साहिर के रचना संसार में बच्चे
हिंदी फिल्म संसार में अपने भावपूर्ण गीतों से एक अलग मुकाम हासिल करने वाले शायर थे साहिर लुधियानवी। उत्कृष्टता के मापदण्ड पर अपने समकालीनों की अपेक्षा उन्होंने ऐसे गीत लिखे जो भाव और कला पक्ष दोनों में अनूठे थे। उनके फिल्मी और गैर फिल्मी रचनाओं को देखने से यह पता चलता है कि भविष्य का भारत उनके लिए काफी अहम था।
उनकी शुरुआती दौर की एक रचना है - आओ कि कोई ख्वाब बुने,कल के वास्ते, वरना ये रात आज के संगीन दौर की, डस लेगी जानो - दिल कि कुछ ऐसे कि जानो - दिल, ताउम्र फिर न कोई हसीं ख्वाब बुन सकें... गो हमसे भागती रही ये तेज गाम उम्र, ख्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र...आओ कि कोई ख्वाब बुनें, कल के वास्ते,
उन्होंने बेहतर भविष्य के सपने देखे थे और भविष्य का जीवन तो हमेशा बच्चों का ही होता है। उनका एक गीत जो फिल्म ‘दो कलियां’ में था बेहद लोकप्रिय हुआ। व्यवहारिक जीवन में अनुभवों से पगे उनके विचार मन पर सीधे असर करते थे। इसका एक बड़ा कारण यह था कि उनके शब्द सरल और सहज होते थे। उनकी विशेषता थी कि उन्होंने बड़े-बड़े दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों को अपने गीतों के जरिए आम जन को सुलभ कराया। अब अगर हम इसी फिल्म के गीत की बात करें तो हम देखते हैंु कि उन्होंने बाल मनोविज्ञान और जीवन के यथार्थ की इतनी बड़ी और गहरी समझ कितनी सहजता से हमारे सामने रख दी है -
खुद रूठें खुद मन जाएं,फिर हमजोली बन जाएं, झगडा जिसके साथ करें,अगले पल फिर बात करें,
इनको किसी से बैर नहीं, इनके लिए कोई गैर नहीं, इनका भोलापन मिलता है सबको बांह पसारे,
इंसां जब तक बच्चा है, तब तक ही वो सच्चा है, ज्यों-ज्यों उसकी उमर बढे,़ मन पर झूठ का मैल चढ़े,
पाप बढ़े नफरत घेरे, लालच की आदत घेरे, बचपन इन सब से हटकर, अपनी उमर गुजारे,
तन कोमल मन सुंदर है,बच्चे बड़ो से बेहतर हैं, इनमें छूत औ छात नहीं, झूठी जात और पात नहीं,
भाषा की तकरार नहीं मज़हब की दीवार नहीं, इनकी नज़रों में एक हैं मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे,
बच्चे मन के सच्चे, सारे जग की आंख के तारे, ये वो नन्हें फूल हैं जो, भगवान को लगते प्यारे,
उनके कई गीतों के केंद्र में बच्चे हैं। इससे पता लगता है कि उन्हें देश की आगामी पीढ़ी की कितनी चिंता थी। उनकी यह चिंता अनेक गीतों में बार - बार मुखरित हुई है। सन 1959 में बनी फिल्म दीदी के लिए लिखा गया यह गीत आंखें खोल देने वाला है। इसका केन्द्रीय भाव यह है कि बच्चे स्कूल की किताबों में तो कुछ और पढ़ते हैं मगर रोजमर्रा की जिंदगी में उन्हें कुछ और ही देखने को मिलता है। किताबों में लिखे आदर्श और आम जिंदगी के भोगे जा रहे यथार्थ के बीच का ये अंतर उन्हें भ्रमित करता है। उनके सवालों के जबाब न घर में मिलते हैं और न स्कूल में। एक अजब पाखण्ड का सामना बच्चा हर पल करता है। वह देखता है लोग कहते कुछ हैं और करते कुछ और हैं। इसी दुविधा में वह जीने लगता है और फिर कहीं से जबाब न पाकर अंततः वह भी उसी दोहरे व्यक्तित्व को अपना लेता है, जो हमारे समाज का हिस्सा है। इस मायने में साहिर की इस पहल का क्रांतिकारी महत्व है कि उन्होंने इस जड़ता को तोड़ने का जबरदस्त प्रयास किया। मेरा मानना है वस्तुतः छोटे - छोटे प्रश्न और उत्तरों वाला अध्यापक और बच्चों के बीच हुआ ये संवाद गीत हमारे शैक्षिक पाठ्यक्रम का हिस्सा होना चाहिए था। आइए इस संवाद गीत को पढ़कर आप खुद आकलन करें कि मेरा यह कहना कहाँ तक उचित है --
बच्चे - हमने सुना था एक है भारत, सब मुल्कों में नेक है भारत, लेकिन जब नजदीक से देखा, सोच समझ कर ठीक से देखा, हमने नक्शे और ही पाए, बदले हुए सब तौर ही पाए, एक से एक की बात जुदा है, धर्म जुदा है जात जुदा है, आपने जो भी हमको पढ़ाया, वो तो कहीं भी नज़र न आया,
अध्यापक - मैंने जो भी तुमको पढ़ाया, उसमें कुछ भी झूठ नहीं,भाषा से भाषा न मिले तो, इसका मतलब फूट नहीं, एक डाली पर रहकर भी जब, फूल जुदा और पात जुदा, बुरा नहीं ग़र यूँँ ही वतन में, धर्म जुदा और जात जुदा,
बच्चे - वही है जब कुरआन का कहना, जो है वेद पुरान का कहना, फिर ये शोर शराबा क्यों है,? इतना खून खराबा क्यों है ?
अध्यापक - सदियों तक इस देश पे बच्चो, रही हुकूमत ग़ैरों की, आज तलक हम सबके मुँँह पर धूल है उनके पैरों की, लड़वाओ और राज करो, ये उन लोगों की हिक़मत थी, उन लोगों की चाल में आना, हम लोगों की ज़िल्लत थी,यह जो बैर है इक दूजे से, ये जो फूट औ रंजिश है, उन्हीं विदेशी आकाओं की सोची समझी बख़्शिश है,
बच्चे - ़कुछ इंसान ब्रह्मन क्यों हैं, कुछ इंसान हरिजन क्यों ? एक को इतनी इज़्जत क्यों है, एक को इतनी ज़िल्लत क्यों ?
अध्यापक - धन और ज्ञान को, ताकत वालों ने अपनी जागीर कहा, मेहनत और गुलामी को कमजोरों को तक़दीर कहा, इंसानों का ये बटवारा, वहशत और जहालत है, जो नफरत की शिक्षा दे, वह धर्म नहीं है लानत है, जनम से कोई नीच नहीं है, जनम से कोई महान नहीं, करम से बढ़कर किसी मनुज की कोई भी पहचान नहीं,
बच्चे-ऊँचे महल बनाने वाले, फ़ुटपाथों पर क्यों रहते हैं,दिन भर मेहनत करने वाले, फ़ाँक़ों का दुख क्यों सहते हैं ?
अध्यापक - खेतों और मिलों पर अब तक, धनवालों का इज़ारा है, हमको अपना देश है प्यारा, उन्हें मुनाफ़ा प्यारा है, उनके राज में बनती है, हर चीज तिजारत की खातिर, अपने राज में बना करेगी, ‘सब’की जरूरत की खातिर,
बच्चे - अब तो देश में आजादी है, अब क्यों जनता फरियादी है ? कब जाएगा दौर पुराना, कब आएगा नया ज़माना ?
अध्यापक - सदियों की भूख और बेकारी, क्या एक दिन में जाएगी, इस उजड़े गुलशन पर रौनक आते - आते आएगी, ये जो नए मंसूबे हैं, ये जो नई तामीरें हैं, आने वाले दौर की कुछ, धुंधली - धुंधंली तस्वीरें हैं, तुम ही रंग भरोगे इनमें तुम ही इन्हें चमकाओगे, नवयुग आप नहीं आएगा, नवयुग को तुम लाओगे,
वास्तव में देश के हर विद्यालय के शिक्षक की यही सोच होनी चाहिए जो कि हमारे देश के संविधान की आत्मा का मूल स्वर भी है। कितनी सरलता से इतने बड़े - बड़े सवालों के हल साहिर ने उन्हें बताए जिन्हें वास्तव में इनकी बेहद जरूरत है। माता पिता अज्ञानता के कारण और राजनेता निहित स्वार्थ के कारण बच्चों को इस हक़ीकत से रूबरू नहीं कराते या नहीं कराना चाहते। मगर ये हमारी इस नई पीढ़ी के साथ धोखा है, सही मायने में कहें तो यह देश के भविष्य के साथ धोखा है।
मगर साहिर ने अपनी सामथ्र्य भर हल बताने की कोशिश की। इसी फिल्म में बच्चों को संबोधित करते हुए एक अन्य महत्वपूर्ण गीत में वे जो बातें लिखते हैं वे ऐसी हैं जिनकी एक - एक पंक्ति पर किताब लिखी जा सकती है। यही कविता की खूबसूरती है और यही कविता की शक्ति भी।
हमारा समाज मूलतः अतीतजीवी है। आज की हर समस्या का हल हम हमेशा बीते हुए कल में ढँ़ूढ़ने की कोशिश करते हैं। यही कारण है कि विज्ञान हमारे यहाँँ ज्यादा नहीं फल फूल सका। वे बड़ी - बड़ी बातें जिन्होंने देश की प्रगति के पाँवों में जंजीर डाल रखी है वास्तव में उतनी बड़ी नहीं हैं। अगर हम नई पीढ़ी को वास्तविकता से परिचित करा कर सही शिक्षा दे ंतो देश दिन दूनी रात चैगुनी गुनी तरक्की कर सकता है। मुझे लगता है कि देश के संविधान निर्माताओं ने जिस स्वप्न को देखते हुए उसे लिखा वह साहिर की रचनाओं में पूर्णतया प्रतिबिंबित हुआ है। गीत कुछ इस तरह से है -
बच्चो! तुम तक़दीर हो, कल के हिंदुस्तान की, बापू के वरदान की, नेहरू के अरमान की,
आज के टूटे खंड़हरों पर, तुम कल का देश बसाओगे,जो हम लोगों से न हुआ वो तुम करके दिखलाओगे,
तुम नन्हीं बुनियादें हो, दुनिया के नए विधान की, बच्चो! तुम तक़दीर हो, कल के हिंदुस्तान की,
जो सदियों के बाद मिली है, वो आजादी खोए ना, दीन धर्म के नाम पे कोई बीज फूट का बोए ना,
हर मज़हब से ऊँची है क़ीमत इंसानी जान की, बच्चो! तुम तक़दीर हो, कल के हिंदुस्तान की,
फिर कोई ‘जयचंद’न उभरे,फिर कोई ‘जाफ़र’न उठे, ग़ैरों का दिल खुश करने को अपनों पर खंज़र न उठे,
धन - दौलत के लालच में तौहीन न हो ईमान की, बच्चो! तुम तक़दीर हो, कल के हिंदुस्तान की,
बहुत दिनों तक इस दुनिया में, रीत रही है जंगों की, लड़ी हंै धनवालों की खातिर फौजें भूखे नंगों की,
कोई लुटेरा ले न सके अब कुर्बानी इंसान की, बच्चो! तुम तक़दीर हो, कल के हिंदुस्तान की,
नारी को इस देश ने देवी कहकर दासी माना है, जिसको कुछ अधिकार नहीं, वह घर की रानी माना है,
तुम ऐसा आदर मत लेना, आड़ जो हो अपमान की, बच्चो! तुम तक़दीर हो, कल के हिंदुस्तान की,
उनके गीतों में बच्चों को लेकर यह चिंताएं लगातार मुखरित हुई हंै। प्रख्यात कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने भी बच्चों के बारे में चिंता जताते हुए उन्हें स्वस्थ माहौल देने की वकालत की है। साहिर के एक अन्य गीत में एक अध्यापक के मन की भावना कुछ ऐसे व्यक्त हुई है कि अपनी सीमाओं में रहते हुए वह श्रेष्ठ नागरिकों के निर्माण की जिम्मेदारी को कैसे निभाए। बच्चों को समाज की संकीर्ण सोच से बचाते हुए उनकी कोमल कल्पनाओं की उड़ान को सकारात्मक सोच के पंख कैसे मिलें। उनकी सोच का दायरा कैसे विस्तृत हो। यह कोशिश लगातार उनके गीतों में दिखती है। गुरुदीक्षा के रूप में उनकी ये पंक्तियाँ सारे शिक्षक और अभिभावक समाज के लिए अनुकरणीय हैं -
भारत माँ की आँख के तारो नन्हें मुन्ने राजदुलारो, जैसे मैंने तुमको सँवारा, वैसे ही तुम देश सँवारो,
ये जो है छोटा सा बस्ता, इल्म के फूलों का गुलदस्ता, कृष्ण हैं इसमें राम हैं इसमें, बुध मत और इस्लाम है इसमें,
ये बस्ता ईसा की कहानी, ये बस्ता नानक की वानी, इसमें छुपी है हर सच्चाई, अपना सुख औरों की भलाई,
इस बस्ते को शीश नवाओ, इस बस्ते पर तन - मन वारो,
छोड़ के झूठी जातें-पातें, सबसे सीखो अच्छी बातंें, जग मे किसी को ग़ैर न समझो, अपना किसी से बैर न समझो,
आप पढ़ो औरों को पढ़ाओ, घर घर ज्ञान की ज्योति जलाओ, नव जीवन की आस तुम्हीं हो, बनता हुआ इतिहास तुम्हीं हों,
जितना गहरा अँधियारा हो, उतने ऊँचे दीप उभारो,
ये संसार जो हमने सजाया, ये संसार जो तुमने पाया, इस संसार में झूठ बहुत है, जुल्म बहुत है लूट बहुत है,
ज़ुल्म के आगे सिर न झुकाना, हर एक झूठ से टकरा जाना, इस संसार का रंग बदलना,ऊँच और नीच का ढंग बदलना,
सारा जग है देश तुम्हारा ,सारे जग का रूप निखारो,
आज आतंक और ज़ुल्म से विश्व मानवता कराह रही है। इसके लिए भारत की विश्व बंधुत्व वाली इस सोच को सामने लाती साहिर की नई पीढ़ी के लिए लिखी गईं उपरोक्त पंक्तियाँ किसी धरोहर से कम नहीं हंै।
किसी भी रचनाकार की रचना खासोआम में तब मकबूल होती है जब उन्हें लगे - ‘अरे यही तो मैं कहना चाह रहा था।’ इसके लिए रचनाकार को जिसके लिए वह लिख रहा है उसके अंतर्मन में प्रवेश कर उसी की तरह सोचना पडता है। अब जरा आप इस गीत को देखिए जिसमें नन्हें बच्चे देश में अपनी सरकार बनाने का सपना देखते हैं। उसमें उनकी सोच में रचनाकार अपने सपने जोड़कर कैसा सपना देखता है। आप भी देखें और महसूस करें -
बड़ों का राज तो सदियों से है जमाने में, कभी हुआ नहीं दुनिया में राज छोटों का,अगर हमें भी मिले इखित्यार अय लोगों,तो हम दिखाएं तुम्हें काम काज छोटों का,
मुल्क में बच्चों की ग़र सरकार हो, जिंदगी एक जश्न एक त्योहार हो,
हुक्म दें ऐसे कैलेंडर के लिए, जिसमें दो दिन बाद इक इतवार हो,
सबको दें स्कूल जैसा यूनिफार्म ,एक सी हो पैंट हर शलवार हो,
हाॅस्टल तामीर हों सबके लिए,कोई भी इंसां न बेघर वार हो,
राष्ट्र भाषा हम इशारों को बनाएं, दक्खिन उत्तर में न फिर तकरार हो,
हम मिनिस्टर हों तो वो सिस्टम बनें, जिसमें मुफलिस हो न साहूकार हो,
कौमी दौलत से खजाने हों भरे, ले ले उससे जिसको जो दरकार हो,
ईद दीवाली सभी मिल के मनाएं, आदमी को आदमी से प्यार हो,
मुल्क में बच्चों की ग़र सरकार हो,
राष्ट्रभाषा की लाइलाज समस्या का कितना खूबसूरत और सार्थक हल सुझाया है उन्होंने। कभी मुंशी प्रेमचंद ने भी इसके लिए सुझाव देते हुए कहा था। अरब के मूर्ख सिपाहियों और हिंदुस्तान के ग्रामीण बाशिंदों के आपसी बोलचाल के मेल से जब इतनी खूबसूरत भाषा उर्दू का जन्म हुआ है तो सभी भारतीय भाषाओं के मेल से बहुत प्यारी भाषा बनेगी।
साहिर की रचनाओं की विषयवस्तु के बच्चे वे जन सामान्य तो थे ही मगर सामाजिक विषमता के शिकार असामान्य परिस्थितियों में पल रहे वे बच्चे भी रहे जो सड़कों पर पल रहे थे।
इन उजले महलों के तले,हम गंदी गलियों में पले,सौ सौ बोझे मन पे लिए,मैल और माटी तन पर लिए,
दुख सहते ग़म खाते रहे, फिर भी हँसते गाते रहे, हम दीपक तूफाँ में जले... दुनिया ने ठुकराया हमें, रस्तों ने अपनाया हमें, सड़कें माँ सड़कें ही पिता, सड़कें घर सड़कें ही चिता, क्यों आए क्या करके चले... दिल में खटका कुछ भी नहीं, हमको परवा कुछ भी नहीं, चाहो तो नाकारा कहो,चाहो तो आवारा कहो, हम ही बुरे तुम सब हो भले..
उनके कई गीत इन बच्चों पर केंद्रित हैं। मगर यहाँ यह बात देखने योग्य है कि उनकी कलम ने उन्हें कहीं हेय नहीं बनाया, बल्कि उनके उल्लास उनके बेफिक्रेपन खिलंदड़े अंदाज़ को ही उभारा क्योंकि उनका स्पष्ट मत था कि अपनी इस स्थिति के लिए वे कतई जिम्मेदार नहीं हैं। इसके लिए सामाजिक परिस्थितियों की जिम्मेदारी है।
परिस्थितियाँ जब नहीं बदलनी हैं समाज के सारे कारोबार निहित स्वार्थी तत्वों के कारण ऐसे ही चलने हैं तो फिर हम भी इसकी चिंता में दुबले क्यों हों । ‘कोउ नृप होय हमैं का हानी, चेरी छोड़ न हुइहंय रानी’ की जब स्थिति रहनी है तो फिर वे कर ही क्या सकते हैं। फिल्म धूल का फूल का गीत लिखते समय साहिर ने लिखा है -
अपनी खातिर जीना है अपनी खातिर मरना है, होने दो जो होता है अपने को क्या करना है,
जिनको जग की चिंता है वे जग का दुख झेलेंगे, हम सड़कों पर नाचेंगे फुटपाथों पर खेलेंगे,
उनको आहें भरने दो जिनको आहें भरना है...
प्यार की शिक्षा मागी तो लोगों ने दुदकार दिया, आखिर हमने दुनिया को बूट की नोक से मार दिया,
यूँ ही उमर गुजरनी थी यूँ ही उमर है,
अपने जैसे बेफिकरे और नहीं इस बस्ती में ,दुनिया ग़म में डूबी है, हम डूबे हैं मस्ती में,
जीना है तो जीना है मरना है तो मरना है
मनोवैज्ञानिकों का कहना हैं कि व्यक्ति सारे जीवन में जो सीखता है उसका आधार सात साल की उमर तक रख जाता हैं बाकी आजीवन उसमें कोई मूलभूत बदलाव नहीं होता। उस समय उसे जैसी शिक्षा माहौल और ज्ञान मिलता है, बाकी का सारा जीवन उस पर ही आधारित होता है।इसी कारण पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली में प्राथमिक शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता है। दुर्भाग्य से हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा ही सर्वाधिक उपेक्षित है। देश की नई पीढ़ी के लिए उस समय रवींद्रनाथ टैगोर ने प्रकृतिवादी शिक्षा और महात्मा गांधी ने बुनियादी शिक्षा के विचार दिए। मगर साहिर ने व्यवहारिक जीवन में पगी ऐसी सूक्तियां दीं जिनका सार्वकालिक महत्व है। वर्ष 1964 में ‘चाँदी की दीवर’ फिल्म के लिए गीत लिखते समय उन्होंने ऐसी बारहखड़ी लिख दी जिसका इस बहुधर्मी बहुभाषी देश के लिए क्या महत्व है इसका अंदाज़ा आप स्वयं इसे पढ़कर लगा सकते हैं -
‘क’ से कुल दुनियां हमारी जिसमें भारत देश है, ‘ख’ से खेती जिसमें जीवन दान का संदेश है,
‘ग’ से गंगा जिसमें पहले आर्य उतरे थे जहाँ,‘घ’से घर की आबरू रक्षक हैं जिसके नौजवाँ,
‘च’ से राजा चंद्रगुप्त और ‘छ’ से उसका छत्र है, देश के इतिहास का वो युग सुनहरा पत्र है,
‘ज’ जलालुद्दीन अकबर जिसने सौ कीले किए, हिंदू मुस्लिम नस्ल और मजहब मिलाने के लिए,
‘झ’ से है झाँसी की रानी, ‘ट’ से टीपू सूरमा, जिनके जीते जी न सिक्का चल सका अंग्रेज का,
‘ठ’ से वो ठाकुर जिसे टैगोर कहता है जहाँ,विश्व भर में उसकी रचनाओं से है भारत का मान,
‘ड’ से डल कश्मीर की जो हर नज़्ार का नूर है, ‘ढ’ से ढाका जिसकी मलमल आज तक मशहूर है,
‘त’ है ताज़ आगरे का इक अछूता शाहकार, शाहजहाँ की लाड़ली मुमताज़ बेगम का मज़ार,
‘द’ से दिल्ली दिल वतन का ‘ध’ से धड़कन प्यार की,‘न’ से नेहरू जिसपे हैं नज़रें लगीं संसार की,
‘प’ से उसका पंचशील और फ’ से उसका सुर्ख फूल,‘ब’ से बापू जिसको प्यारे थे अहिंसा के असूल,
‘भ’ भगतसिंह जिसने ललकारा विदेशी राज़ को, चढ़ के फाँसी पर बचाया अपनी माँ की लाज को,
‘म’ से वो मजदूर जिसका दौर अब आने को है, ‘य’ से युग सरमायादारी का जो मिट जाने को है,
‘र’ से रस्ता प्यार का, ‘ल’ से लगन इंसाफ की, ‘व’ से ऐसा वायुमंडल, जिससे बरसे शान्ती,
‘श’ से शाहों का जमाना ‘स’ से समझो जा चुका, ‘ह’ से हम सब एक से हों वक्त ये समझा चुका,
‘क’ से कुल दुनियां हमारी जिसमें भारत देश है, ‘ख’ से खेती जिसमें जीवन दान का संदेश है,
साहिर की नजरों में कैसा बच्चा भविष्य के भारत का सही प्रतिनिधित्व कर सकता है। इसे उन्होंने ‘धूल का फूल फिल्म का गीत लिखते समय स्पष्ट कर दिया। हम लोग पढ़ लिख कर भी जब बचकानी हरकतें करते हैं तो हँसी आती है। इस गीत में वे देश की नई पीढ़ी को जो संदेश देते हैं। वह वही भारतीय संस्कृति का ‘वसुधैव कुटुंबकम का’ सर्वे भवंतु सुखिनः का उदारवादी स्वर है जिसको लेकर हम गर्वित होते हैं। जो वक्त की धुंध से धंुधला गया हैं। जरूरत है आज इस स्वर को ऊँचा करने की, वक्त के दर्पण पर जमी अनावश्यक धूल हटाने की। लीजिए प़िढ़ए इस गीत को और आकलन करिए कि क्या सही है और क्या गलत -
तू हिंदू बनेगा, न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा,
अच्छा है अभी तक तेरा कुछ नाम नहीं है, तुझको किसी मजहब से कोई काम नहीं है,
जिस इल्म ने इंसान को तक्सीम किया है, उस इल्म का तुझ पर कोई इल्जाम नहीं है,
तू बदले हुए वक्त की पहचान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा,
मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया, हमने उसे हिंदू या मुसलमान बनाया,
कुदरत ने तो बख्शी थी हमें एक ही धरती, हमने कहीं भारत कहीं ईरान बनाया,
जो तोड़ दे हर बंध वो तूफान बनेगा,
नफरत जो सिखाए वो धरम तेरा नहीं है, इंसां को जो रौंदे वो कदम तेरा नहीं है,
कुरआन न हो जिसमें वो मंदिर नहीं तेरा, गीता न हो जिसमंे वो हरम तेरा नहीं,
तू अमन का और सुलह का अरमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा
ये दीन के ताज़र ये वतन बेचने वाले, इंसानों की लाशों के कफन बेचने वाले,
ये महलों में बैठे हुए कातिल ये लुटेरे,काँटों की ऐवज रूहे चमन बेचने वाले,
तू इनके लिए मौत का ऐलान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा
अंत में यही कहना चाहूँगा कि साहिर भारतीय आत्मा के स्वर थे। हमारी मनीषा हमारी पहचान से हमें परिचित कराने वाले साहित्यकार थे। भले ही जमाने ने उनका विभिन्न कारणों से सही मूल्यांकन न किया हो। मगर वे भारत के ही नहीं विश्व मानवता की अनमोल धरोहर थे। जीवन को उन्होंने इतने आयामों अंदाजों से देखा और लिखा कि हमें कहना ही पडता है कि वे हर एक पल के शायर थे।