दर्द को दे जुबान जीना है, ज़हर असमानता का पीना है,
कोशिशें हों इसी की हो वापस,उसका हक़़ जिस किसी ने छीना है,
काश अब भी जो तू सँभल जाए, एक तूफान सा मचल जाए,
ख़िजा रशीदा चमन में बहार आए ज्यों,इस अँधेरे में शम्मा जल जाए,
चूक मत बढ़के अब लपक ही ले, सामने कोई सा भी अवसर हो,
ढ़ाल दे ऐसा अपने जीवन को,आज बीते वो कल से बेहतर हो,
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