यूँ तो हुश्न हर जगह है,लेकिन इस कदर नहीं,
अय वतन की सरजमीं,
ये खुली-खुली फ़िज़ा,ये धुला-धुला गगन,
नदियों के पेचो-ख़म,पर्वतों का बांकपन,
तेरी वादियाँ जवान,तेरे रास्ते हसीं,
अय वतन की सरजमीं,
तेरी खाक में बसी माँ के दूध की महक,
तेरे रूप में रची,स्वर्ग लोक की झलक,
हममें ही कमी रही,तुझमें कुछ कमी नहीं,
अय वतन की सरजमीं,
नैमतों के दरमियां,भूख प्यास क्यों रहे,
तेरे पास क्या नहीं, तू उदास क्यों रहे,
आम होगी वो खुशी,जो है अब कहीं कहीं,
अय वतन की सरजमीं,
तेरी खाक की कसम,हम तुझे सजाएंगे,
हर छिपा हुआ हुनर ,रोशनी में लाएंगे,
आने वाले दौर की,बरक़तों पे रख यकीं,
अय वतन की सरजमीं, (साहिर)
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