Thursday, 30 May 2013

थे खिले फूल भी गुलशन में, और काँटे भी,
छोड़ कर फूल मेरे हाथ थे, काँटों पे चले,
मुझे हर चीज वो अजीज़ है, जिसकी फितरत,
जो हो दिल में वही तस्वीर सी, चेहरे पे खिले,

  
है राहे ग़़म कि जिसमें पाया गया धोखा भी,
एक प्यारी हसीं सौगात की मानिन्द लगे,
सोचकर मैंने इसी दर्द को दी दिल में जगह,
साथी है ऐसा ये जो दूर तलक साथ चले,

खुशी की चाह में इंसा को न सुकून मिला,
खुशी मरीचिका सी उम्र भर इंसा को छले,
ग़म वो बहता हुआ दरिया है जिससे जीवन,
हो प्राणवान और उर्वर बहुत ही फूले-फले,
सदियों से इंसान ये सुनता आया है,
दुख की धूप के आगे सुख का साया है,

मुझको उन सस्ती खुशियों का लोभ न दो,
हमने सोच समझकर ग़म अपनाया है,

झूठ तो क़ातिल ठहरा इसका क्या रोना,
सच ने भी इन्सां का खून बहाया है,

पैदाइश के दिन से मौत की जद में हैं,
इस मक़तल में कौन हमें ले आया है,

अव्वल-अव्वल जिस दिल ने बरबाद किया,
आखिर-आखिर वो दिल ही काम आया है,

उतने दिन एहसान किया दीवानों पर,
जितने दिन लोगों ने साथ निभाया है, (साहिर)
दर्द बर्फ का वो सिल है,बन जो अश्क पिघलता है,
जहाँ कहीं दिल जलता है,गीत वहीं पर पलता है,

दिन से रात और सुख से दुख,सदियों से ही चलता है,
सुख के बाद मिले जो दुख,वो दुख ज्यादा खलता है,

जीवन क्या एक दीपक है,श्रम के तेल से जलता है,
इन्सां पकड़े मेहनत को, करवट भाग्य बदलता है,

श्रम ही है सच्ची पूजा, श्रम से ही सब मिलता है,
द्वेष घृणा का करो त्याग,दुश्मन मन की चंचलता है,

प्रेम सत्य अपनाकर देखो,माना बहुत जटिलता है,
पाना है यदि ईश्वर को, पहला नियम सरलता है,
खूब नारे उछाले गए,लोग बातों में टाले गए,
जो अंधेरों में पाले गए,दूर तक वो उजाले गए,
जिसने ज्यादा उ़ड़ाने भरीं,उसके पर नोच डाले गए,
पाँव जितने चले उनसे भी,दूर पांवों के छाले गए,
जिनसे घर में उजाले हुए, वे ही घर से निकाले गए,
जिनके मन में कोई चोर था,वो नियम से शिवाले गए,
इक जरा सी मुलाकात के,कितने मतलब निकाले गए,
कौन साजिश में शामिल हुए,किनके घर के निवाले गए,
अब ये ताजा अंधेरे जिय़ो ,कल के बासी उजाले गए,
....अंधकार में कैसे पढ़ते,
बल्ब ट्यूब जलवाता कौन,
सोच रहे हो लैम्प अगर तो,
उसको तेल दिलाता कौन,

घर बैठे ही खबर विदेशों की,
हम तक पहुँचाता कौन,
अगर दुखी है मन तो,
मीठे मीठे गीत सुनाता कौन,

दूर देश में क्रिकेट मैच हो,
घर में उसे दिखाता कौन,
बजता है रेडियो मगर,
ये सोचो उसे बजाता कौन,....
पोंछकर अश्क अपनी आँखों से,मुस्कराओ तो कोई बात बने,
सर झुकाने से कुछ नहीं होगा,सर उठाओ तो कोई बात बनें,

जिन्दगी भीख में नहीं मिलती,जिन्दगी बढ़ के छीनी जाती है,
अपना हक़ संगदिल ज़माने से,छीन पाओ तो कोई बात बने,

रंग और नस्ल जात और मज़हब,जो भी है आदमी से कमतर है,
इस हक़ीकत को तुम भी मेरी तरह,मान जाओ तो कोई बात बने,

नफरतों के जहान में हमको,प्यार की बस्तियां बसानी है,
दूर रहना कोई कमाल नहीं, पास आओ तो कोई बात बने,(साहिर)
आज ग़र साथ जमाना न दे,
तो ग़म क्यों हो,
दिल को धड़काएं,
ऐसे गीत तो बन सकता हूँ,
ज़ेहन में तैरती सपनों की,
इमारत कल की,
कर नहीं पूरी सका,
नींव तो बन सकता हूँ,...
भरम तेरी वफाओं का मिटा देते तो क्या होता,
तेरे चेहरे से हम पर्दा उठा देते तो क्या होता,

मोहब्बत भी तिजारत हो गई है इस जमाने में,
अगर ये राज़ दुनियाँ को बता देते तो क्या होता,

तेरी उम्मीद पर जीने से हासिल कुछ नहीं लेकिन,
अगर यूँ भी न दिल को आसरा देते तो क्या होता, (साहिर)

इस धरती पर बसने वाले,सब हैं तेरी गोद के पाले,सब हैं तेरी गोद के पाले,
कोई नीच न कोई महान,सबको सम्मति दे भगवान,

जातों नस्लों के बँटवारे,झूठ कहाएं तेरे द्वारे,झूठ कहाएं तेरे द्वारे,
तेरे लिए सब एक समान,सबको सम्मति दे भगवान,

जनम का कोई मोल नहीं है,जनम मनुष का तोल नहीं है,जन्म मनुष का तोल नहीं है,
करम से है सबकी पहचान, सबको सम्मति दे भगवान,
ईश्वर अल्लाह तेरे नाम ,सबको सम्मति दे भगवान,.(साहिर)
दिल में सच्ची लगन भावना शुद्ध भी,
हाथ जोड़ सिर झुकाना ही वंदगी नहीं,
दर्द है प्यार है और क्या क्या कुछ है,
सिर्फ साँसों का चलना ही जिन्दगी नहीं,
पोंछकर अश्क अपनी आँखों से,मुस्कराओ तो कोई बात बने,
सर झुकाने से कुछ नहीं होगा,सर उठाओ तो कोई बात बनें,

जिन्दगी भीख में नहीं मिलती,जिन्दगी बढ़ के छीनी जाती है,
अपना हक़ संगदिल ज़माने से,छीन पाओ तो कोई बात बने,

रंग और नस्ल जात और मज़हब,जो भी है आदमी से कमतर है,
इस हक़ीकत को तुम भी मेरी तरह,मान जाओ तो कोई बात बने,

नफरतों के जहान में हमको,प्यार की बस्तियां बसानी है,
दूर रहना कोई कमाल नहीं, पास आओ तो कोई बात बने,(साहिर)
उन्हें खोकर, दुखे दिल की दुआ से और क्या माँगूं,
मैं हैरां हूँ कि आज अपनी वफा से और क्या माँगूं,

गिरेबां चाक है, आँखों में आँसू, लब पे आहें हैं,
यही काफी है, दुनिया की हवा से, और क्या माँगूं,

मेरी बरबादियों की दास्ता उन तक पहुँच जाए,
सिवा इसके मोहब्बत के खुदा से और क्या माँगूं, (साहिर)
हैरां हूँ राहे-उम्र की तारीकियों से मैं,
घूरे के भी बदलते हैं,बारह बरस में दिन,

...जिनके ज़ुल्म से दुखी है जनता हर बस्ती हर गाँव में,
दया-धर्म की बात करें वह बैठ के सजी सभाओं में,

दान का चर्चा घर-घर पहुँचे,लूट की दौलत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आए, असली सूरत छिपी रहे,

देखें इन नकली चेहरों की कब तक जय-जयकार चले,
उजले कपड़ों की तह में, कब तक काला बाज़ार चले,

कब तक लोगों की नज़़रों से,छिपी हक़ीकत छिपी रहे,
नक़ली चेहरा सामने आए, असली सूरत छिपी रहे, (साहिर)
तेरा ये हौसला यूँ कम नहीं है, मगर जो चाहिए आलम नहीं है,
मैं दिल की बात को लब तक तो लाऊँ,मगर अब खुशनुमा मौसम नहीं है,

नहीं है कोई जो मुझसे ये कहता,धड़कता दिल है इसमें ग़म नहीं है,
उदासी बन गई मेरा मुकद्दर,मोहब्बत दिल में अबतक कम नहीं है,

फज़ाएं रुख बदलती जा रहीं हैं, नहीं अब प्यार का मौसम नहीं है,
कि नक़ली शक्ल जिसमें नज़र आए,हमारे पास वो दरपन नहीं है,

खुशी के कहकहों से गूँज उट्ठें, कहाँ हैं ऐसे अब आँगन नहीं हैं,
गुलों के दरमियां मानिन्दे-खुश्बू,वो जाहिर है मगर हरदम नहीं है,

जहाँ हों फूल सी खुश्बू बिखेरें, बताता क्या हमें गुलशन नहीं है,
अगर फौलाद सी हिम्मत हो दिल में,मायूसी हो तुझे मुमकिन नहीं है,

जहाँ भी है वो जैसाभी उसे अपना बनालो,ये सच नफरत में कोईदम नहीं है,
नहीं जो प्यार का हामी है यारो,कोई हो वो मेरा हमदम नहीं है,
इतिहास गवाह है,
जब-जब इंसान ने,
सुख को पाने के लिए,
गलत रास्ते को चुना,
वो भटक गया,
अब देखिए,
सुख की चाह में,
पैसे के विश्वामित्र के द्वारा,
इंसान,
त्रिशंकु की भाँति,
एक बार फिर,
अधर में लटक गया,
बोल न बोल ऐ जानेवाले सुन तो ले दीवानों की,
अब नहीं देखी जाती हमसे, ये हालत अरमानो की,

हुस्न के खिलते फूल हमेशा, बेदर्दों के हाथ बिके,
और चाहत के मतवालों को धूल मिली वीरानों की,

दिल के नाजुक जज्बों पर भी, राज है सोने चांदी का,
ये दुनिया क्या कीमत देगी, सादादिल इन्सानों की, (साहिर)
प्यार इबादत है,प्यार पूजा है,
प्यार की दुनिया खूबसूरत है,
इसकी क़़ीमत न अब वफा आँको,
इसको भी पैसे की जरुरत है,
मैं,
तुम्हारी आँख बन,
भर आँख,
तुमको चाहता हूँ,
देखना,
कर न देना,
तुम कहीं,ना
देखना,
(देखना एक दिन)--- । नरेश मेहता ।
यूँ तो हुश्न हर जगह है,लेकिन इस कदर नहीं,
अय वतन की सरजमीं,
ये खुली-खुली फ़िज़ा,ये धुला-धुला गगन,
नदियों के पेचो-ख़म,पर्वतों का बांकपन,
तेरी वादियाँ जवान,तेरे रास्ते हसीं,
अय वतन की सरजमीं,
तेरी खाक में बसी माँ के दूध की महक,
तेरे रूप में रची,स्वर्ग लोक की झलक,
हममें ही कमी रही,तुझमें कुछ कमी नहीं,
अय वतन की सरजमीं,
नैमतों के दरमियां,भूख प्यास क्यों रहे,
तेरे पास क्या नहीं, तू उदास क्यों रहे,
आम होगी वो खुशी,जो है अब कहीं कहीं,
अय वतन की सरजमीं,
तेरी खाक की कसम,हम तुझे सजाएंगे,
हर छिपा हुआ हुनर ,रोशनी में लाएंगे,
आने वाले दौर की,बरक़तों पे रख यकीं,
अय वतन की सरजमीं, (साहिर)
है मीलों तलक सहरा-सहरा,
है कोसों तलक इक सन्नाटा,
उम्मीद मेरी पर कहती है,
बढ़ चलो, है मंज़िल दूर नहीं,
दुर्बल पाता शक्ति हाथ में,
अक्सर ये होता है,
दुर्बल के ही हाथों को,
वह शख्स तोड़ देता है,
एक घुटन सी छाई है,वाताबरण में,
कितनी दूषित वायु है,पर्यावरण में,
राक्षसी गुण हैं विजित,अब सदगुणों पर,
कितना परिवर्तन हुआ है आचरण में,
आरोग्य चाहिए, आरोग्य सूत्र का पालन नहीं,
परिवार सुख चाहिए,परिवार की जिम्मेदारी नहीं,
अधिकार चाहिए,कर्तव्य का निर्वाह नहीं,
लोगों का मत चाहिए,जनहित साधना नहीं,
प्रशासन से रक्षा चाहिए,प्रशासन की रक्षा नहीं,
विश्वविद्यालय की उपाधि चाहिए,अध्ययन नहीं,
धर्म का फल चाहिए,धर्माचरण नहीं,
समाज से मिलने वाले सुख चाहिए,समाजसेवा नहीं,
हे ईश्वर,
तुमसे मिलने वाले दान चाहिए,तुम नहीं,
तुम्हें पसंद न करने वालों को, (संकलित)

ऊँचा नाम

एक खरगोश और एक कछुआ,ये दोनों थे मित्र बड़े,
मिलजुलकर रहते आपस में,कभी नहीं वे थे झगड़े,

एक बार लग गई शर्त,,दोनों में दौड़ हुई,
दौड़़ पड़ा खरगोश,सोचकर मेरी जीत हुई,

लेकिन आधे पथ में उसने सोचा,थोड़ा सा सो लूँ,
कछुआ धीमे आता होगा,तब तक एक नीँद ले लूँ,

धीमे-धीमे चलता कछुआ,उसके आगे निकल गया,
सोया था खरगोश, इसी से कछुआ बाजी जीत गया,

जबतक वक्त काम का तबतक,नहीं करेंगे हम आराम,
जब हो वक्त खेल का खेलें, इससे होगा ऊँचा नाम,
होती है जब जमा,मन में पीड़ा अधिक,
कंठ से खुद-ब-खुद गीत-गंगा बही,
कौन परिचित नहीं निर्झरी शक्ति से,
तोड़ जो पत्थरों का कलेजा रही,
कहूँ क्या हाल मैं अपना,तबीयत यूँ मचलती है,
तुझे देखे बिना तड़पूँ कि दिल में आग जलती है,
मगर एक याद है तेरी,जो मेरी सच्ची हमदम है,
यूँ आती जैसे गर्मी में,हवा एसी की चलती है,
अहले-दिल और भी हैं,अहले-वफा और भी हैं,
एक हम ही नहीं,दुनियाँ से ख़फा और भी हैं,

क्या हुआ ग़र मेरे यारों की ज़बानें चुप हैं,
मेरे शाहिद मिरे यारों के सिवा औरर भी हैं,...(साहिर
)
फूल जब अपनी छाती खोलते हैं,
सुन्दरता सुगन्धि मकरंद की समृद्धि आती है,
सीपियाँ जब अपनी छाती खोलतीं हैं,
मोती झपट पड़ते हैं,
हनुमान जब अपनी छाती खोलते हैं,
सीताराम का चित्र,
रात जब अपनी छाती खोलती है,
कोटि-कोटि नक्षत्र,
सबके ह्रदय में एक न एक,
निधि निधान-
तुम्हारा वर प्रदान है,
मेरे ह्रदय में,
तुम तो रहो,
स्वतंत्रधीर सिद्धेश्वरा.....(संकलित
)
कहीं करार न हो और कहीं खुशी न मिले,
हमारे बाद किसी को ये जिन्दगी न मिले,

सियाह नसीब कोई उससे बढ़ के क्या होगा,
जो अपना घर भी जला दे तो रोशनी न मिले,

यही सलूक है ग़र आदमी से दुनियाँ का,
तो कुछ अजब नहीं,दुनियाँ में आदमी न मिले,

ये बेबसी भी किसी बददुआ से कम तो नहीं,
कि खुल के जी न सके और मौत भी न मिले,(साहिर)
...अब मोहब्बत भी है क्या,
इक तिज़ारत के सिवा,
हम ही नादां थे जो ओढ़ा,बीती यादों का कफ़न,

वरना जीने के लिए सब कुछ भुला देते है लोग,
एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं लोग,

जाने वो क्या लोग थे,जिनको वफा का पास था,
दूसरे के दिल पे क्या गुजरेगी,ये अहसास था,
अब हैं पत्थर के सनम,जिनको अहसास न ग़म,
वो ज़माना अब कहाँ जो अहले दिल कको रास थ

अब तो मतलब के लिए नामे- वफा लेते हैं लोग,
जब भी जी चाहे नई दुनियाँ बसा लेते है लोग,

एक चेहरे पे कई चेहरे, लगा लेते हैं लोग, (साहिर)
अय दिल बता तू इतना परेशान सा क्यों है,
हर सिम्त जहाँ में भरा आलाम सा क्यों है,

जीता न कोई जीत के बाजी यहाँ फिर भी,
दुनियाँ का ये धनवान इक शैतान सा क्यों है,

है खेल जमाने से चला आया एक ही,
पर देख इसे शख्स हर हैरान सा क्यों है,

है दर्द बिना गीत की,जाने इसे दुनियाँ,
ताहम कोई गालिब कोई खैयाम सा क्यों है,

चाहा था जहाँ से वही पाया हसीं तोहफा,
जीवन मेरा मुझपे मगर इल्ज़ाम सा क्यों है,

रोका न था मैंने न ही शिकवा ही किया था,
क़ातिल मेरा मक़्तल में मेहरवान सा क्यों है,

माना कि जिन्दगी है खुशी ग़म की कहानी,
हर चीख बेकसों की, इक पैगाम सा क्यों है,

ऊपर से तो हर दिल यहाँ खुश दिखता है मगर,
हर साँस में, इक दर्द का तूफान सा क्यों है,

ये मुझको पता है, कि है हर चीज पुरानी,
लेकिन नया कुछ करने का,अरमान सा क्यों है,
फरेब देती हैं इंसानियत से दूर करें,
बैल कोल्हू का बनाती हैं हमें जंज़ीरें,
जहाँ में शान्ति का,सुख का मुकाम आगे है,
आओ,दें तोड़ हम झूठी जो गढ़ी जंज़ीरें,

दर्द को दे जुबान जीना है, ज़हर असमानता का पीना है,
कोशिशें हों इसी की हो वापस,उसका हक़़ जिस किसी ने छीना है,

काश अब भी जो तू सँभल जाए, एक तूफान सा मचल जाए,
ख़िजा रशीदा चमन में बहार आए ज्यों,इस अँधेरे में शम्मा जल जाए,

चूक मत बढ़के अब लपक ही ले, सामने कोई सा भी अवसर हो,
ढ़ाल दे ऐसा अपने जीवन को,आज बीते वो कल से बेहतर हो,
हो जाएंगे जड़ रिश्ते अहसास के सोने से,
सरगोशियों में हौले, जगाया करूँगा मैं,

हालात की तपिश में, तुझको सुकून दे जो,
सावन की उस फुहार सा,आया करूँगा मैं,

देखें तो लगें प्यारे, छूने में हों अंगारे,
ओझल हैं ऐसे राज़, नुमाया करूँगा मैं,

चुप होके दर्द सह ले, पिंजरे में रहे बहले,
हर ज़ुल्म की जंज़़ीर को, पिघला ही दूँगा मैं,

मैं प्यार का नग्मा हूँ, सैलाब हूँ दरिया हूँ,
हस्ती मेरी कहेगी, छिपाया करूँगा मैं,
कभी नग्मा लिखा कोई,कभी लब गुनगुनाए हैं,
शरीके-राह तेरी याद के, रंगीन साए हैं,
मैं ये बतला नहीं सकता हूँ,वो गुजरा हसीं मंज़़र,
कि जाते वक्त तेरे होंठ,जिस दम मुस्कराए हैं,

Friday, 17 May 2013

कारण
--------
गरिमा बोली-गौरव से,
एक बात बताओ भाई,
रात को सूरज क्या कारण,
जो पड़ता नहीं दिखाई,

गौरव बोला-सुनो बहिन,
यह मुझे समझ में आता,
रात को बहुत अंधेरा होता,
इसी से ना दिख पाता
पहले कौन ?
---------------

गरिमा बोली-मम्मी तुम हो,
मुझको रोज पढ़ाती,
एक बात पूछूँ मैं तुमसे,
क्यों वह नहीं बताती,

पहले मुर्गी थी या अंड़ा,
बस इतना समझा दो,
वरना अच्छा सा एक कोई,
मुझे खिलौना ला दो,
हट
---
गरिमा गौरव से बोली,
मैं भूल गई अंग्रेजी,
झोपड़ी को क्या कहते हैं,
बतला दो भइया जी,

गौरव बोला,,हट,तब,
गरिमा बोली-क्या कहते हो,
नहीं जानता,साफ ये कह दो,
गुस्सा क्यों करते हो,
प्यारा मोती  (10)
--------------

हम सबका है प्यारा मोती,
है सबसे ही न्यारा मोती,
कभी उछलता कभी कूदता,
अच्छे मजे दिखाता मोती,

कभी है छत पर कभी तखत पर,
अभी इधर था अभी उधर,
तू - तू करके पास बुला लो,
गोदी में छुप जाता मोती,

भूख लगे तो आ जाता है,
कभी खेल में लग जाता है,
चूहे बकरी चिड़िया मुर्गी,
सबको डर दिखलाता मोती,

दूर से बस वो है गुर्राता,
पास आओ तो पूँछ हिलाता,
रात-रात भर पहरा देकर,
निज कर्तव्य निभाता मोती,
आई फ्लू
-----------

परेशान मिस्टर बबलू,
उन्हें हो गया आई फ्लू

लाल आँख बहता पानी,
बता रही उनकी नानी,

टॉवल तकिया अलग करो,
नही आँख अपनी रगड़ो,

नहीं मानते बबलू बात,
सूज गई अब उनकी आँख,

बहुत हो रही ये चिन्ता,
होमवर्क कैसे होगा,

रहना होगा कब तक यूँ,
परेशान मिस्टर बबलू,
सूरज के जैसा चमको    (12)    
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करे कबूतर गुटरुँ-गूँ,
मुर्गा बोले,कुकडूँ-कूँ,

चिड़िया बोले,चीं चीं चीं,
बिल्ली भी बोले,म्याऊँ,

सुनकर देखो करो न शोर,
देखो कैसा नाचे मोर,

अपनी धुन में मस्त मगन,
चाँद को जैसे तके चकोर,

सीखें हम भी कुछ इनसे,
समय बिताएं ना ऐसे,

साहस से हर काम करें,
सफल बनेंगे,हम जिससे,

जीवन में धुँधुँआओ, मत,
पथ की थकन,बढ़ाओ मत,

सूरज के जैसा, चमको,
उजियारा दो,सब जग को,
मीठी बोली                    (13)
-------------    

कुहू-कुहू कर कोयल गाती,
मीठी बोली सबको भाती,

काँव-काँव कौआ चिल्लाता,
जो सुनता वो दूर भगाता,

कहती बिल्ली म्याऊँ-म्याऊँ,
चूहे हो तो मैं खा जाऊँ,

जब हैं काले बादल छाते,
टर्र-टर्र मेढ़क टर्राते,

बादल गड़-गड़ करते दूर,
जंगल में नाचता मयूर,

गदहा कहता ढ़ेंचूँ-ढ़ेंचूँ,
इतना बोझा कब तक खैंचूँ,

उदित बोलता-सुन ले जीजी,
कुत्ते बोल रहे अँग्रेजी,

गार्गी कहती-पप्पा जी,,
हमें दिला दो,तुम चिज्जी,
संकलित

दोस्तो ये रहे-दस्तूर, निभाते क्यों हो,
दिल जो मिलते नहीं,फिर हाथ मिलाते क्यों हो,
बढ़ के लो छीन उजाले की किरन,सूरज से,
यूँ भिखारी की तरह हाथ ,बढ़ाते क्यों हो
लग जाता है चस्का जिसको प्रेम सुधा पीने का,
सारा स्वाद बदल जाता है,दुनियाँ में जीने का, (दिनकर)
 लक्ष्मीशंकर वाजपेयीजी की एक ग़ज़ल --

खूब नारे उछाले गए,
लोग बातों में टाले गए,

जो अंधेरों में पाले गए,
दूर तक वो उजाले गए,

जिसने ज्यादा उ़ड़ाने भरीं,
उसके पर नोच डाले गए,

पाँव जितने चले उनसे भी,
दूर पांवों के छाले गए,

जिनसे घर में उजाले हुए,
 वे ही घर से निकाले गए,

जिनके मन में कोई चोर था,
वो नियम से शिवाले गए,

इक जरा सी मुलाकात के,
कितने मतलब निकाले गए,

कौन साजिश में शामिल हुए,
किनके घर के निवाले गए,

अब ये ताजा अंधेरे जिय़ो ,
कल के बासी उजाले गए,

Tuesday, 14 May 2013

प्यारी मम्मी अच्छी मम्मी,
मुझको थोड़ी भूख लगी,
अभी काम करती हूँ बेटा,
खा ले थोड़ी मूँगफली,

प्यारी मम्मी अच्छी मम्मी,
मुझे खेलने जाना है,
बाहर धूप बड़ी है बेटा,
क्या बीमार हो जाना है,

प्यारी मम्मी अच्छी मम्मी,
मैं तो देखूँगा टी.वी
शोर मचेगा टी.वी से
ये पढ़ती है तेरी दीदी,

प्यारी मम्मी अच्छी मम्मी,
क्या मैं थोड़ा सा पढ़ लूँ,
कितनी अच्छी बात है बेटे,
फिर मैं तुझसे क्यों झगड़ूँ,
सूरज जैसी कभी न रुकतीं,
चींटी जैसी कभी न थकतीं,
गुस्से में भी प्यार ही होता,
अगर कभी तुम बकती झकती,
लगी सदा ही रहतीं हरदम,
सर्दी वर्षा हो या धाम,मम्मी आज करो आराम,

टिंकू पोंछा लगवाएगा,
रिन्की चाय बना लाएगी,
अभी देखना जरा देर में,
बढ़िया सब्जी बन जाएगी,
तुम बस बैठे-बैठे देखो,
झटपट कैसे होते काम, मम्मी आज करो आराम,

चाहो तो टी.वी. ही खोलो,
या फिर आँटी के घर हो लो,,
सुबह रोज जल्दी उठ जाती,
अच्छा है दिन में कुछ सो लो,
अपनी पॉकेट में पैसे हैं,
लेंगे नहीं कोई हम दाम,मम्मी आज करो आराम,

कितना ध्यान हमारा रहता,
इसे देख मेरा मन कहता,
कभी न रुकने वाला झरना,
मम्मी की ममता का बहता,
नहीं दे सकेंगे हम बदला,
काम करें चाहे आठों याम,मम्मी आज करो आराम...
बन्दर मामा पहन पजामा,लेकर निकले कार,
बोले पापा अभी घूमकर, आते हम बाजार,

चौराहे पर जली लालबत्ती देखी, घबराए,
एक्सीलेटर मार जम्प कर,कार भगा ले आए,

मन में चोर,तेज गति गाड़़ी से टकराया बछड़ा,
हाय हाय कर सब चिल्लाए,क्या कर डाला लफड़ा,

भीड़ इकट्ठी हुई सभी कहते,क्या हुआ बताओ,
कोई कहता मारो, कोई कहता पुलिस बुलाओ,

पापा का लाइसेंस लिए थे,अभी उमर थी छोटी,
कहीं पिटाई पड़े न, डर से काँप रही थी बोटी,

मूँछोंवाले पुलिसमैन ने, काट दिया चालान,
जैसे- तैसे बन्दर मामा, भागे लेकर जान,
ये तो है मोबाइल फोन

शान्त सभी बैठे थे सहसा,तोड़ दिया किसने ये मौन,
मीठी मीठी प्यारी सी धुन,सुना रहा हमको ये कौन,
ये तो है मोबाइल फोन,

पत्र डाकिए रस्ता भूले,रिंगटोन सुन हम भी झूले,
बीच राह में रुक एकाएक,लोग बदलने लगते टोन,
ये तो है मोबाइल फोन,

कोई पॉकेट में रखता है,कोई गले, हाथ में लेता,
भरी सभा के बीच अचानक बजा,देखते सब, है कौन,
(अरे) ये तो है मोबाइल फोन,

Friday, 10 May 2013


आई गरमी की छुट्टी      (18)
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रोज-रोज स्कूल पढ़ाई बस्ते से कुट्टी,बस्ते से कुट्टी,
झूमो भाई अब है आई, गरमी की छुट्टी,

आइसक्रीम तरबूज आम खरबूजे में है दम,
लस्सी मट्ठा ठंड़ाई जलजीरे का मौसम,
झर झर झर झर झरने बहते, ठंड़ा ठंड़ा जल, 
दूर पहाड़ों के ऊपर भी जा सकते हैं हम,

इक पल भूलें हमें पिलाई जो सर ने घुट्टी,जो सर ने घुट्टी,
झूमो भाई अब हैं आई गर्मी की छुट्टी

अब ना हमको रोकेगा कोई मनमानी से,
अपने मन की कर पाएंगे,अब आसानी से,
टी वी नाटक देखें खेलें, साथ दोस्तों के,
सुनें कहानी नई पुरानी, नाना नानी से,

गेंदतड़ी लंगड़ी सतोलिया या गुट्टा गुट्टी,या गुट्टा गुट्टी,
झूमो भाई अब हैं आई गरमी की छुट्टी,

अवसर का उपयोग करें हम नये जहाँ दीखें,
गायन वादन नृत्य, कलाएं नई नई सीखें,
नानी के घर जाएं मनाएं छुट्टी गाँव में,
नदी नहाएं तैरें कूदें घूमें नाव में,

पिछले हफ्ते ही तो आई नानी की चिट्ठी,नानी की चिट्ठी,
झूमो भाई अब है आई, गरमी की छुट्टी, झूमो.

Thursday, 9 May 2013

हो दाँव द्यूतक्रीड़ा के अब भी लगा रहे,
 तुमने न सबक कोई इतिहासों से सीखा
है आख भली अच्छी हम सब के जैसी ही,

अफसोस तुम्हें बस पैरों तक का ही दीखा
 

तुमने अपने हर भाई को दुश्मन समझा,
 हा लात मार कर ही तो उसे निकाला है
परिणामों से अंजान न रहना फिर सोचो

 एक छोटी चिन्गारी बन जाती ज्वाला है

और धोखे में भी मत रहना, हर दिन जैसे,
बैठे महलों में, मंगल - मोद मनाओगे,
अपहरित पुन. कर, मुट्ठी में अधिकारों को,
सागर रक्षित, परकोटे में छिप जाओगे


 अपनी पर जब हम आते हैं, तो मत भूलो,
स्वयमेव कुबेर, खज़ाना लेकर आता है,
उच्छंखलता को छोड़, भूल गर्जन-तर्जन,
फिर हाथ जोड़कर, सागर विनय दिखाता है....


,झेलम का पानी लाल हो रहा कहता है,
मानो अब भृकुटि तिरीछी होने वाली है,
करके प्रयास अंतिम क्षण तक समझाने का,
वंशी कोई अंगार उगलने वाली है,

इसलिए समय की गति को जानो-पहचानो,
यह नहीं हमारा प्रश्न,वरन है इस युग का,
यमुना के जल को जहरीला करने वालो,
बालक के होंगे पैर और सिर वासुकि का,




 
किसके पैसे    (19)
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सबकी जेबों में रहते हो,
हो आखिर तुम किसके पैसे,

आम संतरे टॉफी खाते,
वो होते हैं जिसके पैसे,

बोले दादाजी गौरव से,
जेब से मेरी खिसके पैसे,

गौरव हँस कहता दादा से
,पास में जिसके उसके पैसे,

दादाजी ने फिर समझाया,
गौरव बेटा ऐसा कैसे,

चीज के बदले चीज मिले या
मेहनत की है कीमत पैसे,

पहले मीठी सी पप्पी दो,
फिर जेबों में रक्खो पैसे,
अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो,   (20)
सुबह हुई आँखें खोलो

धिंगधिंग धिंगधिंग धिंगतारा,
भाग गया आलस सारा,

धम्म धमाधम धम्मक धम,
खाओ जलेबी गरम गरम,

किड़क किड़क की झइयम झम,
तूफानों में हँसते हम,

अड़रम गड़रम ढ़म्मक ढ़म,
घर को भागो खेल खतम,
कभी कभी रोना भी अच्छा     (21)  
......................................       

छोड़ो मुन्नी रोना-धोना, तुम हमसे ये बात कहो ना,
रसगुल्ला है गोल,समोसा होता है क्यों भला तिकोना

अच्छा मुन्नी जरा बताओ,रोने पर क्यों आँसू आते,
काँटों भरी झाड़ियों में भी, फूल भला क्यों हैं मुस्काते,

जरा हमें ये तो समझाओ,क्यों है आम फलों का राजा,
शुद्ध रक्त करने को, कहते क्यों हैं कड़वी नीम चबा जा,

हँसना है व्यायाम अनोखा,स्वास्थ सदा हो इससे अच्छा,
मन का मैल निकल जाता है,कभी कभी रोना भी अच्छा,

Tuesday, 7 May 2013

मत बनना तुम बोझ किसी पर   (22)
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चाहे वह पृथ्वी माता हो,
चाहे वह जननी माता हो,

वृक्ष लगा कर हरा बनाना,
फर्ज़ अदा कर सेवा करना,

जब तक रहना इस धरती पर,
मत बनना तुम बोझ किसी पर,

राहों में बाधा आती हैं,
लगन देख कर हट जाती हैं,

जैसे तेज पवन झोंकों से,
झुकी बदलियाँ छँट जाती हैं,

बढ़ें कदम हर एक खुशी पर,
मत बनना तुम बोझ किसी पर,

सूरज की किरन बनेंगे हम    (23)
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ओ रात के राही चलते चल,
घबरा न सवेरा होगा,

सूरज की किरन बनेंगे हम,

सब दूर अंधेरा होगा,

आँखों का अब कोई सपना, 
मजबूर न होने देंगे,

जो वक्त करेगा प्रश्न 

सभी अपने हाथों में लेंगे,

रुकना है नहीं थकना है नहीं,

मंज़िल ही पे डेरा होगा,

सूरज की किरन बनेंगे हम,

सब दूर अंधेरा होगा,
सभी सिमटते जाते खुद में, मौसम सर्द हुआ,
दिल के जख्मों में नया, एक शामिल दर्द हुआ,

अपने-अपने तने चँदोवे, हैं लिबास अपने-अपने,
आज ओढ़ते हैं यूँ जैसे, भूल गए कल के सपने,
करके ऋतु का तिरस्कार, जो कल खोए थे खुद में,
देख रहा हूँ आज यहाँ, रुख उनका जर्द हुआ,

जुबाँ खुली है मुक्त हाथ, अहसासों पर ना पहरा,
रुके हुए पानी के जैसा एक जगह क्यों ठहरा,
कर ले पूरा वो जो तूने देखा ख्वाब सुनहरा,
भूल वक्त को जो बैठा,राहों की गर्द हुआ..
अब नहीं हम चुप रहेंगे
कब तलक हम, वक्त की रफ्तार का देखें तमाशा,
कब तलक हम शान्त हो दें,मन अभागे को दिलासा,
आग का दरिया चुनौती दे रहा, हमको मुकाबिल,
आज अपनी अर्चना का हार बाजी पर लगा है,

प्रश्न इसका है नहीं, हम आज हारें या कि जीतें,
प्रश्न इसका भी नहीं,हम मान पाने को झगड़ लें,
प्रश्न है इंसानियत की बलि चढ़े, हम मूक बैठे,
आज अपनी चेतना का ज्वार, बाजी पर लगा है,

चाल अब चलने न देंगे हम, कुटिल दुशासनों को,
दाँव में शकुनी हमारे, पाँव के नीचे पड़ेगे,
क्योंकि छल की नीति ने अब तक हमें नीचा दिखाया,
चूककर अवसर पुराना पाठ, क्यों दोहराएंगे हम,

इसलिए ले आज, अंतश्चेतना से शक्ति सारी,
वक्त ने है जो उछाला प्रश्न, वह बढ़ कर लपक लें,
दें दिखा सामर्थ्य बढ़ आगे, उसे अब छीन ही लें,
भीख में अधिकार ले, कैसे भला हम जी सकेंगे,
सोचने को वक्त काफी दे चुके हैं, किन्तु अब तो,
आज अपनी साधना का सार, बाजी पर लगा है,

अब नहीं हम चुप रहेंगे,अब न हम चुप रह सकेंगे..
ध्वंस सृजन का प्रथम चरण,परिवर्तन आकांक्षी है,
रचना उपजी तभी कि जब, मन में पीड़ा नाची है ,

पीढ़ी नई दिग्भ्रमित सी कोलाहल में खोई है,
आज मनुज क्या स्वयं मनुज की आत्मा भी सोई है,
धर्म या कि मज़हब के पथ में, अँधियारी घातें हैं,
दिन भी बीत रहे ऐसे, लगता जैसे रातें हैं,

नगर गली हर गाँव शहर में,गूँज रही दहशत है,
किसका करें भरोसा आखिर, सकते में जनमत है,
आपस के सम्बन्धों में, कटुता के बीज पड़े हैं,
शक संशय के बिरवे, पहले से भी अधिक बड़े हैं,...


 अंधी राजनीति की विषमय वो बयार आई है,
जख्म पुराने हरे, चल रही ऐसी पुरवाई है,
इसके पहले कहीं न भड़के चिंगारी, और आग लगे,
धूमिल हों बलिदान और सो जाए, मनुज के भाग जगे,

आओ हम सब मिलजुल कर, ऐसे रस्ते पर आएं,
त्याग और बलिदानी आदर्शों को, फिर अपनाएं,

आज अगर बढ़ युवा स्वयं ही, दिशा नहीं पाएगा,
अगर न तम का जहर, उजाला हँस कर पी पाएगा,
तो सच कहता हूँ, क्रुद्ध प्रकृति का दंड मनुज झेलेगा,
जिन्हें नहीं देखना चाहिए, दृश्य वे ही देखेगा,

समय अभी भी है कि काल का घर्घर नाद, सुने हम,
औरौं से आचरण चाहते, पहले स्वयं वरें हम,
आगत की आहट से हो अनभिज्ञ, न झूला झूलें,
देशप्रेमियों के बलिदानी, वो आदर्श न भूलें,

दिया हमें अमृत खुद हँसकर, जिन्होंने जहर पिया था,
,जीना तो है उसी का, जिनने हमको सिखा दिया था,
अंधियारे में जला स्वयं को, जो मशाल की रोशन,
रवि समान दीपित पुरुषोत्तम को, जन मन का वंदन,

आओ लें संकल्प, विषमता की दीवारें तोड़़े,
रख यथार्थ में पाँव कभी, आदर्श नहीं हम छोड़े....,
उलझनों की भीड़ है किससे कहूँ,तू बता मन मैं कहाँ तक चुप रहूँ,

है नज़़र सबकी सवालों की तरफ,देखते गोया उछालों की तरफ,
कौन समझेगा छिपी गहराइयाँ, जानलेवा हैं मेरी तनहाइयाँ,
सोचते हैं सब मगर वैसा न हूँ, अपने मन की उलझनें किससे कहूँ,

पथ जरा उलझा नज़र बेचैन सी,किस कदर बोझल भयावह रैन थी,
मील के पत्थर भला कैसे दिखे,दृष्टि अपनी जबकि मंज़िल पर लगी,
दंश पर अनुभूति का कैसे सहूँ,अपने मन की उलझनें किससे कहूँ,

तुम दुखी हो जाऊँगा मैं ग़मजदा,है मुझे यह दर्द ईश्वर ने दिया,
पर जमाने का चलन अब है अलग,कौन समझेगा जुबाँ जज़बात की,
बस इसी अहसास से बेकल रहूँ, अपने मन की उलझनें किससे कहूँ...

Friday, 3 May 2013

आए बंदर मामाजी    (24)
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आए बंदर मामाजी,
पहने कोट पजामा जी,

बैठे देखो नानाजी, 

उनको भी बतलाना जी,

खाकर गरम समोसा जी,

आए अपने मौसाजी,

पैक करा कर लाए हैं,

साँबर इडली डोसा जी,

क्या तुमने ये जानी है,

कैसी अपनी नानी हैं,

दिखने में सीधी लगती,

वैसे बहुत सयानी हैं,

माँ बोलीं-ओ रामा जी,

रामा बोला-हाँ माँजी,

बहुत बड़ा हंगामा जी,

आए बंदर मामाजी,
साल महीने हफ्ते दिन      (25)
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सूरज चन्दा पृथ्वी हम,
सर्दी गर्मी सब मौसम,

आते है और जाते है,

कभी न रुकने पाते है,

सभी काटते है गिन-गिन,

साल महीने हफ्ते दिन,

समय गँवाते सुस्ती से,

काम न करते चुस्ती से,

वे पीछे रह जाते है, 

आगे ना बढ़ पाते है,

एक पहेली पूछे जो,

बूझ सको तो उत्तर दो,

अलादीन और उसका जिन्न,

तीन नाग में दो ना गिन,

कितने हुए बताओ जो, 

तुमको अव्वल माने हम,

कहते बढ़े चलो हर दिन,

साल महीने हफ्ते दिन,
 चींटी तेरी शाम नहीं       (26)
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टर्र-टर्र मेंढक टर्राते,
क्या इनको कुछ काम नहीं,

रात-रात भर झन-झन करते,
झींगुर को आराम नहीं,

रोज सुबह सूरज दादा,
उठ चल पड़ते,विश्राम नहीं,

हर पल चलते ही देखा है,
 चींटी तेरी शाम नहीं,

चक्र समय का चलता रहता,
करता कहीं मुकाम नहीं,

हरदम आगे ही बढ़ता है,
पल भर भी आराम नहीं,

हर जीवन्त प्राण में गति लय,
तुझ पर हो इल्ज़ाम नहीं,

चलना ही जीवन का मक़सद,
रुकना तेरी शान नहीं,

शेर की सलाह

शेर की सलाह                    (27)
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एक दिन एक जंगल का शेर,

बोला मुझसे आँख तरेर,
कहो तुम्हारे शहरों में, 

मचा हुआ कैसा अंधेर,

करें न हम भोजन बेकार,

तेज भूख में करें शिकार,
खाए नहीं जब हों बीमार,

नियम हमारे समझो यार,

फिर भी हमें जंगली कहते,

तुम अच्छे शहरे में रहते,
क्या तुमको रहता ये याद, 

 भोजन करते हो बरबाद,

सुनो तुम्हारे शहर एक दिन,

बच्चे को ले गया एक दिन,
धुँए गंदगी का आलम था,

कान बज गए शोर बहुत था,

मुझसे बोला मेरा बच्चा, 

इससे अपना जंगल अच्छा,
यहाँ घुट रहा दम हरपल में,

आओ चलें वापस जंगल में,

अच्छी हवा स्वच्छ वातावरण,
देते सिर्फ हमारे ये वन,
अगर चाहते अच्छा मौसम,

रखो सुरक्षित जंगल-जीवन,

फूल-फूल कितने तुम अच्छे


फूल फूल कितने तुम अच्छे,
तुम्हें प्यार करते हम बच्चे,


सबका मन कैसे लुभाते,
काँटों के बीच मुस्कराते,


जंगल हो घर आँगन बगिया,
सभी जगह बाँट रहे खुशियाँ,


दुख- सुख भुला अपने जी का,
तुमने बस खिलना है सीखा,


खुश्बू लुटाते हो सच्चे,
फूल-फूल कितने तुम अच्छे,


कितने रंग की पहने वर्दी,
लगती नहीं तुमको सर्दी,


वर्षा में बूँदों के शोर से,
और निखर आते हो जोर से,


लाल हरा नीला या पीला,
बैजनी गुलाबी चटकीला,


रंग नहीं कोई भी कच्चे,
फूल-फूल कितने तुम अच्छे,