Tuesday, 7 May 2013

अब नहीं हम चुप रहेंगे
कब तलक हम, वक्त की रफ्तार का देखें तमाशा,
कब तलक हम शान्त हो दें,मन अभागे को दिलासा,
आग का दरिया चुनौती दे रहा, हमको मुकाबिल,
आज अपनी अर्चना का हार बाजी पर लगा है,

प्रश्न इसका है नहीं, हम आज हारें या कि जीतें,
प्रश्न इसका भी नहीं,हम मान पाने को झगड़ लें,
प्रश्न है इंसानियत की बलि चढ़े, हम मूक बैठे,
आज अपनी चेतना का ज्वार, बाजी पर लगा है,

चाल अब चलने न देंगे हम, कुटिल दुशासनों को,
दाँव में शकुनी हमारे, पाँव के नीचे पड़ेगे,
क्योंकि छल की नीति ने अब तक हमें नीचा दिखाया,
चूककर अवसर पुराना पाठ, क्यों दोहराएंगे हम,

इसलिए ले आज, अंतश्चेतना से शक्ति सारी,
वक्त ने है जो उछाला प्रश्न, वह बढ़ कर लपक लें,
दें दिखा सामर्थ्य बढ़ आगे, उसे अब छीन ही लें,
भीख में अधिकार ले, कैसे भला हम जी सकेंगे,
सोचने को वक्त काफी दे चुके हैं, किन्तु अब तो,
आज अपनी साधना का सार, बाजी पर लगा है,

अब नहीं हम चुप रहेंगे,अब न हम चुप रह सकेंगे..

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