Wednesday, 27 November 2013


आओ बादल, आओ बादल,
अब तो जल बरसाओ बादल,

चिप-चिप हुआ पसीने से तन,
लगता नहीं, कहीं भी ये मन,

धरती मांग रही है पानी,
इसकी चूनर फिर हो धानी,

जलता है हम सबका आँगन,
आकर अब बरसा दो सावन,

ताल-तलैया सब प्यासे है,
आने वाले चौमासे है,

जी भर-भर कर खूब नहाएं,
कागज़ की नावें तैराएं,

अब ना अधिक सताओ बादल,
अब तो जल बरसाओ बादल,

3 comments:

Amit said...

baadl jaldi laao

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...



☆★☆★☆


अब ना अधिक सताओ बादल
अब तो जल बरसाओ बादल


सुंदर प्रवाहमयी रचना है...
आभार !

मंगलकामनाओं सहित...
राजेन्द्र स्वर्णकार

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...



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