कहीं करार न हो और कहीं खुशी न मिले,
हमारे बाद किसी को ये जिन्दगी न मिले,
सियाह नसीब कोई उससे बढ़ के क्या होगा,
जो अपना घर भी जला दे तो रोशनी न मिले,
यही सलूक है ग़र आदमी से दुनियाँ का,
तो कुछ अजब नहीं,दुनियाँ में आदमी न मिले,
ये बेबसी भी किसी बददुआ से कम तो नहीं,
कि खुल के जी न सके और मौत भी न मिले,(साहिर)
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