Tuesday, 8 November 2016

धरती मेरी प्यारी धरती,
हम सब का इससे नाता,
हम हैं इसके बेटे जैसे,
सचमुच ये अपनी माता,
इतना सुंदर इसे बनाया,
रखी उठा न कोई कसर,
स्वर्ग नहीं देखा हमने पर,
है ये उससे भी बढ़ कर,
रहम करो इस पर अय लोगो,
इसे न यूँ बरबाद करो,
कहाँ रहोगे खुद, ये सोचो,
इसको फिर आबाद करो,
नहीं पीढ़ियां आने वाली,
माफ करेंगी कहते हैं,
सिर्फ नहीं हम ही धरती पर,
और बहुत से रहते हैं,

Thursday, 3 November 2016

रात अचानक आँख खुली तो,
खिड़की के बाहर देखा,

खूब रोशनी बिखर रही थी,
सोचा बल्ब खुला छोड़ा,


आया बाहर धवल चाँदनी,
पसरी हुई सकल भू पर,


अप्रतिम था सौंदर्य खज़ाना,
खुला हुआ नीचे-ऊपर,
भीड़ जुटी है, अपने चारो ओर प्रिये,
नहीं दिखाई देता है, कुछ और प्रिये,
सब थे सबकुछ हम ना कुछ थे ऐसा भी,
गुजर चुका है इस जीवन में, दौर प्रिये,
वक्त एक सा कब रहता इस जीवन में,
सिर पर कभी नदी में जाता, मौर प्रिये,
करें उपासा नौ दिन या नौ महिनों का,
मुँह से बड़ा न मुँह में जाता कौर प्रिये,
थोड़ा लिखा, समझना ज्यादा इसको तुम,
क्या लिक्खूँ मैं तुमको,अब कुछ और प्रिये,
नीलकंठ तुम नीले रहियो, मेरी बात भगवान से कहियो,
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प्रेम सै दुनिया आय जो बस में,
फिर क्यों लोग लड़ैं आपस में,
आवौ फिर सै जा समझईयो,
मेरी बात...
खाय न पामैं रोटी कल सै,
हमैं निकारौ जा दल दल सै,
हम खुस रहैं, रहै खुस भईयौ,
मेरी बात...
चार दिना की जा जिनगानी,
सिगरी दुनिया आनी जानी,
कौन हमेसा के लये रईयौ,
मेरी बात...
रजनीकान्त शुक्ल
कभी कुछ बात कहना और कहना ... चलो रहने दो
कभी कुछ कहते कहते कह देना ... चलो रहने दो
ये अदाएं तुम्हारी ख़ास लगती हैं न जाने क्यूँ
कभी सोचा की कह डालूं,कभी सोचा ... चलो रहने दो
जताना भी नहीं आता कि ये तुमसे कैसा रिश्ता है
तुम्हारे साथ चलता मैं , फिर सोचा ... चलो रहने दो
मेरी बेक़रारी का आलम क्या है किसे जा कर बताऊँ मैं
था ये सोचा तुम को बताऊंगा , फिर सोचा...चलो रहने दो
ख्वाहिश है ये मेरी तुम्हे जी भर कर देखूं मैं
तुम्हारी तस्वीर बनाता मैं , फिर सोचा ... चलो रहने दो
जो तुम रूठ जाओगी तो ग़ज़ल कह कर मना लूँगा
ऐसे जो मानूं तो कहती हो , अच्छा ... चलो रहने दो
रहेगी उम्मीद जब तक ये हमारे एक होने की
डर है तुम कह न दो , उम्मीद को ... चलो रहने दो.
दीवाली के दीप जले,
मन को लगते बहुत भले,
तम मन का बाहर निकले,
अंतर ज्योती विमल जले,
अंधियारा जग से फिसले,
दीवाली के दीप जले,
बैर दूर हो, हाथ मले,
सदभावों की हवा चले,
नफरत की जो वर्फ,गले,
प्रीत लपक कर गले मिले,
मन पर कोई हर्फ न ले,
दीवाली के दीप जले,
धमाके ही धमाके थे,
पटाखे ही पटाखे थे,
हुई जब शाम रौशन तो,
तिमिर के घर में फाके थे,
मनाई रात दीवाली,
नहीं था कोई अँधियारा,
दिए की लड़ियों के आगे,
अँधेरा डर गया, हारा,
अगर सब साथ मिल यूं ही,
भगाएंगे अँधेरों कोे,
न रोके रोका जा पाएगा,
आने से सवेरों को,
और करें लौ को ऊँचा,
दुनिया की खुशहाली में,
यू.एन.ओ. का कार्यालय,
जगमग हुआ दिवाली में,
अच्छी बात बढ़ाएं जग में,
गन्दी बातें नाली में,
यू.एन.ओ. का कार्यालय भी,
जगमग हुआ दिवाली में,
बोतल में राकेट चलाएं,
चकरी नाचे थाली में,
यू.एन.ओ. का कार्यालय भी,
जगमग हुआ दिवाली में,
नन्हे मुन्ने बच्चे हैं हम,
ये संकल्प उठाते हैं,
सुंदर प्यारा देश हमारा,
मिलकर स्वच्छ बनाते हैं,
कल-कल करती पावन नदियां,
सबको जीवन देतीं हैं,
हरदम हरपल देतीं ही हैं,
कुछ ना हमसे लेतीँ हैं,
पूजन इनका यही,न इसमें,
डाले कोई सामग्री,
साफ स्वच्छ हम नदियाँ रक्खें,
है सच्ची अर्चना यही,
घर , स्कूल, सड़क, स्टेशन,
अस्पताल, उद्यान कोई,
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे जैसे,
पावन स्थान सभी,
देवालय से पहले शौचालय है,
वे बतलाते हैं,
सुन्दर प्यारा देश हमारा,
मिलकर स्वच्छ बनाते हैं,
कूड़ा हो कूड़ेदानोँ में,
शपथ यही हम लेते हैं,
खुद करके दिखलाए सबको,
ये संदेशा देते हैं,
गाँव, शहर, सब गलियां अपनी,
सुंदर देश हमारा है,
जो इनको रक्खेगा सुंदर,
वह ही हमको प्यारा है,
आजादी में साँसें लेते,
ये हम पर उनका उपकार,
अब हमको मिलकर देना ही होगा,
उनको ये उपहार,
बापू का संदेशा सारे जग में,
मिल फैलाते हैं,
नन्हे-मुन्ने बच्चे हैं हम,
ये संकल्प उठाते हैं,
सुंदर प्यारा देश हमारा,
मिलकर स्वच्छ बनाते हैं,
हम हैं पहरेदार ,
आपकी गलियों के रखवाले,
हम हैं जहाँ वहाँ डर कैसा,
क्यों डालेँ फिर ताले,
दोस्त और दुश्मन की,
आँखों में रखते पहचान सदा,
माने अपना जिसे,
लुटा दें उस पर अपनी जान सदा,
नन्हा दिया
-------------
हाँ जी हाँ मैं हूँ एक नन्हा दिया,
मैंने जीवन है उसूलों पे जिया,
दे के स्नेह रोशनी बाँटी,
और बदले में तम का ज़हर लिया,
ज्योति का वंशधर हूँ आँगन में,
रोशनी भर लो अपने तन मन में,
फ़र्ज कर पूरा, मिलूँ मिट्टी में,
चाहो तो अर्थ ले लो जीवन में,
हाँ जी हाँ मैं हूँ एक नन्हा दिया,
जिन्दगी को है उसूलों पे जिया,
हाँ जी हाँ ...

Tuesday, 11 October 2016

घाघ कवि (संवत-1750)
उधरा काढ़ि व्योहार चलावै,
छ्प्पर डारै तारो,
सारे के संग बहन पठावै,
तीनौं को मुँह कारो,
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लम्बी पूँछ और ऐंठा कान,
सही बैल की है पहचान,
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दिन में गरमी रात में ओस,
कहैं घाघ वरषा सौ कोस,
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लाल पियर जब होय अकाशा,
तब नाहीं वरषा की आशा,
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ढ़ेले ऊपर चील जो बोलै,
गली-गली में पानी डोलै,
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हँसुआ ठाकुर खसुआ चोर,
इन ससुरन को गहरे बोर,
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आलस नींद किसानै नासै,
चोरै नासै खाँसी,
---------------------
चढ़त जो बरसै चित्रा,
उतरत बरसै हस्त,
कितनै राजा डॉड़ ले,
हारै नहीं गृहस्त,
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प्रातकाल खटिया सै उठि के,
पियै तुरन्तै पानी,
ता घर वैद कबहुँ नहिं आवै,
बात घाघ की जानी,
-------------------------------------👍
अपनी खुद तस्वीर बनाओ
-------------------------------👌
रखो आईना खुद के आगे,
देखो सोचो और बताओ,
अपनी खुद तस्वीर बनाओ,
कोई उपेक्षा करे अगर तो,
क्यों ये मन गुमसुम रहता है,
करें सलाम अगर बहुतेरे,
खुशियों का दरिया बहता है,
खुद की कभी पीठ ठोंकी क्या,
खुद को गाली कभी निकाली,
या औरों की नज़रों वाली ही,
मन में तस्वीर बना ली,
औरों की नज़रों में क्या हो,
बस इस पर ही मत इतराओ,
अपनी खुद तस्वीर बनाओ,
लालमण पाण्डे,प्रमोद
(संवत1911-1960)
रचना--प्रमोद प्रकाश)
प्रकाशित-1966
मन तौ उरझो उनपै सजनी ,
तनु तीर तुम्हारे भले हम लाईं,
हमरी रसना की कहा गति है,
जो कहै उनकी छवि की परछाईं,
चलि देखौ प्रमोद कहे न बने,
सुधि भूलि हौ देखत ही उन धाई,
जनु ब्रह्म सिंगार दुऔ अवतार,
धरे नर देह फिरै यहि ठाई,
जिन पर कोई भी गर्व कर सकता है 👌
--------------------------------------------
कोई भी कवि या रचनाकार जीवन में कितना ही क्यों न लिख ले उसकी साध रहती है कि उसका लिखा लोगों की जुबान पर चढ़ जाए। चाहे वो दो ही पंक्तियां क्यों न हों। इसे एक दृष्टि में मरने के बाद भी न मरना कह सकते हैं।
इस मायने में छिबरामऊ के कवि नेहजी की दो पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं। इन्होंने निमंत्रण पत्र के माध्यम से तोे न जाने कहाँ- कहाँ की सैर की ही और न जाने कितने लोगों की भावनाओं का स्वर बनी। लोकजीवन की कई पीढ़ियों की जुबान पर राज करती रहीं जानकर नई पीढ़ी आश्चर्य और रश्क़ कर सकती है लेकिन जो पीढ़ी इन पंक्तियों की धूम की साक्षी रही है वो आज भी हमारे बीच मौजूद है । प्रस्तुत है वे पंक्तियाँ -
भेज रहा हूँ नेह निमंत्रण,
प्रियवर तुम्हें बुलाने को,
हे मानस के राजहंस तुम,
भूल न जाना आने को,
गदाधरराय नवीन
(संवत-1776-1836)
.............................
पवित्र कुरान का कविता में अनुवाद किया,
दिल्ली दरबार में लार्ड हार्डिग्ज को कविता सुनाई।
--------
डमरु विशाल कर,नाचत विनोद युत,
लाल -लाल नैन काहू ध्यान में सुलीन हैं,
अति विषयारे कारे-कारे अहि तीन धारे,
झुकि-झुकि झूमि-झूमि डोलत गलीन हैं,
विमल विचित्र गंगधार है जटान मध्य,
माथे पै विराजत मयंक समीचीन है,
एहो ब्रजरानी ब्रजराज को दिखावो आनि,
ब्रज में सुआयों आज जटिल नवीन है,
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जाके रूपरेख न अनिच्छ अद्वतीय अज,
श्रुति स्मृति हु नेति-नेति करि गावती,
अच्युत अनंत अविकारी अविनाशी ताहि, 
देखि अनमनो सब देवन मनावती,
तारी को लगैया त्रिपुरारी हू न पावैं ताहि,
दै- दै करतारी वै नवीन दुलरावती,
जगत अपार की रमैया शेष-शय्या ताकी,
लेकर बलैया मैया पालन झुलावती,👍
ईश्वरी कवि
(संवत -अज्ञात)
सूनो घर पायो दौरि आई लहकान लगी,
पायो लै भाजि गई फेरि न दिखाती हो,
औती घरु फांदि तुम डराती हौ नेक नहिं,
खावौ फैलावौ भड़फोरु कर जाती हो,
कहत कवि गोपी बिन छेड़े न छेड़ी कोई,
 लट्ठ लै खीसैं काढ़ि बहुत ही खिसियाती हो,
ऐसो घर ध्यान कवि कहत राय ईश्वरी,
एक दाँय काट चुकी फेरि गुर्राती हो,
शिवचरण लाल शुक्ल 'शम्भू पद'
(1900-1960)
ज्यों त्यों रह्यों अब लौं जिय तू,
अब आओ वसन्त कछू ना बिसैहै,
शम्भू सुगंधित शीतल मन्द,
समीरन पीर गम्भीर उठैहै,
क्यों ठहरैगो करै गो कहा,
जब कोकिल कूक के हूक सुनैहै,
और न तेरी चलैगी कछू बस,
संग कुहू के तुहू कढ़ि जैहै,
शिवचरनलाल शुक्ल शम्भूपद
(1900-1960)

आजु मैं गई ती शम्भु न्योते नन्द गाँव तहाँ,
सांसत बड़ी रूपवती वनितान की,
घेरि लीन्हो सखिन तमासो करि मेरो मोहि, 
गहि-गहि गुलुफ लुनाई तरवान की,
औरै बलि बोलि-बोलि औरनि दिखावै रीझि,
रीझ सुघराई औ ललाई मेरे पान की,
घूँघट उघारि मुख देखि-देखि एकै रहै,
 एकै लगी नापन बड़ाई अँखियान की,


रामनारायण द्विवेदी रमेश
(1932-1992 विक्रमी)
.........................................................................
आलस त्यागि करौ पुरुषारथ,
ताते यथारत काज फुरैंगे,
उद्यम और उपाय करौ
तब आपुहि देश के दुख टरैगे,
आकरी चाकरी में न चले
इमि दास बने नहि पेट भरैंगे,
भारत भूमि के भाग जगैंगे,
रमेश जू वे दिन फेर फिरैंगे,
...............................................................................
आरत भारत गारत ह्वै रह्यो,
जाने कहा दिन खोटे करैंगे,
काल के गाल के ग्रास भये,
बहु देखे अकाल में केते मरेंगे,
कौलौं रमेश कलेश में देश के वासी
अंदेश के पाले परैंगे,
ह्वैहै कहा अब हे मेरे राम
कहौ कब वे दिन फेरि फिरैंगे,
...............................................................................


रामनारायण जी द्विवेदी रमेश 
(1932-1992 वि.)
विलेलेले
केतिक कराल कलिकाल की कठोर कला,
काम क्रोध कपट कुकर्म कुटिलाई है,
कहै कहा कोऊ कछु करनी कुलीनन की,
करत कुकर्म कहै कर्म ही कराई है,
कोविद रमेश कहूँ किंचित कुशल कैसी,
कामनी कनक कोटि कामना कराई है,
काटिए कलेश कारुणीक कमला के कंत,
करौगे कृपा तौ कहौ कौन कठिनाई है,
.............................................
अरुण अनार ऐसी एड़ी अवलोकत ही,
ललकतु नीकी भाँति पावत अनन्द है,
जगमग ज्योति नख-नख पै नखत बृंद,
कोटिचन्द्र वारौं शोभा ललित अमंद की,
पगतल पावन प्रभाव प्रभु ताके पुन्ज,
प्रात के प्रभाकर ते लालिमा दुचन्द हैं,
पद अरविन्द पै रमेश रामचन्द्रजू के,
मन मतवारो मेरो मंजुल मयन्द है,
.........................................
जनकसुता के पति ताके जिन ताके पति,
सविताके कुल के पताके प्रभुता के हैं,
हरन धरा के भार कृपा के अगार विभु
वीर विरदैत बाँके विदित सदा के है,
धन्य ध्यान जाके परि पाके मुनि वृन्द औ 
अनन्द मद छाके जाके पति गिरजा के हैं,
पूरण कला के कमला के कंत हैं रमेश, 
तारन शिला के ये कुमार कौसला के हैं,
.............................................👌

Friday, 7 October 2016

कुदरत हमें बचाती हरदम,
इसको हमें बचाना है,
अपनी रग-रग में साँसों में,
इसका आना जाना है,
हम इसके काम आएं न आएं,
पर इसको काम आना है,
इसकी हर शय अपनी खातिर,
इक अनमोल खज़ाना है,
कभी कभी मन करता मेरा,
मैं ऐसा बन जाऊँ,
खुली हवा में घूमूं ,
मस्ती करूँ उमंग बढाऊँ,
काश कोई ऐसे में साथी,
आए, हो अलबेला,
उसमें डूबूँ , मुझे डुबो ले ,
मैं न रहूँ अकेला,
जग में कोई चीज भी,
कब होती बेकार,
दृष्टि चाहिए दे सकें,
हम उसको आकार,
हम उसको आकार,
सृजन के विचारों से,
बना टोकरीं लीं ये ,
रद्दी अखबारों से,
सोच सही जो,
नहीं कोई कठिनाई मग में,
कचरा भी कर सके
उजाला, सारे जग में,
कितनी सुंदर दुनिया अपनी,
सागर पर्वत सारे,
सन-सन पवन चले मदमाती, 
हँसते छल-छल धारे,
खुशकिस्मत हम पैदा हो जो,
आए इस धरती पर,
तरह-तरह के जीव-जन्तुओं सहित,
हमारा ये घर,
प्रेम लुटाए हाथ बढ़ाए,
साथ रहें मिलजुलकर,
बाहर जो भी दर्शन है,
अंदर का ही दर्पन है,
देते हम जो दुनिया को,
वापस हमको अर्पन है,
आओ ये संकल्प धरें,
मन को मैला नहीं करें,
रंग बिरंगे ये गुब्बारे,
कितने अच्छे कितने प्यारे,
इन्द्रधनुष से रंगरंगीले,
लाल हरे नीले और पीले,
देखूँ तो मन खुश हो जाए,
हाथों में लूँ मन ललचाए,
लगे हाथ ऊपर को जाए,
संग-संग उछलूँ जी में आए,
हुआ जन्मदिन पापा लाए,
संग दोस्त हम सब हर्षाए,
कटा केक तब फोड़े सारे,
रंग बिरंगे ये गुब्बारे,
सागर से उड़ आएं,नभ के आँगन,
बादल से बरसें हम,बूँदों सा छम्म,
मन में हो कैसी भी कोई उलझन,
फूलों पे मुसकाएँ,शबनम से हम,
फौलादी सीने हैं दिल में सरगम,
मरने से पहले, क्यों मर जाएँ हम,
रस्ता न सूझे हो ऐसा विजन,
तब आएँ ले के हम रिमझिम सावन,
खुश क्यों हैं मत पूछो क्या हैं जी हम,
थिरके तन गाए मन ऐसी रिदम,
सतरह से ज्यादा न बारह से कम,
राजा अपने मन के हम हैं जी हम,
पाकिस्तानी कवयित्री फहमीदा रियाज की कविता...
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
**********************
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
अब तक कहां छुपे थे भाई?
वह मूरखता, वह घामड़पन
जिसमें हमने सदी गंवाई
आखिर पहुंची द्वार तुम्हारे
अरे बधाई, बहुत बधाई
भूत धरम का नाच रहा है
कायम हिन्दू राज करोगे?
सारे उल्टे काज करोगे?
अपना चमन नाराज करोगे?
तुम भी बैठे करोगे सोचा,
पूरी है वैसी तैयारी,
कौन है हिन्दू कौन नहीं है
तुम भी करोगे फतवे जारी
वहां भी मुश्किल होगा जीना
दांतो आ जाएगा पसीना
जैसे-तैसे कटा करेगी
वहां भी सबकी सांस घुटेगी
माथे पर सिंदूर की रेखा
कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा!
क्या हमने दुर्दशा बनायी
कुछ भी तुमको नज़र न आयी?
भाड़ में जाये शिक्षा-विक्षा,
अब जाहिलपन के गुन गाना,
आगे गड्ढा है यह मत देखो
वापस लाओ गया जमाना
हम जिन पर रोया करते थे
तुम ने भी वह बात अब की है
बहुत मलाल है हमको, लेकिन
हा हा हा हा हो हो ही ही
कल दुख से सोचा करती थी
सोच के बहुत हँसी आज आयी
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
हम दो कौम नहीं थे भाई
मश्क करो तुम, आ जाएगा
उल्टे पांवों चलते जाना,
दूजा ध्यान न मन में आए
बस पीछे ही नज़र जमाना
एक जाप-सा करते जाओ,
बारम्बार यह ही दोहराओ
कितना वीर महान था भारत!
कैसा आलीशान था भारत!
फिर तुम लोग पहुंच जाओगे
बस परलोक पहुंच जाओगे!
हम तो हैं पहले से वहां पर,
तुम भी समय निकालते रहना,
अब जिस नरक में जाओ, वहां से
चिट्ठी-विट्ठी डालते रहना!

Thursday, 15 September 2016

चेहरे पर प्रकाश हो मेरे,
या प्रकाश में चेहरा,
समझ सको तो समझो मित्रो,
अर्थ है इसमें गहरा,
जीवन में कोशिश हो वैसी,
जो ऐसा हो पाए,
चेहरा पहुँचे जहाँ उस जगह पर,
प्रकाश हो जाए,
समय की नदी तो,बही जा रही है,
तेरी आरजू सब,रही जा रही है,
ठहर तो कुछ एक पल,ज़रा सोच ले तू,
मुखौटे जो पहने, उन्हें नोच ले तू,
क्या आया था करने,क्या करने लगा है,
पता है हर एक पल तू, मरने लगा है,
गलत राह है या, सही जा रही है,
तेरी आरजू सब, रही जा रही है,
बहुत पुण्य तेरे, तू ऐसा बना है,
जरा आईना देख, कैसा बना है ?
नहीं ऐसा अवसर, दोबारा मिलेगा,
न जाने कमल ऐसा, फिर कब खिलेगा ?
कथा ये चिरंतन, कही जा रही है,
तेरी आरजू सब, रही जा रही है,
चले जा रहे हैं,ये साँझ और सवेरे,
ये सूरज ये चंदा, न तेरे न मेरे,
भले पास आएं, न तेरे उजाले,
कोई मन से मीठी सी, धुन गुनगुना ले,
ये नईया किधर भी, नहीं जा रही है,
तेरी आरजू सब, रही जा रही है,
समय की नदी तो...
रखो कदम तुम ऐसे जो,
पैरों से पदचाप न हो,
पहले सोचो फिर बोलो,
कहके फिर संताप न हो,
मन वाणी और कर्म सभी,
निर्मल कर लो कुछ ऐसे,
जो व्यवहार करो जग से,
उसमें कोई पाप न हो,
लगता मुझसे बड़ा कोई,
साथ चले मेरे साया,
सोच रहा तो लगता है,
वो खुद अपना आप न हो,
रेत औ पानी पर लिक्खे,
नाम सभी मिट जाएंगे,
काम ही क्या जिनकी,
मन की चट्टानों पर छाप न हो,
सब सोते मैं जगता हूँ,
पता नहीं क्या बकता हूँ,
मैं समझा वरदान जिसे,
पता नहीं अभिशाप न हो,
ऐसे तुम जलो दीपक,
ऐसे तुम चलो दीपक,
आस पाएं सब तुमसे,
ऐसे श्वांस लो दीपक,
जीत क्या सफलता क्या,
हार क्या विफलता क्या ?
डूबता अगर सूरज,
फिर नहीं निकलता क्या ?
साथ कोई न हो तो,
रंज मन न लो दीपक,
ढ़ूँढ़ कर मिलाओ तुम,
हाथ अब अंधेरों से,
वास्ता भी मत रखना,
मतलबी सवेरों से,
ये तुझे बुझा देंगे,
अपनी राह लो दीपक,
जब विकट अंधेरा हो,
पास ना सवेरा हो,
मुश्किलों ने घेरा हो,
आसरा ही तेरा हो,
तब वहीं डटो दीपक,
तब न तुम टलो दीपक,
कितनी दूर मंज़िल हो,
रास्ता न हासिल हो,
फनफनाती लहरों में,
पास में ना साहिल हो,
तुम कदम कदम चलकर,
सबको जीत लो दीपक,
डर अब किस बात का है,
तम की बिसात क्या है,
अंधकार रौशन है,
तू सूरज रात का है,
अपनी आग में खुद ही,
ऐसे ही जलो दीपक,
लक्ष्य अंतिम है विसर्जन,
प्रात बनकर ढलो दीपक,
"चलाचल पथिक तू लहर के सहारे,
पहुँच जाएगा एक दिन उस किनारे,
लहर ये तेरे मन की ही तो लहर है,
चले एक पल या कि पहरों पहर है,
ये मन की लहर तुझको रुकने न देगी,
चलेगा तेरी राह, रौशन करेगी,
तू चल तो,बिना कुछ भी सोचे विचारे,
पहुँच जाएगा एक दिन उस किनारे,
विफलता कहेगी, अभी तू है कच्चा,
अगर दिल में होगा,तेरा प्यार सच्चा,
न ठोकर लगेगी न खाएगा गच्चा,
मगर मान फिर भी अभी तो है बच्चा,
तेरे साथ चलता,परम वो पिता रे,
पहुँच जाएगा एक दिन उस किनारे,
न दुनिया न दौलत न साथी मिलेगा,
ये वो राह, जिस पर अकेला चलेगा,
न रखना कोई मोह रिश्ता न नाता,
तू खुद का है साथी ये क्यों भूल जाता,
सफर तो है लंबा मगर डर न प्यारे,
पहुँच जाएगा एक दिन उस किनारे,
नहीं पाएगा मुक्ति खुद के बिना रे,
पहुँच जाएगा एक दिन उस किनारे,
चलाचल पथिक तू...
वृक्ष लगाए , वृक्ष लगाए,
सबने मिलकर वृक्ष लगाए,
कुछ खुरपी को लेकर आए,
साथ फावड़ा कुछ ले आए,
गड्ढ़े मिलकर तुरत बनाए,
उनमें फिर पौधे रखवाए,
बच्चों का उत्साह देखकर,
वहाँ प्रिंसिपल जी भी आए,
सर जी फोटो भी तो खींचो,
मिलकर यह सारे चिल्लाए,
इन्हें सुरक्षित भी रखेंगे,
बढ़कर आगे हमें बताए,
पिछली बार किया था ये सब,
अब फिर जल्दी नम्बर आए,
साफ सफाई करने में,
ये बिच्छू निकली घर में,
पीठ सफेद, चकत्ते हैं,
ये सब इसके बच्चे हैं,
ज्यों ही बड़े - बड़े होंगे,
अपनी माँ को खा लेंगे,
मैं भी था अब तक अंजान,
पता लगा तब पाया जान,
कैसी प्रकृति विचित्र बनी,
आश्चर्य से भरी पड़ी,
साँपिन खाती बच्चों को,
ये बच्चे अपनी माँ को,
मन करता है फूल चढ़ा दूँ,
लोकतन्त्र की अर्थी पर,
भारत के बेटे निर्वासित,
हैं अपनी ही धरती पर,
राजमहल को शरम नहीं है,
घायल होती थाती पर,
भारत मुर्दाबाद लिखा है,
श्रीनगर की छाती पर,
सेना को आदेश थमा दो,
घाटी ग़ैर नहीं होगी,
जहाँ तिरंगा नहीं मिलेगा,
उनकी खैर नहीं होगी,..
(डा हरिओम पवार)
आज कल देखा गया है अपनी व्यस्तताओं के चलते पिता का उनके बच्चों चाहे वह लड़का हो या लड़की उससे अबोला सा रहता है। यह एक अलग तरह की चुनौती है।
प्रस्तुत है एक कविता

पापा पास बुलाओ ना,
रूठूँ, मुझे मनाओ ना,
कुछ माँगूँ तो मत बोलो,
मम्मी से ले आओ ना,
याद करो अपना बचपन,
छोटे थे कैसा था मन,
बात करो मेरे मन की,
कुछ घर की कुछ ट्यूशन की,
अपने गले लगाओ ना,
अब इतना झुँझलाओ ना,
अभी तो आए,जाओ ना,
पापा पास बुलाओ ना,

स्मृति के वातायन से एक संस्मरण


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एक प्रसंग मानस से
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बात सन 1977 की है तब मैं ऋषिभूमि इंटर कालेज सौरिख (तब)फर्रुखाबाद उ.प्र. में दसवीं कक्षा का छात्र था। श्री ज्ञानेन्द्र देव त्रिपाठी वहाँ प्रधानाचार्य हुआ करते थे। प्रार्थना स्थल पर वे अक्सर मानस का यह उद्धरण हम बच्चों को सुनाते थे। जो मुझे आज तक भूला नहीं है।
धनुषयज्ञ प्रसंग में जब सारे राजा हार गए कोई धनुष तोड़ना तो दूर हिला भी न सका।राजा जनक भी---
वीर विहीन मही मैं जानी,कह चुके और लक्ष्मण भी -- कन्दुक इव ब्रह्मांड उठावौ,का उद्घोष कर चुके । तब गुरु विश्वामित्र ने लक्ष्मण को शान्त करते हुए राम से कहा--
उठहु राम भंजहु भव चापा,
मेटहु तात जनक परितापा।
तब-
सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा,
हरषु विषाद न कछु उर आवा ।
ठाढ़़े भए उठि सहज सुभाए,
ठवनि जुबा मृगराजु लजाए।
वे कहते थे--राम को पता था कि वे धनुष तोड़ देंगे लेकिन फिर भी उनकी चाल में घमंड नहीं था।बल्कि वे सहज स्वाभाविक ढ़ंग से उठ खडे हए। मगर वो उनका वह सहज स्वाभाविक ढ़ंग से उठना भी जवान सिंहों को लज्जित कर देने वाला था।
कहने का अर्थ है कि हमारा उठना बैठना हर क्रिया कलाप हमारे व्यक्तित्व का परिचायक है। हम मुख की बजाय बाडी लैंग्वैज से ज्यादा बोलते हैं जिसे लोग समझते भी हैं। हमें हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए।
आज गोस्वामी तुलसीदास जी और न ही ज्ञानेन्द्र देव त्रिपाठी जी उपरोक्त दोनों ही इस दुनिया में नहीं है। पर अपनी दी हुई शिक्षाओं के रूप में वे आज भी हमारे साथ हैं।
उनकी स्मृतियों को नमन...
आसमान में जाला बुनती,
देखो ये मकड़ी,
बुना तार का जाल न दिखता,
देखो ये मकडी,
कल सामने मेरे इसने थी,
मक्खी पकड़ी,
है शिकार की फिर तलाश में,
देखो ये मकड़ी,
लापरवाही करी अगर तो,
जाल लगे बालों में,
दबे अगर तो जहर छोड़ दे,
फुंसी हो गालों में,
एक बार फंस जाए न निकले,
इसके पंंजों से,
घातक बड़ी खिलाड़ी निकली,
देखो ये मकड़ी,
आओ हम जन मन गण गाएँ,
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आओ हम जन मन गण गाएँ,
लोकतंत्र का जश्न मनाएँ,
संत मौलवी दुष्कर्मी हैं,
प्रवचन सुनने किससे जाएँ,
आओ हम जन मन गण गाएँ,
लोकतंत्र का जश्न मनाएँ,
भक्षक फिरें निरंकुश, डोलें,
रक्षक पिटते, जान बचाएँ,
आओ हम जन मन गण गाएँ,
लोकतंत्र का जश्न मनाएँ,
अपराधी जब जन नेता हों,
न्याय भला फिर किससे पाएँ,
आओ हम जन मन गण गाए,
लोकतंत्र का जश्न मनाएँ,
सीमाएँ हर रोज सिमटतीं,
खबर पढ़ें,अफसोस जताएँ,
आओ हम जन मन गण गाएँ,
लोकतंत्र का जश्न मनाएँ,
शब्द पढ़ें, बस संविधान में,
अर्थ कहाँ हैं, ढ़ूँढ़ न पाएँ,
पाँव कुल्हाड़ी मार के अपने,
अब हम किसको व्यथा सुनाएँ,
आओ हम जन मन गण गाएँ,
लोकतंत्र का जश्न मनाएँ,
लोकतंत्र आया जंगल में,
नाखुश राजा रानी,
बकरी शेर पिएंगे दोनों,
एक घाट का पानी,
रहकर जल में बैर मगर से,
कैसे निभे बताओ,
सर्व समर्पण तुम्हें,
अगर खाना है हमको खाओ,
कुदरत के सब रंग निराले, 
गोरे हों या काले,
मन कहता तू मन के अंदर,
सारे रंग समा ले,
पत्ती हरी, पंख तितली के,
लाल श्वेत या काले,
देखे अगर दुखी मन,
फैलें अंदर गहन उजाले,
लहर की मानिन्द चुप - चुप,
बह रही है चाँदनी,
ग़र सुने कुछ -कुछ यक़ीनन ,
कह रही है चाँदनी,
रात आई, छोड़ कर सब,
चल दिए तनहा उसेे,
बेवफाई का सितम यूँ ,
सह रही है चाँदनी,
तब और अब
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पेड़ नीम के दो ,
दरवाजे के सामने लगाए,
सोचा था छाया होगी,
ढेरों ऑक्सीजन आए,
रक्षा में ट्री गार्ड लगाए,
पानी दिया हमेशा,
समता किससे करे,
न कोई गुणकारी इस जैसा,
ईशकृपा से दोनों अबतक,
रहे सलामत भाई,
ऑक्सीजन भरपूर दे रहे,
दोनों देते छांई,
धूप और लू से जब जलता,
पथिक आश्रय पाता,
देख उसे तब मन मेरा,
मन ही मन में हरषाता,
दो वर्षों पहले थे इसके ,
ऐसे रूप निराले,
आज बड़े हो झूम रहे हैं,
ये दोनों मतवाले,
अपनी खुद तस्वीर बनाओ
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रखो आईना खुद के आगे,
देखो सोचो और बताओ,
अपनी खुद तस्वीर बनाओ,
कोई उपेक्षा करे अगर तो,
क्यों ये मन गुमसुम रहता है,
करें सलाम अगर बहुतेरे,
खुशियों का दरिया बहता है,
खुद की कभी पीठ ठोंकी क्या,
खुद को गाली कभी निकाली,
या औरों की नज़रों वाली ही,
मन में तस्वीर बना ली,
औरों की नज़रों में क्या हो,
बस इस पर ही मत इतराओ,
अपनी खुद तस्वीर बनाओ,
जीवन का संतुलन साध लो,
करके नित अभ्यास,
लगे निरंतर रहो एक दिन,
छू लोगे आकाश,
आदमी की खोपड़ी
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एक राजमहल के द्वार पर बड़ी भीड़ लगी थी। किसी फ़क़ीर ने सम्राट से भिक्षा माँगी थी।
सम्राट ने उससे कहा-"जो भी चाहते हो ,मॉग लो" ।
दिन के प्रथम याचक की किसी भी इच्छा को पूरा करने का उसका नियम था।
उस फ़क़ीर ने अपने छोटे से भिक्षा-पात्र को आगे बढ़ाया और कहा-"बस ,इसे स्वर्ण -मुद्राओं से भर दें "।
सम्राट ने सोचा ,"इससे सरल बात और क्या हो सकती है ?" लेकिन जब उस भिक्षा-पात्र में स्वर्ण मुद्रायें डाली गईं ,तो ज्ञात हुआ कि उसे भरना असम्भव था। वह तो जादुई था। जितनी अधिक मुद्रायें उसमें डाली गई ,
उतना ही अधिक वह ख़ाली होता गया।
सम्राट ने अपने सारे ख़ज़ाने ख़ाली कर दिये, लेकिन ख़ाली पात्र ख़ाली ही रहा। उसके पास जो कुछ भी था सभी उस पात्र में डाल दिया ,लेकिन अद्भुत पात्र ख़ाली कि ख़ाली ही रहा।
तब उस सम्राट ने कहा, " भिक्षु, तुम्हारा पात्र साधारण नहीं हैं। उसे भरना मेरी सामर्थ्य के बाहर है। क्या मैं पूँछ सकता हूँ कि इस अद्भुत पात्र का रहस्य क्या है ?
वह फकीर हँसने लगा और बोला-"कोई विशेष रहस्य नहीं हैं। मरघट से निकल रहा था कि *मनुष्य की खोपड़ी* मिल गयी ,उससे ही यह भिक्षा पात्र बना है। *मनुष्य की खोपड़ी कभी भरी नहीं* इसलिये यह भिक्षा पात्र कभी नहीं भरा जा सकता हैं।
*धन से, पद से , ज्ञान से -किसी से भी भरो ,यह ख़ाली ही रहेगी क्योंकि इन चीज़ों से भरने के लिये यह बनी ही नहीं हैं।*
यही मेरा वतन!!!
आज पूरे साठ बरस के बाद मुझे अपने वतन, प्यारे वतन का दर्शन फिर नसीब हुआ। जिस वक़्त मैं अपने प्यारे देश से विदा हुआ और क़िस्मत मुझे पच्छिम की तरफ़ ले चली, मेरी उठती जवानी थी। मेरी रगों में ताज़ा खून दौड़ता था और सीना उमंगों और बड़े-बडें़ इरादों से भरा हुआ था। मुझे प्यारे हिन्दुस्तान से किसी ज़ालिम की सख़्तियों और इंसाफ़ के ज़बर्दस्त हाथों ने अलग नहीं किया था। नहीं, ज़ालिम का जुल्म और क़ानून की सख्तियाँ मुझसे जो चाहें करा सकती हैं मगर मेरा वतन मुझसे नहीं छुड़ा सकतीं। यह मेरे बुलन्द इरादे और बड़े-बड़े मंसूबे थे जिन्होंने मुझे देश निकाला दिया। मैंने अमरीका में खूब व्यापार किया, खूब दौलत कमायी और खूब ऐश किये। भाग्य से बीवी भी ऐसी पायी जो अपने रूप में बेजोड़ थी, जिसकी ख़ूबसूरती की चर्चा सारे अमरीका में फैली हुयी थी और जिसके दिल में किसी ऐसे ख़याल की गुंजाइश भी न थी जिसका मुझसे सम्बन्ध न हो। मैं उस पर दिलोजान से न्योछावर था और वह मेरे लिए सब कुछ थी। मेरे पाँच बेटे हुए, सुन्दर,हृष्ट-पुष्ट और नेक, जिन्होंने व्यापार को और भी चमकाया और जिनके भोले,नन्हें बच्चे उस वक़्त मेरी गोद में बैठे हुए थे जब मैंने प्यारी मातृभूमि का अन्तिम दर्शन करने के लिए क़दम उठाया। मैंने बेशुमार दौलत, वफ़ादार बीवी, सपूत बेटे और प्यारे-प्यारे जिगर के टुकड़े, ऐसी-ऐसी अनमोल नेमतें छोड़ दीं। इसलिए कि प्यारी भारतमाता का अन्तिम दर्शन कर लूँ। मैं बहुत बुड्ढा हो गया था। दस और हों तो पूरे सौर बरस का हो जाऊँ, और अब अगर मेरे दिल में कोई आरजू बाक़ी है तो यही कि अपने देश की ख़ाक में मिल जाऊँ। यह आरजू कुछ आज ही मेरे मन में पैदा नहीं हुई है, उस वक़्त भी थी जब कि मेरी बीवी अपनी मीठी बातों और नाज़ुक अदाओं से मेरा दिल खुश किया करती थी। जबकि मेरे नौजवान बेटे सबेरे आकर अपने बूढ़े बाप को अदब से सलाम करते थे, उस वक़्त भी मेरे जिगर में एक काँटा-सा खटकता था और वह काँटा यह था कि मैं यहाँ अपने देश से निर्वासित हूँ। यह देश मेरा नहीं है, मैं इस देश का नहीं हूँ। धन मेरा था, बीवी मेरी थी, लड़के मेरे थे और जायदादें मेरी थीं, मगर जाने क्यों मुझे रह रहकर अपनी मातृभूमि के टूटे-फूटे झोंपड़े, चार छ: बीघा मौरूसी ज़मीन और बचपन के लंगोटिया यारों की याद सताया करती थी और अक्सर खुशियों की धूमधाम में भी यह ख़याल चुटकी लिया करता कि काश अपने देश में होता!
मगर जिस वक़्त बम्बई में जहाज़ से उतरा और काले कोट-पतलून पहने, टूटी-फूटी अंगे्रजी बोलते मल्लाह देखे, फिर अंगे्रजी दुकानें, ट्रामवे और मोटर-गाडिय़ाँ नज़र आयीं, फिर रबड़वाले पहियों और मुँह में चुरुट दाबे आदमियों से मुठभेड़ हुई,फिर रेल का स्टेशन, और रेल पर सवार होकर अपने गाँव को चला, प्यारे गाँव को जो हरी-भरी पहाडिय़ों के बीच में आबाद था, तो मेरी आँखों में आँसू भर आये। मैं खूब रोया, क्योंकि यह मेरा प्यारा देश न था, यह वह देश न था जिसके दर्शन की लालसा हमेशा मेरे दिल में लहरें लिया करती थीं। यह कोई और देश था। यह अमरीका था, इंग्लिस्तान था मगर प्यारा भारत नहीं।
रेलगाड़ी जंगलों, पहाडों, नदियों और मैदानों को पार करके मेरे प्यारे गाँव के पास पहुँची जो किसी ज़माने में फूल-पत्तों की बहुतायत और नदी-नालों की प्रचुरता में स्वर्ग से होड़ करता था। मैं गाड़ी से उतरा तो मेरा दिल बाँसों उछल रहा था-अब अपना प्यारा घर देखूँगा, अपने बचपन के प्यारे साथियों से मिलूँगा। मुझे उस वक़्त यह बिल्कुल याद न रहा कि मैं नब्बे बरस का बूढ़ा आदमी हूँ। ज्यों-ज्यों मैं गाँव के पास पहुँचता था, मेरे क़दम जल्द-जल्द उठते थे और दिल में एक ऐसी खुशी लहरें मार रही थी जिसे बयान नहीं किया जा सकता। हर चीज़ पर आँखें फाड़-फाडक़र निगाह डालता-अहा, यह वो नाला है जिसमें हम रोज़ घोड़े नहलाते और खुद गोते लगाते थे, मगर अब इसके दोनों तरफ़ काँटेदार तारों की चहारदीवारी खिंची हुई थी और सामने एक बंगला था जिसमें दो-तीन अंग्रेज़ बन्दूकें लिए इधर-उधर ताक रहे थे। नाले में नहाने या नहलाने की सख़्त मनाही थी। गाँव में गया और आँखें बचपन के साथियों को ढँूढऩे लगीं मगर अफ़सोस वह सब के सब मौत का निवाला बन चुके थे और मेरा टूटा-फूटा झोंपड़ा जिसकी गोद में बरसों तक खेला था, जहाँ बचपन और बेफ़िक्रियों के मज़े लूटे थे, जिसका नक्शा अभी तक आँखों में फिर रहा है, वह अब एक मिट्टी का ढेर बन गया था। जगह ग़ैर-आबाद न थी। सैकड़ों आदमी चलते-फिरते नज़र आये, जो अदालत और कलक्टरी और थाने-पुलिस की बातें कर रहे थे। उनके चेहरे बेजान और फ़िक्र में डूबे हुए थे और वह सब दुनिया की परेशानियों से टूटे हुए मालूम होते थे। मेरे साथियों के से हृष्ट-पुष्ट, सुन्दर, गोरे-चिट््टे नौजवान कहीं न दिखाई दिये। वह अखाड़ा जिसकी मेरे हाथों ने बुनियाद डाली थी, वहाँ अब एक टूटा-फूटा स्कूल था और उसमें गिनती के बीमार शक्ल-सूरत के बच्चे जिनके चेहरों पर भूख लिखी थी, चिथड़े लगाये बैठे ऊँघ रहे थे। नहीं, यह मेरा देश नहीं है। यह देश देखने के लिए मैं इतनी दूर से नहीं आया। यह कोई और देश है, मेरा प्यारा देश नहीं है।
उस बरगद के पेड़ की तरफ़ दौड़ा जिसकी सुहानी छाया में हमने बचपन के मज़े लूटे थे, जो हमारे बचपन का हिण्डोला और ज़वानी की आरामगाह था। इस प्यारे बरगद को देखते ही रोना-सा आने लगा और ऐसी हसरतभरी, तड़पाने वाली और दर्दनाक यादें ताज़ी हो गयीं कि घण्टों ज़मीन पर बैठकर रोता रहा। यही प्यारा बरगद है जिसकी फुनगियों पर हम चढ़ जाते थे, जिसकी जटाएँ हमारा झूला थीं और जिसके फल हमें सारी दुनिया की मिठाइयों से ज़्यादा मज़ेदार और मीठे मालूम होते थे। वह मेरे गले में बाँहें डालकर खेलने वाले हमजोली जो कभी रूठते थे, कभी मनाते थे, वह कहाँ गये? आह, मैं बेघरबार मुसाफ़िर क्या अब अकेला हूँ? क्या मेरा कोर्ई साथी नहीं। इस बरगद के पास अब थाना और पेड़ के नीचे एक कुर्सी पर कोई लाल पगड़ी बाँधे बैठा हुआ था। उसके आसपास दस-बीस और लाल पगड़ीवाले हाथ बाँधे खड़े थे और एक अधनंगा अकाल का मारा आदमी जिस पर अभी-अभी चाबुकों की बौछार हुई थी, पड़ा सिसक रहा था। मुझे ख़याल आया, यह मेरा प्यारा देश नहीं है, यह कोई और देश है, यह योरप है, अमरीका है, मगर मेरा प्यारा देश नहीं है, हरगिज़ नहीं।
इधर से निराश होकर मैं उस चौपाल की ओर चला जहाँ शाम को पिताजी गाँव के और बड़े-बूढ़ों के साथ हुक़्क़ा पीते और हँसी-दिल्लगी करते थे। हम भी उस टाट पर क़लाबाजियाँ खाया करते। कभी-कभी वहाँ पंचायत भी बैठती थी जिसके सरपंच हमेशा पिताजी ही होते थे। इसी-चौपाल से लगी हुई एक गोशाला थी। जहाँ गाँव भर की गायें रक्खी जाती थीं और हम यहीं बछड़ों के साथ कुलेलें किया करते थे। अफ़सोस, अब इस चौपाल का पता न था। वहाँ अब गाँव के टीका लगाने का स्टेशन और एक डाकख़ाना था। उन दिनों इसी चौपाल से लगा हुआ एक कोल्हाड़ा था जहाँ जाड़े के दिनों मे ऊख पेरी जाती थी और गुड़ की महक से दिमाग़ तर हो जाता था। हम और हमारे हमजोली घण्टों गँडेरियों के इन्तज़ार में बैठे रहते थे और गँडेरियाँ काटने वाले मज़दूरो के हाथों की तेज़ी पर अचरज करते थे, जहाँ सैकड़ों बार मैंने कच्चा रस और पक्का दूध मिलाकर पिया था। यहाँ आसपास के घरों से औरतें और बच्चे अपने-अपने घड़े लेकर आते और उन्हें रस से भरवाकर ले जाते। अफ़सोस, वह कोल्हू अभी ज्यों के त्यों गड़े हुए हैं मगर देखो, कोल्हाड़े की जगह पर अब एक सन लपेटने वाली मशीन है और उसके सामने एक तम्बोली और सिगरेट की दूकान है। इन दिल को छलनी करने वाले दृश्यों से दुखी होकर मैंने एक आदमी से जो सूरत से शरीफ़ नज़र आता था, कहा-बाबा, मैं परदेशी मुसाफ़िर हूँ, रात भर पड़े रहने के लिए मुझे जगह दे दो। इस आदमी ने मुझे सर से पैर तक घूरकर देखा और बोला-आगे जाओ, यहाँ जगह नहीं है। मैं आगे गया और यहाँ से फिर हुक्म मिला- आगे जाओ। पाँचवीं बार सवाल करने पर एक साहब ने मुठ्ठी भर चने मेरे हाथ पर रख दिये। चने मेरे हाथ से छूटकर गिर पड़े और आँखों से आँसू बहने लगे। हाय, यह मेरा प्यारा देश नहीं है, यह कोई और देश है। यह हमारा मेहमान और मुसाफ़िर की आवभगत करने वाला प्यारा देश नहीं, हरगिज़ नहीं।
मैंने एक सिगरेट की डिबिया ली और एक सुनसान जगह पर बैठकर बीते दिनों की याद करने लगा कि यकायक मुझे उस धर्मशाला का ख़याल आया जो मेरे परदेश जाते वक़्त बन रहा था। मैं उधर की तरफ़ लपका कि रात किसी तरह वहीं काटँू, मगर अफ़सोस, हाय अफ़सोस, धर्मशाला की इमारत ज्यों की त्यों थी, लेकिन उसमें ग़रीब मुसाफ़िरों के रहने के लिए जगह न थी। शराब और शराबखोरी, जुआ और बदचलनी का वहाँ अड्डा था। यह हालत देखकर बरबस दिल से एक ठण्डी आह निकली, मैं ज़ोर से चीख़ उठा-नहीं-नहीं और हज़ार बार नहीं यह मेरा वतन, मेरा प्यारा देश, मेरा प्यारा भारत नहीं है। यह कोई और देश है। यह योरप है, अमरीका है, मगर भारत हरिगज नहीं।
अँधेरी रात थी। गीदड़ और कुत्ते अपने राग अलाप रहे थे। मैं दर्दभरा दिल लिये उसी नाले के किनारे जाकर बैठ गया और सोचने लगा कि अब क्या करूँ? क्या फिर अपने प्यारे बच्चों के पास लौट जाऊँ और अपनी नामुराद मिट्टी अमरीका की ख़ाक में मिलाऊँ? अब तो मेरा कोई वतन न था, पहले मैं वतन से अलग ज़रूर था मगर प्यारे वतन की याद दिल में बनी हुई थी। अब बेवतन हूँ, मेरा कोई वतन नहीं। इसी सोच-विचार में बहुत देर तक चुपचाप घुटनों में सिर दिये बैठा रहा। रात आँखों ही आँखों में कट गयी, घडिय़ाल ने तीन बजाये और किसी के गाने की आवाज़ कानों मे आयी। दिल ने गुदगुदाया, यह तो वतन का नग्मा है, अपने देश का राग है। मैं झट उठ खड़ा हुआ। क्या देखता हूँ कि पन्द्रह-बीस औरतें, बूढ़ी, कमज़ोर, सफेद धोतियाँ पहने, हाथों में लोटे लिये स्नान को जा रही हैं और गाती जाती हैं-
प्रभु, मेरे अवगुन चित न धरो
इस मादक और तड़पा देने वाले राग से मेरे दिल की जो हालत हुई उसका बयान करना, मुश्किल है। मैंने अमरीका की चंचल से चंचल, हँसमुख से हँसमुख सुन्दरियों की अलाप सुनी थी और उनकी ज़बानों से मुहब्बत और प्यार के बोल सुने थे जो मोहक गीतों से भी ज़्यादा मीठे थे। मैंने प्यारे बच्चों के अधूरे बोलों और तोतली बानी का आनन्द उठाया था। मैंने सुरीली चिडिय़ों का चहचहाना सुना था। मगर जो लुत्फ़, जो मज़ा, जो आनन्द मुझे गीत में आया वह जि़न्दगी में कभी और हासिल न हुआ था। मैंने खुद गुनगुनाना शुरू किया-
प्रभु, मेरे अवगुन चित न धरो
तन्मय हो रहा था कि फिर मुझे बहुत से आदमियों की बोलचाल सुनाई पड़ी और कुछ लोग हाथों में पीतल के कमण्डल लिये शिव शिव,हर, हर गंगे गंगे, नारायण-नारायण कहते हुए दिखाई दिये। मेरे दिल ने, फिर गुद-गुदाया, यह तो मेरे देश प्यारे देश की बाते हैं। मारे खुशी के दिल बाग़-बाग हो गया । मैं इन आदमियों के साथ हो लिया और एक दो तीन चार पाँच छ: मील पहाड़ी रास्ता पार करने के बाद हम उस नदी के किनारे पहुँचे जिसका नाम पवित्र है, जिसकी लहरों में डुबकी लगाना और जिसकी गोद में मरना हर हिन्दू सबसे बड़ा पुण्य समझता है। गंगा मेरे प्यारे गाँव से छ: सात मील पर बहती थी और किसी ज़माने में सुबह के वक़्त घोड़े पर चढक़र गंगा माता के दर्शन को आया करता था। उनके दर्शन की कामना मेरे दिल में हमेशा थी। यहाँ मैंने हज़ारों आदमियों को इस सर्द, ठिठुरते हुए पानी में डुबकी लगाते देखा। कुछ लोग बालू पर बैठे गायत्री मन्त्र जप रहे थे। कुछ लोग हवन करने में लगे हुए थे। कुछ लोग माथे पर टीके लगा रहे थे। कुछ और लोग वेदमन्त्र सस्वर पढ़ रहे थे। मेरे दिल ने फिर गुदगुदाया और मैं ज़ोर से कह उठा- हाँ हाँ, यही मेरा देश है, यही मेरा प्यारा वतन है, यही मेरा भारत है। और इसी के दर्शन की, इसी की मिट्टी में मिल जाने की आरजू मेरे दिल में थी।
मैं खुशी में पागल हो रहा था। मैंने अपना पुराना कोट और पतलून उतार फेंका और जाकर गंगा माता की गोद में गिर पड़ा, जैसे कोई नासमझ, भोला-भाला बच्चा दिन भर पराये लोगों के साथ रहने के बाद शाम को अपनी प्यारी माँ की गोद में दौडक़र चला आये, उसकी छाती से चिपट जाए। हाँ, अब अपने देश में हूँ। यह मेरा प्यारा वतन है, यह लोग मेरे भाई , गंगा मेरी माता है।
मैंने ठीक गंगाजी के किनारे एक छोटी सी झोंपड़ी बनवा ली है और अब मुझे सिवाय रामनाम जपने के और कोई काम नहीं। मैं रोज़ शाम-सबेरे गंगा-स्नान करता हूँ और यह मेरी लालसा है कि इसी जगह मेरा दम निकले और मेरी हड्डियाँ गंगामाता की लहरों की भेंट चढ़ें।
मेरे लड़के और मेरी बीवी मुझे बार-बार बुलाते हैं, मगर अब मैं यह गंगा का किनारा और यह प्यारा देश छोडक़र वहाँ नहीं जा सकता। मैं अपनी मिट्टी गंगाजी को सौंपूँगा। अब दुनिया की कोई इच्छा, कोई आकांक्षा मुझे यहाँ से नहीं हटा सकती क्योंकि यह मेरा प्यारा देश, मेरी प्यारी मातृभूमि है और मेरी लालसा है कि मैं अपने देश में मरूँ।
प्रेमचंद
कितनी ही असंख्य, 
सीपों से भरा ,
समन्दर है,
पता नहीं चलता,
मोती पर,
किसके अन्दर है,
मनभाते फूलों से ,
चाहे चमन भरा हो,
फिर भी,
मेरी बगिया वाला,
फूल ही,
सबसे सुन्दर है,
हिंदी के पेड़ों पर बैठी,
इंग्लिश की मैना गाएगी,
सच में विकास की धारा तब,
तूफानी गति पा जाएगी,
अपनी भाषा से प्यार करो,
अपनी भाषा व्यवहार करो,
दुनिया की भाषा भी समझो,
यदि दुनिया से व्यापार करो,
क्यों दास बने अंग्रेजी के,
बू जाती नहीं गुलामी की,
काबिल पद के महरानी की,
दी जगह उसे नौकरानी की,
परदेशी भाषा को पढ़कर,
बाबू बन दास कहाओगे,
अपनी भाषा के तुम स्वामी,
मिट्टी का गौरव गाओगे,
गैरों के कंधों पर चढ़ कर,
कब मंज़िल तक पहुँचा कोई,
यदि किसी पहुँचा भी तो,
वह मंज़िल भी मंज़िल कोई,
अपने पैरों पर चलकर ही,
जब आगे कदम बढ़ाएंगे,
मंज़िल कदमों से लिपटेगी,
पाँवों के छाले गाएंगे,
जिनमें खेले - कूदे गाए,
अपना वो आँगन गलियारा,
हमको अजीज़ जां से बढ़कर,
हमको है प्राणों से प्यारा,
अपनी भाषा की कद्र करो,
दिल से इसका सम्मान करो,
हिंदी भारत की भाषा है,
यह ध्यान करो,अभिमान करो,
हिंदी की बोली वानी में,
हिंदी की सुनी कहानी में,
आता वो जोश जवानी में,
जो आग लगा दे पानी में,
आगामी कल अपना होगा,
एक दीप जलाओ आशा का,
अभिनंदन अपनी संस्कृति का,
अभिवादन अपनी भाषा का
सारी दुनिया की माँ अच्छी,
पर अपनी माँ अपनी होती,
तुम हँसते हो तो वो हँसती,
तुम रो देते तो वो रोती,
अपनी भाषा से प्यार करो,
अपनी भाषा व्यवहार करो,
जिसमें पल बढ़कर बड़े हुए,
उस भाषा का सत्कार करो,
मातृ भाषा कनउजी में
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फैली बीमारी,है बुखार सब 
असपताल भर डारे हैं,
जे आस पास के हाल देख,
अब काँपत प्रान हमारे हैं,
घुटना हड्डी सब जोड़ दुखैं,
नाहीं कछु दिखत सहारे हैं,
हमहूँ कहुँ गौतर खाय आंय,
मन मैं अब जहे हमारे है,
जो रो न सकें निज भाषा में,
उससे बेचारा और कौन?
मन में घुट कर रह जाए बोल,
जब मजबूरी में रहें मौन,
जिसमें हम सोकर जाग रहे,
जिसमें हम रोकर हँसते है
उस मइया की भाषा ही में तो,
बस प्रान हमारे बसते हैं,
कथक के पर्याय - पंड़ित बिरजू महाराज

कथक सम्राट पंडित बिरजू महाराज का जन्म चार फरवरी 1938 को लखनऊ में हुआ था। इन्होंने नृत्य की आरंभिक शिक्षा अपने पिता अच्छन महाराज अपनी माँ व चाचा शंभू महाराज से ली। चैदह वर्ष की उम्र में ही वे दिल्ली संगीत भारती में नृत्य शिक्षक हुए।

1970 से कथक केंद्र से उन्होंने गुरू के रूप में अनेक शिष्यों को तैयार किया। उनके शिष्यों ने अपनी उत्कृष्ट कला से नृत्य नाटिकाओं के माध्यम से लखनऊ घराने की कथक शैली को देश विदेश में लोकप्रियता दिलाई। उन्होंने कथक शैली को अंतर्राष्ट्रीय नृत्य जगत में सुस्थापित किया।

उनकी कुछ प्रमुख नृत्य नाटिकाएं  कुमार संभवम, गीतोपदेश, होरी, धूम मचायो रे, कथा रघुनाथ की, हव्वा खातून, गीत गोविंद हैं।

कथक के लिए पल - पल समर्पित सृजनशील पंड़ित बिरजू महाराज को उनकी सेवाओं के लिए 1966 में केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी ने ‘राष्ट्रीय पुरस्कार’ से सम्मानित किया। वर्ष 1986 में ‘पदम भूषण’ व इसी वर्ष मध्यप्रदेश सरकार ने इन्हें ‘कालीदास सम्मान’ दिया। 1987 में वे पुनः ‘पदमविभूषण’ से सम्मानित हुए।

उत्तरप्रदेश संगीत नाटक अकादमी ने 1974 में ‘अकादमी पुरस्कार’ व 1988 में अकादमी की ‘रत्न सदस्यता’ प्रदान की। उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग ने 1994 में ‘यश भारती’ सम्मान दिया।

पंड़ित बिरजू महाराज इस समय कथक केंद्र नई दिल्ली में निदेशक वरिष्ठ गुरू के पद पर कार्यरत हैं। मेरी यहीं पर उनसे मुलाकात हुई। अपनी व्यस्त दिनचर्या में से समय निकाल कर उन्होंने पूछे गए प्रश्नों के उत्तर कुछ इस प्रकार दिए -

क्या कुछ छूट गया, जिसे अभी तक आपने नहीं किया ?

यह एक अंतहीन विद्या है, कला की प्यास है, जो कभी समाप्त नहीं होने वाली है।

जीवन के बारे में आप किस तरह सोचते हैं ?

जीवन जैसे गुरू के द्वारा दिया गया कोई कार्य है, जिसे अपने परिश्रम के द्वारा पूरा करने का प्रयास चलता रहे।

आपका प्रिय स्वप्न क्या है ?

मेरा प्रिय स्वप्न है कि यह कला फलती फूलती रहे। अच्छे शिष्यों के द्वारा यह कला नए शिखरों को छुए और नए प्रतिमान स्थापित करे।

और आपका दुःस्वप्न ?

शास्त्रीय नृत्य संगीत पर विदेशी असर न होने पाए और भारतीयता पर आँच न आए।

प्रेम के बारे में आपका क्या कहना है ?

प्रेम एक लगाव है, और हमें अपना कार्य , जिम्मेदारी , विद्या तथा ईश्वर से प्रेम होना चाहिए।

किस तरह की स्थितियाँ आप नापसंद करते हैं ?

बहुत भीड ़- भाड़, शोर, फालतू की बातें, ये सभी स्थितियाँ, कोई भी दिन जो संगीत की चर्चा के बिना हो मुझे पसंद नहीं है।

 आपके आदर्श कौन - कौन रहे ?

मेरी माँ पिताजी और पूर्वज

कथक में भविष्य की आशा के रूप में आप किसका नाम लेना चाहेंगे ?

शाश्वती सेन, दुर्गा आर्या, मालती श्याम, किरण चैहान, वेरोनिक अजान, वैसे और भी नाम हैं जिनसे भविष्य के लिए आशा है। बाकी हमारे बेटे और भाई दीपक, जयकिशन, कृष्णमोहन और राममोहन तो हैं ही।

कथक का शास्त्र लिपिबद्ध होने में क्या प्रगति हुई है ?

ठुंमरी की एक किताब मेरे द्वारा छपवाई गई है, जिसमें बिंदादीन महाराज की रचनाएं स्वर लिपिबद्ध हैं। इसका अगला संस्करण जल्द ही प्रकाशित होने वाला है। और भी कुछ किताबें प्रकाशित करने की योजना है।

एक ओर विदेशी हमारे शास्त्रीय नृत्य संगीत की ओर आकर्षित हो रहे हैं जबकि भारतीय युवा पाश्चात्य व फिल्मी नृत्य की ओर ... आप क्या कहना चाहेंगे  ?

पुरानी फिल्मों के नृत्य व लेखन में जो गहराई थी, वह अब नहीं रह गई है। कई विदेशी शिष्य भी हमारी परंपरा को सीख रहे हैं।

आप कथक कला के विकास के लिए और क्या करना चाहते हैं ?

मेरी इच्छा है कि गुरूकुल पूरे भारत में अनेक जगह स्थापित हों व भारतीय परंपरा को सुरक्षित रखते हुए सही शिक्षा दी जाय।

प्रयोग को आप किस रूप में देखते हैं ?

सही ढं़ग का प्रयोग विद्या नृत्य कला व संगीत का नायाब पथप्रदर्शक है।





 

ऐसा है राक गार्डन

राक गार्डन चार हेक्टेयर जमीन पर फैला हुआ है। यह कई भागों में बँटा हुआ है। प्रत्येक भाग एक अलग तरह के मूर्तिशिल्प से दर्शकों का परिचय और एक अलग तरह का अनुभव कराता है। प्रत्येक ब्लाक में एक से दूसरे में जाने के लिए रहस्यमय छोटे से दरवाजे हैं।
यद्यपि यह आसान बात नहीं है कि हर कोई कलाकार की दृष्टि को संपूर्णता से समझ सके। लेकिन फिर भी इसे देखते हुए उन अकेले व्यक्ति के कृतित्व की विशालता को देखकर उनके प्रति मन में निश्चय ही विशिष्ट सम्मान के भाव जन्म लेते हैं।
     मूर्तिशिल्प में खाली बेकार ड्रम जिनसे कि राक गार्डन की बाहरी चहारदीवारी भी बनी हुई है। टूटे बर्तन, टूटी क्राकरी के टुकड़े,साइकिल के विभिन्न पुर्जे,उसके फ्रेम,बिजली के टूटे फूटे सामान, जंग लगे लोहे और स्टील के फर्नीचर,प्राकृतिक पथरीली चट्टानों के टुकड़े, काँच की टूटी - फूटी रंगबिरंगी चूड़ियाँ, बोतलों के ढ़क्कन, फ्यूज ट्यूब लाइटें पक्षियों के पंख और कंकड़ पत्थर यहाँ तक कि नाइयों की दुकानों से कटे हुए बाल,इसके अलावा सैकड़ों बेकार वस्तुओं के टुकड़े।
ऐसा महसूस होता है कि जैसे उन सभी बेकार की वस्तुओं से उनकी लगातार बातचीत चलती रहती है कि उसे किस सौंदर्य में ढ़लना है। बरसों बरस की उनकी इस मेहनत की प्रक्रिया में उन्होंने राकगार्डन को एशिया के सबसे बड़े पुनर्नवीकरण केंद्र के रूप में विकसित कर दिया। जो कि उसकी महान प्रतिभा के प्रतीक के रूप में चंड़ीगढ़ में स्थित है। राक गार्डन इस बात का अद्वितीय उदाहरण है कि हम बेकार के सामान का कितना अच्छा उपयोग कर सकते हैं।


नेकचंद कहते थे कि प्रकृति स्वयं ही वस्तुओं को पुर्नउत्पादित करती है और हम सबको इससे सीखना चाहिए कि हम भी उसकी भाँति उपयोगी वस्तुओं का पुनर्निमाण कैसे कर सके। उनका विश्वास था कि प्रकृति की इच्छा और मानव की रचनात्मकता में कोई विरोध नहीं है। ऐसा वे सिर्फ कहते ही नहीं थे उन्होंने इसे करके दिखाया था। सौंदर्य की दिशा में उनकी प्रस्तुति ‘राक गार्डन’ मानव और प्रकृति के बीच की इसी एकता को प्रदर्शित करती है।
एक कलाकार के रूप में नेकचंद ने सीमेंट के घोल का अदभुत प्रयोग कर मनचाही आकृतियों का निर्माण किया। विशेष रूप से झरने की दीवार या खाई, जो झरने के लिए बनाई गई हैं। इसके लिए उन्होंने भारी टाट के कपड़ों का उपयोग किया है। जिससे सीमेंट के खंबों और दीवारों पर विशेष आकर्षण और प्रभाव उत्पन्न हो गया है। झरने का पानी रिसाइकल होकर वापस आता है। इसके लिए उन्होंने मोटर लगाए हैं लेकिन वे इतनी दूरी पर हैं कि इनकी आवाज झरने के संगीत में खो जाती हैं। ऐसा महसूस होता है कि यह प्राकृतिक ही हैं
कहाँ पर  प्राकृतिक शुरू होता है और मानव निर्मित खत्म यह अंतर करना बहुत मुशकिल है। उन्होंने कंकरीट के पेड़ बनाए हैं जो बिलकुल असली जैसे हैं।
पुरुष ओर स्त्री चिड़िया और जानवर सभी जैसे उनके हाथों के चमत्कारिक स्पर्श से जीवंत बन गए हैं। उन्होंने अनुपयोगी लोहे का भी अच्छा उपयोग किया है। जिसमें साइकिल के पुर्जों के ऊपर सीमेंट लगाकर उन्हें भी विभिन्न आकार दिया गया है। साइकिल की सीट को जहाँ चेहरे में तब्दील किया गया है वहीं फ्रेम को टाँगों में बदल दिया है।

प्रत्येक आकृति में भिन्न - भिन्न ढ़ंग की पच्चीकारी की गई है। बाह्य आवरण सीमेंट की पृष्ठभूमि में काँच की रंगबिरंगी चूड़ियों बोतल के ढ़क्कनों, टूटी क्राकरी के टुकड़ों या अन्य अनुपयोगी वस्तुओं से कलात्मक ढंग से जड़ा गया है। अधिकतर मूर्तियाँ, जानवर या मानवीय आकार में हैं। कुछ आकृतियाँ सामान्य से बड़ी हैं तो कुछ छोटी भी।
उनके द्वारा निर्मित चरित्रों में सुंदर काँच की चूड़ियों से बनी स्त्री आकृतियाँ भी हैं। जो कलात्मक ढ़ंग से इंच - इंच रंगबिरंगी व सुनहरी चूड़ियों से ढ़की है। उनके चेहरों को नजदीक से देखने पर विभिन्न भाव प्रकट होते हैं। वे आकृतियाँ भारतीय स्त्रियों की खुशी को अभिव्यक्त करतीं हैं। उनके सिर पर असली बालों का प्रयोग हुआ है। विभिन्न मूर्तिशिल्पों में टूटी केतली, टूटे कप व टूटी ट्रे का खूबसूरती से प्रयोग कर विभिन्न शेड बनाए गए हैं।
नेकचंद की इस महान प्रतिभा और कला के कद्रदान देश में ही नहीं बल्कि दुनिया के अन्य देशों में भी रहे। जहाँ एक ओर चंड़ीगढ़ के एअरफोर्स सेंटर में बेकार पड़े नाकारा सामान को उपयोगी बनाने के लिए उनके मार्गनिर्देशन में ‘मिनी राकगार्डन’ बनाया गया, वहीं अन्य देशों में भी उनके उपयोगी सुझाव पाने के लिए उन्हें समय - समय पर आमंत्रित किया जाता रहा।
स्विटजरलैंड में उनकी कला पर एक पुस्तक ‘नेकचंद आउटसाइडर आर्टस’ नाम से प्रकाशित हुई। भारत के विभिन्न राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री समय - समय पर राकगार्डन में जाकर नेकचंद की कला  की सराहना कर चुके हैं। अमेरिका इंग्लैंड़ जर्मनी आदि देशों में उनके प्रशंसकों ने ‘नेकचंद फाउण्डेशन’ नामक संस्था बनाई है जिसका मुख्यालय इग्लैंड में है। वे सभी समय - समय पर राकगार्डन की बेहतरी के लिए प्रयास करते रहते हैं। राकगार्डन के विस्तार चरण के लिए उन्होंने महंगे ‘मैजिक मिरर’ भेंट किए थे।
आज राकगार्डन में ओपन एयर स्टेज, झूले, ऊँट की सवारी, बच्चों के लिए अंदर मोटर बाइक आदि विविध आकर्षण हैं। अब शहर के बीचोबीच यह शांत सुरम्य अनोखा संसार, बच्चों और युवाओं के लिए एक अच्छा पिकनिक स्थल जैसा है। जहाँ आकर वे नेकचंद के इस स्वप्निल संसार के बीच बैठकर अपने भविष्य के लिए भी सपनों का संसार कल्पित करते हैं। नेकचंद का रचनात्मक मन भी अनुपयोगी से कुछ न कुछ उपयोगी रचता रहता था।
राकगार्डन में घूमते - घूमते आपको एक स्थान पर लोहे के कुँए के ऊपर का ढ़ांचा नजर आएगा जिसके चारों ओर घिरनियाँ लगीं हैं जिसे देखकर हो सकता है आपको अमीर खुसरो के जीवन की घटी वह घटना याद आ जाए जिसमें जब वे प्यासे एक ऐसे ही किसी कुँए के पास पहुँचे थे और उन्हें पहचान कर चार पनिहारियों ने पानी पिलाने के लिए उनसे चार अलग - अलग विषयों खीर, चरखा, कुत्ता और ढ़ोल पर कविता सुनाने की शर्त रखी। विलक्षण प्रतिभा के धनी खुसरो ने चारों की फरमाइश दो पंक्तियों में पूरी कर उन्हें खुश करके पानी पिया। कविता कुछ यूँ थी -‘खीर पकाई जतन से ,चरखा दिया चलाय, आया कुत्ता खा गया,तू बैठी ढ़ोल बजा,। अब न ऐसे कुएँ रहे न उनके कद्रदान। तो वह लोहे का फ्रेम भी अनुपयोगी हो गया। मगर नेकचंद की कलात्मक दृष्टि ने उसे उपयोगी बना लिया। आज राकगार्डन में दर्शक उसके पानी में पैसे फेंक कर अपने भाग्य की आजमाइश करते हैं और मनोरंजन करते हैं।




 

साहिर के रचना संसार में बच्चे
हिंदी फिल्म संसार में अपने भावपूर्ण गीतों से एक अलग मुकाम हासिल करने वाले शायर थे साहिर लुधियानवी। उत्कृष्टता के मापदण्ड पर अपने समकालीनों की अपेक्षा उन्होंने ऐसे गीत लिखे जो भाव और कला पक्ष दोनों में अनूठे थे। उनके फिल्मी और गैर फिल्मी रचनाओं को देखने से यह पता चलता है कि भविष्य का भारत उनके लिए काफी अहम था।
उनकी शुरुआती दौर की एक रचना है - आओ कि कोई ख्वाब बुने,कल के वास्ते, वरना ये रात आज के संगीन दौर की, डस लेगी जानो - दिल कि कुछ ऐसे कि जानो - दिल, ताउम्र फिर न कोई हसीं ख्वाब बुन सकें... गो हमसे भागती रही ये तेज गाम उम्र, ख्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र...आओ कि कोई ख्वाब बुनें, कल के वास्ते,
उन्होंने बेहतर भविष्य के सपने देखे थे और भविष्य का जीवन तो हमेशा बच्चों का ही होता है। उनका एक गीत जो फिल्म ‘दो कलियां’ में था बेहद लोकप्रिय हुआ। व्यवहारिक जीवन में अनुभवों से पगे उनके विचार मन पर सीधे असर करते थे। इसका एक बड़ा कारण यह था कि उनके शब्द सरल और सहज होते थे। उनकी विशेषता थी कि उन्होंने बड़े-बड़े दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों को अपने गीतों के जरिए आम जन को सुलभ कराया। अब अगर हम इसी फिल्म के गीत की बात करें तो हम देखते हैंु कि उन्होंने बाल मनोविज्ञान और जीवन के यथार्थ की इतनी बड़ी और गहरी समझ कितनी सहजता से हमारे सामने रख दी है -
खुद रूठें खुद मन जाएं,फिर हमजोली बन जाएं, झगडा जिसके साथ करें,अगले पल फिर बात करें,
इनको किसी से बैर नहीं, इनके लिए कोई गैर नहीं, इनका भोलापन मिलता है सबको बांह पसारे,
इंसां जब तक बच्चा है, तब तक ही वो सच्चा है, ज्यों-ज्यों उसकी उमर बढे,़ मन पर झूठ का मैल चढ़े,
पाप बढ़े नफरत घेरे, लालच की आदत घेरे, बचपन इन सब से हटकर, अपनी उमर गुजारे,
तन कोमल मन सुंदर है,बच्चे बड़ो से बेहतर हैं, इनमें छूत औ छात नहीं, झूठी जात और पात नहीं,
भाषा की तकरार नहीं मज़हब की दीवार नहीं, इनकी नज़रों में एक हैं मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे,
बच्चे मन के सच्चे, सारे जग की आंख के तारे, ये वो नन्हें फूल हैं जो, भगवान को लगते प्यारे,
 उनके कई गीतों के केंद्र में बच्चे हैं। इससे पता लगता है कि उन्हें देश की आगामी पीढ़ी की कितनी चिंता थी। उनकी यह चिंता अनेक गीतों में बार - बार मुखरित हुई है। सन 1959 में बनी फिल्म दीदी के लिए लिखा गया यह गीत आंखें खोल देने वाला है। इसका केन्द्रीय भाव यह है कि बच्चे स्कूल की किताबों में तो कुछ और पढ़ते हैं मगर रोजमर्रा की जिंदगी में उन्हें कुछ और ही देखने को मिलता है। किताबों में लिखे आदर्श और आम जिंदगी के भोगे जा रहे यथार्थ के बीच का ये अंतर उन्हें भ्रमित करता है। उनके सवालों के जबाब न घर में मिलते हैं और न स्कूल में। एक अजब पाखण्ड का सामना बच्चा हर पल करता है। वह देखता है लोग कहते कुछ हैं और करते कुछ और हैं। इसी दुविधा में वह जीने लगता है और फिर कहीं से जबाब न पाकर अंततः वह भी उसी दोहरे व्यक्तित्व को अपना लेता है, जो हमारे समाज का हिस्सा है। इस मायने में साहिर की इस पहल का क्रांतिकारी महत्व है कि उन्होंने इस जड़ता को तोड़ने का जबरदस्त प्रयास किया। मेरा मानना है वस्तुतः छोटे - छोटे प्रश्न और उत्तरों वाला अध्यापक और बच्चों के बीच हुआ ये संवाद गीत हमारे शैक्षिक पाठ्यक्रम का हिस्सा होना चाहिए था। आइए इस संवाद गीत को पढ़कर आप खुद आकलन करें कि मेरा यह कहना कहाँ तक उचित है --
बच्चे - हमने सुना था एक है भारत, सब मुल्कों में नेक है भारत, लेकिन जब नजदीक से देखा, सोच समझ कर ठीक से देखा, हमने नक्शे और ही पाए, बदले हुए सब तौर ही पाए, एक से एक की बात जुदा है, धर्म जुदा है जात जुदा है,  आपने जो भी हमको पढ़ाया, वो तो कहीं भी नज़र न आया,
अध्यापक - मैंने जो भी तुमको पढ़ाया, उसमें कुछ भी झूठ नहीं,भाषा से भाषा न मिले तो, इसका मतलब फूट नहीं, एक डाली पर रहकर भी जब, फूल जुदा और पात जुदा, बुरा नहीं ग़र यूँँ ही वतन में, धर्म जुदा और जात जुदा,
बच्चे - वही है जब कुरआन का कहना, जो है वेद पुरान का कहना, फिर ये शोर शराबा क्यों है,? इतना खून खराबा क्यों है ?
अध्यापक - सदियों तक इस देश पे बच्चो, रही हुकूमत ग़ैरों की, आज तलक हम सबके मुँँह पर धूल है उनके पैरों की, लड़वाओ और राज करो, ये उन लोगों की हिक़मत थी, उन लोगों की चाल में आना, हम लोगों की ज़िल्लत थी,यह जो बैर है इक दूजे से, ये जो फूट औ रंजिश है, उन्हीं विदेशी आकाओं की सोची समझी बख़्शिश है,
बच्चे - ़कुछ इंसान ब्रह्मन क्यों हैं, कुछ इंसान हरिजन क्यों ? एक को इतनी इज़्जत क्यों है, एक को इतनी ज़िल्लत क्यों ?
अध्यापक - धन और ज्ञान को, ताकत वालों ने अपनी जागीर कहा, मेहनत और गुलामी को कमजोरों को तक़दीर कहा, इंसानों का ये बटवारा, वहशत और जहालत है, जो नफरत की शिक्षा दे, वह धर्म नहीं है लानत है, जनम से कोई नीच नहीं है, जनम से कोई महान नहीं, करम से बढ़कर किसी मनुज की कोई भी पहचान नहीं,
बच्चे-ऊँचे महल बनाने वाले, फ़ुटपाथों पर क्यों रहते हैं,दिन भर मेहनत करने वाले, फ़ाँक़ों का दुख क्यों सहते हैं ?
अध्यापक - खेतों और मिलों पर अब तक, धनवालों का इज़ारा है, हमको अपना देश है प्यारा, उन्हें मुनाफ़ा प्यारा है, उनके राज में बनती है, हर चीज तिजारत की खातिर, अपने राज में बना करेगी, ‘सब’की जरूरत की खातिर,
बच्चे - अब तो देश में आजादी है, अब क्यों जनता फरियादी है ? कब जाएगा दौर पुराना, कब आएगा नया ज़माना ?
अध्यापक - सदियों की भूख और बेकारी, क्या एक दिन में जाएगी, इस उजड़े गुलशन पर रौनक आते - आते आएगी, ये जो नए मंसूबे हैं, ये जो नई तामीरें हैं, आने वाले दौर की कुछ, धुंधली - धुंधंली तस्वीरें हैं, तुम ही रंग भरोगे इनमें तुम ही इन्हें चमकाओगे, नवयुग आप नहीं आएगा, नवयुग को तुम लाओगे,
वास्तव में देश के हर विद्यालय के शिक्षक की यही सोच होनी चाहिए जो कि हमारे देश के संविधान की आत्मा का मूल स्वर भी है। कितनी सरलता से इतने बड़े - बड़े सवालों के हल साहिर ने उन्हें बताए जिन्हें वास्तव में इनकी बेहद जरूरत है। माता पिता अज्ञानता के कारण और राजनेता निहित स्वार्थ के कारण बच्चों को इस हक़ीकत से रूबरू नहीं कराते या नहीं कराना चाहते। मगर ये हमारी इस नई पीढ़ी के साथ धोखा है, सही मायने में कहें तो यह देश के भविष्य के साथ धोखा है।
मगर साहिर ने अपनी सामथ्र्य भर हल बताने की कोशिश की। इसी फिल्म में बच्चों को संबोधित करते हुए एक अन्य महत्वपूर्ण गीत में वे जो बातें लिखते हैं वे ऐसी हैं जिनकी एक - एक पंक्ति पर किताब लिखी जा सकती है। यही कविता की खूबसूरती है और यही कविता की शक्ति भी।
 हमारा समाज मूलतः अतीतजीवी है। आज की हर समस्या का हल हम हमेशा बीते हुए कल में ढँ़ूढ़ने की कोशिश करते हैं। यही कारण है कि विज्ञान हमारे यहाँँ ज्यादा नहीं फल फूल सका। वे बड़ी - बड़ी बातें जिन्होंने देश की प्रगति के पाँवों में जंजीर डाल रखी है वास्तव में उतनी बड़ी नहीं हैं। अगर हम नई पीढ़ी को वास्तविकता से परिचित करा कर सही शिक्षा दे ंतो देश दिन दूनी रात चैगुनी गुनी तरक्की कर सकता है। मुझे लगता है कि देश के संविधान निर्माताओं ने जिस स्वप्न को देखते हुए उसे लिखा वह साहिर की रचनाओं में पूर्णतया प्रतिबिंबित हुआ है। गीत कुछ इस तरह से है -
बच्चो! तुम तक़दीर हो, कल के हिंदुस्तान की, बापू के वरदान की, नेहरू के अरमान की,
आज के टूटे खंड़हरों पर, तुम कल का देश बसाओगे,जो हम लोगों से न हुआ वो तुम करके दिखलाओगे,
तुम नन्हीं बुनियादें हो, दुनिया के नए विधान की, बच्चो! तुम तक़दीर हो, कल के हिंदुस्तान की,
जो सदियों के बाद मिली है, वो आजादी खोए ना, दीन धर्म के नाम पे कोई बीज फूट का बोए ना,
हर मज़हब से ऊँची है क़ीमत इंसानी जान की, बच्चो! तुम तक़दीर हो, कल के हिंदुस्तान की,
फिर कोई ‘जयचंद’न उभरे,फिर कोई ‘जाफ़र’न उठे, ग़ैरों का दिल खुश करने को अपनों पर खंज़र न उठे,
धन - दौलत के लालच में तौहीन न हो ईमान की, बच्चो! तुम तक़दीर हो, कल के हिंदुस्तान की,
बहुत दिनों तक इस दुनिया में, रीत रही है जंगों की, लड़ी हंै धनवालों की खातिर फौजें भूखे नंगों की,
कोई लुटेरा ले न सके अब कुर्बानी इंसान की, बच्चो! तुम तक़दीर हो, कल के हिंदुस्तान की,
नारी को इस देश ने देवी कहकर दासी माना है, जिसको कुछ अधिकार नहीं, वह घर की रानी माना है,
तुम ऐसा आदर मत लेना, आड़ जो हो अपमान की, बच्चो! तुम तक़दीर हो, कल के हिंदुस्तान की,
 उनके गीतों में बच्चों को लेकर यह चिंताएं लगातार मुखरित हुई हंै। प्रख्यात कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने भी बच्चों के बारे में चिंता जताते हुए उन्हें स्वस्थ माहौल देने की वकालत की है। साहिर के एक अन्य गीत में एक अध्यापक के मन की भावना कुछ ऐसे व्यक्त हुई है कि अपनी सीमाओं में रहते हुए वह श्रेष्ठ नागरिकों के निर्माण की जिम्मेदारी को कैसे निभाए। बच्चों को समाज की संकीर्ण सोच से बचाते हुए उनकी कोमल कल्पनाओं की उड़ान को सकारात्मक सोच के पंख कैसे मिलें। उनकी सोच का दायरा कैसे विस्तृत हो। यह कोशिश लगातार उनके गीतों में दिखती है। गुरुदीक्षा के रूप में उनकी ये पंक्तियाँ सारे शिक्षक और अभिभावक समाज के लिए अनुकरणीय हैं -
भारत माँ की आँख के तारो नन्हें मुन्ने राजदुलारो, जैसे मैंने तुमको सँवारा, वैसे ही तुम देश सँवारो,
ये जो है छोटा सा बस्ता, इल्म के फूलों का गुलदस्ता, कृष्ण हैं इसमें राम हैं इसमें, बुध मत और इस्लाम है इसमें,
ये बस्ता ईसा की कहानी, ये बस्ता नानक की वानी, इसमें छुपी है हर सच्चाई, अपना सुख औरों की भलाई,
इस बस्ते को शीश नवाओ, इस बस्ते पर तन - मन वारो,
छोड़ के झूठी जातें-पातें, सबसे सीखो अच्छी बातंें, जग मे किसी को ग़ैर न समझो, अपना किसी से बैर न समझो,
आप पढ़ो औरों को पढ़ाओ, घर घर ज्ञान की ज्योति जलाओ, नव जीवन की आस तुम्हीं हो, बनता हुआ इतिहास तुम्हीं हों,
जितना गहरा अँधियारा हो, उतने ऊँचे दीप उभारो,
ये संसार जो हमने सजाया, ये संसार जो तुमने पाया, इस संसार में झूठ बहुत है, जुल्म बहुत है लूट बहुत है,
ज़ुल्म के आगे सिर न झुकाना, हर एक झूठ से टकरा जाना, इस संसार का रंग बदलना,ऊँच और नीच का ढंग बदलना,
सारा जग है देश तुम्हारा ,सारे जग का रूप निखारो,
आज आतंक और ज़ुल्म से विश्व मानवता कराह रही है। इसके लिए भारत की विश्व बंधुत्व वाली इस सोच को सामने लाती साहिर की नई पीढ़ी के लिए लिखी गईं उपरोक्त पंक्तियाँ किसी धरोहर से कम नहीं हंै।
 किसी भी रचनाकार की रचना खासोआम में तब मकबूल होती है जब उन्हें लगे - ‘अरे यही तो मैं कहना चाह रहा था।’ इसके लिए रचनाकार को जिसके लिए वह लिख रहा है उसके अंतर्मन में प्रवेश कर उसी की तरह सोचना पडता है। अब जरा आप इस गीत को देखिए जिसमें नन्हें बच्चे देश में अपनी सरकार बनाने का सपना देखते हैं। उसमें उनकी सोच में रचनाकार अपने सपने जोड़कर कैसा सपना देखता है। आप भी देखें और महसूस करें -
बड़ों का राज तो सदियों से है जमाने में, कभी हुआ नहीं दुनिया में राज छोटों का,अगर हमें भी मिले इखित्यार अय लोगों,तो हम दिखाएं तुम्हें काम काज छोटों का,
मुल्क में बच्चों की ग़र सरकार हो, जिंदगी एक जश्न एक त्योहार हो,
हुक्म दें ऐसे कैलेंडर के लिए, जिसमें दो दिन बाद इक इतवार हो,
सबको दें स्कूल जैसा यूनिफार्म ,एक सी हो पैंट हर शलवार हो,
हाॅस्टल तामीर हों सबके लिए,कोई भी इंसां न बेघर वार हो,
राष्ट्र भाषा हम इशारों को बनाएं, दक्खिन उत्तर में न फिर तकरार हो,
हम मिनिस्टर हों तो वो सिस्टम बनें, जिसमें मुफलिस हो न साहूकार हो,
कौमी दौलत से खजाने हों भरे, ले ले उससे जिसको जो दरकार हो,
ईद दीवाली सभी मिल के मनाएं, आदमी को आदमी से प्यार हो,
मुल्क में बच्चों की ग़र सरकार हो,
राष्ट्रभाषा की लाइलाज समस्या का कितना खूबसूरत और सार्थक हल सुझाया है उन्होंने। कभी मुंशी प्रेमचंद ने भी इसके लिए सुझाव देते हुए कहा था। अरब के मूर्ख सिपाहियों और हिंदुस्तान के ग्रामीण बाशिंदों के आपसी बोलचाल के मेल से जब इतनी खूबसूरत भाषा उर्दू का जन्म हुआ है तो सभी भारतीय भाषाओं के मेल से बहुत प्यारी भाषा बनेगी।
साहिर की रचनाओं की विषयवस्तु के बच्चे वे जन सामान्य तो थे ही मगर सामाजिक विषमता के शिकार असामान्य परिस्थितियों में पल रहे वे बच्चे भी रहे जो सड़कों पर पल रहे थे।
इन उजले महलों के तले,हम गंदी गलियों में पले,सौ सौ बोझे मन पे लिए,मैल और माटी तन पर लिए,
दुख सहते ग़म खाते रहे, फिर भी हँसते गाते रहे, हम दीपक तूफाँ में जले... दुनिया ने ठुकराया हमें, रस्तों ने अपनाया हमें, सड़कें माँ सड़कें ही पिता, सड़कें घर सड़कें ही चिता, क्यों आए क्या करके चले... दिल में खटका कुछ भी नहीं, हमको परवा कुछ भी नहीं, चाहो तो नाकारा कहो,चाहो तो आवारा कहो, हम ही बुरे तुम सब हो भले..
उनके कई गीत इन बच्चों पर केंद्रित हैं। मगर यहाँ यह बात देखने योग्य है कि उनकी कलम ने उन्हें कहीं हेय नहीं बनाया, बल्कि उनके उल्लास उनके बेफिक्रेपन खिलंदड़े अंदाज़ को ही उभारा क्योंकि उनका स्पष्ट मत था कि अपनी इस स्थिति के लिए वे कतई जिम्मेदार नहीं हैं। इसके लिए सामाजिक परिस्थितियों की जिम्मेदारी है।
परिस्थितियाँ जब नहीं बदलनी हैं समाज के सारे कारोबार निहित स्वार्थी तत्वों के कारण ऐसे ही चलने हैं तो फिर हम भी इसकी चिंता में दुबले क्यों हों । ‘कोउ नृप होय हमैं का हानी, चेरी छोड़ न हुइहंय रानी’ की जब स्थिति रहनी है तो फिर वे कर ही क्या सकते हैं। फिल्म धूल का फूल का गीत लिखते समय साहिर ने लिखा है -
अपनी खातिर जीना है अपनी खातिर मरना है, होने दो जो होता है अपने को क्या करना है,
जिनको जग की चिंता है वे जग का दुख झेलेंगे, हम सड़कों पर नाचेंगे फुटपाथों पर खेलेंगे,
उनको आहें भरने दो जिनको आहें भरना है...
प्यार की शिक्षा मागी तो लोगों ने दुदकार दिया, आखिर हमने दुनिया को बूट की नोक से मार दिया,
यूँ ही उमर गुजरनी थी यूँ ही उमर है,
अपने जैसे बेफिकरे और नहीं इस बस्ती में ,दुनिया  ग़म में डूबी है, हम डूबे हैं मस्ती में,
जीना है तो जीना है मरना है तो मरना है
 मनोवैज्ञानिकों का कहना हैं कि व्यक्ति सारे जीवन में जो सीखता है उसका आधार सात साल की उमर तक रख जाता हैं बाकी आजीवन उसमें कोई मूलभूत बदलाव नहीं होता। उस समय उसे जैसी शिक्षा माहौल और ज्ञान मिलता है, बाकी का सारा जीवन उस पर ही आधारित होता है।इसी कारण पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली में प्राथमिक शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता है। दुर्भाग्य से हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा ही सर्वाधिक उपेक्षित है। देश की नई पीढ़ी के लिए उस समय रवींद्रनाथ टैगोर ने प्रकृतिवादी शिक्षा और महात्मा गांधी ने बुनियादी शिक्षा के विचार दिए। मगर साहिर ने व्यवहारिक जीवन में पगी ऐसी सूक्तियां दीं जिनका सार्वकालिक महत्व है। वर्ष 1964 में ‘चाँदी की दीवर’ फिल्म  के लिए गीत लिखते समय उन्होंने ऐसी बारहखड़ी लिख दी जिसका इस बहुधर्मी बहुभाषी देश के लिए क्या महत्व है इसका अंदाज़ा आप स्वयं इसे पढ़कर लगा सकते हैं -
‘क’ से कुल दुनियां हमारी जिसमें भारत देश है, ‘ख’ से खेती जिसमें जीवन दान का संदेश है,
‘ग’ से गंगा जिसमें पहले आर्य उतरे थे जहाँ,‘घ’से घर की आबरू रक्षक हैं जिसके नौजवाँ,
‘च’ से राजा चंद्रगुप्त और ‘छ’ से उसका छत्र है, देश के इतिहास का वो युग सुनहरा पत्र है,
‘ज’ जलालुद्दीन अकबर जिसने सौ कीले किए, हिंदू मुस्लिम नस्ल और मजहब मिलाने के लिए,
‘झ’ से है झाँसी की रानी, ‘ट’ से टीपू सूरमा, जिनके जीते जी न सिक्का चल सका अंग्रेज का,
‘ठ’ से वो ठाकुर जिसे टैगोर कहता है जहाँ,विश्व भर में उसकी रचनाओं से है भारत का मान,
‘ड’ से डल कश्मीर की जो हर नज़्ार का नूर है, ‘ढ’ से ढाका जिसकी मलमल आज तक मशहूर है,
‘त’ है ताज़ आगरे का इक अछूता शाहकार, शाहजहाँ की लाड़ली मुमताज़ बेगम का मज़ार,
‘द’ से दिल्ली दिल वतन का ‘ध’ से धड़कन प्यार की,‘न’ से नेहरू जिसपे हैं नज़रें लगीं संसार की,
‘प’ से उसका पंचशील और फ’ से उसका सुर्ख फूल,‘ब’ से बापू जिसको प्यारे थे अहिंसा के असूल,
‘भ’ भगतसिंह जिसने ललकारा विदेशी राज़ को, चढ़ के फाँसी पर बचाया अपनी माँ की लाज को,
‘म’ से वो मजदूर जिसका दौर अब आने को है, ‘य’ से युग सरमायादारी का जो मिट जाने को है,
‘र’ से रस्ता प्यार का, ‘ल’ से लगन इंसाफ की, ‘व’ से ऐसा वायुमंडल, जिससे बरसे शान्ती,
‘श’ से शाहों का जमाना ‘स’ से समझो जा चुका, ‘ह’ से हम सब एक से हों वक्त ये समझा चुका,
‘क’ से कुल दुनियां हमारी जिसमें भारत देश है, ‘ख’ से खेती जिसमें जीवन दान का संदेश है,
साहिर की नजरों में कैसा बच्चा भविष्य के भारत का सही प्रतिनिधित्व कर सकता है। इसे उन्होंने ‘धूल का फूल फिल्म का गीत लिखते समय स्पष्ट कर दिया। हम लोग पढ़ लिख कर भी जब बचकानी हरकतें करते हैं तो हँसी आती है। इस गीत में वे देश की नई पीढ़ी को जो संदेश देते हैं। वह वही भारतीय संस्कृति का ‘वसुधैव कुटुंबकम का’ सर्वे भवंतु सुखिनः का उदारवादी स्वर है जिसको लेकर हम गर्वित होते हैं। जो वक्त की धुंध से धंुधला गया हैं। जरूरत है आज इस स्वर को ऊँचा करने की, वक्त के दर्पण पर जमी अनावश्यक धूल हटाने की। लीजिए प़िढ़ए इस गीत को और आकलन करिए कि क्या सही है और क्या गलत  -
तू हिंदू बनेगा, न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा,
अच्छा है अभी तक तेरा कुछ नाम नहीं है, तुझको किसी मजहब से कोई काम नहीं है,
जिस इल्म ने इंसान को तक्सीम किया है, उस इल्म का तुझ पर कोई इल्जाम नहीं है,
तू बदले हुए वक्त की पहचान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा,
मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया, हमने उसे हिंदू या मुसलमान बनाया,
कुदरत ने तो बख्शी थी हमें एक ही धरती, हमने कहीं भारत कहीं ईरान बनाया,
जो तोड़ दे हर बंध वो तूफान बनेगा,
नफरत जो सिखाए वो धरम तेरा नहीं है, इंसां को जो रौंदे वो कदम तेरा नहीं है,
कुरआन न हो जिसमें वो मंदिर नहीं तेरा, गीता न हो जिसमंे वो हरम तेरा नहीं,
तू अमन का और सुलह का अरमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा
ये दीन के ताज़र ये वतन बेचने वाले, इंसानों की लाशों के कफन बेचने वाले,
ये महलों में बैठे हुए कातिल ये लुटेरे,काँटों की ऐवज रूहे चमन बेचने वाले,
तू इनके लिए मौत का ऐलान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा

अंत में यही कहना चाहूँगा कि साहिर भारतीय आत्मा के स्वर थे। हमारी मनीषा हमारी पहचान से हमें परिचित कराने वाले साहित्यकार थे। भले ही जमाने ने उनका विभिन्न कारणों से सही मूल्यांकन न किया हो। मगर वे भारत के ही नहीं विश्व मानवता की अनमोल धरोहर थे। जीवन को उन्होंने इतने आयामों अंदाजों से देखा और लिखा कि हमें कहना ही पडता है कि वे हर एक पल के शायर थे।