Thursday, 9 May 2013

हो दाँव द्यूतक्रीड़ा के अब भी लगा रहे,
 तुमने न सबक कोई इतिहासों से सीखा
है आख भली अच्छी हम सब के जैसी ही,

अफसोस तुम्हें बस पैरों तक का ही दीखा
 

तुमने अपने हर भाई को दुश्मन समझा,
 हा लात मार कर ही तो उसे निकाला है
परिणामों से अंजान न रहना फिर सोचो

 एक छोटी चिन्गारी बन जाती ज्वाला है

और धोखे में भी मत रहना, हर दिन जैसे,
बैठे महलों में, मंगल - मोद मनाओगे,
अपहरित पुन. कर, मुट्ठी में अधिकारों को,
सागर रक्षित, परकोटे में छिप जाओगे


 अपनी पर जब हम आते हैं, तो मत भूलो,
स्वयमेव कुबेर, खज़ाना लेकर आता है,
उच्छंखलता को छोड़, भूल गर्जन-तर्जन,
फिर हाथ जोड़कर, सागर विनय दिखाता है....


,झेलम का पानी लाल हो रहा कहता है,
मानो अब भृकुटि तिरीछी होने वाली है,
करके प्रयास अंतिम क्षण तक समझाने का,
वंशी कोई अंगार उगलने वाली है,

इसलिए समय की गति को जानो-पहचानो,
यह नहीं हमारा प्रश्न,वरन है इस युग का,
यमुना के जल को जहरीला करने वालो,
बालक के होंगे पैर और सिर वासुकि का,




 

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