Wednesday, 27 November 2013

आई दिवाली,

(1)
आई दिवाली,
आई दिवाली,

दीपों की लड़ियाँ हँसीं,
खुशियों की घड़ियाँ हँसीं,

रोशनी बिखेर अपनी,
खिल-खिल फुलझड़ियाँ हँसीं,

हर घर हर चेहरे पर,
प्यारी सी मुस्कान लाई दिवाली,

आई दिवाली,
आई दिवाली,

चकरी लहरा नाची,
बकरी मिमिया नाची,

मुन्नी और चुन्नू संग,
झूम उठी माँ चाची,

डूबते अँधेरों में,
जगमगा उठे तन-मन,

भाई दिवाली,
आई दिवाली,

अँधियारा रोशन है,
गाता हरएक मन है,

हर घर हर गलियारे,
खुशियों का मौसम है,

रात अमावस काली,
रोशन हुई पल में,

छाई दिवाली
आईदिवाली,
 जीव और वन,

वन हैं धरती का श्रंगार,वन हैं कुदरत का उपहार,
वन के हैं उपयोग अपार, वन से उऋण न होंगे हम,
जीवन है ही जीव और वन,
वन से सीने में धड़कन, वन से गीतों में सरगम,
वन से खुशियों का मौसम,वन से जिन्दा हम और तुम,
जीवन है ही जीव और वन,

वन से दुनिया में हरियाली,वन से जीवन में खुशहाली,
वन से होली और दीवाली, वन जिन्दा तो जिन्दा हम,
जीवन है ही जीव और वन,

वन से है साँसों की डोर, वन से हैं खुशियाँ चंहु ओर,
वन है तभी नाचते मोर, वन से धरती पर सावन,
जीवन है ही जीव और वन,

वन से ही बनता वनराज,वन से तीतर हुदहुद बाज,
वन से बनें अनेकों साज,वन से औषधि और ईंधन,
जीवन है ही जीव और वन,

वन से चीते की रफ्तार,वन से हाथी की चिंघार,
वन के अनगिन उपहार,वन से कोयल की सरगम,
जीवन है ही जीव और वन,

वन से है उपयोगी फल,वन बादल से लेते जल,
वन से कविता गीत ग़ज़ल,वन जीवन का आकर्षन,
जीवन है ही

वन सेवा करते रह मौन,वन समान उपकारी कौन,
वन बिन सांस चलाता कौन,वन से मिलती आक्सीजन,
जीवन है ही जीव और वन,

आओ बादल, आओ बादल,
अब तो जल बरसाओ बादल,

चिप-चिप हुआ पसीने से तन,
लगता नहीं, कहीं भी ये मन,

धरती मांग रही है पानी,
इसकी चूनर फिर हो धानी,

जलता है हम सबका आँगन,
आकर अब बरसा दो सावन,

ताल-तलैया सब प्यासे है,
आने वाले चौमासे है,

जी भर-भर कर खूब नहाएं,
कागज़ की नावें तैराएं,

अब ना अधिक सताओ बादल,
अब तो जल बरसाओ बादल,

भइया करते हैं व्यायाम,

भइया करते हैं व्यायाम,

रोज सुबह वे जल्दी उठ कर,
नित्यक्रिया से निवृत होकर,
मंजन कर और मुँह को धोकर,
रोजाना कसरत करते हैं,
फिर करते हैं पूजा ध्यान,
भइया करते हैं व्यायाम,

सीना उनका काफी चौड़ा,
बड़ों-बड़ों का पंजा मोड़ा,
मुझसे कभी हुई जो गलती,
झट से कान पकड़ कर छोड़ा,
कहते है- आराम हराम,
भइया करते हैं व्यायाम,

प्रतिदिन ही वे पढ़ने जाते,
वापस आकर मुझे पढाते,
गन्दे बच्चे उन्हें न भाते,
मौसम के ताजे फल लाकर,
खाते खिलाते, सुबहो-शाम,
भइया करते हैं व्यायाम,
काश,जानवर बोल बोलते,
हम सबकी वे पोल खोलते,

कैसे उन्हें सताते हैं हम,
कितना उन्हें रुलाते हैं हम,

कौन क्रूर दिल अत्याचारी,
घोड़े कुत्ते गाय बेचारी,

आखिर को ये कौन बताए,
किसे जानवर बोला जाए,

दोनों की सच बात तोलते,
काश जानवर बोल बोलते,
अगर कहीं हम उड़ सकते जो,
चाँद- सितारे छू सकते तो,

कितना मज़ा हमें तब आता,
कोई नहीं हमको छू पाता,

उड़ते मस्ती भरे झूमते,
अपना प्यारा देश घूमते,

उड़ते जंगल, सागर, बगिया,
और देखते, सारी दुनिया,

दोस्त बनाते देश- देश के,
कुछ स्वदेश के,कुछ विदेश के,

संस्कृतियों से जुड़ सकते तो,
अगर कहीं हम उड़ सकते जो,
अगर आदमी को भी जो बच्चा होता,
सोचो प्यारे तब कितना अच्छा होता,

जनकर वह कहलाता सही जन्मदाता,
बच्चे दुख में कहते- ,मरे हाय पापा,

गृहस्थी के बंधन में ज्यादा बंध जाता,
तब इतना निश्चिंत न इंसां रह पाता,

होते कितने परिवर्तन सोच हँसी आती,
ये चौड़ा चकला सीना,बन जाता छाती,

कैसे देता ताने, अपनी घरवाली को,
रहता घर में फिर, बच्चों की रखवाली को,

लगन,समर्पण,स्नेह प्रेम सच्चा होता,
अगर आदमी के भी जो, बच्चा होता,
तिरंगे का सम्मान

बंदर मामा पहन पजामा,लेकर निकले कार,
बोले पापा अभी घूमकर,आते हम बाजार,
चौराहे पर मूँछों वाले,पुलिसमैन ने रोका,
कहाँ चले तुम बंदर भाई बने हवा का झोंका,
लाल पीले हरे,तिरंगे का करना सम्मान,
यातायात नियम का पालन,करो बचाओ जान,


खुदाऐ बरतर तेरी जमीं पर, जमीं की खातिर ये जंग क्यों है,
हर एक फतह-ओ-ज़फर के दामन पे,खूने-इंसा का रंग क्यों है,

जमीं भी तेरी है, हम भी तेरे ये मिल्कियत का सवाल क्यों है,
ये कत्लो -खूँ का रिवाज़ क्यों है,ये रस्से जंग-ओ-जवाल क्यों है,

जिन्हें तलब है जहान भर की,उन्हीं का दिल इतना तंग क्यों है,

ग़रीब माँओं शरीफ बहनों को अम्नो-इज़्जत की जिन्दगी दे,
जिन्हें अता की है तूने ताकत,उन्हें हिदायत की ऱोशनी दे,

सरों में कब्रो-गुरूर क्यों है,दिलों के शीशों पे जंग क्यों है,

कज़ा के रस्ते पे जाने वालों,को बच के आने की राह देना,
दिलों के गुलशन उजड़ न जाएं,मुहब्बतों को पनाह देना,

जहाँ में अपने वफा के बदले,ये जश्ने तीरो तफंग क्यों है,


Tuesday, 26 November 2013



मेट्रो रेल मेट्रो रेल ,
जैसे हो जादू का खेल,

दरवाजे हैं खुल जा सिम सिम,
अन्दर वातानुकूलित मौसम,
एक गई तो दूजी आई,
झगड़ा झंझट नहीं झमेल,
मेट्रो रेल मेट्रो रेल

दौड़े खंबों के ऊपर से,
कहीं सुरंगों के अन्दर से,
यह जा वह जा चलती ऐसे,
जैसे हो पानी में ह्वेल,
मेट्रो रेल मेट्रो रेल,

समय और पैसा है बचता,
सुविधाजनक परिवहन सस्ता,
तीन तीन मंज़िल नीचे जा,
चलती कोई हँसी न खेल,
मेट्रो रेल मेट्रो रेल,

आना जाना अब आसान,
लोग देखकर सब हैरान,
आटो बसें कार स्कूटर,
इसके आगे सब हैं फेल,
मेट्रो रेल मेट्रो रेल,

देखो इसमें धुँआ न धूल,
कूड़ा-करकट जाओ भूल,
दूषित पर्यावरण करे जो,
पड़े न कोयला पड़े न तेल,
मेट्रो रेल मेट्रो रेल,

शाहदरा से चली रिठाला,
यूनीवर्सिटी दफ़्तर आला,
गाज़ियाबाद,गुड़गाँव चलेगी,
नोयडा से होकर भंगेल,
मेट्रो रेल मेट्रो रेल,
दिल्ली की है शान मेट्रो,
हम सबका अभिमान मेट्रो,
समय कीमती कितना होता,
करवाती यह ज्ञान मेट्रो,

दोड़े खम्बों के ऊपर से,
बैठने वाले बैठें तनकर,
जमींदोज़ सुंरंगों में भी,
नवयुग का वरदान मेट्रो,

बैठ गया है एक बार जो,
चाहे बैठना बार-बार वो,
डी टी सी ब्लू लाइन आटो,
सबके काटे कान मेट्रो,

तेल न कोयला धुँआ न धूल,
कूड़ा-करकट जाओ भूल,
आज नहीं तो कल बनेगी,
यातायात की जान मेट्रो,

भारत की ये नई विरासत,
कोई करना नहीं शरारत,
आगे पीढ़ियाँ याद करेंगी,
ऐसा एक अभियान मेट्रो,
बादल ढोल बजाते आए,
ढ़म्म ढ़मा ढ़म ढ़म्म,
बूँदें नाच रह पत्तों पर,
छम्म छमा छम छम्म,

पत्ते झन्डों से लहराते,
फर फर फर फर फर्र,
हवा झुलाती झूला इनको,
सर सर सर सर सर्र,

आसमान में बिजली तड़के,
तड़ तड़ तड़ तड़ तड़,
आँधी पेड़ हिला देती,
तो फल जाते हैं झड़,

टकरा बादल रस खो देते,
आपस में मत लड़,
कविता खतम हुई अब,
मुन्नी थोड़ा सा तो पढ़,
अ़बस इस जान को हमने, हजारों रोग पाले हैं,
न जाने किस तरह से हम ये नाज़ुक दिल सँभाले हैं,

ये दुनियाँ है वो जिसके वास्ते,सौ जाँ भी दूँ कम है,
मैं हूँ जो फूल तो समझो,ये मेरा प्यारा गुलशन है,

भटकता फिर रहा हूँ शान्त कर लूँ मै जलन दिल की,
मगर पाई ख़बर अब तक न मैंने कोई मंज़िल की,

तुम अपने हाथ दोनों को उठा,उससे दुआ माँगो,
मेरी नाकामियों को राह मिल जाए पता माँगो,

मगर मालूम है मुझको कोई कुछ कर नहीं सकता,
मैं जबतक पा न लूँ उसको यक़ीनन मर नहीं सकता,

बदन जाए बदल लेकिन मुझे क्या मौत आएगी,
अगर आ भी गई पछताएगी,फिर लौट जाएगी,

भटकता फिरता है सूरज,जलन दिल में लिए अबतक,
न जाने क्या लिखा किस्मत में है मंज़िल मिले कबतक,

तड़पता है समन्दर भी, कोई तो दर्द है दिल का,
न जाने क्यों पता उसको,नहीं मिलता है मंज़िल का,

हवा भी सर पटकती है,न पाया उसने साजन को,
चली जाती है यूँ बेताब सी, बस उसके दर्शन को,

मेरी भी प्यास है पानी भरी एक ऐसी बदली की,
जो धरती के लिए खुद को मिटा दे ऐसी पगली सी,

मेरी हर पल ये कोशिश है कभी उसको नहीं भूलूँ,
जो दम निकले तो प्रीतम के लपक कर होंठ मैं चूमूँ,

हम जंगल के वृक्ष बनेंगे



गमले के पौधों का जीवन,
एक अजब दुख भरी कहानी,
हर हालत में खुश रहना है,
कहते जंगल के सैलानी,

जितनी ज्यादा तेज हवा हो,
उतना ही जड़ को पकड़ेंगे,
धरती माँ के अनगढ़ बेटे,
हम जंगल के वृक्ष बनेंगे,

जरा धूप में तेज हवा में,
गमले का पौधा मुरझाता,
पानी थोड़ा अधिक मिले जो,
तो उसका अन्तर खुल जाता,

तेज धूप से नहीं डरेंगे,
तूफानों में जड़ पकड़ेंगे,
मिट्टी से कटाव रोकेंगे,
हम जंगल के वृक्ष बनेंगे,

बढ़ना है छोटे हो जाएं,
माँ की गोदी में सो जाएं,
खुलते जाते अंग, धरा को,
लज्जा का आवरण उढ़ाएं,

पूर्ण समर्पित हो जाने तक,
अपना विजय लक्ष्य पाने तक,
हर बाधा स्वीकार करेंगे,
हम जंगल के वृक्ष बनेंगे,

एक दिन बैठी मैं अपने बागीचे,
खेल रही थी एक पेड़ के नीचे,

देखा चली आ रही एक परी थी,
अपनी दोनों ही आँखों को मींचे,

आँखें नीली, उसके बाल सुनहले,
चम-चम चमकें उसके वस्त्र रुपहले,

हाथ छड़ी उसके थी जादू वाली,
फूल झरे,सामने नज़र जो डाली,

बोली मुझसे, मेरे संग चलोगी,
परीलोक की बोलो सैर करोगी,

मैं भी थी तैयार, उड़ चले ऊपर,
बादल और पवन दोनों में घुसकर,

पहुँचे,घूमे,मौज मनाई ,आए,
आँख खुली तो मम्मी मुझे जगाए,

उठो चलो स्कूल बैग लो अपना,
टूट गया, मैंने देखा था सपना,
ये दुनियाँ दोरंगी है---
एक तरफ से रेशम ओढ़े,
एक तरफ से नंगी है,

एक तरफ अंधी दौलत की,
पागल ऐश परस्ती है,
एक तरफ जिस्मों की कीमत
रोटी से भी सस्ती है,

एक तरफ है सोनागाछी,
एक तरफ चौरंगी है,
ये दुनिया दोरंगी है,
खून अपना हो या पराया हो,नस्ले आदम का खून है आखिर,
जंग मशरिक में हो या मगरिब में अम्ने-आलम का खून है आखिर,

बम घरों पर गिरें कि सरहद पर, रुहे-तामीर जख़्म खाती है,
खेत अपने जलें कि औरों के, ज़ीस्त फाक़ों से तिलमिलाती है,

टैंक आगे बढ़ें या पीछे हटें, कोख धरती की बाँझ होती है,
फतह का जश्न हो,या हार का सोग,जिन्दगी मैय्यतों पे रोती है,

जंग तो खुद ही एक मसला है,जंग क्या मसअलों का हल होगी,
आग और खून आज बख्शेगी,भूख और एहतियाज कल देगी,

इसलिए अय शरीफ इंसानो,जंग टलती रहे तो बेहतर है,
आप और हम सभी के आँगन में, शम्मा जलती रहे तो बेहतर है,

वक्त से दिन और रात ,वक्त से कल और आज,
वक्त की हर शै गुलाम,वक्त का हर शै पे राज,

वक्त की पाबंद हैं आती जाती रौनकें,
वक्त है फूलों की सेज,वक्त है काँटों का ताज,

वक्त के आगे उड़ी, कितनी तहज़ीबों की धूल,
वक्त के आगे मिटे,कितने मज़हब और रिवाज़,

वक्त को गरदिश से है, चॉंद तारों का निज़ाम
वक्त की ठोकर में हैं, क्या हकूमत क्या समाज,

आदमी को चाहिए वक्त से डर कर रहे
कौन जाने किस घड़ी,वक्त का बदले मिज़ाज,

Monday, 25 November 2013

आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है,
भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है,

जब तुझसे न सुलझे तेरे उलझे हुए धंधे,
भगवान के इंसाफ पे सब छोड़ दे बंदे

खुद ही तेरी मुशकिल को वो आसान करेगा,
जो तू नहीं कर पाया वो भगवान करेगा,

आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है,
भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है,

कहने की ज़रूरत नहीं आना ही बहुत है,
इस दर पे तेरा शीश झुकाना ही बहुत है,

जो कुछ तेरे दिल में है सब उसको ख़बर है,
बंदे तेरे हर हाल पे मालिक की नज़र है,

आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है,
भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है,

बिन माँगे ही मिलती हैं यहाँ मन की मुरादें,
दिल साफ हो जिनका वो यहाँ आके सदा दें,

मिलता है जहाँ न्याय वो दरबार यही है,
संसार की सबसे बड़ी सरकार यही है,

आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है,
भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है,

Friday, 22 November 2013

नहीं है वो प्यार जिसको तुमने ओ मेरे दिलबर है प्यार जाना,
है प्यार वो नाम जिसके दम पर ये चल रहा आज भी ज़माना,

सुनो ज़माना है बस उसी का,जो प्यार में खो गया किसी के,
जो ग़म मिला तो नहीं है शिकवा,जो जाम पाया पिया खुशी से,

जो ख़ुदकुशी करके मर गए हैं, मुझे बताओ कि वे जिए हैं,
जहाँ की खुशियाँ जहाँ की रौनक़ जहाँ की जन्नत तेरे लिए है,

वो क़ाबिले-फ़ख़्र होगा इन्सां,जो मुश्किलों से लड़े बराबर,
जो दिल कहे वो ही सच समझकर मुसीबतों से भिड़े बराबर,

है प्यार ईसा है प्यार गाँधी समझ लो गंगा न समझो आँधी,
न कोई बन्धन है इससे बढ़कर, न इससे बढ़कर कोई भलाई,

हर इक जुबां पे है नाम इसका कि नफ़रतों को सलाम इसका,
है ये वो ताक़त कि जिसके बलपर मिलेगा तुझको हर इक ख़ज़ाना,

मुझे तो प्यारा न आसमां है ,मुझे है प्यारा यही ज़माना,
है प्यार वो नाम जिसके दम पर ये चल रहा आज भी ज़माना,

वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

इन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढ़लकेगा,
जब दुःख के बादल पिघलेंगेजब सुख का सूरज छलकेगा,

जब अम्बर झूम के नाचेगा,जब धरती नज़्में गाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

जिस सुबह की खातिर जुग-जुग से,हम सब मर-मर कर जीते हैं,
जिस सुबह के अमृत की धुन मे हम जहर के प्याले पीते हैं,

इन भूखी-प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फरमाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं,
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इन्सानों की क़ीमत कुछ भी नहीं,

इन्सानों की इज़्ज़त जब झूठे, सिक्कों में न तौली जाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

दौलत के लिए जब औरत की अस्मत को न बेचा जाएगा,
चाहत को न कुचला जाएगा, ग़ैरत को न बेचा जाएगा,

अपनी काली करतूतों पर, जब ये दुनिया शरमाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

बीतेंगे कभी तो दिन आखिर,ये भूख के और बेकारी के,
टूटेंगे कभी तो बुत आखिर,  दौलत की इज़ारादारी के,

जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

मजबूर बुढ़ापा जब, सूनी राहों की धूल न फाँकेगा,
मासूम लड़कपन जब,गंदी गलियों में भीख न माँगेगा,

हक़ माँगनेवालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

फ़ाक़ों की चिताओं पर जिस दिन इन्सां न जलाए जाएंगे,
सीनों के दहकते दोज़ख में  अरमां न जलाए जाएंगे,

ये नरक से भी गन्दी दुनियाँ जब स्वर्ग बनाई जाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,वो सुबह कभी तो आएगी,

Thursday, 21 November 2013


बस्ती-बस्ती परवत-परवत गाता जाए बन्जारा,
लेकर दिल का इकतारा,

पल दो पल का साथ हमारा,पल दो पल की यारी,
आज नहीं तो कल करनी है, चलने की तैयारी,
बस्ती-बस्ती परवत-परवत गाता जाए बन्जारा,
लेकर दिल का इकतारा,

कदम-कदम पर होनी बैठी अपना जाल बिछाए,
इस जीवन की राह में कोई कौन कहाँ रह जाए,
बस्ती-बस्ती परवत-परवत गाता जाए बन्जारा,
लेकर दिल का इकतारा,

धन-दौलत के पीछे क्यों है,ये दुनियाँ दीवानी,
यहाँ की दौलत यहीं रहेगी,साथ नहीं कुछ जानी,
बस्ती-बस्ती परवत-परवत गाता जाए बन्जारा,
लेकर दिल का इकतारा,

सोने-चाँदी में तुलता हो, जहाँ दिलों का प्यार,
आँसू भी बेकार वहाँ पर आहे भी बेकार,
बस्ती-बस्ती परवत-परवत गाता जाए बन्जारा,
लेकर दिल का इकतारा,

दुनियाँ के बाजार में आखिर चाहत भी व्यापार बनी,
तेरे दिल से उनके दिल तक,चाँदी की दीवार बनी,
बस्ती-बस्ती परवत-परवत गाता जाए बन्जारा,
लेकर दिल का इकतारा,

हम जैसों के भाग में लिक्खा चाहत का वरदान नहीं,
जिसने हमको जनम दिया,वो पत्थर है भगवान नहीं,
बस्ती-बस्ती परवत-परवत गाता जाए बन्जारा,
लेकर दिल का इकतारा,

Wednesday, 20 November 2013

शुभसंध्या मित्रो,

जिसे तू क़ुबूल कर ले, वो अदा कहाँ से लाऊँ,
तेरे दिल को लुभा ले, वो सदा कहाँ से लाऊँ,

मैं वो फूल हूँ कि जिसको गया हर कोई मसल के,
मेरी उम्र बह गई है, मेरे आँसुओं में ढ़ल के,

जो बहार बन के बरसे, वो घटा कहाँ से लाऊँ,
तेरे दिल को लुभा ले, वो सदा कहाँ से लाऊँ,

तुझे और की तमन्ना मुझे तेरी आरज़ू है,
तेरे दिल में ग़म ही ग़म हैं,मेरे दिल में तू ही तू है,

जो दिलों को चैन दे दे, वो दवा कहाँ से लाऊँ,
तेरे दिल को लुभा ले, वो सदा कहाँ से लाऊँ,

मेरी बेबसी है जाहिर मेरी आहे-बेअसर से,
कभी मौत भी जो माँगी,तो न पाई उसके दर से,

जो मुराद ले के आए, वो दुआ कहाँ से लाऊँ,
तेरे दिल को लुभा ले, वो सदा कहाँ से लाऊँ,

जिसे तू क़ुबूल कर ले, वो अदा कहाँ से लाऊँ,
तेरे दिल को लुभा ले, वो सदा कहाँ से लाऊँ,

(साहिर)

Tuesday, 19 November 2013



मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी,
मुझको रातों की सियाही के सिवा कुछ न मिला,

मैं वो नग्मा हूँ जिसे प्यार की महफ़िल न मिली,
वो मुसाफिर हूँ जिसे कोई भी मंज़िल न मिली,

जख़्म पाए हैं बहारों की तमन्ना की थी,
मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी,

किसी गेसू किसी आँचल का सहारा भी नहीं,
रास्ते में कोई धुँधला सा सितारा भी नहीं,

मेरी नज़रों ने नज़ारों की तमन्ना की थी,
मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी,

दिल में नाकाम उम्मीदों के बसेरे पाए,
रोशनी लेने को निकला तो अँधेरे पाए,

रंग और नूर के धारों की तमन्ना की थी,
मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी,

मेरी राहों से जुदा हो गईं राहें उनकी,
आज बदली नज़र आतीं हैं निगाहें उनकी,

जिनसे इस दिल ने सहारों की तमन्ना की थी,
मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी,

प्यार माँगा तो सिसकते हुए अरमान मिले,
चैन चाहा तो उमड़ते हुए तूफान मिले,

डूबते दिल ने किनारों की तमन्ना की थी,
मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी,

(साहिर)

Monday, 18 November 2013

जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला,
हमने तो जब कलियाँ माँगी काँटों का हार मिला

खुशियों की मंज़िल ढ़ूँढ़ी तो ग़म की गर्द मिली,
चाहत के नगमें चाहे तो आहें सर्द मिली,

दिल के बोझ को दूना कर गया जो ग़मख्वार मिला,
जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला,

बिछड़ गया हर साथी देकर पल  दो पल का साथ,
किसको फुरसत है जो थामे, दीवानों का हाथ,

हमको अपना साया भी अक्सर बेज़ार मिला,
जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला,

इसको ही जीना कहते हैं तो यूँ ही जी लेंगे,
उफ ना करेंगे लब सी लेंगे आँसू पी लेंगे,

ग़म से अब घबराना कैसा ग़म सौ बार मिला,
जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला,



तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले,
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले,

डरता है जमाने की निगाहों से भला क्या,
इन्साफ तेरे साथ है, इल्ज़ाम उठा ले,
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले,

क्या ख़ाक वो जीना है जो अपने ही लिए हो,
खुद मिट के किसी और को मिटने से बचा ले,
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले,

टूटे हुए पतवार हैं कश्ती के तो ग़म क्या,
हारी हुई बाँहों को ही पतवार बना ले,
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले,

(साहिर)

Sunday, 17 November 2013



जाने क्या तूने कही,जाने क्या मैंने सुनी,
बात कुछ बन ही गई,

सनसनाहट सी हुई,थरथराहट सी हुई,
जाग उठे ख्वाब कई,बात कुछ बन ही गई,

नैन झुक-झुक के उठे,पाँव रुक-रुक के उठे,
आ गई चाल नई,बात कुछ बन ही गई,

ज़ुल्फ़ शाने पे मुड़ी,एक खुश्बू सी उड़ी,
खुल गए राज़ कई,बात कुछ बन ही गई,

जाने क्या तूने कही,जाने क्या मैंने सुनी,
बात कुछ बन ही गई,

(साहिर)


हर वक्त तेरे हुश्न का होता है समां और,
हर वक्त मुझे चाहिए अन्दाज़े-बयां और,

फूलों सा कभी नर्म तो शोलों सा कभी गर्म,
मस्ताना अदा में,कभी शोखी है कभी शर्म,

हर सुबह गुमां और है, हर रात गुमां और,
हर वक्त तेरे हुश्न का होता है समां और,

भरने नहीं पातीं तेरे जल्बों से निगाहें,
थकने नहीं पातीं तुझे लिपटा के ये बाँहें,

छू लेने से होता है तेरा जिस्म जबां और,
हर वक्त तेरे हुश्न का होता है समां और,

(साहिर)
गंगा तेरा पानी अमृत झर-झर बहता जाए,
युग-युग से इस देश की धरती तुझसे जीवन पाए,

दूर हिमालय से तू आई गीत सुहाने गाती,
बस्ती-बस्ती पर्वत-पर्वत सुख संदेश सुनाती,

तेरी चाँदी जैसी धारा मीलों तक लहराए,
गंगा तेरा पानी अमृत झर-झर बहता जाए,

गंगा तेरा पानी अमृत झर-झर बहता जाए,
युग-युग से इस देश की धरती तुझसे जीवन पाए,

कितने सूरज डूबे उबरे गंगा तेरे द्वारे,
युगों-युगों की कथा सुनाएं तेरे बहते धारे,

तुझको छोड़ के भारत का इतिहास लिखा न जाए,
गंगा तेरा पानी अमृत झर-झर बहता जाए,

इस धरती का दुख सुख तूने अपने बीच समोया,
जब-जब देश गुलाम हुआ है तेरा पानी रोया,

जब-जब हम आजाद हुए हैं तेरे तट मुस्काए,
गंगा तेरा पानी अमृत झर-झर बहता जाए,

(साहिर)
हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग,
रो-रो के बात करने की आदत नहीं रही,
अब बुजुर्गों के फ़साने नहीं अच्छे लगते,
मेरे बच्चों को ये ताने नहीं अच्छे लगते,
बेटियाँ जबसे बड़ी होने लगीं हैं मेरी,
मुझको इस दौर के गाने नहीं अच्छे लगते,

साथी हाथ बढ़ाना,साथी हाथ बढ़ाना,
एक अकेला थक जाएगा,मिलकर बोझ उठाना,
साथी हाथ बढ़ाना,

हम मेहनत वालों ने जब भी मिलकर कदम बढ़ाया,
सागर ने रस्ता छोड़ा परवत ने शीश झुकाया,

फौलादी हैं सीने अपने फौलादी हैं बाँहें,
हम चाहें तो पैदाकर दें चट्टानों में राहें,
साथी हाथ बढ़ाना,

मेहनत अपने लेख की रेखा मेहनत से क्या डरना,
कल गैरों की खातिर की आज अपनी खातिर करना,

अपना दुख भी एक है साथी,अपना सुख भी एक,
अपनी मंज़िल सच की मंज़िल अपना रस्ता नेक,
साथी हाथ बढ़ाना,

एक से एक मिले तो क़तरा बन जाता है दरिया,
एक से एक मिले तो ज़र्रा बन जाता है सहरा,

एक से एक मिले तो राई बन सकती है परवत,
एक से एक मिले तो इंसां वश में कर ले किस्मत,
साथी हाथ बढ़ाना,

माटी से हम लाल निकालें,मोती लाएं जल से,
जो कुछ इस दुनिया में बना है बना हमारे बल से,

कब तक मेहनत के पैरों में दौलत की ज़ंजीरें ?
हाथ बढ़ाकर छीन लो अपने ख्वाबों की ताबीरे,
साथी हाथ बढ़ाना,
बहार आई,खिली कलियाँ,हँसे तारे,चले आओ,
हमें जीने नहीं देते ये नज़्जारे, चले आओ,


जबाँ पर आह बन-बन कर तुम्हारा नाम आता है,
मोहब्बत में तुम्हीं जीते, हमीं हारे चले आओ,

कहीं ऐसा न हो, दिल की लगी दिल ही को ले डूबे,
बुझाए से नहीं बुझते ये अंगारे, चले आओ,

इन्सी-मिन्सी माकड़ा, ऊपर चढ़ गया,
पानी जोर से बरसा,नीचे गिर गया,
सूरज चमकने लगा पानी सूख गया,
इन्सी-मिन्सी माकड़ा,फिर से चढ़ गया,
लाल टमाटर लाल टमाटर मैं तो तुमको खाऊँगा,

अभी न खाओ थोड़े दिन में और अधिक पक जाऊँगा,

लाल टमाटर लाल टमाटर मुझको भूख लगी भारी,

भूख लगी है तो तुम खा लो ये गाजर मूली सारी,

लाल टमाटर लाल टमाटर मुझको तुम ही भाते हो,

जो तुमको अच्छा लगता है उसको तुम क्यों खाते हो,

लाल टमाटर लाल टमाटर अच्छा तुम्हें न खाऊँगा,

लेकिन तुमको तोड़ डाल से अपने घर ले जाऊँगा,

(निरंकार देव सेवक)
जाग तुझको दूर जाना,
बाँध लेंगे क्या तुझे,ये मोम के बन्धन सजीले,
पन्थ की बाधा बनेंगे,तितलियों के पर रंगीले,
विश्व का क्रन्दन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,
क्या डुबो देंगे तुझे ये फूल के दल ओस गीले,
तू न अपनी छाँव को अपने लिए कारा बनाना,
जाग तुझको दूर जाना

(महादेवी वर्मा)
कहीं करार मिले और कहीं खुशी न मिले,
हमारे बाद किसी को ये जिन्दगी न मिले,

सियाह नसीब कोई उनसे बढ़ के क्या होगा,
जो अपना घर भी जला दें तो रोशनी न मिले,

यही सलूक है ग़र आदमी से दुनिया का,
तो कुछ अजब नहीं दुनिया में आदमी न मिले,

ये बेबसी भी किसी बददुआ से कम तो नहीं,
कि खुल के जी न सके और मौत भी न मिले,

(साहिर)

ये हवा ये हवा ये हवा...
ये फिज़ा ये फिज़ा ये फिज़ा...
है उदास जैसे मेरा दिल मेरा दिल...
आ भी जा आ भी जा आ भी जा ...

आ कि अब तो चाँदनी भी जर्द हो चली.. हो चली..
धड़कनों की नर्म आँच सर्द हो चली..हो चली..
ढ़ल ही है रात आ के मिल आ के मिल आ के मिल ..
आ भी जा आ भी जा आ भी जा ...

राह में बिछी हुई है मेरी हर नज़र.हर नज़र..
मैं तड़प रहा हूँ और तू है बेखबर. बेखबर..
रुक रही है साँस आ के मिल.आ के मिल..आ के मिल..
आ भी जा आ भी जा आ भी जा ...
ये हवा ये हवा ये हवा...


जाने क्या तूने कही,जाने क्या मैंने सुनी,
बात कुछ बन ही गई,

सनसनाहट सी हुई,थरथराहट सी हुई,
जाग उठे ख्वाब कई,बात कुछ बन ही गई,

नैन झुक-झुक के उठे,पाँव रुक-रुक के उठे,
आ गई चाल नई,बात कुछ बन ही गई,

ज़ुल्फ़ शाने पे मुड़ी,एक खुश्बू सी उड़ी,
खुल गए राज़ कई,बात कुछ बन ही गई,

जाने क्या तूने कही,जाने क्या मैंने सुनी,
बात कुछ बन ही गई,

(साहिर)

Wednesday, 13 November 2013



दीवारों का जंगल जिसका आबादी है नाम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,

दीवारों के इस जंगल में भटक रहे इंसान,
अपने-अपने उलझे दामन झटक रहे इंसान,

अपनी विपदा छोड़ के आए कौन किसी के काम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,

सीने खाली आँखें सूनी, चेहरों पर हैरानी,
जितने घने हँगामें इसमें, उतनी घनी उदासी,

रातें क़ातिल सुबहें मुज़रिम,मुल्ज़िम है हर शाम,
बाहर से चुप-चुप लगता है, अंदर है कोहराम,

हाल न पूछें दर्द न बाँटे, इस जंगल के लोग,
अपना-अपना सुख है सबका,अपना-अपना सोग,

कोई नहीं जो हाथ बढ़ाकर गिरतों को ले थाम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,

बेबस को दोषी ठहराए,इस जंगल का न्याय,
सच की लाश पे कोई न रोए,झूठ को शीश नवाए,

पत्थर की इन दीवारों में पत्थर हो गए राम,
बाहर से चुप-चुप लगता है अंदर है कोहराम,

- साहिर
लोग औरत को फ़कत जिस्म समझ लेते हैं,
रूह भी होती है उसमें ये कहाँ सोचते हैं,

रूह भी होती है इससे उन्हें मतलब ही नहीं,
वो तो बस तन के तकाजों का कहा मानते हैं,

रूह मर जाए तो हर जिस्म है चलती हुई लाश,
इस हक़ीकत को समझते हैं, न पहचानते हैं,

कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है,
कितनी सदियों से ये कायम है गुनाहों का रिवाज़,

लोग औरत की हर एक चीख को नग्मा समझे,
वो कबीलों का जमाना हो या शहरों का समाज,

जबर से नस्ल बढ़े ज़ुल्म से तन मेल करें,
जो अमल हममें है बे-इल्म परिन्दों में नहीं,

हम जो इन्सान की तहज़ीब लिए फिरते हैं,
हम सा वहशी कोई जंगल के दरिन्दों में नहीं,

एक मैं ही नहीं क्या जानिए कितनी होंगी,
जिनको अब आईना तकने में झिझक आती है,

जिनके ख्वाबों में न सेहरे हैं न सिन्दूर न सेज,
राख ही राख है जो ज़ेहन पे मँड़लाती है,

एक बुझी रूह,लुटे जिस्म के ढ़ाचे में लिए,
सोचती हूँ कि कहाँ जा के मुकद्दर फोड़ूँ,

मैं न जिन्दा हूँ के मरने का सहारा ढ़ूँढ़ूँ,
और न मुर्दा के जीने के ग़मों से छूटूँ,

कौन बतलाएगा मुझको,किसे जाकर पूछूँ,
जिंदगी कहर के साँचों में ढ़लेगी कब तक,

कब तलक आँख न खोलेगा जमाने का ज़मीर,
जुल्म और जबर की ये रीत चलेगी कब तक,

लोग औरत को फ़कत जिस्म समझ लेते हैं,

मुस्कराने के लिए है जिन्दगी
गीत गाने के लिए है जिन्दगी,

सिर झुका कर जो चले उनसे कहो,
सिर उठाने के लिए है जिन्दगी,

आँसुओं की बात करना छोड़ दो,
खिलखिलाने के लिए है जिन्दगी,

काम जो कोई न कर पाया उसे,
कर दिखाने के लिए है जिन्दगी,

हारने की बात क्यों मन में उठे,
जीत जाने के लिए है जिन्दगी,

मुस्कराने के लिए है जिन्दगी
गीत गाने के लिए है जिन्दगी,
मौत कितनी भी संगदिल हो मगर,जिन्दगी से तो मेहरबां होगी,

नित नए रंज दिल को देती है,जिन्दगी हर खुशी की दुश्मन है,
मौत सबसे निबाह करती है, जिन्दगी जिन्दगी की दुश्मन है,
कुछ न कुछ तो सुकून पाएगा,मौत के बस में जिसकी जाँ होगी,
मौत कितनी भी संगदिल हो मगर,जिन्दगी से तो मेहरबां होगी,

रंग और नस्ल नाम और दौलत,जिन्दगी कितने फर्क मानती है,
मौत हदबंदियों से ऊँची है, सारी दुनिया को एक मानती है,
जिन असूलों पे मर रहे हैं हम, उन असूलों की कद्रदाँ होगी,
मौत कितनी भी संगदिल हो मगर,जिन्दगी से तो मेहरबां होगी,

मौत से और कुछ मिले न मिले, जिन्दगी से तो जान छूटेगी,
मुस्कराहट नसीब हो कि न हो, आँसुओं की लड़ी तो टूटेगी,
हम न होंगे तो ग़म किसे होगा,खत्म हर ग़म की दास्ताँ होगी,
मौत कितनी भी संगदिल हो मगर,जिन्दगी से तो मेहरबां होगी,
कौन आया कि निगाहों में चमक जाग उठी,
दिल के सोए हुए तारों में ख़नक जाग उठी,

किस के आने की ख़बर ले के हवाएँ आईं,
जिस्म से फूल चटकने की सदाएँ आईं,

रूह खिलने लगी साँसों में महक जाग उठी,
दिल के सोए हुए तारों में ख़नक जाग उठी,

किसने ये मेरी नज़र देख के बाहें खोलीं,
शोख जज़बात ने सीने में निगाहें खोलीं,

होंठ तपने लगे ज़ुल्फों में लचक जाग उठी,
दिल के सोए हुए तारों में ख़नक जाग उठी,

किसके हाथों ने मेरे हाथों से कुछ माँगा है,
किसके ख्वाबों ने मेरी रातों से कुछ माँगा है,

साज़ बजने लगे आँचल में छनक जाग उठी,
दिल के सोए हुए तारों में ख़नक जाग उठी,

छू लेने दो नाजुक होठों को,
कुछ और नहीं है जाम है ये,

कुदरत ने जो हम को बक्शा है,
वो सबसे हसीं ईनाम हैं ये,

शरमा के न यूँ ही खो देना,
रंगीन जवानी की घड़ियाँ,

बेताब धड़कते सीनों का,
अरमान भरा पैग़ाम हैं ये,

अच्छों को बुरा साबित करना,
दुनिया की पुरानी आदत है,

इस मय को मुबारक चीज़ समझ,
माना कि बहुत बदनाम है ये,

कश्ती का खामोश सफर है,शाम भी है तन्हाई भी,
दूर किनारे पर बजती है,लहरों की शहनाई भी,

आज मुझे कुछ कहना है...

लेकिन ये शर्मीली निग़ाहें,मुझको इजाज़त दें तो कहूँ,
खुद मेरी बेताब उमंगें,थोड़ी फुरसत दें तो कहूँ,

आज मुझे कुछ कहना है...

जो कुछ तुमको कहना है,वो मेरे दिल की बात न हो,
जो है मेरे ख्वाबों की मंज़िल,उस मंज़िल की बात न हो,

कह भी दो जो कहना है...

कहते हुए डर लगता है,कहकर बात न खो बैठूँ,
यह जो ज़रा सा साथ मिला है,यह भी साथ न खो बैठूँ,

आज मुझे कुछ कहना है...

कब से तुम्हारे रस्ते में,मैं फूल बिछाए बैठी हूँ,
कह भी दो जो कहना है मैं आस लगाए बैठी हूँ,

कह भी दो जो कहना है...

दिल ने दिल की बात समझ ली,अब मुँह से क्या कहना है,
आज नहीं तो कल कह लेंगे, अब तो साथ ही रहना है,

कह भी दो जो कहना है,

छोड़ो,अब क्या कहना है,
साथी हाथ बढ़ाना,साथी हाथ बढ़ाना,
एक अकेला थक जाएगा,मिलकर बोझ उठाना,
साथी हाथ बढ़ाना,

हम मेहनत वालों ने जब भी मिलकर कदम बढ़ाया,
सागर ने रस्ता छोड़ा परवत ने शीश झुकाया,

फौलादी हैं सीने अपने फौलादी हैं बाँहें,
हम चाहें तो पैदाकर दें चट्टानों में राहें,
साथी हाथ बढ़ाना,

मेहनत अपने लेख की रेखा मेहनत से क्या डरना,
कल गैरों की खातिर की आज अपनी खातिर करना,

अपना दुख भी एक है साथी,अपना सुख भी एक,
अपनी मंज़िल सच की मंज़िल अपना रस्ता नेक,
साथी हाथ बढ़ाना,

एक से एक मिले तो क़तरा बन जाता है दरिया,
एक से एक मिले तो ज़र्रा बन जाता है सहरा,

एक से एक मिले तो राई बन सकती है परवत,
एक से एक मिले तो इंसां वश में कर ले किस्मत,
साथी हाथ बढ़ाना,

माटी से हम लाल निकालें,मोती लाएं जल से,
जो कुछ इस दुनिया में बना है बना हमारे बल से,

कब तक मेहनत के पैरों में दौलत की ज़ंजीरें ?
हाथ बढ़ाकर छीन लो अपने ख्वाबों की ताबीरे,
साथी हाथ बढ़ाना,


Friday, 8 November 2013


तुम न जाने किस जहाँ में खो गए,
हम भरी दुनियाँ में तन्हा हो गए,

मौत भी आती नहीं,आस भी जाती नहीं,
दिल को ये क्या हो गया,कोई शय भाती नहीं,

लूटकर मेरा जहाँ छुप गए हो तुम कहाँ,
तुम कहाँ,तुम कहाँ,तुम कहाँ,

तुम न जाने किस जहाँ में खो गए,
हम भरी दुनियाँ में तन्हा हो गए,

एक जाँ और लाख ग़म,घुट के रह जाए न दम,
आओ तुमको देख लें डूबती नज़रों से हम,

लूटकर मेरा जहाँ छुप गए हो तुम कहाँ,
तुम कहाँ,तुम कहाँ,तुम कहाँ,

तुम न जाने किस जहाँ में खो गए,
हम भरी दुनियाँ में तन्हा हो गए,
हो के मायूस तेरे दर से सवाली न गया,
झोलियाँ भर गईं सबकी,कोई खाली न गया,

तेरे दरबार में जो भी, परेशां हो के आए,
दुआएँ दे के जाए और मुरादें ले के जाए,

तू रहमत का फरिश्ता है,तू उजड़े घर बसाए,
तू रूहों का मसीहा है, तू हर ग़म को मिटाए,

अहले-दिल अहले-मोहब्बत पे इनायत है तेरी,
तूने डूबों को उबारा है, ये शोहरत है तेरी,

अनोखी शान तेरी, निराली आन तेरी,
तू मस्ती का खज़ाना,तेरा हर दिल दीवाना,

तू महबूबे-ख़ुदा है, तू हर ग़म की दवा है,
तभी तो सब कहते है,कहते है,कहते है,

हो के मायूस तेरे दर से, सवाली न गया,
झोलियाँ भर गईं सबकी,कोई खाली न गया,

जमाले-यार देखा है,जमाले-यार देखा,
रुखे-दिलदार देखा है,रुखे-दिलदार देखा,

किसी का नाज़नी जलबा सरे-दरबार देखा,
तमन्नाओं के सहरा में, हसीं-गुलजार देखा,

जब से देखा है तुझे,दिल का अजब आलम है,
जानो-ईमा भी अगर नज़र करूँ, तो कम है,

था जो सुनने में आया, तुझे वैसा ही पाया,
तू अरमानों का साहिल,तू उम्मीदों की मंज़िल,

तू हर बिगड़ी बनाए, तू बिछड़ों को मिलाए,
तभी तो सब कहते हैं,कहते हैं,कहते हैं,

हो के मायूस तेरे दर से, सवाली न गया,
झोलियाँ भर गईं सबकी,कोई खाली न गया
तोरा मनवा क्यों घबराए रे,
लाखों दीन दुखियारे प्रानी,जग में मुक्ति पाएँ रे,
राम जी के द्वार रे,

बन्द हुआ ये द्वार कभी ना,
जुग कितने ही-2 बीते,
सब द्वारों पर हारने वाले,
इस द्वारे पर-2 जीते,
लाखों पतित लाखों पतिताएँ,
पावन होकर आए रे,
रामजी के द्वार से,

तोरा मनवा क्यों घबराए रे,
लाखों दीन दुखियारे प्रानी,जग में मुक्ति पाएँ रे,
राम जी के द्वार रे,

हम मूरख जो काज बिगारें,
राम वे काज सँवारें,
वो महानंदा हो कि अहल्या,
सबको पार उतारें,
जो कंकर चरनों को छूले-2,
वो हीरा हो जाए रे,
राम जी के द्वार से,

तोरा मनवा क्यों घबराए रे,
लाखों दीन दुखियारे प्रानी,जग में मुक्ति पाएँ रे,
राम जी के द्वार रे,
आज की रात पिया दिल ना तोड़ो,
मन की बात पिया मान लो,

दिल की कहानी अपनी जुबानी,तुमको सुनाने आई हूँ,
आँखों में ले के सपने सुहाने,अपना बनाने आई हूँ,
छोड़ के साथ पिया मुख न मोड़ो,
मन की बात पिया मान लो,

आज की रात पिया दिल ना तोड़ो,
मन की बात पिया मान लो,

चन्दा भी देखें,तारे भी देखें,हमको गगन की ओट से,
घायल किया है,दिल तूने मेरा,मीठी नज़र की चोट से,
थाम के हाथ पिया.यूँ ना छोड़ो..
मन की बात पिया मान लो,

आज की रात पिया दिल ना तोड़ो,
मन की बात पिया मान लो,
हम और तुम,
तुम और हम,
खुश हैं यूँ आज मिलके,
जैसे किसी संगम पर,
मिल जाएँ दो नदियाँ,
तन्हा बहते-बहते,
मुड़ के क्यों देखे पीछे चाहे कुछ भी हो,
चलते ही जाएं नई मंज़िलो को,
रस्ते आसां है नहीं आज हम दो,
तू मेरी बाँहों में,मैं तेरी बाँहों में,
लहराएँ बाँहों में,
हम और तुम,
तुम और हम,
खुश हैं यूँ आज मिलके,
ज़ुल्फों को खुलने दो,
साँसों को घुलने दो,
दिल से दिल मिलने दो,
दीवाने हो जाएँ,
कोहरे में खो जाएँ,
मिलकर यूँ हो जाएँ,
जैसे किसी पर्वत पर,
मिल जाएँ दो बादल,
तन्हा उड़ते-उड़ते,
हम और तुम,
तुम और हम,
खुश हैं यूँ आज मिल के,
तेरी है जमीं तेरा आसमाँ,तू बड़ा मेहरबाँ,तू बख्शीश कर,
सभी का है तू सभी तेरे, खुदा मेरे तू बख्शीश कर,

तेरी मर्जी पे ऐ मालिक, हम इस दुनिया में आए हैं,
तेरी रहमत से हम सबने, ये जिस्म और जान पाए हैं,

तू अपनी नज़र हम पर रखना, किस हाल में हैं ये खबर रखना,
तेरी है जमीं तेरा आसमाँ, तू बड़ा मेहरबाँ,तू बख्शीश कर,

तू चाहे तो हमें रक्खे, तू चाहे तो हमें मारे,
तेरे आगे झुका के सर ,खड़े हैं आज हम सारे,

सबसे बड़ी ताकत वाले, तू चाहे तो हर आफत टाले,
तेरी है जमीं तेरा आसमाँ,तू बड़ा मेहरबाँ,तू बख्शीश कर,
ये रात ये चाँदनी फिर कहाँ,
सुन जा दिल की दास्ताँ,

पेड़ों की शाखों पे सोई-सोई चाँदनी,
तेरे खयालों में खोई-खोई चाँदनी,
और थोड़ी देर में थक के लौट जाएगी,
रात ये बहार की फिर कभी न आएगी,

दो एक पल और है ये समाँ,
सुन जा दिल की दास्ताँ,

लहरों के होठों पे धीमा-धीमा राग है,
भीगी हवाओं में ठन्ड़ी-ठन्ड़ी आग है,
इस हसीन आग में,तू भी जल के देख ले,
जिन्दगी के गीत की धुन बदल के देख ले,

खुलने दे अब धड़कनों की जवाँ,
सुन जा दिल की दास्ताँ,

जाती बहारें हैं उठती जवानियाँ,
तारों की छाँव में कह ले कहानियाँ,
एक बार चल दिए ग़र तुझे पुकार के,
लौटकर न आएँगे काफिले बहार के,

आजा अभी जिन्दगी है जवाँ,
सुन जा दिल की दास्ताँ,
तोरा मन दरपन कहलाए,
भले बुरे सारे कर्मो को,
देखे और दिखाए,
तोरा मन दरपन कहलाए,

मन ही देवता मन ही ईश्वर,
मन से बड़ा न कोए,
मन उजियारा जब-जब फैले,
जग उजियारा होए,
इस उजले दरपन पर प्रानी,
धूल न जमने पाए,
तोरा मन दरपन कहलाए,

सुख का कलियाँ,दुख के काँटे,
मन सबका आधार,
मन से कोई बात छुपे ना,
मन के नैन हजार,
जग से कोई भाग ले चाहे,
मन से भाग न पाए,
तोरा मन दरपन कहलाए,

तन की दौलत,ढ़लती छाया,
मन का धन अनमोल,
तन के कारण मन को अपने,
मत माटी में रोल,
मन की कदर भलाने वाला,
हीरा जनम गँवाए,
तोरा मन दरपन कहलाए,

(साहिर)