Friday, 27 September 2013

हादसे ही हादसे हैं इन दिनों,
फासले दर फासले हैं इन दिनों,
बेवफा थे दोस्त कोई ग़म न था,
हमको खुद से ही गिले हैं इन दिनों,
लोग हमको न यूँ बुरा कहते,
आपके सुर में सुर मिला देते,
दो घड़ी के सुकून की खातिर,
रूह के ग़म अगर भुला देते,

जिनके बल पर मानवता, है जीवित अब भी,
जिनका इष्ट नहीं मन्दिर में, पीड़ित अब भी,
जिनका जीवन खुली हुई पावन गीता है,
जिनका जीवन पर दुख कातर विलगित अब भी,

ऐसे कर्मयोगियों का, सम्मान करे हम,
उनके ही आचरणों का अनुसरण करें हम,
जिसने मुझे सुकून दिलाया तमाम उम्र,
शायद वो था रक़ीब मेरा चारागर न था,

घटना रहा वजूद न अफसाना कि मुझमें,
खुद्दारियों का खून करे, वो हुनर न था,
अपने अन्दर जरा झाँक मेरे वतन,
अपने ऐबों को मत ढ़ाँक मेरे वतन,...

रंग औ नस्ल के दायरे से निकल,
गिर चुका है बहुत देर,अब तो सँभल,

तेरे दिल से जो नफरत न मिट पाएगी,
तेरे घर फिर गुलामी पलट आएगी,

अपनी बरबादियों का तुझे वास्ता,
ढ़ूँढ़ अपने लिए अब नया रास्ता,

अपने अन्दर जरा झाँक मेरे वतन,
अपने ऐबों को मत ढ़ाँक मेरे वतन,
प्यार गुनाह नहीं प्यार एक पूजा है,
जिसमें मंज़िल पता नहीं होती,
वो जवानी भी एक तोहमत है,
जिसमें कोई ख़ता नहीं होती,

सावन की फुहारें ठण्डी हों, या सर्द हवाओं का मौसम,
कोई तो कहे क्यों ऐसे में, जलता है बदन मालूम नहीं,

ठुकरा के जमाने की खुशियाँ,आए थे तेरी इस महफिल में,
नादान था दिल दुनियाँ की जिसे,रस्मों का चलन मालूम नहीँ,


कुछ ऐसी बहारें आईं हैं, बदली है फ़िजा इस गुलशन की,
दुनियाँ में खुशी छाई है पर, दिल को है वहम मालूम नहीं,


उम्मीद से भी आगे बढ़कर, कुछ ख्वाब सजाए बैठे हम,
भटके जो कदम टूटा जो भरम,होंगे कहाँ हम मालूम नहीं,

सूनी है नज़र रस्ता वीराँ, मंज़िल के पते का इल्म नहीं,
बढ़ते हैं कदम आगे-आगे, कैसी है लगन मालूम नहीं,
प्यार चाहते यारो, खार और गुल दोनों,
एक का चयन करना, ये चलन पुराना है,

आप क्यों ख़फा हमतो हैं अलग जमाने से,
तुमने ये सुना होगा, बेवफा जमाना है,

हमतो कब से गाते हैं,तुम भी यार कुछ बोलो,
साज़ दिल का छेड़ो तो, जिन्दगी तराना है,
मेरे घर आयी एक नन्ही परी
चाँदनी के हसीन रथ पे सवार

उसकी बातों में शहद जैसी मिठास,
उसकी सांसों में इतर की महकार,
होंठ जैसे कि भीगे-भीगे गुलाब,
गाल जैसे कि दहके-दहके अनार,

मेरे घर आयी एक नन्ही परी
चाँदनी के हसीन रथ पे सवार

उस के आने से मेरे आँगन में
खिल उठे फूल, गुनगुनायी बहार
देख कर उस को जी नहीं भरता
चाहे देखूँ उसे हजार बार

मेरे घर आयी एक नन्ही परी
चाँदनी के हसीन रथ पे सवार

मैंने पूछा उसे के कौन हैं तू
हँस के बोली के मैं हूँ तेरा प्यार
मैं तेरे दिल में थी हमेशा से
घर में आयी हूँ, आज पहली बार

मेरे घर आयी एक नन्ही परी
चाँदनी के हसीन रथ पे सवार

(साहिर)
रूप की अर्चना प्रेम की वंदना संग की कल्पना, कौन करता नहीं,
रीत हो गीत हो कोई भी जीत हो,प्रीत बिन मन का ये मौन भरता नहीं,

गुनगुनाओ जो तुम साथ मेरे अगर, राह की मुश्किलें ही सहारा बनें,
बीच मझधार में एक तिनका बनें, फिर हों कश्ती वही फिर किनारा बनें,

आज दो दर्द की भावना मुझको तुम, कल के ख्वाबों की मैं रोशनी तुमको दूँ,
प्यार की अनवरत साधना दो मुझे, आज मैं प्यार की सादगी तुमको दूँ,

हो गई जब जमा मन में पीड़ा अधिक, कण्ठ से खुद ब खुद गीत-गंगा बही,
कौन परिचित नहीं निर्झरी शक्ति से, तो़ड़ जो पत्थरों का कलेजा रही

उम्र के लम्बे पथ में सहारा बनें ,छाँव दें जो तुझे वृक्ष वे रोप दूँ,
तुझको जीवन मिले खूब फूले - फलें हो ये सच मैं तुझे जिन्दगी सौंप दूँ,
दे चीर के रख ज़ुल्म का सीना, ये कर अहद,
इंसाफ को कुचले जो, वो मेरा कदम न हो,

इंसानियत हो धर्म और मज़हब हो प्रेम का,
संसार से छोटा कोई मेरा वतन न हो,

इस आँच में जलता रहूँ ताउम्र कर कबूल,
ये दुआ दिल से प्यार की वह आग कम न हो,

जिस पर निगाह उट्ठे तेरी ग़ैर की होकर,
दाता वो और कुछ हो,मेरी अंजुमन न हो,

आईने से बिगड़ के बैठ गए,
जिनकी सूरत जिन्हें दिखाई गई,

जिन्दगी का नसीब क्या कहिए, 
एक सीता थी जो सताई गई,

घर के बाहर लगाया पेड़,एक पिलखन का,
काम अच्छा हुआ ये आज, हमारे मन का,

छाया देगा घनी, बाहर से जब घर आएँगे,
सोच में दिन है वो, सच में बड़ा सुख पाएँगे,

हम रहेंगे नहीं, पर जब तलक ये वृक्ष जिया,
कहेगा पथिक से, हमने धरा से प्यार किया,
फिज़ा में रंग कुछ घुला सा है,
मौसमे-गुल खिला-खिला सा है,
धरती अम्बर वो मिल रहे देखो,
आपका कहिए फैसला क्या है ?
जहाँ पर आपका आभाष होगा,
वहाँ पतझार भी मधुमास होगा,

जहाँ होगी कहीं वैभव की चर्चा,
कटे हाथों का भी इतिहास होगा,

यूँ ही होता नहीं लहरों में कम्पन,
कोई प्यासा नदी के पास होगा,

जो हम लड़ते रहे भाषा को लेकर,
कोई ग़ालिब न तुलसीदास होगा,

(अंसार कम्बरी)
बहुत ही तल्ख है मेरी जुबान ये सच है,
मैं साफ गो हूँ बहुत मेहरवान ये सच है,

भरम भले हो कि धरती से मिल रहा है गले,
झुका नहीं है कहीं आसमान, ये सच है,

जोश था, पंख थे, मौसम भी ठीक था लेकिन,
ख्वाब ही रह गई मेरी उड़ान, ये सच है,

(संजय मासूम)
जाने किस दिन लालकिला मर्दानी भाषा बोलेगा,
....................................................................

सैतालिस को ए के सैतालिस से डरते देखा है,
संविधान को नेता के घर पालिश करते देखा है,

खुद्दारों को गद्दारों का पानी भरते देखा है,
सिन्दूरों को तन्दूरों में जलकर मरते देखा है,

दण्डनीति का नायक कब कटखानी भाषा बोलेगा,
जाने किस दिन लालकिला मर्दानी भाषा बोलेगा,

हमको पता न था सूरज बचकानी भाषा बोलेगा।

(संकलित)

Monday, 16 September 2013

बच्चे हैं मन के सच्चे,
हि्म्मत के मतवाले है,
वक्त आए तो फिर हम भी,
आफत के परकाले है
शहर आपका या कूड़ाघर,
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बुरा लगा सुनकर,
तो फिर क्यों-
खाकर पान थूक देते हो,
सिगरेट पीकर उसके टोटे,
बीड़ी पीकर उसके टुकड़े,
केले खाकर छिलके सारे,
टॉफी खाकर उसका रैपर,
किसी हाल में कभी कहीं भी,
जानबूझकर नासमझी में,
फेंक देश में कूड़ा भरते,
माँ का आँचल मैला करते,


यही देश की क्या भक्ती है,
नहीं रही हममें शक्ती है,
जो हम थोड़ी मेहनत करके,
ये कू़ड़ेदानों में डालें,
जो ऐसा करते हैं अक्सर,
उनको रोके उन्हे सुधारें,


घर के सब कमरों को झारा,
दरवाजे पर कूड़ा सारा,
अपने दरवाजे को झारा,
बीच सड़क पर कूड़ा सारा,
जमा कहीं भी कूड़ा पाया,
आग लगाकर उसे जलाया,
करके वातावरण विषैला,
उसको भी गन्दा कर डाला,


चाहे जानवर या पशु- पक्षी,
कितनी साफ -सफाई रखते,
पढ़े-लिखे होकर भी हम सब,
हर पल कितना गन्दा करते,
ध्यान नहीं देते हैं हम सब,
कहता है कोई बूढ़ा ग़र,
देखेगा जो बोलेगा ही,
शहर आपका या कूड़ाघर,
शहर आपका या मूत्रालय
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सुनकर चौंके,बुरा लगा क्या,
मैं कब कहता,ये दिखता है,

जो देखे ,वह ही कहता है,
कहीं कोई भी कोना लेकर,

मूत्र विसर्जित करने लगता,
गधे के पूत यहाँ मत मूतो,

दीवारों पर लिक्खा दिखता,
कहीं न कोई जगह बनाई,

जहाँ कहीं हम हल्के होकर,
जल्दी से बाहर आ जाएं,

पुरुष और महिलाएं सारे,
बड़ी परेशानी में होते,

कई जगह पर जगह नहीं है,
इसीलिए वो बैठ खड़े हो,

ये सब कुछ करने लगते हैं,
अगर कहीं मूत्रालय है भी,

तो वह इतना गन्दा होता,
हम सब उसके बाहर से ही,

होकर खड़े शुरू हो जाते,
ये सब कुछ कितना भद्दा है,

देख बड़ी ही घिन आती है,
पर हम सब इसके आदी हैं,

लेकिन भारत घूम रहा जो,
पहली बार शहर में आया,

देखेगा तो बोलेगा ही --
शहर आपका या मूत्रालय
झेलम का पानी लाल हो रहा कहता है,
मानो अब भृकुटि तिरीछी होने वाली है,
करके प्रयास अंतिम क्षण तक समझाने का,
वंशी कोई अंगार उगलने वाली है,

इसलिए समय की गति को जानो-पहचानो,
यह नहीं हमारा प्रश्न,वरन है इस युग का,
यमुना के जल को जहरीला करने वालो,
बालक के होंगे पैर और सिर वासुकि का,
वक्त मुश्किल है,कुछ सरल बनिए,
प्यास पथरा गई तरल बनिए,
जिसको पीने से कृण्ण मिलता हो,
आप मीरा का वह गरल बनिए,

(रमानाथ अवस्थी)
घायलों की पीड़ितों की,गूँज है वातावरण में,
एक मंदिर सा बना रणक्षेत्र,मैं इसका पुजारी,
क्रन्दनों कोलाहलों के बीच,यह आवाज भी है,
अलग सबसे प्रबल सबसे,मर्मभेदी और भारी,

(दुष्यन्त कुमार)
आओ हम जन मन गण गाएँ,
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आओ हम जन मन गण गाएँ,
लोकतंत्र का जश्न मनाएँ,

संत मौलवी दुष्कर्मी हैं,
प्रवचन सुनने किससे जाएँ,

आओ हम जन मन गण गाएँ,
लोकतंत्र का जश्न मनाएँ,

भक्षक फिरें निरंकुश, डोलें,
रक्षक पिटते, जान बचाएँ,

आओ हम जन मन गण गाएँ,
लोकतंत्र का जश्न मनाएँ,

अपराधी जब जन नेता हों,
न्याय भला फिर किससे पाएँ,

आओ हम जन मन गण गाए,
लोकतंत्र का जश्न मनाएँ,

सीमाएँ हर रोज सिमटतीं,
खबर पढ़ें,अफसोस जताएँ,
मैं वो परवाना नहीं, जो लौ में तेरी जल मरे,
तू वो शम्मा ही नहीं जो दिल मेरा रोशन करे,
भेद से आगे खड़े और फर्क से अनजान हैं,
प्यार है मज़हब हमारा,हम फ़कत इंसान हैं,
(संकलित)
मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया,
हमने उसे हिन्दू औ मुसलमान बनाया,
कुदरत ने तो बक्शी थी हमें एक ही धरती,
हमने कही भारत कहीं ईरान बनाया,

अच्छा है अभी तक तेरा कुछ नाम नहीं है,
तुझको किसी मज़हब से कोई काम नहीं है,
जिस इल्म ने इंसान को तक़्सीम किया है,
उस इल्म का तुझपे कोई इल्ज़ाम नहीं है,

तू बदले हुए वक्त की पहचान बनेगा,
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा,
(साहिर)
अब नहीं हम चुप रहेंगे
.............................
कब तलक हम,
वक्त की रफ्तार का देखें तमाशा,
कब तलक हम शान्त हो दें,
मन अभागे को दिलासा,
आग का दरिया चुनौती दे रहा,
हमको मुकाबिल,
आज अपनी अर्चना का हार,
बाजी पर लगा है,

अब नहीं हम चुप रहेंगे

प्रश्न इसका है नहीं,
हम आज हारें या कि जीतें,
प्रश्न इसका भी नहीं,
हम मान पाने को झगड़ लें,
प्रश्न है इंसानियत की बलि चढ़े, 
हम मूक बैठे,
आज अपनी चेतना का ज्वार, 
बाजी पर लगा है,
अब नहीं हम चुप रहेंगे,

चाल अब चलने न देंगे हम,
कुटिल दुशासनों को, 
दाँव में शकुनी हमारे,
पाँव के नीचे पड़ेगे,
क्योंकि छल की नीति ने,
अबतक हमें नीचा दिखाया,
चूक कर अवसर,
पुराना पाठ क्यों  दोहराएँगे हम,
 अब नहीं हम चुप रहेंगे,

इसलिए ले आज,
अंतश्चेतना से शक्ति सारी,
वक्त ने है जो उछाला,
प्रश्न वह बढ़ कर लपक लें,
दें दिखा सामर्थ्य,
बढ़ आगे उसे अब छीन ही लें,
भीख में अधिकार ले,
कैसे भला हम जी सकेंगे,
सोचने को वक्त काफी दे चुके हैं,
किन्तु अब तो,
आज अपनी साधना का सार,
बाजी पर लगा है,

अब नहीं हम चुप रहेंगे,
अब न हम चुप रह सकेंगे..



खूब नारे उछाले गए,
लोग बातों में टाले गए,

जो अंधेरों में पाले गए,
दूर तक वो उजाले गए,

जिसने ज्यादा उ़ड़ाने भरीं,
उसके पर नोच डाले गए,

पाँव जितने चले उनसे भी,
दूर पांवों के छाले गए,

जिनसे घर में उजाले हुए,
वे ही घर से निकाले गए,

जिनके मन में कोई चोर था,
वो नियम से शिवाले गए,

इक जरा सी मुलाकात के,
कितने मतलब निकाले गए,

कौन साजिश में शामिल हुए,
किनके घर के निवाले गए,

अब ये ताजा अंधेरे जिय़ो,
कल के बासी उजाले गए,

(लक्ष्मीशंकर वाजपेयी)
चाक-दिल और भी हैं,चाक-क़बा और भी हैं,
एक हम ही नही दुनिया से ख़फा और भी है,

क्या हुआ ग़र मेरे यारों की जुबानें चुप हैं,
मेरे शाहिद मेरे यारों के सिवा और भी हैं,
नहीं है कोई जो मुझसे ये कहता,
धड़कता दिल है इसमें ग़म नहीं है,
उदासी बन गई मेरा मुकद्दर,
मोहब्बत दिल में अबतक कम नहीं है,

जाग तुझको दूर जाना
बाँध लेंगे क्या तुझे ये मोम के बंधन सजीले,
पन्थ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले,
विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुन-गुन,
क्या डुबो देगें तुझे ये फूल के दल ओस गीले,
तू न अपनी छाँव को अपने लिए कारा बनाना,
जाग तुझको दूर जाना

किसका खयाल कौन सी मंज़िल नज़र में है,
सदियाँ गुजर गईं हैं , ज़माना सफर में है,

सोचा था तुझसे दूर निकल जाएंगे कहीं,
देखा तो हर मक़ाम तेरी रहगुजर में है,

(जिगर मुरादाबादी)
बहुत कुछ सहना पड़ता है,
और चुप रहना पड़ता है,
न कहें तो हम मर जाएं,
इसलिए कहना प़ड़ता है



पोंछकर अश्क अपनी आँखों से,
मुस्कराओ तो कोई बात बने,

सर झुकाने से कुछ नहीं होगा,
सर उठाओ तो कोई बात बनें,

जिन्दगी भीख में नहीं मिलती,
जिन्दगी बढ़ के छीनी जाती है,

अपना हक़ संगदिल ज़माने से,
छीन पाओ तो कोई बात बने,

रंग और नस्ल जात और मज़हब,
जो भी है आदमी से कमतर है,

इस हक़ीकत को तुम भी मेरी तरह,
मान जाओ तो कोई बात बने,

नफरतों के जहान में हमको,
प्यार की बस्तियां बसानी है,

दूर रहना कोई कमाल नहीं,
पास आओ तो कोई बात बने,

(साहिर)
फिर विचारों पर सियासी रंग गहराने लगे,
फिर छतों पर लाल पीले झंडे लहराने लगे,

आज अपनी ही गली से गुजरते में डर लगा,
आज अपने ही शहर के लोग अन्जाने लगे,

जान पाए तब ही, कोई पास में मारा गया,
जब पुलिसवाले उठाकर लाश ले जाने लगे,

हो गई वीरान सड़कें और कर्फ्यू लग गया,
फिर शहर के आसमाँ पर गिद्ध मँड़राने लगे,

रंग पहले इश्तहारों के अभी उतरे नहीं,
फिर फ़सीलों पर नए नारे लिखे जाने लगे,

अन्त में खामोश होकर रह गए अख़बार भी,
साजिशों में रहबरों के नाम जब आने लगे,

(संकलित)

Sunday, 15 September 2013

लेडीज एण्ड जेन्टिल मैन,
इण्डिया हमारी कन्ट्री है,
और हम हैं इण्डिया के सिटीजन,
इसलिए हिन्दी बोलना हमारी ड्यूटी है,
पर बेचारी हिन्दी की किस्मत फूटी है,
आज कल की यंग जेनरेशन,
दैन एवर माउथ खोलती है,
ओनली एण्ड ओनली इंग्लिश बोलती है,
तब हमारा सिर शेम से झुक जाता है,
और हार्ट डीप वेदना से भर जाता है,
ये सब वेरी रांग है,
इन रीयल्टी देशद्रोह है, ढ़ोंग है,
हमें अपनी डेली लाइफ में,
हिन्दी लैंग्वैज को लाना है,
दैन एण्ड दैन ओनली मेरे ,
और भारतमाता के ड्रीम्स होंगे सच,
थैंक्यू वेरी मच
सोचो आखिर कब सोचोगे
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टीपू के अरमान जले हैं
बापू के अहसान जले हैं

गीता और कुरान जले हैं
हद ये है इंसान जले हैं

हर तीरथ स्थान जलेगा
सारा हिंदुस्तान जलेगा

तब सोचोगे

सोचो आखिर कब सोचोगे

(डा.नवाज देवबंदी )
आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है,
पत्थरों में चीख हरगिज़ कारगर होती नहीं,
सिर्फ शायर देखता है,कहकहों की असलियत,
हर किसी के पास तो ऐसी नज़र होती नहीं,

(दुष्यन्त कुमार)
निज अरमानों का घोंट गला मत तू ऐसे,
चलता जा आगे बढ़ता जा आँधी जैसे,
आँधी में भी चल, चलती जैसे गोली है,
चलना जीवन रुकना है मौत,
ये दीवानों की बोली है,
यहाँ सिर्फ वह आदमी देश के करीब है,
जो या तो मूर्ख है या गरीब है,

-धूमिल
मन करता है फूल चढ़ा दूँ,लोकतन्त्र की अर्थी पर,
भारत के बेटे निर्वासित हैं अपनी ही धरती पर,

राजमहल को शरम नहीं है,घायल होती थाती पर,
भारत मुर्दाबाद लिखा है, श्रीनगर की छाती पर,

सेना को आदेश थमा दो,घाटी ग़ैर नहीं होगी,
जहाँ तिरंगा नहीं मिलेगा,उनकी खैर नहीं होगी,..

(डा हरिओम पवार)
मुझे मिल गया बहाना तेरी दीद का,
कैसी खुशी ले के आया चाँद ईद का,

जुल्फ़ मचल के खुल-खुल जाए,
चाल में मस्ती घुल-घुल जाए,
ऐसी खुशी आज मिली,
आँखों में नाम नहीं नींद का,...

जागती आँखें ढ़ूढ़ती हैं सपने,
तुझ बिन आके पहलू में अपने,
दिल को मिली ऐसी खुशी,
आँखों में नाम नहीं नींद का,...

रोते ही तेरे चटकी हैं कलियाँ,
दिलवर बनके धड़की हैं कलियाँ,
ऐसी कटी रात मेरी,
आँखों में नाम नहीं नींद का,...

(साहिर)
ईद मुबारक

अय दोस्तो, मुबारक त्योहार ये मिलन का,
चंदा की झलक बायस होती है इस जशन का,

है उससे इश्क कितना, पूछे है ये महीना,
सच में कहूँ तो ये है इक रिश्ता जानो-तन का,

वैसे तो हजारों गुल गुलजार इस चमन में,
भाते बहार को बस कुछ फूल ही गुलशन के,

आबाद रहे ये दिल, आबाद रहे बस्ती,
नेमत जहाँ है उसकी चारो तरफ बरसती,

छुट जाए रंगे-महफिल,थम जाए नब्जे-हस्ती,
मत छोड़ना वो दामन, मस्ती जहाँ है बसती,

सब ओर अमन और चैन की दुनिया बनी रहे,
पैग़ाम यही ईद का, लोगों से दिल कहे,
क़ौम इन पर गुमान करती है,
जिन्दगी एहतराम करती है,
वक्त ढ़ोता शहीद की अर्थी,
मौत झुककर सलाम करती है,


सारा आलम मुरीद होता है,
वक्त खुद चश्मदीद होता है,
मौत पेशानी चूम लेती है,
जब सिपाही शहीद होता है,

(आत्मप्रकाश शुक्ल)

इस मातृभूमि के कण-कण का,
उपकार है अपने जीवन पर,
यदि इसका कर्ज न चुका सके,
तो धिक्कार है अपने जीवन पर,
है याद बड़ी बेरहम यार,बिन कुछ बतलाए आती है,
ये नर्म हवा और मस्त फ़िजा का मज़ा सजा कर जाती है,
जब विषधर फन फैलाता है,
अनुनय कुछ काम न आता है,
जो निर्भय हाथ बढ़ाते हैं,
मणि वही खींचकर लाते हैं,

- गुलाब खण्डेलवाल
हमारे देश का समाजवाद,
मालगोदाम में लटकी हुई, उन बाल्टियों की तरह है,
जिन पर लिखा तो है-आग,
लेकिन भरी हुई है - बालू,

-- सुदामा पाण्डे,धूमिल


अपनी धरती पे सदियों से छाई हुई ,जुल्म और लूट की संगदिल रात है,
ये न समझो कि ये आज की बात है,ये न समझो कि ये आज की बात है,

जबसे धरती बनी,जब से दुनिया बसी हम यूँ ही जिन्दगी को तरसते रहे,
मौत की आँधियाँ बनके छा तीं रहीं, आग और खूँ के बादल बरसते रहे,

तुम भी मजबूर हो हम भी मजबूर हैं,क्या करें ये बुज़ुर्गों की सौगात है,
ये समझो कि ये आज की बात है,....

हम अंधेरी गुफाओं से निकले मगर रोशनी अपने सीनों से फूटी नहीं,
हमने जंगल तो शहरों बदले मगर, हमसे जंगल की तहज़़ीब छूटी नहीं,

अपनी बदनाम इंसानियत की कसम, अपनी हैवानियत आज भी साथ है,
ये न समझो कि ये आज की बात है......


हमने सुकरात को जहर की भेंट दी,और मसीहा को सूली का तख्ता दिया,
हमने गाँधी के सीने को छलनी किया, कनेडी सा जवाँ खूँ में नहला दिया,

हर मुसीबत जो इंसान पर आई है, इस मुसीबत में इंसान का हाथ है,
ये न समझो कि ये आज की बात है,

हिरोशिमा की झुलसी जमीं की कसम,नागासाकी की सुलगी फ़िजा की कसम,
जिन पे जंगल का कानून भी थूक दे, ऐटमी दौर के वो दरिन्दे हैं हम,

अपनी बढ़ती हुई नस्ल खुद फूँक दे,ऐसी बदजात अपनी ही एक जात है,
ये न समझो कि ये आज की बात है,

हम तबाही के रस्ते पे इतना बढ़े,अब तबाही का रस्ता ही बाकी नही,
खूने-इंसा जहाँ स़ागरों में बँटे,इसके आगे वो महफिल वो साकी नहीं,

इस अंधेरे की इतनी ही औकात थी,इसके आगे उजालों की बारात है,
ये न समझो कि ये आज की बात है,

(साहिर)