Tuesday, 7 May 2013

ध्वंस सृजन का प्रथम चरण,परिवर्तन आकांक्षी है,
रचना उपजी तभी कि जब, मन में पीड़ा नाची है ,

पीढ़ी नई दिग्भ्रमित सी कोलाहल में खोई है,
आज मनुज क्या स्वयं मनुज की आत्मा भी सोई है,
धर्म या कि मज़हब के पथ में, अँधियारी घातें हैं,
दिन भी बीत रहे ऐसे, लगता जैसे रातें हैं,

नगर गली हर गाँव शहर में,गूँज रही दहशत है,
किसका करें भरोसा आखिर, सकते में जनमत है,
आपस के सम्बन्धों में, कटुता के बीज पड़े हैं,
शक संशय के बिरवे, पहले से भी अधिक बड़े हैं,...


 अंधी राजनीति की विषमय वो बयार आई है,
जख्म पुराने हरे, चल रही ऐसी पुरवाई है,
इसके पहले कहीं न भड़के चिंगारी, और आग लगे,
धूमिल हों बलिदान और सो जाए, मनुज के भाग जगे,

आओ हम सब मिलजुल कर, ऐसे रस्ते पर आएं,
त्याग और बलिदानी आदर्शों को, फिर अपनाएं,

आज अगर बढ़ युवा स्वयं ही, दिशा नहीं पाएगा,
अगर न तम का जहर, उजाला हँस कर पी पाएगा,
तो सच कहता हूँ, क्रुद्ध प्रकृति का दंड मनुज झेलेगा,
जिन्हें नहीं देखना चाहिए, दृश्य वे ही देखेगा,

समय अभी भी है कि काल का घर्घर नाद, सुने हम,
औरौं से आचरण चाहते, पहले स्वयं वरें हम,
आगत की आहट से हो अनभिज्ञ, न झूला झूलें,
देशप्रेमियों के बलिदानी, वो आदर्श न भूलें,

दिया हमें अमृत खुद हँसकर, जिन्होंने जहर पिया था,
,जीना तो है उसी का, जिनने हमको सिखा दिया था,
अंधियारे में जला स्वयं को, जो मशाल की रोशन,
रवि समान दीपित पुरुषोत्तम को, जन मन का वंदन,

आओ लें संकल्प, विषमता की दीवारें तोड़़े,
रख यथार्थ में पाँव कभी, आदर्श नहीं हम छोड़े....,

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