Tuesday, 7 May 2013

उलझनों की भीड़ है किससे कहूँ,तू बता मन मैं कहाँ तक चुप रहूँ,

है नज़़र सबकी सवालों की तरफ,देखते गोया उछालों की तरफ,
कौन समझेगा छिपी गहराइयाँ, जानलेवा हैं मेरी तनहाइयाँ,
सोचते हैं सब मगर वैसा न हूँ, अपने मन की उलझनें किससे कहूँ,

पथ जरा उलझा नज़र बेचैन सी,किस कदर बोझल भयावह रैन थी,
मील के पत्थर भला कैसे दिखे,दृष्टि अपनी जबकि मंज़िल पर लगी,
दंश पर अनुभूति का कैसे सहूँ,अपने मन की उलझनें किससे कहूँ,

तुम दुखी हो जाऊँगा मैं ग़मजदा,है मुझे यह दर्द ईश्वर ने दिया,
पर जमाने का चलन अब है अलग,कौन समझेगा जुबाँ जज़बात की,
बस इसी अहसास से बेकल रहूँ, अपने मन की उलझनें किससे कहूँ...

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