंग
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सीधा सादा बंदा, सीधा सादा है परिवार,
रंगरंगीला देश, देश के रंगीले त्योहार,
महके मिट्टी सोंधी खुश्बू खींचे अपनी जान,
देखो जरा बताना कैसा पहना ये परिधान?

(सिक्किम में)
झर झर झरते झरने,
सर सर चलती पवन सुहानी,
दिल न रहे वश में जो,
तो फिर इसमें क्या हैरानी,
सजग प्रतिपल जुटे तैयार,
अपनी मुहिम पर सारे,
यही बस होड़ है प्रतिपक्ष के,
कितने गए मारे,
न अंतिम पल तलक हमको,
जरा विश्राम लेना है,
चपलता से विरोधी को,
हमें अब मात देना है,
हकीकत बनाम फिल्म
'संडास का नाश' बनाम टायलेट एक प्रेमकथा
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यह आज से लगभग सोलह साल पहले की घटना है जब गर्मी की छुट्टियों में मैं अपने गृहनगर फर्रुखाबाद छिबरामऊ गया था।हर बार ये छुट्टियाँ मेरे लिए विशेष होती थीं। कभी उत्साही युवा साथियों का दल कैमरा और कार लिए आस पास के जिलों में कारगिल में शहीद हुए सैनिकों के घरों में जा जाकर वीडियो फिल्म बनाने के लिए तैयार होते। तो कभी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली के प्रशिक्षण दल के द्वारा लगाई कार्यशाला से प्रेमचन्द की 'ईदगाह' और भारतेन्दु हरिश्चंद्र का 'अंधेर नगरी' की तैयारी और उसका प्रदर्शन...
मगर इस बार एक नया युवा दल अपने हाथ में एक नई संस्था की मशाल थामें था और उसके साथ ही लिए हुए था अनूठा अभियान...
संस्था का नाम था 'अननोन वालंटियर्स एक्शन' यानि 'युवा' ...
और उनके अभियान का नाम था 'संडास का नाश' ...
कन्नौज जिले के छिबरामऊ कस्बे के सारे संडास यानि शुष्क शौचालयों के विरुद्ध युद्ध...
तब न कहीं दूर-दूर आज की तरह 'स्वच्छता अभियान' का नाम था और न 'टायलेट एक प्रेमकथा' जैसी किसी मूवी का शोर...
एक जुनून के तहत युवाओं का यह दल जुटा हुआ था सिर पर मैला ढ़ोने की अमानवीय प्रथा के खिलाफ कमर कसे।
जो लोग इस सुविधा का परंपरागत ढंग से लाभ उठा रहे थे। वे तिलमिलाए हुए थे। शोषक और शोषित दोनों इनके खिलाफ थे। उनकी जमी जमायी रोजी जो छिन रही थी।
अजीब सी परिस्थितियाँ थी। ऐसे में सारे जमाने से दुश्मनी लेकर धारा के विरुद्ध युद्ध करते हुए इन्होंने अपने जिले के जिलाधिकारी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग नई दिल्ली, राष्ट्रीय महिला आयोग नई दिल्ली तक बार बार लगातार संघर्ष करते हुए शहर से इस अमानवीय प्रथा का नाश किया।
अंततः नगरपालिका प्रशासन को घुटने टेकते हुए संडासों को तोड़कर मल श्रमिकों का पुनर्वास करना पड़ा था।
लाख मुसीबतों के बावजूद ऐसा करके इस उत्साही युवाओं के दल ने आने वाले युवाओं के लिए एक चुनौती प्रस्तुत की कि "बिना किसी संसाधन के अगर मन में बदलाव की लगन है तो वह जरूर होकर रहता है।"
इस यथार्थ जीवन की सत्य घटना में फिल्म जैसी रोमान्स की घटनाएं भले ही मुखर न हों पर रोमान्च की घटनाओं की कमी नहीं थीं।
जिस तरह से आक्रोशित मल श्रमिकों द्वारा आंदोलनकारियों के घरों में मल फेंकने की धमकियां दीं गईं। सारे नगर में तनाव और उत्तेजना का वह माहौल किसी बड़े फिल्मी रोमांच से कम नहीं था। जबकि बिडम्बना ये थी यह लड़ाई उनकी दशा को सुधारने के लिए ही थी।
कुछ को गीता अच्छी लगती,
कुछ को लगे कुरान,
मैंने माथे पर लिख डाला,
प्यारा हिन्दुस्तान,

हिन्दू प्यारा लगे, किसी को
प्यारा है इस्लाम,
मेरे लिए सभी कुछ मेरा,
प्यारा हिन्दुस्तान,
हम झंड़े के तीन रंग हैं,
देखो हमको ध्यान से,
बच्चे नहीं वरन हम चेहरे,
कल के हिंदुस्तान के,
प्रकृति विचित्र बनाई
तेरे क्या कहने,
कहाँ तक करें बड़ाई,
तेरे क्या कहने,
कैसे-कैसे जीव
बनाए दुनियाँ में,
सोच न पाएं भाई,
तेरे क्या कहने,
खब्‍बू दिवस यानी लेफ्ट हेंडर्स डे
---------------------------------------
13 अगस्‍त, यह दिन दुनिया भर में खब्‍बू दिवस यानी लैफ्ट हैंडर्स डे के रूप में मनाया जाता है।
(पंजाबी में बायें हाथ को खब्‍बा और दायें हाथ को सज्‍जा हाथ कहते हैं)। दुनिया में पूरी जनसंख्‍या के 13 से 14 प्रतिशत लोग खब्‍बू हैं।
महात्‍मा गांधी, सिकंदर महान, हैंस क्रिश्चियन एंडरसन, बिस्‍मार्क, नेपोलियन बोनापार्ट, जॉर्ज बुश सीनियर, जूलियस सीजर, लुइस कैरोल, चार्ली चैप्लिन, विंस्‍टन चर्चिल, बिल क्लिंटन, लियोनार्डो द विंची, अल्‍बर्ट आइंस्‍टीन, बेंजामिन फ्रेंकलिन, ग्रेटा गार्बो, इलियास होव, निकोल किडमैन, गैरी सोबर्स, ब्रायन लारा, सौरव गांगुली, वसीम अकरम, माइकल एंजेलो, मर्लिन मनरो, पेले, प्रिंस चार्ल्‍स, क्‍वीन विक्‍टोरिया, क्रिस्‍टोफर रीव, जिमी कोनर्स, टाम क्रूज, सिल्‍वेस्‍टर स्‍टेलोन, बीथोवन, एच जी वेल्‍स और अपने देश के पिता पुत्र बच्‍चन, बराक ओबामा रजनीकान्त शुक्ल सब खब्‍बू।
है ना मजेदार
खब्‍बू बेशक हर क्षेत्र कला, खेल, लेखन और संगीत में उत्‍कृष्‍ट होते हैं लेकिन वे आम तौर पर हॉकी खिलाड़ी नहीं होते।
जो हम से ना हो पाया,
वो तुम करके दिखलाओगी,
सिंधु साइना हो कोई भी,
उभर के ऊपर आओगी,
मुझे याद रखो या भूलो,
पर खुद पर इतराओगी,
मेरे इस मेडल से ज्यादा,
ऊँचे मेडल लाओगी,
पुलेला गोपीचंद
एक आदमी जो इलेक्शन मे किस्मत आजमा रहा था उसे सिर्फ तीन वोट मिले।
तो वो सरकार से जेड प्लस की सुरक्षा मांगने गया ,
जिले के डी एम साहब ने समझाते हुए कहा "आप को सिर्फ तीन वोट मिले हैं , फिर आप को जेड प्लस कैसे दी जा सकती है ?? "
वह आदमी बोला "जिस शहर मे इतने सारे लोग मेरे खिलाफ हों , तो मुझे मरवाओगे क्या ?? मुझे तो सुरक्षा मिलनी ही चाहिए।"
ये निर्मल निश्छल हँसी,
खिलते जैसे फूल,
ज्यों ज्यों बढ़ती उमर है,
हम जाते हैं भूल,
मेहनत और लगन का चमके,
जिन पैरों में जूता,
रोक सकेगा कौन उसे फिर,
किसमें इतना बूता,

1. धान-पान अरु केरा, तीनों पानी के चेरा

2. तरकारी है तरकारी या में पानी की अधिकारी

काला फूल न पाया पानी धान मरा अधबीच जवानी

3. करिया बादर जी डरवावे, भूरा बादर पानी लावे

माघ-पूस पुरवैया चले तो छिछली गड़हिया नाव चलावे
अदबी नामों की दिलचस्प
हकीकत ?
----------------------------------------जानें इन मशहूर शायरों के असली नाम...
मिर्ज़ा ग़ालिब = मिर्ज़ा असदुल्ला खां, असद, मिर्ज़ा नौशा
मख़्मूर सईदी = सुल्तान मुहम्मद खां
फ़िराक़ गोरखपुरी = रघुपति सहाय मिश्र
कमर जलालाबादी = औम प्रकाश भण्डारी
निदा फाजली = मुक्तदा हसन
साहिर लुधियानवी = अब्दुल हई
शहरयार = प्रो. अखलाक मोहम्मद खां
गुलज़ार = सम्पूर्ण सिंह कालरा
कतील शिफाई = औरंगज़ेब खान
मजरूह सुल्तानपुरी = असरार उल हसन खान
जिगर मुरादाबादी = अली सिकन्दर
दाग देहलवी = नवाब मिर्ज़ा खां
अदम गोंडवी = रामनाथ सिंह
ज़ौक = मोहम्मद इब्राहिम ज़ौक
जोश मलीहाबादी = शब्बीर हसन खां
फानी बदायूंनी = शौकत अली खां
होश तिर्मज़ी = सैयद सिब्ते हसन
नीरज = गोपालदास नीरज
शकील बदायूंनी = शकील अहमद कादरी
इब्ने इंशा = शेर माहम्मद खां
रिफअत सरोश = सैयद शौकत अली
कैसर उल जाफरी = जुबैर अहमद
मुनीर नियाज़ी = मोहम्मद मुनीर खां
बशर नवाज़ = बशारत नवाज़ खां
शैदा बघौनवी = शहाबुद्दीन अहमद
तुफैल चतुर्वेदी = विजय कृष्ण चतुर्वेदी
मैकश अजमेरी = मोहम्मद युनूस
शीन काफ निज़ाम = शिव किशन बिस्सा
रियाज़ गाजियाबादी = मेहर इलाही खां
मयंक अकबराबादी = के. के. सिंह
साहिर होशियारपुरी = रामप्रकाश
अहमद फराज़ = सैयद अहमद शाह
मीना कुमारी = माहज़बीं अली बख़्श
नज़्मा = शमशाद नज़्मा
जलील मानकपुरी = जलील हसन
नज़ीर अकबराबादी = सैयद वली मोहम्मद
हफीज जालंधरी = अब्दुल असर हफीज
शेरी भोपाली = मुहम्मद असगर खान
गुलशन बावरा = गुलशन कुमार मेहता
खातिर गज़नवी = मिर्ज़ा इब्राहिम बेग
दुबे जी के पड़ोस में सत्यनारायण कथा की आरती हो रही थी,
आरती की थाली दुबे जी के सामने आने पर,
दुबे जी नेअपनी जेब में से छाँटकर कटा-फटा दस रूपये का नोट कोई देखे नहीं, ऐसे डाला ।
वहाँ पर अत्यधिक ठसाठस भीड़ थी ।
दुबे जी के कंधे पर ठीक पीछे वाली आंटी ने थपकी मार कर दुबे जी की ओर ₹2000 का नोट बढ़ाया ।
दुबे जी ने उनसे नोट ले कर आरती की थाली में डाल दिया ।
दुबे जी को अपने ₹10 डालने पर थोड़ी लज्जा भी आई ।
बाहर निकलते समय दुबे जी ने उन आंटी को श्रद्धा पूर्वक नमस्कार किया,
तब आंटी ने दुबे जी को बताया कि ₹10 का नोट निकालते समय आपका ₹2000 का नोट जेब से गिरा था, वो ही आपको वापिस किया था ।

Monday, 22 May 2017

एक बार एक राजा ने विद्वान ज्योतिषियों की सभा बुलाकर प्रश्न किया कि "मेरी जन्म पत्रिका के अनुसार मेरा राजा बनने का योग था मैं राजा बना , किन्तु उसी घड़ी मुहूर्त में अनेक जातकों ने जन्म लिया होगा जो राजा नहीं बन सके क्यों ? इसका क्या कारण है ?
राजा के इस प्रश्न से सब निरुत्तर होगये क्या जबाब दें कि एक ही घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके भाग्य अलग अलग क्यों हैं?
सभी विद्वजन इस प्रश्न का उत्तर सोच ही रहे थे में कि एक वृद्ध खड़े हुये और बोले, "महाराज की जय हो ! आपके प्रश्न का उत्तर भला कौन दे सकता है , आप यहाँ से कुछ दूर घने जंगल में जाएँ तो वहां पर आपको एक महात्मा मिलेंगे उनसे आपको उत्तर मिल सकता है।"
राजा की जिज्ञासा बढ़ी।
घोर जंगल में जाकर देखा कि एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठ कर अंगार (गरमा गरम कोयला ) खाने में व्यस्त हैं।
सहमे हुए राजा ने महात्मा से जैसे ही प्रश्न पूछा महात्मा ने क्रोधित होकर कहा-"तेरे प्रश्न का उत्तर देने के लिए मेरे पास समय नहीं है मैं भूख से पीड़ित हूँ ।तेरे प्रश्न का उत्तर यहां से कुछ आगे पहाड़ियों के बीच एक और महात्मा हैं,वे दे सकते हैं।"
राजा की जिज्ञासा और बढ़ गयी, पुनः अंधकार और पहाड़ी मार्ग पार कर बड़ी कठिनाइयों से राजा दूसरे महात्मा के पास पहुंचा किन्तु यह क्या?
महात्मा को देखकर राजा हक्का बक्का रह गया, दृश्य ही कुछ ऐसा था, महात्मा अपना ही माँस चिमटे से नोच नोच कर खा रहे थे।
राजा को देखते ही महात्मा ने भी डांटते हुए कहा " मैं भूख से बेचैन हूँ मेरे पास इतना समय नहीं है , आगे जाओ पहाड़ियों के उस पार एक आदिवासी गाँव में एक बालक जन्म लेने वाला है ,जो कुछ ही देर तक जिन्दा रहेगा सूर्योदय से पूर्व वहाँ पहुँचो वह बालक तेरे प्रश्न का उत्तर का दे सकता है।"
सुन कर राजा बड़ा बेचैन हुआ बड़ी अजब पहेली बन गया मेरा प्रश्न, उत्सुकता प्रबल थी। कुछ भी हो यहाँ तक पहुँच चुका हूँ वहाँ भी जाकर देखता हूँ क्या होता है?
राजा पुनः कठिन मार्ग पार कर किसी तरह प्रातः होने तक उस गाँव में पहुंचा, गाँव में पता किया और उस दंपति के घर पहुंचकर सारी बात कही और शीघ्रता से बच्चा लाने को कहा जैसे ही बच्चा हुआ दम्पत्ति ने नाल सहित बालक राजा के सम्मुख उपस्थित किया राजा को देखते ही बालक ने हँसते हुए कहा,
"राजन् ! मेरे पास भी समय नहीं है ,किन्तु अपना उत्तर सुनो लो तुम,मैं और दोनों महात्मा सात जन्म पहले चारों भाई व राजकुमार थे। एक बार शिकार खेलते खेलते हम जंगल में *भटक गए। तीन दिन तक भूखे प्यासे भटकते रहे ।
अचानक हम चारों भाइयों को आटे की एक पोटली मिली जैसे तैसे हमने चार बाटी सेकीं और अपनी अपनी बाटी लेकर खाने बैठे ही थे कि भूख प्यास से तड़पते हुए एक महात्मा आ गये । अंगार खाने वाले भइया से उन्होंने कहा -
बेटा मैं दस दिन से भूखा हूँ अपनी बाटी में से मुझे भी कुछ दे दो, मुझ पर दया करो जिससे मेरा भी जीवन बच जाय, इस घोर जंगल से पार निकलने की मुझमें भी कुछ सामर्थ्य आ जायेगी " इतना सुनते ही भइया गुस्से से भड़क उठे और बोले "तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या आग खाऊंगा ? चलो भागो यहां से।
वे महात्मा जी फिर मांस खाने वाले भइया के निकट आये उनसे भी अपनी बात कही किन्तु उन भइया ने भी महात्मा से गुस्से में आकर कहा कि "बड़ी मुश्किल से प्राप्त ये बाटी तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या अपना मांस नोचकर खाऊंगा ?"
भूख से लाचार वे महात्मा मेरे पास भी आये , मुझे भी बाटी मांगी... तथा दया करने को कहा किन्तु मैंने भी भूख में धैर्य खोकर कह दिया कि " चलो आगे बढ़ो मैं क्या भूखा मरुँ ...?"
बालक बोला "अंतिम आशा लिये वो महात्मा हे राजन !आपके पास आये, आपसे भी दया की याचना की।
सुनते ही आपने उनकी दशा पर दया करते हुये ख़ुशी से अपनी बाटी में से आधी बाटी आदर सहित उन महात्मा को दे दी।
बाटी पाकर महात्मा बड़े खुश हुए और जाते हुए बोले "तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से फलेगा।
बालक ने कहा "इस प्रकार हे राजन ! उस घटना के आधार पर हम अपना भोग, भोग रहे हैं ,धरती पर एक समय में अनेक फूल खिलते हैं, किन्तु सबके फल रूप, गुण, आकार-प्रकार, स्वाद में भिन्न होते हैं। इतना कहकर वह बालक मर गया।
राजा अपने महल में पहुंचा और सोचने लगा......
एक ही मुहूर्त में अनेक जातक जन्मते हैं किन्तु इसी तरह सब अपना किया, दिया, लिया ही पाते हैं।
लो यहाँ पे आ गए हम,
यूँ ही साथ-साथ चलते,
हो न ग़म किसी को हमसे,
यही देखते-सँभलते,

गुजरे बरस पचीसों,
इस राह में हमारी,
मिलती रही है छाया,
यूँ ही छाँव में तुम्हारी,
लेकर आशीष पिता का,
जीवन पथ पर बढ़ जाएं,
सागर में गहरे तैरें,
गिरि के शिखरों चढ़ जाए,
माँ का तो प्यार हमेशा,
बिन माँगे मिलता रहता,
दिल पर रख हाथ बताओ,
क्या कोई गलत मैं कहता,
सबकी जेबों में रहते हो,
हो आखिर तुम किसके पैसे,
आम संतरे टॉफी खाते
वो, होते हैं जिसके पैसे,

बोले दादाजी गौरव से,
जेब से मेरी खिसके पैसे,
गौरव हँस कहता दादा से,
पास में जिसके उसके पैसे,
दादाजी ने फिर समझाया,
गौरव बेटा ऐसा कैसे,
चीज के बदले चीज मिले
या मेहनत की है कीमत पैसे,
पैसों से खट्टा मीठा लो,
फिर वो चाहो चक्खो जैसे,
पहले मीठी सी पप्पी दो,
फिर जेबों में रक्खो पैसे,
बूढ़ा पिता अपने IAS बेटे के चेंबर में जाकर उसके कंधे पर हाथ रख कर खड़ा हो गया !
और प्यार से अपने पुत्र से पूछा...
"इस दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान कौन है"?

पुत्र ने पिता को बड़े प्यार से हंसते हुए कहा "मेरे अलावा कौन हो सकता है पिताजी "!
पिता को इस जवाब की आशा नहीं थी, उसे विश्वास था कि उसका बेटा गर्व से कहेगा पिताजी इस दुनिया के सब से शक्तिशाली इंसान आप हैैं, जिन्होंने मुझे इतना योग्य बनाया !
उनकी आँखे छलछला आई ! वो चेंबर के गेट को खोल कर बाहर निकलने लगे !
उन्होंने एक बार पीछे मुड़ कर पुनः बेटे से पूछा एक बार फिर बताओ इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान कौन है ???
पुत्र ने इस बार कहा- "पिताजी आप हैैं, इस दुनिया के सबसे शक्तिशाली इंसान "!
पिता सुनकर आश्चर्यचकित हो गए ।
उन्होंने कहा "अभी तो तुम अपने आप को इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान बता रहे थे अब तुम मुझे बता रहे हो " ???
पुत्र ने हंसते हुए उन्हें अपने सामने बिठाते हुएकहा-"पिताजी उस समय आप का हाथ मेरे कंधे पर था, जिस पुत्र के कंधे पर या सिर पर पिता का हाथ हो वो पुत्र तो दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान ही होगा ना,,,,,
बोलिए पिताजी" !
पिता की आँखे भर आई उन्होंने अपने पुत्र को कस कर के अपने गले लग लिया !
बड़े दिनों के बाद हैं आए,
छुट्टी वाले दिन,
कितना मेरे मन को भाए,
छुट्टी वाले दिन,

रोज-रोज जल्दी उठने की,
भागमभाग नहीं,
अब तो जब हम उठ जाएंगे,
होगी सुबह तभी,
पापा मम्मी भी अब ज्यादा,
जोर नहीं देंगे,
'छुट्टी है सोने दो' आपस में,
मिल कह लेंगे,
बस्ता कापी पेंसिल से अब,
कुट्टी वाले दिन,
बहुत दिनों के बाद हैं आए,
छुट्टी वाले दिन,
जाएंगे हम सब मिलकर,
दादी नानी के गाँव,
जहाँ नदी का शीतल जल,
पेड़ों की ठंड़ी छाँव,
तोड़ डाल से आम और जामुन,
हम खाएंगे,
दोस्त गाय बकरी के संग,
खेतों में जाएंगे,
भूलेंगे सर की मैडम की,
घुट्टी वाले दिन,
बहुत दिनों के बाद हैं आए,
छुट्टी वाले दिन,
काश कहीं से मिल जाए,
हमको ऐसी पावर,
बुर्ज खलीफा पर घूूमें,
टहलें एफिल टावर,
सागर के नीचे की दुनियां,
देखें जी भर के,
नभ के तारे सभी खंगालें,
एक-एक कर के,
किस्से और कहानी झूठा-
झुट्ठी वाले दिन,
बहुत दिनों के बाद हैं आए,
छुट्टी वाले दिन,
ओशो से किसी ने पूछा -‎
"राजनीतिक लुच्चे-लफंगों से देश को छुटकारा कब मिलेगा?"
ओशो ने कहा - "बहुत कठिन है। क्योंकि प्रश्न राजनेताओं से छुटकारे का नही है, प्रश्न तो तुम्हारे अज्ञान के मिटने का है ? तुम जब तक अज्ञानी हो, कोई न कोई तुम्हारा शोषण करता ही रहेगा, कोई न कोई तुम्हे चूसेगा ही !-
‎पंडित चूसेंगे , पुरोहित चूसेंगे , मुल्ला-मौलवी चूसेंगे , राजनेता चूसेंगे तुम जब तक जाग्रत नही हो, तब तक लुटोगे ही ? फिर किसने लूटा, क्या फर्क पड़ता है ? किस झण्डे की आड़ में लुटे, क्या फर्क पड़ता है ?
‎समाजवादियों से लुटे कि साम्यवादियों से, क्या फर्क पड़ता है ? तुम तो लूटोगे ही ! लूटेरों के नाम बदलते रहेंगे और तुम लुटते रहोगे !
'इसलिए ये मत पूछो कि राजनैतिक लुच्चे-लफंगों से देश का छुटकारा कब होगा? यह प्रश्न ही अर्थहीन है ? ये पूछो कि मै कब इतना जाग सकूँगा कि झूठ को झूठ की तरह पहचान सकूँ ? और जब तक सारी मनुष्य- जाति झूठ को झूठ की भाँति नहींं पहचानती, तब तक छुटकारे का कोई उपाय नहीं है।‎
राह में तुम मत सोना
------------------------
माँ ने सब्जी लेने चुन्नू को,
भेजा बाजार,
लगे राह में खेल खेलने,
बन्द हुआ बाजार,
खाली हाथ लौटकर आए,
डाँट पड़ी डटकर,
चुन्नू गुस्से में बोले-अब,
नहीं घुसेंगे घर,
माँ ने हँसकर कहा-
बिना सब्जी के खाना खाना,
आज नहीं ला पाए तो फिर,
कल सुबह ले आना,
मेहनत का फल अच्छा,
लापरवाही ठीक न होती,
जीत पे हँसती ये आँखें,
और असफलता पर रोती,
जीवन में पल-पल पर ऐसी,
मुश्किल घड़ियाँ आतीं,
पर वे आसमान पर छाई,
बदली सी हट जातीं,
सीखो सबक हर एक गलती से,
ऐसे कभी न रोना,
आँखों में मंज़िल को रख लो,
राह में अब मत सोना,

Sunday, 26 February 2017

उत्साही हर पल, जो कह दो, करने को तैयार,
नहीं किसी से कोई दुश्मनी, हैं जो सबके यार,
जन्मदिवस के इस अवसर पर हम सब है तैयार,
भर लो जितनी चाहो झोली, सभी लुटाते प्यार,
एक दो तीन चार,
पढ़े लिखे सारा परिवार,
इस युग का कहना,
अनपढ़ न रहना,
मुशकिल है जी वन,
कैसे चले ए टी एम,
पढ़ेंगे जब हम,
निकलेगा तब धन,
आओ साथ-साथ चलें,
कदम-कदम आगे बढ़े,
सागर में तैरें और,
पर्वत की चोटी चढ़ें,
शिक्षित हों सारे जने,
खुशदिल परिवार बने,
सारे मिल साथ चलें,
सुखमय संसार बने,
घूम-घूम कर देख रहे हैं ,
मेले को बच्चे,
संग किताबों के ये,
लगते हैं कितने अच्छे,
दोस्त किताबें सबसे अच्छीं,
सभी बताते हैं,
अगर पढोगे तभी बढोगे,
सब समझाते हैं,
मानी बात बडों की,
आया मज़ा बड़ा हमको,
चेहरे देख बताओ,
कैसा लगता है तुमको,
अपनी मट्टी की खुशबू सै,
भीजै तन मन सारो,
घाट घाट को पानी पी लेेव,
घर को पानी प्यारो,
अम्मा को बोली मै बोलैं,
जाको सुख है न्यारो,
जब जब बोलैं तब तब फैलै,
घर आँगन उजियारो,
करता हूँ मैं सलाम मादरी जुबान को,
जिसमें पुकारा सबसे पहले माँ के नाम को,
बहती है जिसमें दरिया की मानिंद मेरी सोच,
खुशदिल बनाया जिसने मेरी सुबह शाम को,
कल पुस्तक मेले में हम थे,
पुस्तक थीं और बच्चे थे,
दोस्त दोस्तों के संग संग थे,
वे क्षण कितने अच्छे थे,
वादा है यह अपना खुद से,
आगे भी हम संग रहें,
मजे करें, बातें आपस में,
मिलें जुलें ना बंद रहें,
पढने का आनंद भला,
ना पढने वाले क्या जाने,
जिनका दिल खुश हुआ,
वही तो मोल इन्ही का पहचाने,
वर्ष महीने हफ्ते दिन,
आते ही हैं सुबहो-शाम,
सूरज चन्दा तारे पृथ्वी,
करते कब आराम,
कितने प्राणी जन्में जग में
रह जाते गुमनाम,
नहीं वक्त का पता ठिकाना,
कर दे कब वीरान,
जीते जी जग में कर जाएँ,
हम ऐसे कुछ काम,
मरने के भी बाद हमारा,
याद रखें सब नाम,
कूड़ा-कूड़ा घर दरवाजा,
कचरा कचरा गली मुहल्ला,
फिर भी आप और हम बैठे,
बिलकुल खाली बने निठल्ला,
दोष देखते हैं औरों में,
खुद की ओर नज़र दौड़ाएं,
सारा देश हमारा मंदिर,
आओ सुंदर इसे बनाएं,

Tuesday, 7 February 2017

आई पुस्तक एक नवीन,
'हँसते गाते नाटक तीन'
इसे पढ़ो और हँसो हँसाओ,
स्वस्थ रहो और स्वास्थ बनाओ,
चाहो मिलकर इसको खेलो,
मन जो चाहे पात्र, उसे लो,
और बनाओ रोचक सीन,
'हँसते गाते नाटक तीन,'
इसमें साथ कहानी कविता,
चुन्नू - मुन्नू हो या बबिता,
सारे मिल खेले ये खेल,
झगड़ा करें न करें झमेल,
लो जब मन हो जरा मलीन,
'हँसते गाते नाटक तीन',
जीवन में तनाव को भूलें,
सहज उड़़ें और नभ को छू लें,
प्यार बढ़ाएं हँसें हँसाएं,
जीवन को खुशनुमा बनाएं,
सीख ये देते बेहतरीन,
'हँसते गाते नाटक तीन',
जिसे दुश्मन समझता हूँ वही अपना निकलता है
हर इक पत्थर से मेरे सर का कुछ रिश्ता निकलता है
डरा - धमका के तुम हमसे वफ़ा करने को कहते हो
कहीं तलवार से भी पांव का काँटा निकलता है
ज़रा -सा झुटपुटा होते ही छुप जाता है सूरज भी
मगर एक चाँद है जो शब् में भी तनहा निकलता है
फ़ज़ा में घोल दी हैं नफरतें अहले सियासत ने
मगर पानी कुएँ से आज तक मीठा निकलता है
दुआएँ माँ की , पहुँचाने को मीलों मील जाती हैं
कि जब परदेश जाने के लिए बेटा निकलता है
मुन्नवर राना
दिल कहे रुक जा रे रुक जा,
यहीं पे कहीं,
जो बात,जो बात इस जगह है,
वो कहीं पे नहीं,
दिल कहे रुक जा रे रुक जा,
पर्वत ऊपर खिड़की खोले,
झाँके सुन्दर भोर,
चले पवन सुहानी,
नदियों के ये राग रसीले,
झरनों का ये शोर,
बहे झर-झर पानी,
मद-भरा मद-भरा समां,
वन धुला-धुला,
हर कली रस पली यहाँ,
रस घुला-घुला,
तो दिल कहे रुक जा रे रुक जा,
यहीं पे कहीं,
जो बात जो बात इस जगह है
वो कहीं पे नहीं,
नीली-नीली झील में झलके,
नील गगन का रूप,
बहें रंग के धारे,
ऊँचे-ऊँचे पेंड़ घनेरे,
छनती जिनसे धूप,
खड़े बाँह पसारे,
चम्पई-चम्पई फिज़ा ,
दिन खिला-खिला,
डाली-डाली चिड़ियों की सदा,
सुर मिला-मिला,
तो दिल कहे रुक जा रे रुक जा,
यहीं पे कहीं,
जो बात जो बात इस जगह है
कहीं पर नहीं,
परियों के ये जमघट जिनके,
फूलों जैसे गाल,
सभी शोख हठीली,
इनमें है वो अल्हड़,
जिसकी हिरनी जैसी चाल,
बड़ी छैल-छबीली,
मनचली-मनचली अदा,
छवि जवाँ-जवाँ,
हर घड़ी चढ़ रहा नशा,
सुध रही कहाँ,
तो दिल कहे रुक जा रे रुक जा,
यहीं पे कहीं,
जो बात जो बात इस जगह है
कहीं पर नहीं,
एक वर्ष और गया,
गाँठ से,
बताता है,
समय का पहिया,
जिसे कि तुम,
सुनना मत,
पुनर्मूल्यांकन कर,
बीते समय का,
पुनः,
लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में,
सउत्साह,
होना रत,
बीता सो रीत गया,
आएगा वह लाएगा,
रस की हर बूँद,
आप उसकी पी जाईये,
वर्तमान का हर एक क्षण है,
मादक सुरा सा,
जीवन की प्यास,
इस उल्लास से बुझाईये,
आपकी शुभकामनाओं से,
मुझे संबल मिला है,
इसलिए उपलब्धियों में,
श्रेय भी तो आपका है,
प्राप्ति हर,देती निराशा,
कामना उत्साह भरती,
नित नए पल्लव सजाती,
उर्वरा मन की ये धरती,
आइए हम नयी सुबह के,
नए सपने सजाएं,
नित बदलते इस जहाँ को,
और कुछ बेहतर बनाएं,
फर फर फर फर फर फर फर फर,
हवा घुसी बैलून में,
सर सर सर सर सर सर सर सर,
सरदी घुस गई ऊन में,
खर खर खर खर चरखा काते,
बुढ़िया बैठी मून में,
टप टप टप टप टप टप टप टप,
बारिश बरसी जून में,
गुर्र गुर्र गर गुर्र गुर्र गर,
कितनी गरमी खून में,
ट्रिन ट्रिन ट्रिन ट्रिन ट्रिन ट्रिन ट्रिन ट्रिन,
घंटी टेलीफून में,
पूछो हमसे कितनी ताकत,
चटनी रोटी नून में,
जाना था रंगून,
पहुँच गए, हम तो देहरादून में,
कुछ ऐसी बहारें आईं हैं,
बदली है फ़िजा इस गुलशन की,
दुनियाँ में खुशी छाई है पर, 
दिल को है वहम मालूम नहीं,
उम्मीद से भी आगे बढ़कर,
कुछ ख्वाब सजाए बैठे हम,
भटके जो कदम टूटा जो भरम,
होंगे कहाँ हम मालूम नहीं,
सूनी है नज़र रस्ता वीराँ,
मंज़िल के पते का इल्म नहीं,
बढ़ते हैं कदम आगे-आगे,
कैसी है लगन मालूम नहीं,
तकते रहे मकान और गोदाम में कंबल,
बाहर खुले में ठिठुर के इंसान मर गए,
 तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है
उधर जम्हूरियत का ढोल पीते जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी है
लगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है
तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है
अदम गोंडवी
नज़र से दिल में समानेवाले
मेरी मोहब्बत तेरे लिए है,
वफ़ा की दुनिया में आनेवाले,
वफ़ा की दौलत तेरे लिए है,
खड़ी हूँ मैं, तेरे रास्ते में,
जवां उम्मीदों, के फूल लेकर,
महकती जुल्फ़ों,बहकती नज़रों,
की गर्म जन्नत,तेरे लिए है,
सिवा तेरी आरजू के, इस दिल में
कोई आरजू नहीं है,
हर एक जज़्बा,हर एक धड़कन,
हर एक हसरत,तेरे लिए है,
मेरे खयालों के नर्म परदों
में झाँककर मुस्कराने वाले,
हज़ार ख्वाबों,से जो सजी है,
वो एक हक़ीकत,तेरे लिए है
टूटे अज्ञानों की कारा,
असहायों को मिले सहारा,
सबल पाएं सद्ज्ञान खुदारा,
अमर रहे गणतंत्र हमारा,
राज़ है यही जिसे,जिन्दगी में ढ़ाल लें,
जो हमें सुखी करे,बस वही खयाल लें,
आएगा इसी से दम,
जिन्दगी की राह में,ख्वाब जो तूने बुने,
दे आवाज़ इस तरह कि हर कोई उसे सुने,
साथ चल कदम-कदम,
कोड़ा जमाल शाही,
पीछे देखा मार खाई,
घूम -घूम दौड़-दौड़,
पीछे कहीं कोड़ा छोड़,
भागना-भगाना है,
पकड़ा ना जाना है,
दौड़ो और दौड़ो भाई,
देना है नहीं छुआई,
कोड़ा जमाल शाही,
पीछे देखा मार खाई,
गोल-गोल घेरा है,
तेरा है ना मेरा है,
जो कोई बताएगा,
वही मार खाएगा,
बच पाओ बचो भाई,
पीठ पीछे आफत आई,
कोड़ा जमाल शाही,
पीछे देखा मार खाई,
छब्बीस जनवरी
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साहिर ने यह नज़्म बरसोंबरस पहले लिखी थी। देखें उन्होंने जो प्रश्न उठाए थे क्या वे आज भी प्रासंगिक नहीं हैं?
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आओ कि आज गौर करें, इस सवाल पर,
देखे थे हमने जो, वो हसीं ख्वाब क्या हुए,
दौलत बढ़ी तो मुल्क में, इफ़्लास(दरिद्रता) क्यों बढ़ा,
खुशहालिए-अवाम के असबाब(संसाधन) क्या हुए,
जो अपने साथ-साथ चले कूए दार(फाँसी की कोठरी) तक,
वह दोस्त वह रफीक वो अहबाब(साथी)क्या हुए,
क्या मोल लग रहा है शहीदों के खून का,
मरते थे जिनपे हम वो सजायाब(दण्ड)क्या हुए,
बेकस बरहनगी (विवश नग्नता)को कफ़न तक नहीं नसीब,
वो वादा- हाए-अतलसो कमख्वाब(बहुमूल्य बस्त्रो के वादे)क्या हुए,
जमहूरियत नवाज़, बशर दोस्त, अम्न ख्वाह,
खुद को जो खुद दिए थे,वो अल्क़ाब (उपाधियाँ)क्या हुए,
मज़हब का रोग आज भी क्यों लाइलाज है,
वह नुस्खा हाए नादिरो-नायाब क्या हुए,
हर कूचा शोलाज़ार है,हर शहर कत्लगाह,
यकजहतिए-हयात के आदाब क्या हुए,
सहरा-ए-तीरगी(अंधे मरुस्थल) में भटकती है जिंदगी ,
उभरे थे जो उफ़क(क्षितिज)पे जो महताब(चाँद)क्या हुए,
मुजरिम हूँ अगर मैं तो गुनहगार तुम भी हो,
ऐ रहबरान-ए-कौम(देश के नेताओं) खताकार तुम भी हो,
तुम्हारी नज़र क्यों खफ़ा हो गई,
खता बख्श दो ग़र खता हो गई,
हमारा इरादा तो कुछ भी न था,
तुम्हारी खता खुद सजा हो गई
सज़ा ही सही आज कुछ तो मिला है,
सज़ा में भी एक प्यार का सिलसिला है,
मोहब्बत का अब कुछ भी अंज़ाम हो,
मुलाकात की इब्दता हो गई,
मुलाकात पर इतने मगरूर क्यों हो,
हमारी खुशामद पे मजबूर क्यों हो,
मनाने की आदत कहाँ पड़ गई,
सताने की तालीम क्या हो गई,
सताते न हम तो मनाते ही कैसे,
तुम्हें अपने नज़दीक लाते ही कैसे,
इसी दिन का चाहत को अरमान था,
कबूल आज दिल की दुआ हो गई,
ये हुस्न तेरा ये इश्क़ मेरा
रंगीन तो है बदनाम सही
मुझ पर तो कई इल्ज़ाम लगे
तुझ पर भी कोई इल्ज़ाम सही
इस रात की निखरी रंगत को
कुछ और निखर जाने दे ज़रा
नज़रों को बहक जाने दे ज़रा
ज़ुल्फ़ों को बिखर जाने दे ज़रा
कुछ देर की ही तस्कीन सही
कुछ देर का ही आराम सही
जज़्बात की कलियाँ चुनना है
और प्यार का तोहफ़ा देना है
लोगों की निगाहें कुछ भी कहें
लोगों से हमें क्या लेना है
ये ख़ास त'अल्लुक़ आपस का
दुनिया की नज़र में आम सही
रुसवाई के डर से घबरा कर
हम तर्क-ए-वफ़ा कब करते हैं
जिस दिल को बसा लें पहलू में
उस दिल को जुदा कब करते हैं
जो हश्र हुआ है लाखों का
अपना भी वही अंजाम सही
ये हुस्न तेरा ये इश्क़ मेरा
रंगीन तो है बदनाम सही
मुझ पर तो कई इल्ज़ाम लगे
तुझ पर भी कोई इल्ज़ाम सही
अब न कर विलम्ब अम्ब,
कंठ में विराज आज,
साज ले सितार,
तार-तार झनकार दे,
प्यार दे पुकार पर,
गुहार पर सँभार स्वर,
जीभ पर सजीव,
शब्द-शब्द रस धार दे,
भाव दे प्रभाव दे,
स्वभाव दे कि काव्य भव्य,
भावना भरी हुई,
विभावना विहार दे,
मातु मैं कहूँ तो सत्य,
सत्य में शिवत्व तत्व,
तत्व में सदैव अभय,
सुंदरतम साज दे,
अब न कर विलंब अम्ब,
कंठ में विराज आज,
साज ले सितार,
तार-तार झनकार दे,
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या कुन्देन्दुतुषारहारधवला
या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा
या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकर
प्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती
भगवती निःशेषजाड्यापहा।।
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माँ तुम्हीं कहो कि,
किस तरह तुम्हें पुकार लें,
प्रत्यक्ष लक्ष के समक्ष,
आरती उतार लें,
तेरे पाद पंकजों का,
पंकजों के भी रजों का,
कोटि-कोटि बार-बार,
प्रेम से पुकार लें,
तुम्हारे ज्ञान पुञ्ज को,
विवेक के निकुञ्ज को
दया करो हे देवि हम,
कर तो नमस्कार लें,
माँ तुम्हीं कहो कि....
कहीं यादें पुरानी हैं,
कहीं फोटो पुरानी है,
नई हरपल नई हरदम, 
हमारी जिन्दगानी है,
वो जो क्षण जी रहे है हम,
वही तो है मेरा जीवन,
जो गुजरा था भला या कि बुरा,
वो सब कहानी है,
प्रतिपल मदमाती प्यास रहे,
हमसे लोगों की आस रहे,
जब तक साँसों में साँस रहे,
हो जुड़ा यही विश्वास रहे,
रोना या हँसना रहे खरा,
जीवन में रहे बसंत भरा,
वृक्षों पर मंजरियाँ झूलें,
अरमान उछल नभ को छू लें,
ग़म सारी दुनियाँ के भूलें,
खिल-खिला उठें कलियाँ फूलें,
हो पुलकित सारी वसुन्धरा,
जीवन में रहे बसंत भरा,
माँ तेरी वीणा के तारों की सुमधुर धुन,
सुनकर और गुनकर मैं जग को समझा पाऊँ,
बुद्धि दे हर स्वर के अंतर को पहचानूँ,
वीणा की पीड़ा को गीतों में गा पाऊँ,
'सा'गर में छुपी हुई उन अशान्त लहरों को,
'रे'ती में गहरे जो दबे, ज्वलित ईंधन को,
'गा'फिल हैं जो कल से ऐसे अनजानों को,
'मा'सूमी के क़ातिल, रंघ्रहीन कानों को,
'पा'ञ्चजन्य का स्वर दूँ, ऐसी तू शक्ति दे,
'धा'रण करने में होऊँ समर्थ भक्ति दे,
'नी'रव इस संध्या के अंतर का कोलाहल,
'सा'नुरोध व्यक्त करूँ, नेह शक्ति पा जाऊँ,
माँ तेरी वीणा के तारों की सुमधुर धुन,
सुनकर और गुनकर मैं जग को समझा पाऊँ,
यह सोच न लेना कल को दूसरे पहनूँगा,
फैशन के तहत नहीं ओढ़े मैंने विचार,
रग-रग में लहू उबलता, आग मचलती है,
जब कभी सुनाई देती है, शोषित पुकार,
ज्यों चुभे दंश, अनुभूति न सोने देती है,
चाँदनी रात में सौ-सौ ज्वार उठाती है,
तनहाई का यह जहर चाटता है मन को,
मत पूछ, अकेलेपन की पीड़ा, खाती है,
हम ग़मज़दा हैं, लाएं कहां से खुशी के गीत,
देंगे वही जो पाएंगे, इस जिंदगी से हम,
है आज नहीं कुछ हाथों में,
अपने भी नहीं तो ग़म क्यों हो, 

सूरज भी नहीं,चंदा भी नहीं,
तारे भी नहीं,जुगनू भी नहीं,
हम दूत उजाले के,किरनें बन,
अपनी डगर चमकाएंगे,


बादल भी नहीं,सागर भी नहीं,
नदिया भी नहीं,पोखर भी नहीं,
हम बूँद उम्मीद की,पत्तों पर,
मोती सा बिखरता जाएंगे,


तूफां भी नहीं,आंधी भी नहीं,
लूका भी नहीं,झोंका भी नहीं,
हम सांस की चलती डोरी हैं,
मंज़िल पे सफर ले जाएंगे,


है पास नहीं,कुछ परवा नहीं,
अपने भी नहीं तो क्यों ग़म हो,
हिम्मत से जो पत्थर जोड़े हैं,
हम उनसे राह बनाएंगे,